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  "type": "article",
  "title": "बिस्तर पर जाते ही शरीर में कंपन और गिरने का अहसास क्यों होता है, जानिए न्यूरोलॉजिस्ट की सलाह",
  "summary": "सोते समय अचानक झटका महसूस होना या ऊंचाई से गिरने का अहसास आमतौर पर हिप्निक जर्क होता है, लेकिन बार-बार होने पर चिकित्सीय जांच आवश्यक है।",
  "content": "अक्सर बिस्तर पर लेटते ही जब आंखें बंद होने लगती हैं, तभी अचानक पूरा शरीर चौंक उठता है और ऐसा जान पड़ता है मानो कोई ऊंचाई से नीचे फिसल रहा हो। कई लोग इस अचानक होने वाली शारीरिक हलचल से चौंक कर उठ बैठते हैं और यह चिंता करने लगते हैं कि कहीं यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत तो नहीं है। चिकित्सा विज्ञान में नींद की शुरुआती अवस्था में पेशियों के इस तरह अचानक सिकुड़ने को फिजियोलॉजिकल मायोक्लोनस या आम बोलचाल में हिप्निक जर्क कहा जाता है। फरीदाबाद स्थित अमृता हॉस्पिटल के न्यूरोलॉजी विभाग में कार्यरत सीनियर कंसल्टेंट डॉ. अमित अग्रवाल का कहना है कि अधिकांश परिस्थितियों में यह एक पूर्णतः स्वाभाविक शारीरिक क्रिया है, लेकिन कुछ खास लक्षणों के साथ अगर यह बार-बार दोहराया जाए तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए।\n\nहिप्निक जर्क के पीछे की शारीरिक प्रक्रिया और गिरने का अहसास\nजब शरीर जागने की सक्रिय स्थिति से विश्राम और नींद की अवस्था में प्रवेश करता है, उस संक्रमण काल के दौरान मांसपेशियों में अचानक अनैच्छिक संकुचन उत्पन्न हो सकता है। यह झटका महज कुछ पलों का होता है और इसके तुरंत बाद शरीर अपनी सामान्य अवस्था में वापस आ जाता है। हालांकि विज्ञान के पास अभी तक इसका कोई एकमात्र सटीक और निर्णायक कारण नहीं है, फिर भी इसे एक बेहद स्वाभाविक अनुभव माना गया है। कई बार सोते समय ऐसा महसूस होता है जैसे व्यक्ति किसी खाई या सीढ़ी से नीचे गिर रहा हो, जिससे मांसपेशियों में तीव्र खिंचाव आता है। यदि यह अनुभव कभी-कभार ही होता है और दिनचर्या को बाधित नहीं करता, तो भयभीत होने की आवश्यकता नहीं होती है।\n\nकब सामान्य नहीं रह जाता नींद का यह झटका\nनींद आने की शुरुआती दहलीज पर होने वाले क्षणिक और हल्के झटके अधिकांश लोगों में सामान्य माने जाते हैं और इसके लिए अस्पताल जाने या दवा लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती। परंतु हर प्रकार के झटके को सामान्य मानना स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अनुचित हो सकता है। यदि यह स्थिति केवल कभी-कभार तक सीमित न रहकर हर रात बार-बार होने लगे, रात में कई दफा नींद टूट जाए और झटके के बाद व्यक्ति की चेतना या प्रतिक्रिया सामान्य न रहे, तो विस्तृत चिकित्सीय जांच कराई जानी चाहिए। जब शरीर का यह अनैच्छिक खिंचाव सामान्य विश्राम में बाधा पहुंचाने लगे, तब विशेषज्ञ न्यूरोलॉजिस्ट से परामर्श लेना ही सुरक्षित कदम होता है।\n\nसाधारण हिप्निक जर्क और मिर्गी के दौरे में मुख्य अंतर\nडॉ. अमित अग्रवाल के अनुसार, साधारण हिप्निक जर्क और मिर्गी यानी सीजर के बीच भेद करने के लिए झटके के समय और उसके बाद की स्थिति का बारीकी से अवलोकन करना अत्यंत आवश्यक है। यदि झटका केवल बिस्तर पर लेटने और नींद की झपकी लगते समय ही आता है और कुछ ही क्षणों में व्यक्ति पूरी तरह सचेत होकर सामान्य हो जाता है, तो यह हानिरहित हिप्निक जर्क है। इसके विपरीत, यदि झटका आने के बाद व्यक्ति तुरंत सामान्य नहीं हो पाता, आसपास के लोगों की बातों का उत्तर देने में असमर्थ रहता है या कुछ समय तक भारी उलझन और असमंजस की स्थिति में रहता है, तो यह चिंताजनक संकेत है। ऐसी स्थिति में मिर्गी के दौरे की संभावना को ध्यान में रखते हुए चिकित्सकीय परीक्षण कराना जरूरी हो जाता है।\n\nइसके अलावा, यदि झटके केवल नींद की शुरुआत में न आकर गहरी नींद के दौरान भी लगातार चलते रहें या पूरी रात बार-बार दोहराए जाएं, तो उन्हें कतई नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सामान्य शारीरिक मायोक्लोनस मुख्य रूप से नींद में प्रवेश करते समय ही घटित होता है, जबकि गहरी नींद में बार-बार होने वाले असामान्य झटकों के पीछे तंत्रिका तंत्र से जुड़ी कोई अन्य जटिल समस्या हो सकती है।\n\nन्यूरोलॉजिस्ट से जांच कराने के अहम लक्षण और विकार\nजब शरीर में झटके बार-बार आएं, प्रत्येक झटके का स्वरूप लगभग एक जैसा हो और बार-बार नींद टूटने से मानसिक व शारीरिक थकान बनी रहे, तो न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए। आम लोगों में यह धारणा होती है कि मिर्गी के दौरे में हमेशा हाथ-पैर अकड़ जाना या जीभ का कट जाना ही अनिवार्य लक्षण होता है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। कुछ मामलों में केवल मांसपेशियों में अचानक आने वाले झटके भी मिर्गी का रूप हो सकते हैं, जिसे चिकित्सकीय भाषा में मायोक्लोनिक सीजर कहा जाता है।\n\nइसके साथ ही, नींद से जुड़े अन्य विकार भी असामान्य शारीरिक गतिविधियों के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। इनमें पैरासोम्निया और पीरियोडिक लिम्ब मूवमेंट डिसऑर्डर प्रमुख हैं। पीरियोडिक लिम्ब मूवमेंट डिसऑर्डर में व्यक्ति के सोते समय उसके हाथ-पैरों, विशेषकर पैरों में, बार-बार अनियंत्रित और अनैच्छिक हलचल होती रहती है। इसी कारण झटके आने के समय, उसकी तीव्रता और व्यवहार को समझकर सही निदान तक पहुंचना आवश्यक होता है।\n\nतनाव, नींद का अभाव और मोबाइल स्क्रीन का प्रभाव\nवर्तमान जीवनशैली में अधूरी नींद, मानसिक तनाव और अत्यधिक शारीरिक थकान नींद से संबंधित इन झटकों की आवृत्ति को काफी बढ़ा सकते हैं। अत्यधिक कैफीन का सेवन भी केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को उत्तेजित कर नींद की गुणवत्ता और शारीरिक गतिविधियों पर नकारात्मक असर डालता है। आजकल बहुत से लोग रात को सोने से पहले बिस्तर पर घंटों मोबाइल फोन का प्रयोग करते हैं और स्क्रीन देखते-देखते ही सो जाते हैं। देर रात तक स्क्रीन देखने से निकलने वाली रोशनी, अपर्याप्त नींद और थकान मिलकर नींद के चक्र को अस्त-व्यस्त कर देते हैं, जिससे सोते समय झटके महसूस होने की संभावना और अधिक प्रबल हो जाती है।\n\nस्वस्थ नींद के लिए आवश्यक सावधानियां और दिनचर्या\nनींद की गुणवत्ता बनाए रखने और अनैच्छिक झटकों की समस्या को कम करने के लिए नियमित समय पर सोने और जागने की दिनचर्या बनाना आवश्यक है। प्रतिदिन पर्याप्त नींद लेना, दिनभर के तनाव को कम करने का प्रयास करना और रात में सोने से पूर्व मोबाइल स्क्रीन के इस्तेमाल को सीमित करना बेहद जरूरी कदम हैं। यदि इन जीवनशैली सुधारों और सावधानियों को अपनाने के बाद भी रात में झटके लगातार आते रहें या उनके साथ चेतना में भ्रम जैसे असामान्य लक्षण दिखाई दें, तो बिना किसी देरी के किसी योग्य न्यूरोलॉजिस्ट से मिलकर परामर्श लेना चाहिए।\n\nइसका आप पर असर\nसोते समय शरीर में लगने वाले झटके आपकी नींद की गुणवत्ता और संपूर्ण स्वास्थ्य दिनचर्या को सीधे प्रभावित कर सकते हैं।\n\n• दैनिक नींद की गुणवत्ता: अचानक लगने वाले सामान्य झटके कभी-कभार होने पर नुकसानदेह नहीं होते। यदि यह समस्या रोज रात बार-बार नींद तोड़ने लगे, तो दिनभर थकान और सुस्ती बनी रह सकती है।\n• स्क्रीन टाइम और जीवनशैली: देर रात मोबाइल इस्तेमाल करने और कैफीन लेने से ये शारीरिक झटके बढ़ सकते हैं। सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाकर और तय समय पर सोकर इस असुविधा से बचा जा सकता है।\n• चिकित्सीय जांच की जरूरत: यदि झटके के बाद व्यक्ति को भ्रम महसूस हो या बात करने में परेशानी आए, तो यह केवल सामान्य थकान नहीं है। ऐसी स्थिति में देरी किए बिना किसी न्यूरोलॉजिस्ट से परामर्श लेकर जांच करानी चाहिए।\n• तनाव और विश्राम का प्रबंधन: अत्यधिक मानसिक तनाव और मांसपेशियों की थकान इस परेशानी को बढ़ा देती है। नियमित योग, ध्यान और पर्याप्त आराम अपनाकर शरीर के नर्वस सिस्टम को शांत रखा जा सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nनींद की शुरुआत में शरीर में झटका लगना जागने से सोने की अवस्था में परिवर्तन के दौरान मांसपेशियों की एक अनैच्छिक शारीरिक प्रतिक्रिया है। इस स्थिति के पीछे जीवनशैली से जुड़े कारक और संभावित न्यूरोलॉजिकल कारण दोनों जिम्मेदार हो सकते हैं।\n\n• मांसपेशियों का अनैच्छिक संकुचन: जब मस्तिष्क शरीर को विश्राम की मुद्रा में भेज रहा होता है, तब पेशियों में अचानक संक्षिप्त खिंचाव पैदा हो जाता है। इसी क्षणिक प्रक्रिया के कारण व्यक्ति को ऊंचाई से फिसलने या गिरने का आभास होता है।\n• तनाव, थकान और स्क्रीन का असर: मानसिक तनाव, पर्याप्त नींद न मिलना और अत्यधिक थकान तंत्रिका तंत्र को अतिसंवेदनशील बना देते हैं। रात में देर तक मोबाइल फोन चलाने और कैफीन के अधिक सेवन से इस तरह के झटकों की आवृत्ति बढ़ जाती है।\n• संभावित न्यूरोलॉजिकल विकार: यदि झटके गहरी नींद में आएं या बार-बार दोहराए जाएं, तो यह मायोक्लोनिक सीजर, पैरासोम्निया या पीरियोडिक लिम्ब मूवमेंट डिसऑर्डर से जुड़ा हो सकता है। ऐसे लक्षणों में सटीक कारण जानने के लिए चिकित्सीय परीक्षण आवश्यक होता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सोते समय शरीर में अचानक झटका क्यों महसूस होता है?\nजागने की स्थिति से नींद में प्रवेश करते समय मांसपेशियों में अचानक अनैच्छिक संकुचन होता है, जिसे हिप्निक जर्क या फिजियोलॉजिकल मायोक्लोनस कहा जाता है।\n\n2. क्या सोते समय गिरने का अहसास होना किसी गंभीर बीमारी का संकेत है?\nयदि यह अहसास कभी-कभार ही नींद आते समय होता है तो यह पूरी तरह सामान्य है और किसी बीमारी का संकेत नहीं है।\n\n3. सामान्य झटके और मिर्गी के दौरे में क्या अंतर होता है?\nसामान्य झटका कुछ ही पलों में ठीक हो जाता है, जबकि मिर्गी के दौरे के बाद व्यक्ति तुरंत सामान्य नहीं हो पाता और कुछ समय तक भ्रम या असमंजस में रह सकता है।\n\n4. किन परिस्थितियों में न्यूरोलॉजिस्ट को दिखाना जरूरी हो जाता है?\nयदि रातभर बार-बार झटके आएं, गहरी नींद में भी हलचल हो, नींद लगातार टूटे या झटके के बाद व्यक्ति असामान्य प्रतिक्रिया दे, तो न्यूरोलॉजिस्ट से जांच करानी चाहिए।\n\n5. क्या मोबाइल फोन का देर रात तक इस्तेमाल इन झटकों को बढ़ा सकता है?\nहां, देर रात तक मोबाइल स्क्रीन देखना, नींद की कमी, मानसिक तनाव और कैफीन का अधिक सेवन इन झटकों की संभावना को बढ़ा देते हैं।\n\n6. पीरियोडिक लिम्ब मूवमेंट डिसऑर्डर क्या होता है?\nयह नींद से जुड़ा एक विकार है जिसमें सोते समय व्यक्ति के हाथ-पैरों, खासकर पैरों में बार-बार अनैच्छिक हलचल होती है।",
  "url": "https://trendkia.com/health/bistara-para-jate-hi-sharira-men-knpana-aura-girane-ka-ahasasa-kyon-hota-hai-janie-neurologist-ki-salaha-45766",
  "category": "स्वास्थ्य",
  "publishedAt": "2026-10-10",
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