कोहेरेंस न्यूरो का दिमागी इम्प्लांट, ऑस्ट्रेलिया में तीन मरीजों पर हुआ पहला सफल ट्रायल ब्रेन ट्यूमर हटाने की सर्जरी के दौरान तीन मरीजों के दिमाग में कोहेरेंस न्यूरो का सिक्के जितना छोटा इम्प्लांट करीब 30 मिनट के लिए लगाया गया, जो ट्यूमर के इलेक्ट्रिकल सिग्नल पहचानकर उसकी बढ़त रोकने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ऑस्ट्रेलिया के रॉयल मेलबर्न हॉस्पिटल में ब्रेन कैंसर के इलाज की दिशा में एक नया कदम उठाया गया है। स्टार्टअप कंपनी कोहेरेंस न्यूरो ने अपना सिक्के जितना छोटा इम्प्लांट तीन ऐसे मरीजों के दिमाग में लगाया, जिनकी ब्रेन ट्यूमर हटाने की सर्जरी चल रही थी। यह डिवाइस करीब 30 मिनट तक दिमाग में रही और फिर निकाल ली गई। इस शुरुआती ट्रायल का मकसद था कि लंबे समय के लिए इम्प्लांट करने से पहले डिवाइस की सुरक्षा को परखा जाए। तीनों मरीजों ने सर्जरी से पहले ही अपनी सहमति दे रखी थी। यह डिवाइस करती क्या है कोहेरेंस न्यूरो का यह इम्प्लांट एक ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस है। इसे एक साथ दो काम के लिए बनाया गया है। पहला, ट्यूमर टिश्यू से निकलने वाले खास इलेक्ट्रिकल सिग्नल को पहचानना, और दूसरा, हल्की इलेक्ट्रिकल स्टिमुलेशन देकर ट्यूमर की बढ़त को रोकना। जब इसे स्थायी रूप से लगाया जाएगा, तो यह खोपड़ी के अंदर बैठेगी और इसके 16 पतले धागे जैसे तार दिमाग के टिश्यू में प्रवेश करेंगे। योजना यह है कि जब ट्यूमर हटाने की सर्जरी हो, ठीक उसी दौरान इसे लगा दिया जाए, ताकि मरीज को बाद में अलग से कोई ऑपरेशन न करवाना पड़े। ट्यूमर पूरी तरह हटा लिए जाने के बाद भी वह अक्सर वापस आ जाता है, और यह डिवाइस उसी दोबारा आने की निगरानी और रोकथाम के लिए बनाई गई है। बिजली से कैंसर से लड़ने का विज्ञान इलेक्ट्रिकल स्टिमुलेशन से ट्यूमर का इलाज करने की सोच दशकों की वैज्ञानिक समझ पर टिकी है। ट्यूमर टिश्यू की इलेक्ट्रिकल खासियतें सामान्य दिमाग से अलग होती हैं और शोधकर्ताओं को लंबे समय से उम्मीद रही है कि इस फर्क का इलाज में फायदा उठाया जा सकता है। कोहेरेंस के CEO और को-फाउंडर बेन वुडिंगटन इसे इस तरह समझाते हैं: "ये इलेक्ट्रिकल कंडीशन हैं, बिल्कुल एपिलेप्सी की तरह, डिप्रेशन की तरह। यह दिमाग में एक नेटवर्क की समस्या है।" 2019 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक अहम खोज की। उन्होंने पाया कि हाई-ग्रेड ग्लियोमा नाम के खतरनाक ब्रेन ट्यूमर स्वस्थ न्यूरॉन्स के साथ सिनैप्स बनाकर यानी सीधे कनेक्शन जोड़कर अपनी बढ़त को खुद बढ़ावा देते हैं। उसी अध्ययन में यह भी दिखाया गया कि चूहों को एक सीज़र की दवा देने से ट्यूमर तक पहुंचने वाले इलेक्ट्रिकल सिग्नल टूट गए और उसकी बढ़त धीमी पड़ गई। इसके अलावा कम तीव्रता की इलेक्ट्रिकल करंट से ब्रेन ट्यूमर में कैंसर कोशिकाओं का विभाजन बाधित होता है, यह बात भी पहले के शोध में सामने आ चुकी है। पहले से मौजूद डिवाइस और उसकी सीमाएं ब्रेन ट्यूमर के लिए इलेक्ट्रिकल स्टिमुलेशन पूरी तरह नई बात नहीं है। नोवोक्योर कंपनी का ऑप्ट्यून डिवाइस 2011 में पहली बार ग्लियोब्लास्टोमा के वयस्क मरीजों के इलाज के लिए मंजूर किया गया था। ग्लियोब्लास्टोमा, कैंसरकारी ब्रेन ट्यूमर के करीब आधे मामलों के लिए जिम्मेदार है। इस साल नोवोक्योर को पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज के लिए भी अपनी डिवाइस इस्तेमाल करने की रेगुलेटरी मंजूरी मिली है। कैंसर के प्रकार के अनुसार इसे स्कैल्प या पेट पर एडहेसिव पैच से चिपकाया जाता है। ऑप्ट्यून जिंदगी को कुछ महीने बढ़ा सकता है, लेकिन इसके लिए पूरे दिन डिवाइस पहनना जरूरी है। इसके लिए मरीजों को सिर मुंडवाना होता है और एक बैटरी पैक बैकपैक में या हिप बेल्ट पर साथ रखना होता है। कोहेरेंस की डिवाइस इन सब झंझटों से छुटकारा दे सकती है क्योंकि वह खोपड़ी के अंदर छुपी रहती है और बाहर से कुछ भी नहीं दिखता। इस प्रोजेक्ट से जुड़े जाने-माने नाम कोहेरेंस न्यूरो से न्यूरोसाइंस की दुनिया के बड़े नाम जुड़े हैं। न्यूरालिंक के हेड न्यूरोसर्जन मैथ्यू मैकडॉगल कंपनी के सलाहकार भी हैं और उन्होंने इसमें निवेश भी किया है। इसके अलावा एरिज़ोना के बैरो न्यूरोलॉजिकल इंस्टीट्यूट के न्यूरोसर्जन रोरी मर्फी, जो न्यूरालिंक के एक ट्रायल में इन्वेस्टिगेटर हैं, वे कोहेरेंस के भावी ट्रायल में भी शामिल होने वाले हैं। ग्लियोब्लास्टोमा, एक बेहद खतरनाक और लाइलाज जैसी बीमारी कोहेरेंस ने शुरुआत में ग्लियोब्लास्टोमा को निशाना बनाया है क्योंकि यह निचले ग्रेड के ट्यूमर की तुलना में सर्जरी के बाद दोबारा आने का खतरा कहीं ज्यादा रखता है। इस बीमारी में मरीजों के पास बेहद कम विकल्प होते हैं। डायग्नोसिस के बाद अधिकांश मरीज सिर्फ 15 से 18 महीने जी पाते हैं और पांच साल की सर्वाइवल रेट 10 प्रतिशत से भी कम है। फिलहाल डॉक्टर हर दो से तीन महीने में MRI करवाते हैं ताकि ट्यूमर की बढ़त पर नजर रखी जा सके और जरूरत के हिसाब से दवाएं बदली जा सकें। लेकिन वुडिंगटन का मानना है कि यह पर्याप्त नहीं है। दो स्कैन के बीच ट्यूमर अचानक और आक्रामक हो सकता है और डॉक्टरों को इसकी कोई खबर नहीं होती। कोहेरेंस की डिवाइस इस खामी को दूर करेगी क्योंकि यह लगातार निगरानी रखेगी। एक ऐप के जरिए मरीज अपने लक्षण दर्ज कर सकेंगे और यह जानकारी, बीमारी की स्थिति और मिल रही स्टिमुलेशन के डेटा के साथ, डॉक्टरों तक पहुंचेगी। डॉक्टर दूर बैठकर थेरेपी को एडजस्ट कर सकेंगे, या डिवाइस यह काम खुद ही कर सकती है। अगर ट्यूमर अचानक तेजी से बढ़ने लगे, तो यह डिवाइस MRI का इंतजार किए बिना डॉक्टरों को सर्जरी के लिए सतर्क कर सकती है। आगे क्या होगा इस पहले ट्रायल से यह साबित होने के बाद कि सर्जरी के दौरान थोड़े समय के लिए डिवाइस लगाना सुरक्षित और संभव है, कोहेरेंस न्यूरो अगले साल एक नया ट्रायल शुरू करने की तैयारी में है। इस बार ग्लियोब्लास्टोमा के मरीजों में इम्प्लांट को स्थायी रूप से लगाया जाएगा। यही ट्रायल कंपनी को व्यापक रेगुलेटरी मंजूरी के लिए जरूरी दीर्घकालिक डेटा देगा। इसका आप पर असर • कैंसर मरीजों के लिए: अगर यह डिवाइस ट्रायल में सफल रही, तो ग्लियोब्लास्टोमा मरीजों को हर दो-तीन महीने के MRI की जगह 24 घंटे की निगरानी मिलेगी, जिससे ट्यूमर की वापसी पहले पकड़ी जा सकेगी। • रोज़मर्रा की जिंदगी पर असर: मौजूदा ऑप्ट्यून डिवाइस की तरह सिर मुंडवाने या बैटरी पैक साथ ढोने की जरूरत नहीं होगी, जिससे इलाज कहीं आसान और सम्मानजनक हो जाएगा। सवाल-जवाब 1. कोहेरेंस न्यूरो का ब्रेन इम्प्लांट क्या है और यह काम कैसे करता है? यह एक ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस है जो खोपड़ी में लगाया जाता है और इसके 16 पतले तार दिमाग के टिश्यू में जाते हैं। यह ट्यूमर के इलेक्ट्रिकल सिग्नल पहचानता है और हल्की इलेक्ट्रिकल स्टिमुलेशन देकर ट्यूमर की बढ़त रोकने की कोशिश करता है। 2. यह ट्रायल कहां और किन मरीजों पर किया गया? यह ट्रायल ऑस्ट्रेलिया के रॉयल मेलबर्न हॉस्पिटल में हुआ, जहां ब्रेन ट्यूमर हटाने की सर्जरी करवा रहे तीन मरीजों के दिमाग में इम्प्लांट करीब 30 मिनट के लिए लगाया गया और फिर निकाल लिया गया। 3. ग्लियोब्लास्टोमा कितना खतरनाक है? यह बेहद गंभीर बीमारी है। इससे पीड़ित अधिकांश मरीज डायग्नोसिस के बाद सिर्फ 15 से 18 महीने जी पाते हैं और पांच साल की सर्वाइवल रेट 10 प्रतिशत से कम है। 4. कोहेरेंस की डिवाइस और ऑप्ट्यून में क्या फर्क है? ऑप्ट्यून एक बाहरी वियरेबल डिवाइस है जिसके लिए सिर मुंडवाना और बैटरी पैक साथ रखना जरूरी है, जबकि कोहेरेंस का इम्प्लांट खोपड़ी के अंदर स्थायी रूप से बैठता है और बाहर से कुछ नहीं दिखता। 5. न्यूरालिंक का इस प्रोजेक्ट से क्या संबंध है? न्यूरालिंक के हेड न्यूरोसर्जन मैथ्यू मैकडॉगल कोहेरेंस न्यूरो के सलाहकार और निवेशक हैं, और न्यूरालिंक के एक ट्रायल में इन्वेस्टिगेटर रोरी मर्फी भी कोहेरेंस के भावी ट्रायल में शामिल होंगे। 6. 2019 के स्टैनफोर्ड अध्ययन का इससे क्या लेना-देना है? उस अध्ययन में पाया गया कि हाई-ग्रेड ग्लियोमा ट्यूमर स्वस्थ न्यूरॉन्स के साथ सिनैप्स बनाकर खुद अपनी बढ़त को बढ़ावा देते हैं, और एक सीज़र दवा से चूहों में इन सिग्नल को काटकर ट्यूमर की रफ्तार धीमी की जा सकी। 7. यह डिवाइस डॉक्टरों को दो स्कैन के बीच कैसे मदद करेगी? डिवाइस लगातार मॉनिटरिंग करेगी और मरीज के लक्षणों का डेटा एक ऐप के जरिए डॉक्टरों तक पहुंचाएगी, जिससे वे दूर से थेरेपी एडजस्ट कर सकेंगे और MRI से पहले ही जरूरत पड़ने पर सर्जरी का फैसला ले सकेंगे। 8. कंपनी आगे क्या करने वाली है? कोहेरेंस न्यूरो अगले साल ग्लियोब्लास्टोमा के मरीजों में इम्प्लांट को स्थायी रूप से लगाने का ट्रायल शुरू करने की योजना बना रही है। https://trendkia.com/health/coherence-neuro-ka-dimagi-implanta-australia-men-tina-marijon-para-hua-pahala-saphala-trayala-2451 TrendKia — Har trend, sabse pehle.