धनबाद के सुमन को मिली कूल्हे के पुराने दर्द से निजात, पटना में रोबोटिक सर्जरी के दो दिन बाद चढ़ने लगे सीढ़ियां डेढ़ दशक से कूल्हे के असहनीय दर्द से जूझ रहे मरीज को पटना में आधुनिक रोबोटिक तकनीक से नया जीवन मिला। सफल प्रत्यारोपण के महज बारह घंटे बाद मरीज पैरों पर खड़ा हुआ और दूसरे दिन सीढ़ियां चढ़ने लगा। झारखंड के धनबाद निवासी सुमन कुमार मिश्रा पिछले 15 वर्षों से कूल्हे के गंभीर दर्द से जूझ रहे थे। यह तकलीफ इतनी बढ़ चुकी थी कि उनका सामान्य रूप से चलना-फिरना भी दूभर हो गया था। उन्होंने राहत पाने के लिए कई बड़े शहरों के अस्पतालों की खाक छानी, लेकिन वर्षों तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका। आखिरकार बिहार की राजधानी पटना में आधुनिक रोबोटिक सर्जरी के जरिए उनका सफल कूल्हा प्रत्यारोपण किया गया। इस प्रक्रिया की सटीकता का परिणाम यह रहा कि ऑपरेशन के महज 12 घंटे के भीतर मरीज अपने पैरों पर खड़ा हो गया और सर्जरी के दो दिन बाद ही बिना किसी सहारे के सीढ़ियां चढ़ने लगा। कई बड़े शहरों में नहीं मिली राहत सुमन कुमार मिश्रा के कूल्हे में यह असहनीय समस्या लंबे समय से बनी हुई थी। सही इलाज की तलाश में उन्होंने दिल्ली, कोलकाता और बोकारो समेत कई प्रमुख चिकित्सा केंद्रों के विशेषज्ञों से संपर्क किया। इन सभी स्थानों पर विस्तृत जांच के बाद चिकित्सकों ने उन्हें कूल्हा प्रत्यारोपण कराने की सलाह दी थी। हालांकि, सही तकनीक और भरोसेमंद उपचार की तलाश उन्हें पटना तक ले आई। उन्होंने पटना स्थित एआईओआर सुपर स्पेशियलिटी यूनिट के ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. आशीष सिंह से पहले वीडियो परामर्श के माध्यम से संपर्क साधा। सभी पुरानी रिपोर्ट्स की समीक्षा और ऑनलाइन चर्चा के बाद वह प्रत्यक्ष परामर्श के लिए पटना पहुंचे। अस्पताल में आवश्यक जांचों के बाद 6 तारीख को उनके कूल्हे का सफल ऑपरेशन संपन्न हुआ। सटीक प्रत्यारोपण और आधुनिक रोबोटिक तकनीक इस ऑपरेशन को अंजाम देने वाले ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. आशीष सिंह ने प्रक्रिया के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मरीज पहले वीडियो कंसल्टेशन के माध्यम से जुड़ा था। वीडियो और मेडिकल रिपोर्ट्स के गहन विश्लेषण के बाद मरीज को सर्जरी की पूरी रूपरेखा समझाई गई। अस्पताल पहुंचने पर भी ऑपरेशन से जुड़ी हर बारीक जानकारी साझा की गई। इसके बाद मरीज का कूल्हा प्रत्यारोपण स्ट्राइकर मैको स्मार्ट रोबोटिक तकनीक की सहायता से पूरा किया गया। इस सर्जरी में ड्यूल मोबिलिटी कप वाले अत्याधुनिक इंप्लांट का इस्तेमाल किया गया है। डॉ. सिंह के अनुसार, रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें हड्डियों और इंप्लांट का संतुलन बेहद सटीक रहता है। इससे मांसपेशियों को कम नुकसान पहुंचता है, दर्द बहुत कम होता है और मरीज की रिकवरी बेहद तेज गति से होती है। इसी वजह से सर्जरी के लगभग 12 घंटे के भीतर ही मरीज को खड़ा कर दिया गया और दूसरे ही दिन उसने बिना किसी सहारे के सामान्य रूप से चलना और सीढ़ियां चढ़ना शुरू कर दिया। कम उम्र में एवैस्कुलर नेक्रोसिस का खतरा डॉ. आशीष सिंह ने स्पष्ट किया कि कूल्हे की खराबी सिर्फ बुढ़ापे की बीमारी नहीं है, बल्कि यह कम उम्र के व्यक्तियों को भी अपनी चपेट में ले सकती है। सुमन कुमार मिश्रा के मामले में यह समस्या एवैस्कुलर नेक्रोसिस (AVN) के कारण हुई थी। इस चिकित्सीय स्थिति में कूल्हे की हड्डी के गोलाकार हिस्से (बॉल) तक रक्त की समुचित आपूर्ति बाधित हो जाती है। रक्त प्रवाह रुकने की वजह से हड्डी के जीवित ऊतक धीरे-धीरे नष्ट होने लगते हैं और जोड़ पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार एवैस्कुलर नेक्रोसिस के पीछे कई सामान्य कारक हो सकते हैं। इनमें बिना चिकित्सकीय देखरेख या लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं का अनुचित सेवन, अत्यधिक शराब का सेवन, सिकल सेल रोग और कूल्हे पर लगी कोई पुरानी चोट प्रमुख हैं। हालांकि, सुमन कुमार मिश्रा के मामले में यह बात सामने आई कि वह न तो शराब पीते थे और न ही उन्होंने कभी स्टेरॉयड का सेवन किया था। इसके बावजूद वह इस बीमारी की चपेट में आ गए। विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार इस बीमारी का कोई ज्ञात या स्पष्ट कारण सामने नहीं आ पाता है। इंप्लांट की क्षमता और सर्जरी के बाद जरूरी सावधानियां इस प्रक्रिया में उपयोग किए गए इंप्लांट की गुणवत्ता विश्वस्तरीय है। डॉ. सिंह ने बताया कि इस आधुनिक तकनीक और विशेष इंप्लांट की संभावित कार्यक्षमता करीब 35 वर्ष की है। हालांकि, सर्जरी के बाद जोड़ की लंबी उम्र और सुरक्षित रिकवरी के लिए मरीज को डॉक्टरों द्वारा बताए गए दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करना चाहिए। विशेष रूप से जमीन पर नीचे बैठने और पालथी मारकर बैठने से पूरी तरह परहेज करना आवश्यक होता है ताकि नए जोड़ पर अवांछित दबाव न पड़े। सुमन के ऑपरेशन में इस्तेमाल किया गया स्ट्राइकर मैको रोबोट सीटी स्कैन पर आधारित विश्व की पहली और अग्रणी तकनीक मानी जाती है। यह स्मार्ट रोबोटिक प्रणाली जटिल से जटिल मामलों को भी अत्यंत सुगमता और सटीकता से हल करने में सक्षम है। यह तकनीक वर्तमान में अमेरिका समेत कई विकसित देशों के उन्नत चिकित्सा केंद्रों में व्यापक रूप से इस्तेमाल की जा रही है। कूल्हे के ऐसे सटीक प्रत्यारोपण के लिए यह प्रणाली विशेष रूप से प्रभावी है। डॉ. आशीष सिंह ने यह भी रेखांकित किया कि पिछले 6 वर्षों के दौरान वे 3500 से अधिक सफल रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी कर चुके हैं और आधुनिक चिकित्सा तकनीकों के जरिए मरीजों को दर्द से मुक्ति दिलाने का यह सिलसिला निरंतर जारी है। इसका आप पर असर गंभीर कूल्हे के दर्द और जोड़ों की समस्या से पीड़ित मरीजों के लिए आधुनिक रोबोटिक तकनीक तेजी से सामान्य जीवन में लौटने का सुरक्षित जरिया बन रही है। • मरीजों के लिए राहत: रोबोटिक सर्जरी में पारंपरिक ऑपरेशन की तुलना में चीरा और ऊतकों का नुकसान बहुत कम होता है। मरीज 12 से 48 घंटे के भीतर अपने पैरों पर खड़ा होकर बिना सहारे चलने में सक्षम हो जाता है। • इलाज का विकल्प: बड़े महानगरों की तुलना में अब पटना जैसे क्षेत्रीय केंद्रों में भी विश्वस्तरीय तकनीक उपलब्ध हो चुकी है। बिहार और झारखंड के निवासियों को दिल्ली या मुंबई की महंगी यात्राओं और लंबी प्रतीक्षा सूची से छुटकारा मिल सकता है। • सावधानी और सुरक्षा: इंप्लांट की उम्र बढ़ाने के लिए सर्जरी के बाद जमीन पर बैठने या पालथी मारने से परहेज करना जरूरी है। डॉक्टर द्वारा दिए गए व्यायाम और दिशा-निर्देशों का नियमित पालन नए जोड़ को दशकों तक सुरक्षित रखता है। • जागरूकता का महत्व: कम उम्र में भी अगर कूल्हे में लगातार दर्द रहे तो तुरंत ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। शुरुआती चरण में जांच कराने से एवैस्कुलर नेक्रोसिस जैसी बीमारियों की पहचान समय रहते संभव हो पाती है। ऐसा क्यों हुआ यह घटना आधुनिक रोबोटिक तकनीक की उच्च सटीकता और एवैस्कुलर नेक्रोसिस के कारण कूल्हे की हड्डी को पहुंचे गंभीर नुकसान की पृष्ठभूमि में सामने आई है। • प्रत्यक्ष कारण: मरीज के कूल्हे की हड्डी का गोलाकार हिस्सा एवैस्कुलर नेक्रोसिस की वजह से नष्ट हो चुका था। रक्त की आपूर्ति बाधित होने के कारण हड्डी के ऊतक मृत हो गए थे, जिससे कूल्हा प्रत्यारोपण अनिवार्य हो गया। • तकनीकी चयन: पारंपरिक सर्जरी के बजाय सीटी-आधारित स्ट्राइकर मैको रोबोटिक प्रणाली और ड्यूल मोबिलिटी कप को चुना गया। इस तकनीक से प्रत्यारोपण के कोण और जोड़ का संतुलन मिलीमीटर स्तर पर सटीक बैठता है, जिससे तुरंत चलना संभव हुआ। • अज्ञात कारक: आमतौर पर स्टेरॉयड, शराब या चोट इस बीमारी का कारण बनते हैं, लेकिन मरीज में ये लक्षण नहीं थे। चिकित्सा विज्ञान में कई मामलों में रक्त प्रवाह बाधित होने का सटीक कारण अज्ञात ही रह जाता है। • उपचार का अगला चरण: सफल सर्जरी के बाद मरीज को निश्चित जीवनशैली नियमों और सावधानियों का पालन करने को कहा गया है। प्रत्यारोपित जोड़ सामान्य रूप से काम करता रहे, इसके लिए नियमित मेडिकल फॉलो-अप किया जाएगा। सवाल-जवाब 1. सुमन कुमार मिश्रा कितने समय से कूल्हे के दर्द से जूझ रहे थे? सुमन कुमार मिश्रा पिछले 15 वर्षों से कूल्हे के गंभीर दर्द से परेशान थे और उनका चलना-फिरना भी मुश्किल हो गया था। 2. सुमन ने इलाज के लिए किन-किन शहरों के डॉक्टरों से संपर्क किया था? उन्होंने राहत पाने के लिए दिल्ली, कोलकाता और बोकारो समेत कई शहरों के विभिन्न अस्पतालों में चिकित्सकों से परामर्श लिया था। 3. पटना में उनका ऑपरेशन किस तकनीक की मदद से किया गया? उनका ऑपरेशन आधुनिक स्ट्राइकर मैको रोबोटिक तकनीक और ड्यूल मोबिलिटी कप इंप्लांट की मदद से किया गया। 4. ऑपरेशन के कितने समय बाद मरीज चलने-फिरने लगा? सर्जरी के महज 12 घंटे बाद मरीज अपने पैरों पर खड़ा हो गया और दूसरे दिन बिना सहारे के सीढ़ियां भी चढ़ने लगा। 5. सुमन के कूल्हे की खराबी का मुख्य कारण क्या था? उनकी समस्या एवैस्कुलर नेक्रोसिस (AVN) की वजह से हुई थी, जिसमें कूल्हे की हड्डी तक रक्त आपूर्ति बंद होने से ऊतक नष्ट हो जाते हैं। 6. इस सर्जरी में इस्तेमाल किए गए इंप्लांट की संभावित कार्यक्षमता कितनी है? डॉक्टर के अनुसार इस आधुनिक और विश्वस्तरीय इंप्लांट की संभावित कार्यक्षमता लगभग 35 वर्ष है। 7. कूल्हा प्रत्यारोपण के बाद मरीजों को क्या मुख्य सावधानियां बरतनी चाहिए? मरीजों को जमीन पर नीचे बैठने और पालथी मारकर बैठने से पूरी तरह परहेज करने की सलाह दी जाती है। https://trendkia.com/health/dhanbad-ke-suman-ko-mili-kulhe-ke-purane-darda-se-nijata-patna-men-robotika-sarjari-ke-do-dina-bada-charhane-lage-sirhiyan-45745 TrendKia — Har trend, sabse pehle.