चिम्पांजी समाज का सच्चा सबक: पुरुष दोस्ती में आक्रामकता नहीं बल्कि भरोसा और अपनापन तय करते हैं असली ताकत इंटरनेट पर अक्सर अल्फा मेल की आक्रामक छवि बेची जाती है, लेकिन वन्यजीव शोध साबित करते हैं कि चिम्पांजी समूहों में लंबे समय तक वही नर टिकते हैं जो साथियों की देखभाल, शारीरिक स्पर्श और परस्पर गठबंधन को प्राथमिकता देते हैं। पश्चिमी समाज में हाल के वर्षों में आर्थिक ढांचे में आए बड़े बदलावों के चलते युवा पुरुषों और लड़कों को एक अजीब खालीपन का सामना करना पड़ रहा है। परंपरागत मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों और शारीरिक श्रम वाले रोजगार के घटते अवसरों ने एक बड़े वर्ग को दिशाहीन और उपेक्षित महसूस कराया है। जब पहचान और उद्देश्य का संकट गहराता है, तब भटकाव और शोषण की आशंकाएं तेजी से बढ़ती हैं। इसी सामाजिक खालीपन को भुनाते हुए सोशल मीडिया पर एक ऐसा वर्ग सक्रिय हो गया है जो विकासवादी विज्ञान की मनगढ़ंत व्याख्याएं पेश करता है। हर रात मोबाइल स्क्रीन पर जहरीले उपदेश परोसे जाते हैं, जिनमें मर्दानगी हासिल करने, खुद को मजबूत साबित करने और दुनिया के प्रति क्रूर बनने की वकालत की जाती है। जीवविज्ञान का वास्तविक सच इस उग्र सोच से बिल्कुल उलट है। कुदरत का नियम केवल अंधाधुंध प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि सहयोग भी है। चाहे वह जमीन के नीचे फंगल नेटवर्क द्वारा पोषक तत्वों का परस्पर आदान प्रदान हो या फिर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा साझा जिम्मेदारियां निभाना हो, हर जीव संतुलन बनाकर ही जिंदा रहता है। पशु जगत के विस्तृत शोध दर्शाते हैं कि मिलजुलकर काम करने से पुरुषत्व या ताकत में कोई कमी नहीं आती। प्राइमेट्स में शीर्ष नर अपनी शक्ति का प्रयोग बहुत सूझबूझ और संयम से करते हैं। वहां पुरुषों की दोस्ती की बुनियाद आपसी देखभाल, स्नेहपूर्ण स्पर्श और एक दूसरे के सामने सहज होने पर टिकी होती है। इंटरनेट पर गढ़ी गई अल्फा की एकांगी और हिंसक छवि हकीकत की कसौटी पर टिक नहीं पाती। अल्फा की भ्रामक छवि और प्रकृति का वास्तविक संतुलन कथित मर्दानगी की पैरवी करने वाले लोग 'अल्फा मेल' की धारणा को बहुत गलत तरीके से पेश करते हैं। कुछ नेता और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स यह मान बैठते हैं कि आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका दूसरों को दबाना और कमजोरों को पीछे छोड़ना है। असलियत में प्राइमेट्स में दबदबा रखने वाले नर अपने संबंधों का बेहद ख्याल रखते हैं और सत्ता को हिंसक ताकत के बजाय कूटनीति से संभालते हैं। चिम्पांजी समूहों में यह सच है कि शक्ति का एक पदानुक्रम होता है, जहां एक नर दूसरे के आगे झुकता है और शीर्ष पद पर मौजूद नर अधिक संतानों को जन्म देने का अवसर पाता है। इसके लिए आपस में तीखी प्रतिद्वंद्विता भी होती है जो कई बार शारीरिक टकराव तक पहुंच जाती है। इस सतही तस्वीर के पीछे जो गहरा सच छिपा है, वह है चिम्पांजी पुरुषों के बीच का अटूट सहयोग और कोमल स्पर्श। दिन प्रतिदिन के जीवन में अधिकांश तनाव कभी खूनी जंग में तब्दील नहीं होता। चिम्पांजी समाज को शीर्ष पर बैठा अकेला नर नहीं चलाता, बल्कि उसके नीचे बने मजबूत गठबंधन उसे थामे रखते हैं। नर साथी घंटों बैठकर एक दूसरे के शरीर की सफाई करते हैं, जिसे ग्रूमिंग कहा जाता है। किसी विवाद के बाद वे गले मिलते हैं और भविष्य की प्रतिस्पर्धा से पहले तनाव दूर करने के लिए सहयोगियों के कंधों व बाजुओं को चूमते हैं। सीमावर्ती गश्त जैसे जोखिम भरे अभियानों पर निकलने से पहले, जहां प्रतिद्वंद्वी झुंडों से जानलेवा झड़प का खतरा होता है, वे आपसी भरोसे के प्रतीक के तौर पर एक दूसरे के जननांगों को छूते हैं। गोम्बे में करीब तीन दशकों तक चले आंकड़ों से साफ हुआ कि जिन नरों के अल्फा के साथ घनिष्ठ संबंध थे या जिनका अपना व्यापक मित्र नेटवर्क था, वे संतानों के मामले में ज्यादा सफल रहे, भले ही वे खुद कभी शीर्ष पद तक न पहुंचे हों। इन गठबंधनों की असली अहमियत तब दिखती है जब शक्ति संतुलन बिगड़ता है। कोटे डी आइवर के ताई नेशनल पार्क में अन्ना प्रिस और उनके सहयोगियों द्वारा किए गए अध्ययन में स्थिर और अस्थिर दौर के दौरान नरों के यूरिनरी कोर्टिसोल की जांच की गई। नतीजे बताते हैं कि जब पदानुक्रम अस्थिर होता है, तो रैंक की परवाह किए बिना हर नर का तनाव स्तर बढ़ जाता है। वहीं दूसरी तरफ, आक्रामकता तब बढ़ती है जब माहौल पूरी तरह शांत होता है और समूह टूटने का खतरा कम रहता है। लेकिन जब टकराव के विनाशकारी होने की संभावना सबसे ज्यादा होती है, तब नर अपने कदम पीछे खींच लेते हैं। कोई भी समूह खुद आपस में लड़कर अपनी सीमाओं की रक्षा नहीं कर सकता, इसलिए स्थिरता बनाए रखना हर किसी के हित में होता है। यहां तक कि 'अल्फा' शब्द की उत्पत्ति भी एक विकृत प्रयोग से हुई थी। बीसवीं सदी के मध्य में कैद में रखे गए भेड़ियों पर किए गए शोध से यह शब्द निकला था, जहां अनजान भेड़ियों को एक छोटे बाड़े में बिना भागने की जगह के ठूंस दिया गया था। किसी भी प्रजाति को अगर ऐसी तंग जगह में बंद किया जाए, तो वहां निरंकुश और आक्रामक व्यवहार पैदा होना स्वाभाविक है। जब बाद में जीवविज्ञानियों ने खुले जंगलों में भेड़ियों के झुंडों का अध्ययन किया, तो पाया कि वे असल में सामान्य परिवार होते हैं, जिनमें एक प्रजनन जोड़ा और उनकी संताने होती हैं। इस शब्द को लोकप्रिय बनाने वाले जीवविज्ञानी एल. डेविड मेक ने खुद पिछले दो दशकों से लोगों से अपील की है कि वे इस शब्द का इस्तेमाल बंद करें ताकि प्रकृति के वास्तविक स्वरूप को समझा जा सके। इसके बावजूद पॉडकास्ट और सोशल मीडिया पर यह गलत अवधारणा आज भी बेची जा रही है। संकट में अल्फा को पूरे समूह से मिली सांत्वना प्राकृतिक दुनिया में अपनी संवेदनशीलता दिखाना और सांत्वना पाना इंसानों के लिए एक बहुत बड़ी सीख है। जाम्बिया के एक वन्यजीव अभयारण्य में डग नाम के एक पुराने अल्फा नर चिम्पांजी के व्यवहार को लंबे समय तक करीब से देखा गया। समूह के दैनिक प्रबंधन के दौरान एक बार डग को एक युवा प्रतिद्वंद्वी और उसके पिता के साथ समूह से कुछ देर के लिए अलग रखा गया। उस अलगाव के दौरान उन दोनों ने मिलकर अचानक डग पर घात लगाकर हमला कर दिया, जिससे वह बुरी तरह घबरा गया। एक ऐसा निडर नेता जो कभी अपना संयम नहीं खोता था, अचानक भयभीत होकर चीखने लगा। जैसे ही समूह दोबारा मिला, एक बहुत ही निचले पायदान वाले नर ने, जिस पर डग ने पहले कभी ध्यान नहीं दिया था, सबसे पहले आगे बढ़कर समर्पण का भाव जताया। इसके बाद जो हुआ वह असाधारण था। झुंड के लगभग 40 चिम्पांजी डग के चारों तरफ इकट्ठा हो गए। उन्होंने डग को गले लगाया, चूमा, स्पर्श किया, जननांगों का संपर्क साझा किया और अपना हाथ उसके मुंह में डाला। किसी संकट के समय एक अकेले नेता के प्रति पूरे समूह की इस स्तर की सहानुभूति और सांत्वना इंसानी प्रेम और करुणा जैसी ही थी। इस अध्ययन का प्राथमिक उद्देश्य सांत्वना देने के व्यवहार को समझना था कि चिम्पांजी और बोनोबो लड़ाई के बाद एक दूसरे को कैसे ढांढस बंधाते हैं। लेकिन शोध के दौरान यह भी सामने आया कि बिना किसी झगड़े के भी, केवल आगामी प्रतिस्पर्धा की आशंका के समय, ऐसे दोस्ताना शारीरिक संपर्क बहुत बढ़ जाते हैं। दो अभयारण्यों के पांच समूहों के 116 वानरों को भोजन दिए जाने से पहले पांच मिनट के अंतराल में रिकॉर्ड किया गया। परिणाम दर्शाते हैं कि भोजन मिलने से पहले जिन वानरों ने एक दूसरे को आश्वस्त करने वाला स्पर्श दिया था, उन्होंने बाद में बिना किसी हिंसक टकराव के शांतिपूर्वक भोजन साझा किया। चिम्पांजी समाज में यह प्रवृत्ति नरों में अधिक थी, विशेषकर डग के सहिष्णु समूह में। इसके विपरीत, जिस समूह में सत्ता निरंकुश थी और संसाधन असमान थे, वहां नरों के आपसी संबंध बहुत कमजोर पाए गए। साफ है कि नरों के बीच दोस्ती और भरोसा ही शांतिपूर्ण समाज की नींव रखते हैं। इस तरह के व्यवहार में जानलेवा जोखिम होता है। किसी घायल या तनावग्रस्त चिम्पांजी के मुंह में अपनी उंगली या हाथ डालना बेहद खतरनाक है, क्योंकि उनके नुकीले दांत और अंगों को चबा डालने की प्रवृत्ति किसी से छिपी नहीं है। अगर दूसरा साथी इसे हमला मान ले तो भयानक हिंसा भड़क सकती है। लेकिन ठीक यही बात इस व्यवहार को भरोसे का सबसे बड़ा पैमाना बनाती है। कोई जीव अपनी सबसे कमजोर स्थिति उसी के सामने पेश करता है जिस पर उसे पूरा यकीन हो। डग अपने समूह में लगातार वर्षों से अल्फा बना रहा क्योंकि उसने अपने साथियों में निवेश किया, उनकी जरूरतों को समझा और संसाधनों का उचित वितरण किया। वह कोई पूर्ण या दोषरहित प्राणी नहीं था और कभी-कभार सामान्य चिम्पांजी की तरह गुस्सा भी करता था, लेकिन सहयोग की नीति ने उसे सात वर्षों तक निर्विवाद नेता बनाए रखा। स्पर्श की शक्ति और खेल जगत के उदाहरण चिम्पांजी नरों की कोमलता का एक और पहलू उनके द्वारा अनाथ बच्चों को गोद लेने में दिखता है। ताई नेशनल पार्क में दर्ज मामलों के अनुसार, अनाथ बच्चों को अपनाने वालों में आधे से अधिक वयस्क नर थे, जिनका उन बच्चों से कोई जैविक रिश्ता नहीं था। पोर्थोस नाम के एक वयस्क नर ने जिया नाम की एक लावारिस मादा बच्ची को गोद लिया, सालों तक उसे अपनी पीठ पर ढोया और खाना साझा किया, जबकि उसकी मृत मां के प्रति उसका कोई सामाजिक दायित्व शेष नहीं था। विश्लेषण से पता चला कि यह फैसला इस बात से तय हुआ था कि बच्चे की मां के जीवित रहते पोर्थोस के उसके साथ ग्रूमिंग के रिश्ते कितने प्रगाढ़ थे। मानव जीवन में भी स्पर्श की अपनी एक मूक भाषा होती है। पांच यूरोपीय संस्कृतियों पर किए गए शोध से पता चला कि आप शरीर के किस हिस्से पर किसे छूने की अनुमति देते हैं, यह आपके भावनात्मक जुड़ाव पर निर्भर करता है। ब्रिटिश लोग अपने यूरोपीय पड़ोसियों की तुलना में आकस्मिक स्पर्श को लेकर अधिक संकोची होते हैं, और पश्चिमी समाजों में पुरुषों के बीच स्पर्श को अक्सर गलत नजरिए से देखा जाता है। हालांकि हाथ पकड़ना या कंधे पर हाथ रखना कभी-कभार दबाव बनाने का जरिया भी हो सकता है, लेकिन इसका सही इस्तेमाल अपनत्व और हौसला बढ़ाता है। स्पर्श की यह ताकत खेलों में सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। 2008 और 2009 के सत्र के दौरान एनबीए की सभी 30 बास्केटबॉल टीमों के अध्ययन से यह साबित हुआ कि जो टीमें शुरुआती सत्र में चेस्ट बम्प, हाई फाइव, गले मिलने और फिस्ट बम्प के जरिए अधिक शारीरिक संपर्क रखती थीं, उन्होंने बाद में अधिक सहयोगात्मक खेल दिखाया और शानदार प्रदर्शन किया। महिलाओं के कॉलेज बास्केटबॉल में देखा गया कि जब कोई खिलाड़ी पहला फ्री थ्रो चूक जाती है, तो साथियों द्वारा तुरंत पीठ थपथपाने या छूने पर उसके द्वारा दूसरा थ्रो सही निशाने पर लगाने की संभावना काफी बढ़ जाती है। इसी तरह लगातार पांच पेनल्टी शूटआउट हारने के बाद इंग्लैंड के फुटबॉल एसोसिएशन ने गैरेथ साउथगेट के नेतृत्व में पेनल्टी लेने के मनोवैज्ञानिक पहलू पर 18 महीने काम किया। खिलाड़ियों को सिखाया गया कि पेनल्टी मिस होने पर साथी को अकेला छोड़ने के बजाय उसके कंधे पर हाथ रखकर सहारा दें और गोल होने पर खुलकर जश्न मनाएं ताकि आने वाले खिलाड़ी का हौसला बढ़े। लॉकर रूम की यह शारीरिक आत्मीयता मैदान पर नतीजे बदलने की ताकत रखती है। जब इंसान क्रूरता या हिंसा करता है तो अक्सर उसे जानवर जैसा कह दिया जाता है, जबकि परोपकार को केवल इंसानी खूबी मान लिया जाता है। यह सोच जानवरों के साथ अन्याय है। इंसानों ने अपने ही साथियों को आत्महत्या की कगार पर पहुंचाया है, संस्कृतियों को तबाह किया है और कुदरती पर्यावास नष्ट किए हैं। आक्रामकता हमारी एकमात्र पहचान नहीं है। वानरों का समाज साबित करता है कि शक्ति और प्रतिस्पर्धा की भावना को दैनिक सहयोग के जरिए कैसे संतुलित किया जाता है। पुरुष मित्रता सुधारने के व्यावहारिक कदम प्राइमेट्स और इंसानों के स्वभाव में सहयोग कितना गहरा है, यह जानकर हमें दूसरों के बारे में नकारात्मक धारणाएं बनाना बंद करना चाहिए। साइंस जर्नल में प्रकाशित 125 देशों के एक लाख से अधिक लोगों के सर्वेक्षण में सामने आया कि 69 प्रतिशत लोग किसी अजनबी के साथ भी सहयोग करने को तैयार रहते हैं, जबकि आम जनता को लगता था कि केवल 47 प्रतिशत लोग ही ऐसा करेंगे। यह अविश्वास 125 में से 124 देशों में दर्ज किया गया। जब लोगों को यह बताया गया कि दुनिया का एक बड़ा हिस्सा जलवायु परिवर्तन को गंभीर खतरा मानता है, तो उनका दूसरों पर भरोसा बढ़ा और आपसी सहयोग में भी वृद्धि देखी गई। वानरों के व्यवहार से सीखकर अपनी मित्रता को मजबूत बनाना बेहद सरल है। सबसे पहले, सादे जुड़ाव की तलाश करें। वानर घंटों केवल एक दूसरे के करीब बैठकर समय बिताते हैं। बिना किसी खास बातचीत के सिर्फ साथ बैठना भी रिश्तों को प्रगाढ़ बनाता है। दूसरा, ऐसी गतिविधियों में शामिल हों जहां आमने-सामने आंखें मिलाकर बात करने का दबाव न हो, जैसे साथ में गाड़ी चलाना या कोई खेल खेलना। जो पुरुष अपनी भावनाएं बोलकर नहीं कह पाते, वे साथ मिलकर कोई काम करने पर ज्यादा सहज महसूस करते हैं। तीसरा महत्वपूर्ण नियम यह है कि संकट आने का इंतजार न करें बल्कि तनाव से पहले ही हाथ बढ़ाएं। चिम्पांजी टकराव शुरू होने से पहले के नाजुक पलों में एक दूसरे को स्पर्श कर आश्वस्त करते हैं, जिससे कई बड़े विवाद टल जाते हैं। चौथा, पहल करने में संकोच न करें। समाज में सहयोग की वास्तविक इच्छा और उसके अनुमान के बीच जो 22 अंकों का फासला है, वह साबित करता है कि ज्यादातर लोग केवल इस इंतजार में रहते हैं कि सामने वाला पहला कदम उठाए। मर्दानगी की नकली परिभाषाएं गढ़ने वाले लोग विज्ञान को नकार रहे हैं। ताकत का असली पैमाना दूसरों को दबाना नहीं, बल्कि उनकी देखभाल करना और साथ लेकर चलना है। इसका आप पर असर यह शोध पुरुषों के बीच आपसी बातचीत, मानसिक स्वास्थ्य और दोस्ती को देखने का नजरिया पूरी तरह बदलता है। • मानसिक स्वास्थ्य: आक्रामक और अकेले रहने की भ्रामक सोच को छोड़कर दोस्तों से संवाद बढ़ाने से अवसाद और अकेलापन कम होता है। खुद को साबित करने के तनाव से मुक्ति पाकर पुरुष अधिक खुशहाल और तनावमुक्त जीवन जी सकते हैं। • पारस्परिक संबंध: किसी संकट या बड़े झगड़े का इंतजार करने के बजाय रोजमर्रा के छोटे-छोटे संपर्कों और सहयोग पर ध्यान देना रिश्तों को मजबूत बनाता है। बिना किसी खास काम के भी सिर्फ साथ वक्त बिताना आपसी विश्वास को कई गुना बढ़ा देता है। • खेल और कार्यस्थल: खेलों और दफ्तरों में सहयोगियों को गले लगाना, हाथ मिलाना या पीठ थपथपाना टीम के प्रदर्शन को सीधे तौर पर बेहतर करता है। एनबीए और फुटबॉल टीमों के आंकड़े साबित करते हैं कि सकारात्मक स्पर्श से दबाव में भी बेहतरीन परिणाम मिलते हैं। • सहानुभूति की पहल: अजनबियों और दोस्तों के प्रति यह न सोचें कि वे रूखा व्यवहार करेंगे, क्योंकि अधिकतर लोग जुड़ने के लिए तैयार रहते हैं। रिश्ते की शुरुआत करने के लिए दूसरे का इंतजार न करें बल्कि खुद आगे बढ़कर पहल करें। ऐसा क्यों हुआ प्राइमेट्स और इंसानों में हिंसक प्रभुत्व के बजाय सहयोग और स्नेह के विकास के पीछे गहरे विकासवादी और सामाजिक कारण रहे हैं। अकेले बल प्रयोग से कोई भी प्रजाति लंबे समय तक अपना अस्तित्व नहीं बचा सकती थी। • सामूहिक सुरक्षा की अनिवार्यता: बाहरी दुश्मनों और प्रतिद्वंद्वी समूहों से सीमाओं की रक्षा करने के लिए आंतरिक एकजुटता पहली शर्त होती है। अगर समूह के सदस्य आपस में ही लड़ते रहेंगे तो बाहरी खतरे के सामने पूरा समुदाय बिखर जाएगा। • गठबंधन की विकासवादी सफलता: दशकों के वन्यजीव आंकड़ों से स्पष्ट हुआ है कि सबसे ज्यादा सफल और सुरक्षित वे नर रहे जिन्होंने मजबूत मित्रता बनाई। अकेले अपनी ताकत के दम पर शीर्ष पर रहने की कोशिश करने वाले नर बहुत जल्दी अपदस्थ और घायल हो जाते हैं। • तनाव कम करने का जैविक तंत्र: आपसी स्पर्श, ग्रूमिंग और आलिंगन शरीर में तनाव पैदा करने वाले हार्मोन कोर्टिसोल को नियंत्रित करते हैं। प्रतिस्पर्धा से पहले का आश्वस्त करने वाला स्पर्श टकराव को टालने और शांतिपूर्वक संसाधन बांटने में सीधे मदद करता है। • अल्फा की गलत वैज्ञानिक व्याख्या: कैद में रखे गए अस्वाभाविक भेड़ियों के अध्ययन से अल्फा की आक्रामक छवि निकली थी जिसे बाद के शोधकर्ताओं ने खारिज कर दिया। प्रकृति में प्रभुत्व क्रूरता से नहीं बल्कि परिवार और समूह के पालन पोषण से हासिल होता है। सवाल-जवाब 1. प्रकृति में अल्फा नर की सही भूमिका क्या होती है? प्रकृति में अल्फा नर केवल ताकत नहीं दिखाता बल्कि अपने साथियों की देखभाल करता है, तनाव के समय सहयोगियों को साथ रखता है और संसाधनों का उचित बंटवारा करता है। 2. चिम्पांजी आपसी तनाव को बिना लड़े कैसे सुलझाते हैं? वे घंटों ग्रूमिंग करते हैं, गले मिलते हैं, कंधे और हाथ चूमते हैं तथा आगामी खतरे से पहले एक दूसरे को छूकर भरोसा जताते हैं। 3. क्या खेलों में खिलाड़ियों का आपस में छूना प्रदर्शन सुधारता है? एनबीए और महिला कॉलेज बास्केटबॉल के अध्ययनों से साबित हुआ है कि हाई फाइव और गले मिलने जैसी आदतें टीम के खेल और प्रदर्शन को बेहतर बनाती हैं। 4. अल्फा शब्द की शुरुआत कैसे हुई थी? यह शब्द बीसवीं सदी के मध्य में कैद में रखे गए भेड़ियों के अध्ययन से निकला था, जिसे बाद में शोधकर्ताओं ने जंगली भेड़ियों के लिए गलत मानकर खारिज कर दिया। 5. पुरुष अपनी दोस्ती को बेहतर बनाने के लिए क्या कदम उठा सकते हैं? साथ में गाड़ी चलाना या खेल खेलना, तनाव आने से पहले संपर्क साधना और बातचीत की औपचारिकता के बिना केवल साथ समय बिताना मददगार होता है। https://trendkia.com/health/chimpanzee-samaja-ka-sachcha-sabaka-purusha-dosti-men-akramakata-nahin-balki-bharosa-aura-apanapana-taya-karate-hain-asali-takata-35959 TrendKia — Har trend, sabse pehle.