धूम्रपान की लत पर काबू पाने के लिए जापान ने अपनाया नया तकनीकी रास्ता, भारत की सख्त नीति से कितना अलग पारंपरिक सिगरेट की खपत घटाने के लिए जापान हीटेड टोबैको डिवाइस जैसे विकल्पों के प्रभाव का अध्ययन कर रहा है, जबकि भारत पूर्ण प्रतिबंध और कराधान की सख्त रणनीति पर कायम है। दोनों देशों के मॉडल स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। दुनिया के कई हिस्सों में तंबाकू का सेवन सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक भारी संकट बना हुआ है, और इससे मुक्ति पाने के लिए अलग-अलग देश अपनी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार नीतियां बना रहे हैं। भारत में जहां बीड़ी, सिगरेट और चबाने वाले तंबाकू के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए पूर्ण पाबंदी और सख्त कानूनों पर जोर दिया जाता है, वहीं एशियाई देश जापान ने एक बिल्कुल भिन्न राह चुनी है। जापान में धूम्रपान करने वालों की संख्या में कमी लाने के लिए तंबाकू को जलाने के बजाय सिर्फ गर्म करने वाली आधुनिक तकनीकों का दायरा बढ़ा है। स्वास्थ्य शोधकर्ताओं और नीति विश्लेषकों के लिए यह तुलना इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि दोनों ही देश विशाल आबादी और पुरानी तंबाकू संस्कृति से जूझते हुए दो विपरीत रणनीतियों पर आगे बढ़ रहे हैं। जापान के तंबाकू बाजार में आया बड़ा बदलाव जापान में वर्ष 2014 के बाद से निकोटीन के उपभोग के तौर-तरीकों में बहुत बड़ा फेरबदल दर्ज किया गया। वहां हीटेड टोबैको डिवाइस, जिनमें तंबाकू की पत्तियों को उच्च तापमान पर जलाया नहीं जाता बल्कि एरोसोल बनाने के लिए केवल गर्म किया जाता है, तेजी से लोकप्रिय हुए हैं। बिक्री की मात्रा के हिसाब से देखें तो इन उपकरणों ने जापान के पूरे तंबाकू बाजार की लगभग एक-चौथाई हिस्सेदारी अपने नाम कर ली है। यह उपकरण सिगरेट की तरह धुआं नहीं छोड़ते, बल्कि भाप जैसा एरोसोल पैदा करते हैं, जिसकी वजह से सार्वजनिक स्थानों पर इनके उपयोग को लेकर कई तरह के नियम भी बदले गए हैं। खुदरा बिक्री पर शोध और सिगरेट की खपत में तेज गिरावट इस बड़े बाजार परिवर्तन के स्वास्थ्य और आर्थिक प्रभावों का आकलन करने के लिए कई वैज्ञानिक अध्ययन किए गए हैं। टोबेको कंट्रोल में छपे एक व्यापक शोध में जापान के कुल 12 प्रशासनिक क्षेत्रों में से 11 के खुदरा बिक्री आंकड़ों की पड़ताल की गई। इस पड़ताल में सामने आया कि देश में वर्ष 2011 से ही पारंपरिक सिगरेट की बिक्री में क्रमिक गिरावट देखी जा रही थी। हालांकि, जैसे ही हीटेड टोबैको उत्पाद पूरे देश के बाजारों में सुलभ हुए, सिगरेट की बिक्री गिरने की रफ्तार कई गुना बढ़ गई। शोधकर्ताओं के गणितीय मॉडल और अनुमान के मुताबिक, सिगरेट की बिक्री में गिरावट की वार्षिक दर पहले की तुलना में लगभग पांच गुना तेज हो गई। इसी संदर्भ में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल रिसर्च एंड पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित एक अन्य स्वतंत्र विश्लेषण ने भी अलग सांख्यिकीय आधार पर इसी प्रवृत्ति की पुष्टि की। हालांकि, इस विश्लेषण के लेखकों ने आगाह किया कि केवल बाजार के खुदरा आंकड़ों के आधार पर यह शत-प्रतिशत साबित नहीं किया जा सकता कि हर सिगरेट पीने वाले व्यक्ति ने सीधे तौर पर इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को अपना लिया, या फिर इस गिरावट में सिगरेट की बढ़ती कीमतें, सामाजिक जागरूकता और अन्य गैर-तकनीकी कारण भी समानांतर रूप से भूमिका निभा रहे थे। इनडोर एयर क्वालिटी और स्वास्थ्य मंत्रालय की पड़ताल जापान के स्वास्थ्य, श्रम और कल्याण मंत्रालय ने हीटेड टोबैको उपकरणों से निकलने वाले एरोसोल का इनडोर वातावरण पर असर जांचने के लिए विस्तृत परीक्षण किए। मंत्रालय द्वारा तय किए गए विशिष्ट धूम्रपान कक्षों में हवा की गुणवत्ता का परीक्षण करने पर पाया गया कि इन उपकरणों से पैदा होने वाला रासायनिक एक्सपोजर पारंपरिक सिगरेट के धुएं की तुलना में काफी कम दर्ज किया गया। इसके बावजूद मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि कम रसायनों की मौजूदगी का यह कतई मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि ये उत्पाद स्वास्थ्य के लिहाज से पूरी तरह सुरक्षित या हानिरहित हैं। वैज्ञानिक समीक्षाओं में भी पाया गया है कि एरोसोल में हानिकारक तत्वों का स्तर कम होने के बावजूद लंबी अवधि में पूरी आबादी के स्तर पर फेफड़ों और हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम कितना घटता है, इस पर अभी कोई निर्णायक और पुख्ता वैज्ञानिक मुहर नहीं लगी है। चिकित्सा विशेषज्ञों का नजरिया और जापानी अनुभव कावासाकी स्थित एओआई इंटरनेशनल हॉस्पिटल के कार्डियोवैस्कुलर सर्जन और वाइस डायरेक्टर डॉ. हिरोया कुमामारू इस तकनीकी परिवर्तन को एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में देखते हैं। डॉ. हिरोया कुमामारू का कहना है, “जापान में तंबाकू से होने वाले नुकसान को कम करने की दिशा में सामने आया यह अनुभव दिखाता है कि तकनीक और नई चीजें धूम्रपान में गिरावट को तेज कर सकते हैं और तंबाकू से होने वाले भारी स्वास्थ्य बोझ को कम कर सकते हैं।” डॉ. हिरोया कुमामारू के अनुसार, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के आधार पर तैयार रणनीतियां वैश्विक स्तर पर बीमारी और असामयिक मौतों के सबसे बड़े कारणों में शामिल तंबाकू से निपटने के लिए उपयोगी मॉडल साबित हो सकती हैं। उनका मानना है कि जिन वयस्कों के लिए सिगरेट की पुरानी लत को अचानक छोड़ पाना अत्यंत कठिन होता है, उन्हें कम हानिकारक तकनीकी विकल्प देकर बड़े पैमाने पर सार्वजनिक स्वास्थ्य में सकारात्मक परिणाम पाए जा सकते हैं। भारत की सख्त नीति और पूर्ण प्रतिबंध का रुख जापान की तुलना में भारत ने सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए पूरी तरह अलग और सख्त कानूनी ढांचा चुना है। भारत सरकार ने वर्ष 2019 में प्रोहिबिशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट्स एक्ट लागू किया, जिसके तहत ई-सिगरेट, वेप्स और हीटेड टोबैको उत्पादों के निर्माण, आयात, निर्यात, बिक्री, भंडारण, परिवहन और विज्ञापनों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया। इस साल फरवरी में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने पुनः स्पष्ट किया कि सरकार इस कड़े प्रतिबंध में किसी भी प्रकार की ढील देने या इन उपकरणों को वैध करने के किसी प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही है। भारत का यह कड़ा फैसला देश में तंबाकू उपभोग के व्यापक और विकट आंकड़ों पर आधारित है। भारत में तंबाकू से जुड़ी बीमारियों के कारण हर साल 10 लाख से अधिक लोगों की जान चली जाती है। इसके अलावा, भारत का तंबाकू बाजार पश्चिमी या जापानी बाजार जैसा नहीं है; यहां पारंपरिक सिगरेट की तुलना में बीड़ी और धुआंरहित तंबाकू जैसे गुटखा, खैनी और जर्दा का उपभोग बहुत बड़े पैमाने पर होता है। यदि नए इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों को बाजार में प्रवेश दिया जाता, तो किशोरों और युवाओं में निकोटीन की नई लत फैलने का गंभीर अंदेशा था। इसी कारण भारतीय नीति निर्माताओं ने भारी कराधान, तंबाकू मुक्ति केंद्रों के विस्तार, नियमों के कठोर प्रवर्तन और युवाओं को निकोटीन से दूर रखने पर अपनी पूरी शक्ति केंद्रित की है। अनुभवों का आदान-प्रदान और भविष्य का रास्ता दोनों देशों की भिन्न रणनीतियों को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के बड़े फलक पर देखा जा सकता है। दिल्ली के बीएलके-मैक्स सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल में सेंटर फॉर चेस्ट एंड रेस्पिरेटरी डिजीज के डायरेक्टर डॉ. पवन गुप्ता दोनों प्रणालियों के मजबूत पक्षों के समन्वय की बात करते हैं। डॉ. पवन गुप्ता का कहना है, “जापान तेजी से बदलते निकोटीन बाजार की निगरानी, विस्तृत बाजार और स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े जुटाने व अलग-अलग नियामकीय दृष्टिकोणों पर अध्ययन कर रहा है।” डॉ. पवन गुप्ता ने जोर दिया कि भारत के पास विशाल अनौपचारिक क्षेत्र, बीड़ी उद्योग और धुआंरहित उत्पादों के प्रबंधन, कानूनों के जमीनी क्रियान्वयन और जन-जागरूकता अभियानों का व्यापक अनुभव है। उनके अनुसार, दोनों देशों के स्वास्थ्य संस्थानों, शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं के बीच पारदर्शी वैज्ञानिक संवाद और संयुक्त अध्ययनों से यह तय करने में मदद मिलेगी कि कौन से समाधान स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल हैं और किन्हें वैश्विक स्तर पर लागू किया जा सकता है। इसका आप पर असर तंबाकू नियंत्रण नीतियों और नए उत्पादों के अध्ययन से आम नागरिकों और उनके परिवारों के स्वास्थ्य तथा कानूनी अधिकारों पर सीधा असर पड़ता है। • भारत में उपभोक्ताओं के लिए: देश में ई-सिगरेट और हीटेड टोबैको उपकरणों का इस्तेमाल, खरीद और बिक्री 2019 के कानून के तहत पूरी तरह गैरकानूनी है। यदि कोई व्यक्ति इन प्रतिबंधित उत्पादों को विदेश से लाने या बेचने की कोशिश करता है तो उस पर कानूनी कार्रवाई और भारी जुर्माना हो सकता है। • धूम्रपान छोड़ने वालों के लिए: सिगरेट या बीड़ी की लत से जूझ रहे लोगों के लिए भारत में केवल पारंपरिक मेडिकल थेरेपी और सरकारी नशामुक्ति केंद्र ही वैध विकल्प हैं। उपभोक्ताओं को किसी भी अनधिकृत तकनीकी गैजेट के भरोसे रहने के बजाय पंजीकृत डॉक्टरों की सलाह से ही निकोटीन रिप्लेसमेंट अपनाना चाहिए। • परिवार और बच्चों की सुरक्षा: युवाओं और गैर-धूम्रपान करने वालों को निकोटीन की लत से बचाने के लिए भारत में सख्त प्रतिबंध जारी रहेगा। परिवारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके बच्चे सोशल मीडिया या अवैध माध्यमों से आधुनिक वेप्स की ओर आकर्षित न हों। • वैश्विक यात्रियों और प्रवासियों के लिए: जापान की यात्रा करने वाले या वहां रहने वाले भारतीयों को वहां के खुले बाजार और निर्दिष्ट स्मोकिंग रूम के नियमों का पालन करना होगा। हालांकि, जापान से लौटते समय ऐसे उपकरणों को भारतीय हवाई अड्डों पर लाना कानूनी रूप से वर्जित है। ऐसा क्यों हुआ जापान और भारत के तंबाकू नियंत्रण मॉडल में यह भारी अंतर दोनों देशों की अलग-अलग सामाजिक संरचना, स्वास्थ्य प्राथमिकताओं और तंबाकू उपभोग के स्वरूप की वजह से पैदा हुआ है। • तंबाकू बाजार की भिन्न बनावट: जापान में तंबाकू का मुख्य उपभोग सिर्फ सिगरेट तक सीमित था, जिससे तकनीकी विकल्पों को बाजार में उतारना आसान रहा। इसके विपरीत भारत में विशाल आबादी बीड़ी और धुआंरहित चबाने वाले तंबाकू का उपयोग करती है, जहां आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का कोई व्यावहारिक लाभ नहीं था। • युवाओं में लत का जोखिम: भारतीय नीति निर्माताओं को आशंका थी कि आधुनिक और आकर्षक वेपिंग उत्पाद गैर-धूम्रपान करने वाले किशोरों को निकोटीन का आदी बना देंगे। इसी अंदेशे के चलते भारत सरकार ने 2019 में बिना किसी छूट के पूर्ण प्रतिबंध लगाने का कड़ा फैसला किया। • दीर्घकालिक स्वास्थ्य साक्ष्यों की कमी: हीटेड टोबैको उपकरणों से हानिकारक रसायनों का स्तर कम होने के प्रमाण तो मिले हैं, लेकिन वे पूरी तरह हानिरहित साबित नहीं हुए हैं। भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय दीर्घकालिक नैदानिक प्रमाण न होने के कारण किसी भी नए उत्पाद को बाजार में छूट देने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। सवाल-जवाब 1. जापान में सिगरेट की बिक्री में गिरावट की रफ्तार कितनी बढ़ी? टोबेको कंट्रोल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, हीटेड टोबैको उत्पादों के आने के बाद पारंपरिक सिगरेट की बिक्री में गिरावट की दर लगभग पांच गुना तेज हो गई। 2. क्या हीटेड टोबैको उपकरण पूरी तरह सुरक्षित और हानिरहित हैं? जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय और स्वतंत्र समीक्षाओं ने स्पष्ट किया है कि एरोसोल में रसायनों का स्तर कम होने का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि ये उत्पाद पूरी तरह सुरक्षित हैं। 3. भारत में ई-सिगरेट और हीटेड टोबैको पर क्या कानून है? भारत में वर्ष 2019 के प्रोहिबिशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट्स एक्ट के तहत इन सभी उपकरणों के उत्पादन, बिक्री, आयात और विज्ञापन पर पूर्ण प्रतिबंध लागू है। 4. भारत में तंबाकू के सेवन से हर साल कितनी मौतें होती हैं? भारत में तंबाकू के उपभोग से जुड़ी गंभीर बीमारियों के कारण हर वर्ष 10 लाख से अधिक लोगों की मौत होती है। 5. क्या भारत सरकार इन उपकरणों पर लगे प्रतिबंध में ढील देने की योजना बना रही है? फरवरी में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने साफ कर दिया कि सरकार इस प्रतिबंध में किसी भी तरह की ढील देने के प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही है। https://trendkia.com/health/dhumrapana-ki-lata-para-kabu-pane-ke-lie-japan-ne-apanaya-naya-takaniki-rasta-india-ki-sakhta-niti-se-kitana-alaga-41214 TrendKia — Har trend, sabse pehle.