दफ्तर और घर की भागदौड़ में उलझे दिमाग को तुरंत शांत करेंगी ये चार आसान आदतें, न्यूरोसाइंस ने भी माना असरदार लगातार तनाव में रहने से सेहत बिगड़ सकती है, लेकिन गहरी सांस लेने, हंसने, सेल्फ-सूथिंग टच और हल्की स्ट्रेचिंग जैसी बेहद छोटी आदतें महज 30 सेकंड में मानसिक दबाव घटाने में मददगार साबित होती हैं. सुबह बिस्तर छोड़ते ही दफ्तर पहुंचने की जल्दबाजी, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना, सड़कों पर घंटों का ट्रैफिक, दिनभर बैठकों का अंतहीन सिलसिला और फिर देर शाम घर लौटकर घरेलू जिम्मेदारियों को संभालना आधुनिक जीवन की सामान्य दिनचर्या बन चुका है. ज्यादातर कामकाजी लोगों का पूरा दिन इसी तरह के अनवरत मानसिक दबाव और भागदौड़ में बीतता है. मानव शरीर विज्ञान पर हुए शोध स्पष्ट करते हैं कि इंसान का जैविक ढांचा हर समय निरंतर तनाव की अवस्था में रहने के लिए तैयार नहीं हुआ है. आदिकाल में जब इंसान जंगलों में शिकार पर निर्भर था, तब किसी खूंखार जानवर की हल्की सी आहट मिलते ही शरीर का सुरक्षा तंत्र तुरंत सतर्क हो जाता था. खतरा टलते ही शरीर वापस सामान्य स्थिति में आ जाता था. आज की आधुनिक और तेज रफ्तार जीवनशैली की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि तनाव किसी जानवर की तरह आकर चला नहीं जाता, बल्कि पूरे दिन हमारे इर्द-गिर्द बना रहता है. काम और रोजमर्रा की छोटी-छोटी उलझनों से पैदा होने वाला यह दबाव धीरे-धीरे जमा होता रहता है, जो आगे चलकर हमारी नींद की गुणवत्ता, मानसिक मिजाज, आपसी रिश्तों और शारीरिक सेहत पर गहरा नकारात्मक असर डालने लगता है. ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या तनाव से मुक्ति पाने के लिए हमेशा किसी शांत कोने में घंटों बैठकर ध्यान लगाना ही एकमात्र जरिया है, या फिर कुछ ऐसे त्वरित उपाय भी हैं जो अचानक बढ़ने वाले तनाव को पलक झपकते कम कर सकें. न्यूरोसाइंस और व्यवहार से जुड़े वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार कुछ बेहद संक्षिप्त शारीरिक क्रियाएं और छोटी आदतें, जिन्हें माइक्रो-प्रैक्टिसेज कहा जाता है, सिर्फ 20 से 30 सेकंड के भीतर दिमाग को स्थिर और शांत कर सकती हैं. पहली नजर में आधा मिनट बहुत कम समय लग सकता है, लेकिन मानव तंत्रिका तंत्र की संरचना ऐसी है कि शरीर और मस्तिष्क के काम करने के तरीके को बदलने के लिए कभी-कभी कुछ सेकंड की सही प्रक्रिया ही पर्याप्त साबित होती है. भारत में मानसिक स्वास्थ्य और तनाव की गंभीर स्थिति राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएमएचएस) के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि भारत में करीब 10.6 प्रतिशत वयस्क आबादी किसी न किसी प्रकार की मानसिक स्वास्थ्य समस्या का सामना कर रही है. इसके साथ ही देश के लगभग 15 प्रतिशत वयस्कों को अपने जीवन के किसी न किसी पड़ाव पर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिकित्सकीय मदद या परामर्श की दरकार होती है. बेंगलुरु स्थित राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान (निमहांस) के सर्वेक्षण से भी यह हकीकत उजागर हुई है कि देश भर में करोड़ों नागरिकों को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं की तत्काल आवश्यकता है. इसके बावजूद संसाधनों और डॉक्टरों की कमी के चलते आबादी का एक बड़ा हिस्सा औपचारिक इलाज अथवा पेशेवर परामर्श तक पहुंच नहीं पाता है. हकीकत यही है कि हर तनावग्रस्त व्यक्ति को संकट के समय तुरंत कोई मनोचिकित्सक या थेरेपिस्ट उपलब्ध नहीं हो सकता. इसी जमीनी सच्चाई के चलते यह बेहद जरूरी हो जाता है कि लोग अपनी दैनिक जीवनशैली में ऐसे छोटे-छोटे तौर-तरीकों को शामिल करें जो दिनभर के तनाव को खुद से नियंत्रित करने में मददगार बन सकें. दिल्ली के जनकपुरी इलाके में रहने वाली सूचना प्रौद्योगिकी पेशेवर शालिनी अवस्थी का अनुभव इस दिशा में एक बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करता है. वे बताती हैं कि जब भी उन्हें दफ्तर में किसी अहम प्रोजेक्ट की प्रेजेंटेशन देनी होती थी, तो ऐन मौके पर उनके दिल की धड़कनें बहुत तेज हो जाती थीं और घबराहट हावी होने लगती थी. इस मानसिक दबाव से निपटने के लिए उन्होंने एक बेहद सरल तकनीक अपनाई. मीटिंग रूम का दरवाजा खोलने से ठीक पहले वे केवल तीन बार बहुत गहरी और धीमी सांसें लेती हैं. इस साधारण सी क्रिया ने उनके घबराए हुए मन को तुरंत शांत करने और आत्मविश्वास लौटाने में उल्लेखनीय मदद की है. पहली आदत: पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम को सक्रिय करने वाली गहरी सांसें काम के बीच गहरी सांस लेने का यह तरीका भले ही बहुत सामान्य लगे, लेकिन इसके पीछे शरीर विज्ञान का एक स्थापित तंत्र काम करता है. जब कोई व्यक्ति धीमी गति से गहरी सांस अंदर खींचता है और धीरे-धीरे बाहर छोड़ता है, तो इससे शरीर का पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम सक्रिय हो जाता है. चिकित्सा विज्ञान में इस तंत्र को शरीर का विश्राम और सुधार तंत्र माना जाता है, जो आपातकालीन प्रतिक्रिया को शांत कर शरीर को आराम की मुद्रा में ले आता है. वैज्ञानिक अनुसंधानों से यह साबित हुआ है कि सचेत होकर की जाने वाली ब्रीदिंग एक्सरसाइज घबराहट, चिंता और अचानक बढ़े हुए मानसिक दबाव को तेजी से नियंत्रित करती है. इस प्रक्रिया को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना बेहद आसान है. इसके लिए लगभग 10 सेकंड का समय लेकर नाक से धीरे-धीरे गहरी सांस फेफड़ों में भरें. इसके बाद सांस को बाहर छोड़ते समय अंदर लेने की तुलना में थोड़ा अधिक समय लगाएं. जब सांस छोड़ने की रफ्तार धीमी होती है, तो हृदय गति अपने आप नियंत्रित होने लगती है और मस्तिष्क तक यह संकेत पहुंचता है कि कोई तात्कालिक खतरा नहीं है. दूसरी आदत: बनावटी मुस्कान और लाफ्टर योग का मनोवैज्ञानिक असर तनाव घटाने का दूसरा कारगर उपाय हंसी है, भले ही शुरुआत में वह पूरी तरह बनावटी ही क्यों न हो. देश के विभिन्न शहरों में सुबह के समय सार्वजनिक पार्कों में टहलने निकलने पर लाफ्टर क्लबों में लोगों को ठहाके लगाते देखना आम बात है. इन पार्कों में लोग अक्सर बनावटी हंसी से अभ्यास शुरू करते हैं, लेकिन कुछ ही पलों में वह बनावटी प्रयास असली और सहज ठहाकों में तब्दील हो जाता है. लाफ्टर योग भी एक ऐसी ही संक्षिप्त शारीरिक आदत है जो शरीर में तनाव पैदा करने वाले तत्वों को तुरंत कम कर सकती है. कई वैज्ञानिक अनुसंधानों में यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि खुलकर हंसने की आदत अवसाद के लक्षणों को कम करने और मानसिक बेचैनी को दूर भगाने में अत्यंत प्रभावी भूमिका निभाती है. तीसरी आदत: सेल्फ-सूथिंग टच और दिल पर हाथ रखने का असर खुद को स्पर्श करके शांत करने का विचार सुनने में थोड़ा अप्रत्याशित लग सकता है, लेकिन चिकित्सा जगत में इसे वैज्ञानिक रूप से सेल्फ-सूथिंग टच के नाम से जाना जाता है. लोकप्रिय हिंदी फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ का मुख्य पात्र रैंचो किसी भी बड़ी मुसीबत या तनावपूर्ण घड़ी में अपने सीने पर हाथ रखकर ‘ऑल इज वेल’ दोहराता है. फिल्म का यह दृश्य केवल एक काल्पनिक संवाद नहीं है, बल्कि इसके पीछे वास्तविक शारीरिक मनोविज्ञान मौजूद है. आमतौर पर जब भी हमारे काम में कोई गड़बड़ी होती है या परिस्थितियां विपरीत हो जाती हैं, तो इंसान तुरंत खुद के प्रति बेहद कठोर हो जाता है, अपनी ही गलतियों को कोसने लगता है और हीनभावना से घिर जाता है. वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार जब कोई व्यक्ति अपने सीने पर हाथ रखता है या खुद को धीरज बंधाने वाला कोमल स्पर्श देता है, तो इससे शरीर में तनाव पैदा करने वाले प्रमुख हार्मोन कोर्टिसोल के स्तर में त्वरित गिरावट आती है. अगर किसी संकट के समय फिल्म ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ की तरह कोई दूसरा व्यक्ति ढांढस बंधाने या गले लगाने के लिए मौजूद न हो, तो रैंचो की तरह स्वयं अपने दिल पर हाथ रखकर तसल्ली दी जा सकती है. जब इंसान खुद को भरोसा दिलाता है कि सब ठीक हो जाएगा, तो मस्तिष्क उस स्पर्श को सुरक्षा के संकेत के रूप में स्वीकार कर शांत होने लगता है. चौथी आदत: कुर्सी छोड़कर शरीर को हल्का स्ट्रेच देना कॉर्पोरेट जगत की कार्यसंस्कृति चाहे किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की हो या किसी कॉल सेंटर की, इसके साथ जुड़ी सबसे बड़ी समस्या लगातार घंटों तक एक ही जगह बैठे रहना है. आधुनिक दौर के कामकाजी युवाओं के लिए लैपटॉप या कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बिना हिले-डुले आठ से दस घंटे लगातार बिताना सामान्य बात हो गई है. काम का यह ढर्रा तनाव को अप्रत्याशित रूप से बढ़ाने का बहुत बड़ा जरिया बन चुका है. जब शरीर लंबे समय तक एक ही मुद्रा में स्थिर रहता है, तो तनाव केवल सोचने-समझने वाले मस्तिष्क तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह गर्दन, पीठ और कंधों की मांसपेशियों में भी जकड़न के रूप में जमा होने लगता है. शरीर में संचित हो रहे इस शारीरिक खिंचाव और तनाव को दूर करने के लिए हमेशा जिम जाकर पसीना बहाने की जरूरत नहीं होती है. इसके लिए बस अपनी काम करने वाली कुर्सी से उठना है और पूरे शरीर की मांसपेशियों को दोनों तरफ थोड़ा खींचना है. ऐसा करते ही शरीर में फंसा हुआ तनाव तुरंत ढीला पड़ने लगता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि गहरी सांसों के साथ अगर शरीर को हल्का सा स्ट्रेच दिया जाए, तो यह दिमागी थकान और मांसपेशियों के तनाव को कुछ ही क्षणों में काफी हद तक दूर कर देता है. रोजमर्रा के दबाव से राहत दिलाएंगी ये तीस सेकंड की आदतें तनाव प्रबंधन से जुड़ी ये चारों आदतें ऐसी हैं जिन्हें पूरा करने में एक मिनट से भी कम का वक्त लगता है. अगर कोई व्यक्ति दिनभर की भागदौड़ के बीच सिर्फ 30 सेकंड निकालकर इनमें से किसी एक तरीके को भी ईमानदारी से अपनाता है, तो उसे मानसिक स्तर पर उल्लेखनीय शांति और ताजगी का अनुभव होता है. हालांकि यह समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि ये संक्षिप्त आदतें किसी गंभीर अवसाद, पैनिक डिसऑर्डर या लंबे समय से चली आ रही जटिल मानसिक बीमारियों का संपूर्ण चिकित्सीय उपचार नहीं हैं. लेकिन रोजमर्रा की व्यस्त जिंदगी, कार्यस्थल पर अधिकारियों के साथ होने वाली जरूरी बैठकों या किसी महत्वपूर्ण काम की अंतिम समयसीमा के दबाव से निपटने के लिए ये 30 सेकंड की तकनीकें बेहद व्यावहारिक और असरदार हथियार साबित होती हैं. इसका आप पर असर दैनिक जीवन में 30 सेकंड की इन माइक्रो-प्रैक्टिसेज को अपनाने से कामकाजी पेशेवरों और छात्रों को बिना किसी अतिरिक्त खर्च के त्वरित मानसिक राहत मिल सकती है. • दैनिक कार्यक्षमता में सुधार: अचानक पैदा होने वाली घबराहट और कार्यस्थल के दबाव को कुछ ही पलों में नियंत्रित किया जा सकता है. इससे महत्वपूर्ण बैठकों और प्रेजेंटेशन के दौरान एकाग्रता और निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होती है. • शारीरिक थकान से बचाव: लंबे समय तक डेस्क पर बैठने से होने वाली गर्दन और कंधों की जकड़न में तुरंत आराम मिलता है. हर दो घंटे में 30 सेकंड का स्ट्रेच मांसपेशियों के दर्द और रीढ़ की समस्याओं को कम कर सकता है. • बिना खर्च का व्यावहारिक समाधान: इन तकनीकों के लिए किसी महंगे उपकरण, थेरेपी सेशन या जिम जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है. कोई भी व्यक्ति घर, दफ्तर या यात्रा के दौरान अपनी सुविधानुसार इनका तुरंत अभ्यास कर सकता है. • भावनात्मक स्थिरता का विकास: कठिन परिस्थितियों में खुद को कोसने के बजाय सेल्फ-सूथिंग टच और धीमी सांसों से मानसिक संतुलन बना रहता है. यह आदत काम के तनाव को घर के माहौल और व्यक्तिगत रिश्तों में घुसने से रोकने में मदद करती है. ऐसा क्यों हुआ आधुनिक जीवनशैली में काम का बढ़ता बोझ और लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठने की मजबूरी तंत्रिका तंत्र को लगातार तनाव की स्थिति में बनाए रखती है. जब तक सचेत प्रयास न किया जाए, शरीर का आपातकालीन तंत्र शांत नहीं हो पाता है. • प्राकृतिक रक्षा तंत्र का असंतुलन: मानव शरीर तात्कालिक शारीरिक खतरों से निपटने के लिए बना था, न कि चौबीसों घंटे चलने वाले मानसिक तनाव के लिए. लगातार दबाव में रहने से तनाव बढ़ाने वाला कोर्टिसोल हार्मोन सामान्य स्तर पर नहीं लौट पाता है. • बैठकर काम करने का लंबा ढर्रा: कॉर्पोरेट और आईटी क्षेत्र में रोजाना आठ से दस घंटे तक लगातार स्क्रीन के सामने बैठना सामान्य बन चुका है. शरीर की गतिशीलता रुकने से मानसिक तनाव शारीरिक मांसपेशियों में जकड़न के रूप में जमा होने लगता है. • मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुंच: राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार करोड़ों लोगों को सहायता की जरूरत होने के बाद भी पर्याप्त पेशेवर सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं. तत्काल चिकित्सकीय मार्गदर्शन न मिलने के कारण रोजमर्रा की आदतें ही तनाव नियंत्रण का पहला साधन बनती हैं. सवाल-जवाब 1. क्या 30 सेकंड में तनाव कम करना वास्तव में संभव है? हां, न्यूरोसाइंस के अनुसार 20 से 30 सेकंड की गहरी सांसें या हल्की स्ट्रेचिंग शरीर के पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम को सक्रिय कर दिमाग को तुरंत शांत कर सकती है. 2. तनाव घटाने के लिए सुझाई गई चार मुख्य आदतें कौन सी हैं? इनमें 10 सेकंड की गहरी सांसें लेना, बनावटी या असली हंसी हंसना, दिल पर हाथ रखकर सेल्फ-सूथिंग टच देना और कुर्सी से उठकर शरीर को स्ट्रेच करना शामिल है. 3. भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से कितने लोग जूझ रहे हैं? राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक देश के लगभग 10.6 प्रतिशत वयस्क मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से प्रभावित हैं और करीब 15 प्रतिशत को जीवन में मदद की जरूरत पड़ती है. 4. दिल पर हाथ रखने या सेल्फ-सूथिंग टच से क्या फायदा होता है? अनुसंधानों से पता चला है कि खुद को तसल्ली देने वाला स्पर्श देने से शरीर में तनाव से जुड़ा कोर्टिसोल हार्मोन तेजी से कम होता है. 5. क्या ये 30 सेकंड की आदतें गंभीर डिप्रेशन या पैनिक डिसऑर्डर का इलाज हैं? नहीं, ये आदतें रोजमर्रा के तात्कालिक तनाव को संभालने के लिए हैं और गंभीर मानसिक विकारों के लिए पेशेवर डॉक्टर या थेरेपिस्ट से इलाज कराना आवश्यक है. 6. दफ्तर में काम के दौरान मांसपेशियों में तनाव क्यों जमा होता है? दिन में 8 से 10 घंटे लगातार कंप्यूटर या लैपटॉप के सामने एक ही मुद्रा में बैठे रहने से मानसिक दबाव के साथ-साथ मांसपेशियों में भी खिंचाव और जकड़न आ जाती है. https://trendkia.com/health/daphtara-aura-ghara-ki-bhagadaura-men-ulajhe-dimaga-ko-turnta-shanta-karengi-ye-chara-asana-adaten-neuroscience-ne-bhi-mana-asarad-34409 TrendKia — Har trend, sabse pehle.