# दिल्ली के डॉक्टरों ने सिकल सेल बीमारी से दी मुक्ति: याशिका की नई ज़िंदगी और अपोलो इंद्रप्रस्थ की सफलता की कहानी

> भोपाल की 23 वर्षीय याशिका पाटिल ने 10 साल के संघर्ष के बाद दिल्ली के अपोलो इंद्रप्रस्थ हॉस्पिटल में बोन मैरो ट्रांसप्लांट के जरिए सिकल सेल बीमारी पर जीत हासिल की है, जो भारत और अफ्रीका के मरीजों के लिए इस आनुवंशिक बीमारी के इलाज में अस्पताल की विशेषज्ञता को दर्शाता है।

**Type:** article · **Category:** स्वास्थ्य · **Published:** 2026-06-18 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/health/delhi-ke-doktaron-ne-sikala-sela-bimari-se-di-mukti-yashika-ki-nai-zindagi-aura--1645 · **Language:** Hindi
**Tags:** सिकल सेल बीमारी, बोन मैरो ट्रांसप्लांट, याशिका पाटिल, अपोलो इंद्रप्रस्थ हॉस्पिटल, डॉ. गौरव खार्या, आनुवंशिक रोग, स्वास्थ्य भारत, चिकित्सा सफलता

## सिकल सेल रोग से 10 साल का संघर्ष
मध्य प्रदेश के भोपाल की रहने वाली 23 साल की याशिका पाटिल का बचपन एक गंभीर बीमारी से जूझते हुए बीता। 10 साल की उम्र से ही वह सिकल सेल रोग से पीड़ित थीं, जिसने उनके स्कूली जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया। याशिका को अक्सर पूरे शरीर में असहनीय दर्द का अनुभव होता था, जिससे उनका जीवन मानो रुक सा गया था। उन्हें बार-बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ता था, लेकिन शुरुआत में बीमारी की सही पहचान नहीं हो पा रही थी। यह संघर्ष 22 साल की उम्र तक चला, जब उनकी मुलाकात दिल्ली के अपोलो इंद्रप्रस्थ हॉस्पिटल के डॉ. गौरव खार्या से हुई। डॉ. खार्या पीडियाट्रिक हेमेटोलॉजी, ऑन्कोलॉजी और इम्यूनोलॉजी के सीनियर कंसल्टेंट हैं और सेंटर फॉर बोन मैरो ट्रांसप्लांट एंड सेल्यूलर थेरेपी के क्लीनिकल लीडर भी हैं।

## सही पहचान और सफल बोन मैरो ट्रांसप्लांट
डॉ. गौरव खार्या ने याशिका पाटिल के रोग की पहचान सिकल सेल डिजीज के रूप में की, जो एक गंभीर बीमारी है और जिसका इलाज बोन मैरो ट्रांसप्लांट (BMT) से संभव है। इस प्रक्रिया के लिए एक डोनर की आवश्यकता होती है। याशिका के माता-पिता ने उनके भाई को डोनर के रूप में आगे किया। इस सहायता के बाद, याशिका का बोन मैरो ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। आज याशिका पूरी तरह स्वस्थ हैं और उन्होंने एक दृढ़ योद्धा के रूप में इस बीमारी पर विजय प्राप्त की है।

## सिकल सेल रोग: एक आनुवंशिक चुनौती
डॉ. गौरव खार्या के अनुसार, सिकल सेल डिजीज एक आनुवंशिक बीमारी है जो माता-पिता से बच्चों में फैलती है। यह रोग तब होता है जब शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की संरचना और उनके कार्य में खराबी आ जाती है। इसके परिणामस्वरूप शरीर में खून की कमी, बार-बार दर्द के दौरे, आंतरिक अंगों को नुकसान, स्ट्रोक का खतरा और जीवनकाल में कमी जैसे गंभीर परिणाम हो सकते हैं। भारत में यह बीमारी मुख्य रूप से मध्य, पश्चिमी और आदिवासी क्षेत्रों में पाई जाती है, खासकर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गुजरात, ओडिशा और राजस्थान जैसे राज्यों में। भारत में लगभग 13% लोग या बच्चे इस बीमारी से प्रभावित हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, अफ्रीका और उससे जुड़े देश जैसे युगांडा, नाइजीरिया और केन्या भी इस रोग से काफी प्रभावित हैं।

## अपोलो इंद्रप्रस्थ में बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सफलता
अपोलो इंद्रप्रस्थ हॉस्पिटल ने सिकल सेल रोग के लिए लगभग 216 बोन मैरो ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किए हैं। डॉ. खार्या ने बताया कि सभी ट्रांसप्लांट सफल रहे हैं। हाल ही में, उन्होंने अफ्रीका से आए कुछ बच्चों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट भी किया है, जिनमें 32 साल की एक महिला भी शामिल थीं। ये मामले अस्पताल की वैश्विक पहुंच और विशेषज्ञता को दर्शाते हैं।

## पूर्ण रिकवरी और इलाज का खर्च
डॉ. खार्या ने यह भी बताया कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट के बाद मरीजों की कम से कम 100 दिनों तक निगरानी की जाती है। इस अवधि के बाद ही मरीज को पूरी तरह स्वस्थ माना जाता है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट के बाद सिकल सेल डिजीज के दोबारा होने की संभावना बेहद कम हो जाती है क्योंकि इस प्रक्रिया में मरीज का डीएनए बदल दिया जाता है और शरीर में एक नया प्रतिरक्षा तंत्र विकसित हो जाता है। हालांकि, यह इलाज बिना डोनर के संभव नहीं है। भारत में सिकल सेल बोन मैरो ट्रांसप्लांट का खर्च लगभग 15 लाख से 50 लाख रुपए तक आता है। अपोलो इंद्रप्रस्थ अस्पताल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ये जानकारियां साझा कीं, जिसमें देश के जाने-माने डॉक्टर डॉ. बिपिन पुरी भी उपस्थित थे। डॉ. पुरी किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी, लखनऊ के पूर्व वाइस चांसलर भी रह चुके हैं।

## इसका आप पर असर
- **भारत में:** सिकल सेल रोग के सफल बोन मैरो ट्रांसप्लांट की खबरें उन लाखों भारतीयों के लिए आशा जगाती हैं जो इस आनुवंशिक बीमारी से जूझ रहे हैं, खासकर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे उच्च प्रसार वाले राज्यों में।
- **प्रभावित परिवारों के लिए:** यह समाचार बीमारी से जूझ रहे परिवारों को स्थायी उपचार का एक संभावित मार्ग प्रदान करता है, हालांकि इलाज का महत्वपूर्ण खर्च (15-50 लाख रुपये) अभी भी एक चुनौती है।

## सवाल-जवाब

### 1. याशिका पाटिल को कौन सी बीमारी थी?
याशिका पाटिल को सिकल सेल डिजीज नामक एक गंभीर आनुवंशिक बीमारी थी, जिससे वह 10 साल की उम्र से पीड़ित थीं।

### 2. सिकल सेल डिजीज का इलाज कैसे किया गया?
याशिका का इलाज दिल्ली के अपोलो इंद्रप्रस्थ हॉस्पिटल में डॉ. गौरव खार्या द्वारा सफल बोन मैरो ट्रांसप्लांट (BMT) के जरिए किया गया, जिसमें उनके भाई ने डोनर के रूप में योगदान दिया।

### 3. भारत में सिकल सेल बोन मैरो ट्रांसप्लांट का खर्च कितना आता है?
भारत में सिकल सेल बोन मैरो ट्रांसप्लांट का अनुमानित खर्च लगभग 15 लाख से 50 लाख रुपए तक होता है।

### 4. क्या बोन मैरो ट्रांसप्लांट के बाद सिकल सेल डिजीज दोबारा हो सकती है?
डॉक्टरों के अनुसार, बोन मैरो ट्रांसप्लांट के बाद सिकल सेल डिजीज के दोबारा होने की संभावना बहुत कम हो जाती है क्योंकि मरीज का डीएनए और प्रतिरक्षा प्रणाली पूरी तरह से बदल जाती है।

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