साइबरनाइफ और डीबीएस से आसान हुआ दिमागी बीमारियों का उपचार, मरीजों को मिला नया जीवन आधुनिक न्यूरोसर्जरी में उन्नत तकनीकों के आने से ब्रेन ट्यूमर और पार्किंसन जैसी जटिल बीमारियों का उपचार अब पहले से कहीं अधिक सटीक, तेज और मरीजों के लिए सुविधाजनक हो गया है। मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र से जुड़े गंभीर रोगों की चिकित्सा पद्धति में हाल के वर्षों में अभूतपूर्व प्रगति दर्ज की गई है। एक समय था जब मस्तिष्क विकारों के उपचार के सीमित साधन उपलब्ध थे और शल्य चिकित्सा काफी जोखिम भरी मानी जाती थी। परिष्कृत इमेजिंग प्रणालियों से शुरू हुई यह वैज्ञानिक यात्रा आज अत्याधुनिक कंप्यूटर-नियंत्रित उपकरणों और न्यूनतम चीर-फाड़ वाली तकनीकों तक पहुंच चुकी है। इस बदलाव ने उन जटिलताओं को भी साध्य बना दिया है, जिन्हें पहले असाध्य मान लिया जाता था। सटीक रेडिएशन से ट्यूमर पर त्वरित प्रहार न्यूरोसर्जरी के क्षेत्र में आए क्रांतिकारी बदलावों को लेकर आर्टेमिस हॉस्पिटल के न्यूरोसर्जरी एवं सीएनएस रेडियोसर्जरी विभाग के चेयरमैन तथा साइबरनाइफ सेंटर के को-चीफ डॉ. आदित्य गुप्ता ने विस्तृत जानकारी साझा की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक चिकित्सा उपकरणों ने ट्यूमर उपचार के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। साइबरनाइफ प्रणाली का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि उपयुक्त मामलों में ट्यूमर का पूर्ण उपचार महज 40 मिनट की एकल प्रक्रिया में संभव हो पा रहा है। पारंपरिक ओपन सर्जरी में सिर की हड्डी को खोलना पड़ता था, जिसमें रक्तस्राव और संक्रमण का भारी जोखिम रहता था। इसके विपरीत, रोबोटिक रेडियोसर्जरी में बिना किसी चीरे के सीधे लक्षित कोशिकाओं पर उच्च-तीव्रता की किरणें डाली जाती हैं। इससे स्वस्थ ऊतकों को कोई नुकसान नहीं पहुंचता, मरीज को अस्पताल में लंबा समय नहीं बिताना पड़ता और वह बहुत तेजी से अपनी सामान्य दिनचर्या में वापस लौट जाता है। दवाओं का असर घटने पर डीप ब्रेन स्टिमुलेशन का सहारा आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का मुख्य ध्येय केवल बीमारी का उन्मूलन करना नहीं, बल्कि पीड़ित व्यक्ति के रोजमर्रा के जीवन स्तर को संवारना भी है। इसी कड़ी में डीप ब्रेन स्टिमुलेशन यानी डीबीएस तकनीक अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो रही है। यह पद्धति विशेष रूप से पार्किंसन रोग से जूझ रहे उन व्यक्तियों के लिए वरदान साबित हो रही है, जिनके शरीर पर दवाओं का प्रभाव धीरे-धीरे निष्प्रभावी होने लगता है। पार्किंसन के गंभीर चरण में पहुंचने पर कई मरीजों को कंपकंपी, मांसपेशियों की जकड़न और शारीरिक संतुलन बिगड़ने जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में उन्हें हर दो घंटे में दवाओं की खुराक लेनी पड़ती है, जिससे उनकी आत्मनिर्भरता लगभग समाप्त हो जाती है और दैनिक कार्य बाधित होते हैं। पेसमेकर और सूक्ष्म तारों से नियंत्रित होते हैं लक्षण डीप ब्रेन स्टिमुलेशन की कार्यप्रणाली मस्तिष्क के विद्युत संकेतों को नियंत्रित करने पर आधारित है। इस शल्य प्रक्रिया के तहत मस्तिष्क के उन विशिष्ट केंद्रों में अत्यंत पतले तार प्रत्यारोपित किए जाते हैं, जो शारीरिक गतिविधियों का नियमन करते हैं। इसके उपरांत इन तारों को सीने की त्वचा के नीचे लगाए जाने वाले पेसमेकर जैसे यंत्र से जोड़ दिया जाता है। यह उपकरण मस्तिष्क के अशांत केंद्रों को निरंतर सूक्ष्म विद्युत संकेत भेजता रहता है, जिससे अनियंत्रित कंपन और अकड़न शांत हो जाती है। उचित चिकित्सीय परीक्षण के बाद चुने गए मरीजों में इस प्रत्यारोपण के उपरांत आश्चर्यजनक सुधार देखा गया है। मरीज बिना किसी बाहरी सहारे के अपने आवश्यक कार्य स्वयं करने में सक्षम हो जाते हैं। सटीक जांच और सही मरीज का चयन आवश्यक पार्किंसन से पीड़ित लोगों को जीवन की गुणवत्ता के प्रति हताश होने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, यह तकनीक प्रत्येक मरीज के लिए एक समान रूप से लागू नहीं की जा सकती। इसके क्रियान्वयन से पूर्व मरीज की शारीरिक स्थिति, बीमारी की वर्तमान अवस्था तथा दवाओं की प्रतिक्रिया का गहन क्लिनिकल परीक्षण किया जाता है। गहन परीक्षण के बाद यदि मरीज उपयुक्त पाया जाता है, तो यह तकनीक उसके जीवन को सामान्य बना देती है। डॉ. आदित्य गुप्ता के अनुसार, न्यूरोसर्जरी में निरंतर नवाचार का सर्वोपरि लक्ष्य यही है कि पीड़ितों को सुरक्षित उपचार मिले और वे पूरी स्वतंत्रता के साथ गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत कर सकें। इसका आप पर असर आधुनिक न्यूरोसर्जिकल तकनीकों के प्रसार से मस्तिष्क रोगों से पीड़ित मरीजों के लिए उपचार की अवधि और शारीरिक कष्ट में उल्लेखनीय कमी आई है। • मरीजों के लिए: ओपन सर्जरी की जगह साइबरनाइफ से करीब 40 मिनट में बिना चीरे के ट्यूमर का इलाज संभव हो रहा है। इससे मरीज को लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती नहीं रहना पड़ता और रिकवरी तेजी से होती है। • पार्किंसन पीड़ितों के लिए: बार-बार दवा लेने पर निर्भर मरीजों के लिए डीप ब्रेन स्टिमुलेशन शारीरिक जकड़न और कंपकंपी को नियंत्रित करता है। इससे मरीज दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय अपने दैनिक कार्य खुद करने में सक्षम हो जाते हैं। • इलाज के चयन के लिए: ये उन्नत सर्जिकल विकल्प हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं। इसके लिए विशेषज्ञ न्यूरोलॉजिस्ट से विस्तृत क्लिनिकल जांच और परामर्श कराना अनिवार्य है। • पारिवारिक देखभाल में: मरीज की स्थिति में सुधार होने से परिजनों पर देखभाल का बोझ काफी कम हो जाता है। इससे पूरे परिवार की दिनचर्या और मानसिक सुकून बेहतर होता है। ऐसा क्यों हुआ न्यूरोसर्जरी के क्षेत्र में चिकित्सा उपकरणों और इमेजिंग तकनीकों के विकास ने पारंपरिक सर्जरी की सीमाओं को समाप्त कर दिया है। इसी तकनीकी बदलाव के कारण गंभीर मस्तिष्क रोगों का न्यूनतम चीर-फाड़ के साथ सुरक्षित उपचार संभव हो सका है। • तकनीकी नवाचार: हाई-रिज़ॉल्यूशन इमेजिंग और रोबोटिक रेडिएशन प्रणालियों के विकास से मस्तिष्क के संवेदनशील हिस्सों तक बिना चीरा लगाए पहुंचना संभव हुआ है। इस कारण ट्यूमर कोशिकाओं पर सटीक रेडिएशन दिया जा सकता है। • दवाओं की सीमित प्रभावशीलता: पार्किंसन रोग के लंबे समय तक चलने पर मरीजों के शरीर में दवाओं का असर कम होने लगता है। इस कमी को दूर करने के लिए मस्तिष्क के विद्युत संकेतों को नियंत्रित करने वाले पेसमेकर प्रत्यारोपण की जरूरत महसूस हुई। • जीवन की गुणवत्ता में सुधार का लक्ष्य: चिकित्सा विज्ञान का ध्यान अब केवल जान बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि मरीज को दर्द और पराधीनता से मुक्त करना भी है। इसी सोच ने डीबीएस और साइबरनाइफ जैसी प्रणालियों के उपयोग को बढ़ावा दिया है। सवाल-जवाब 1. साइबरनाइफ तकनीक से ब्रेन ट्यूमर के इलाज में कितना समय लगता है? विशेषज्ञों के अनुसार, उपयुक्त मामलों में साइबरनाइफ तकनीक के जरिए ब्रेन ट्यूमर का उपचार लगभग 40 मिनट में पूरा किया जा सकता है। 2. डीप ब्रेन स्टिमुलेशन यानी डीबीएस तकनीक किन मरीजों के लिए उपयोगी है? यह तकनीक मुख्य रूप से पार्किंसन रोग के उन मरीजों के लिए उपयोगी है, जिन पर दवाओं का असर कम होने लगता है या जिन्हें हर दो घंटे में दवा लेनी पड़ती है। 3. डीबीएस सर्जरी शरीर में किस तरह काम करती है? इसमें मस्तिष्क में बारीक तार लगाकर उन्हें पेसमेकर जैसे उपकरण से जोड़ा जाता है, जो दिमाग को विद्युत संकेत भेजकर कंपकंपी और जकड़न जैसे लक्षणों को नियंत्रित करता है। 4. क्या डीप ब्रेन स्टिमुलेशन हर पार्किंसन मरीज के लिए उपयुक्त है? नहीं, यह उपचार हर मरीज के लिए नहीं होता। इसके लिए मरीज की शारीरिक स्थिति, बीमारी के चरण और दवाओं के असर की विस्तृत जांच के बाद ही चयन किया जाता है। https://trendkia.com/health/cyberknife-aura-dbs-se-asana-hua-dimagi-bimariyon-ka-upachara-marijon-ko-mila-naya-jivana-37429 TrendKia — Har trend, sabse pehle.