# दिल की अनियंत्रित धड़कन दे रही है गंभीर बीमारी की दस्तक, जानिए एट्रियल फाइब्रिलेशन के कारण और बचाव के तरीके

> भारत में बुजुर्गों और लाइफस्टाइल बीमारियों से पीड़ित लोगों में एट्रियल फाइब्रिलेशन का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। जानिए कैसे दिल के इलेक्ट्रिकल सिग्नल में गड़बड़ी स्ट्रोक और हार्ट फेलियर की वजह बनती है।

**Type:** article · **Category:** स्वास्थ्य · **Published:** 2026-08-21 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/health/dil-ki-aniyantrit-dhadkan-de-rahi-hai-gambhir-bimari-ki-dastak-janiye-afib-ke-karan-aur-bachav-ke-tarike-19591 · **Language:** Hindi
**Tags:** एट्रियल फाइब्रिलेशन, हार्ट हेल्थ, दिल की धड़कन, कार्डियोलॉजी, डॉ अपर्णा जायसवाल, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स, हार्ट अटैक और स्ट्रोक, हेल्थ न्यूज़

मानव शरीर में हृदय एक निरंतर कार्य करने वाली प्राकृतिक पंपिंग मशीन की तरह भूमिका निभाता है। हमारे द्वारा ग्रहण किए गए भोजन से मिलने वाले आवश्यक पोषक तत्व रक्त में घुलकर शरीर के प्रत्येक हिस्से तक पहुंचते हैं। इस पोषक तत्व युक्त रक्त को पूरे शरीर में प्रसारित करने और वहां से अशुद्ध रक्त को वापस लाने का कठिन कार्य हृदय ही करता है। जब तक शरीर में जीवन की सांसें चलती रहती हैं, तब तक हृदय बिना किसी रुकावट के पूरी क्षमता के साथ रक्त पंप करता रहता है। एक स्वस्थ व्यक्ति का हृदय एक मिनट में सामान्यतः 60 से 100 बार धड़कता है। हालांकि, स्वास्थ्य संबंधी कई विकारों या शारीरिक बदलावों के कारण यह गति अनियंत्रित हो सकती है, जिससे हृदय पर गंभीर दबाव उत्पन्न होता है। हाल के वर्षों में भारत के भीतर दिल की अनियंत्रित धड़कन से जुड़ी एक विशेष मेडिकल स्थिति के मामलों में तेज वृद्धि देखी जा रही है।

## हृदय की प्राकृतिक बनावट और रक्त संचार की वैज्ञानिक प्रक्रिया
हृदय के कार्य करने के तरीके और धड़कन के पैटर्न को समझने के लिए इसकी आंतरिक संरचना को जानना आवश्यक है। मानव हृदय मुख्य रूप से चार अलग-अलग कमरों या चैंबर्स में विभाजित होता है। ऊपर की तरफ स्थित दो कमरों को एट्रिया कहा जाता है, जिनमें एक बायां और एक दायां एट्रियम शामिल है। इसी प्रकार, नीचे स्थित दो कमरों को वेंट्रिकल्स कहा जाता है, जिन्हें बायां और दायां वेंट्रिकल कहा जाता है। संपूर्ण शरीर से बिना ऑक्सीजन वाला अशुद्ध रक्त सबसे पहले ऊपर के दाएं एट्रियम में प्रवेश करता है। इसके विपरीत, फेफड़ों से शुद्ध और ऑक्सीजन युक्त रक्त आकर बाएं एट्रियम में एकत्रित होता है।

यह पूरी प्रक्रिया एक प्राकृतिक इलेक्ट्रिकल सिग्नल की मदद से संचालित होती है। दिल के दाहिने एट्रियम के ऊपरी कोने में एक कुदरती स्पार्क प्लग मौजूद होता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में साइनोएट्रियल नोड या पेसमेकर कहा जाता है। इस नोड में स्वतः ही एक हल्का बिजली का झटका या इलेक्ट्रिकल इंपल्स उत्पन्न होता है। जैसे ही यह इलेक्ट्रिकल सिग्नल बनता है, हृदय के दोनों ऊपरी कमरे यानी एट्रिया एक साथ सिकुड़ते हैं। एट्रिया के सिकुड़ने से बाएं कमरे में मौजूद शुद्ध रक्त नीचे वाले बाएं वेंट्रिकल में पहुंच जाता है, जबकि दाएं कमरे का अशुद्ध रक्त और कार्बन डाइऑक्साइड नीचे के दाएं वेंट्रिकल में चला जाता है।

## इलेक्ट्रिकल सिग्नलों का तालमेल और निचले चैंबर्स की कार्यप्रणाली
ऊपरी कमरों से रक्त का निचले कमरों में पूरी तरह ट्रांसफर होना सुनिश्चित करने के लिए प्रकृति ने एक बेहतरीन व्यवस्था बनाई है। एट्रिया से निकलने वाला इलेक्ट्रिकल सिग्नल सीधे नीचे नहीं जाता, बल्कि बीच में स्थित एक स्टेशन पर रुकता है जिसे एट्रियोवेंट्रिकुलर नोड कहा जाता है। इस स्टेशन पर सिग्नल के क्षणिक ठहराव के कारण ऊपर के दोनों कमरों का सारा रक्त नीचे के कमरों में अच्छी तरह भर जाता है। इसके पश्चात सिग्नल नीचे स्थित दोनों वेंट्रिकल्स तक पहुंचता है।

सिग्नल के पहुंचते ही दोनों वेंट्रिकल्स पूरी ताकत से सिकुड़ते हैं। वेंट्रिकल्स के इस शक्तिशाली संकुचन के कारण बाएं वेंट्रिकल में जमा शुद्ध रक्त तीव्र गति से पंप होकर पूरे शरीर की धमनियों में फैल जाता है। इसी समय, दाएं वेंट्रिकल में मौजूद अशुद्ध रक्त वापस फेफड़ों की ओर भेज दिया जाता है ताकि उसमें फिर से ऑक्सीजन भरी जा सके। हृदय का यह चक्र बिना थके और बिना रुके जीवन भर एक निर्धारित लय में चलता रहता है।

## क्या है एट्रियल फाइब्रिलेशन और कैसे बदलती है दिल की धड़कन
फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट की वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट एवं इलेक्ट्रोफिजियोलॉजिस्ट डॉ. अपर्णा जायसवाल के अनुसार, जब हृदय की यह सामान्य लयबद्ध धड़कन अनियंत्रित हो जाती है, तो इस चिकित्सीय स्थिति को एट्रियल फाइब्रिलेशन या संक्षेप में AFib कहा जाता है। इस स्थिति में हृदय को संचालित करने वाले इलेक्ट्रिकल सिग्नल अपने तय समय और नियम के अनुसार स्पार्क करने के बजाय अत्यंत तीव्र और अव्यवस्थित तरीके से उत्पन्न होने लगते हैं।

जब इलेक्ट्रिकल सिग्नलों की यह गड़बड़ी होती है, तो हृदय की धड़कन का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है। AFib से पीड़ित मरीज के एट्रिया में इलेक्ट्रिकल स्पार्क की दर प्रति मिनट 450 से 600 बार तक पहुंच सकती है। इतनी अत्यधिक गति के कारण ऊपरी कमरे उचित तरीके से सिकुड़ने के बजाय केवल फड़फड़ाने या कांपने लगते हैं। इसके परिणामस्वरूप हृदय की रक्त पंप करने की क्षमता बुरी तरह प्रभावित होती है और शरीर में रक्त प्रवाह का तालमेल टूट जाता है।

## किन कारणों और स्वास्थ्य समस्याओं से बढ़ता है AFib का जोखिम
डॉ. अपर्णा जायसवाल बताती हैं कि एट्रियल फाइब्रिलेशन का सबसे प्रमुख कारण बढ़ती उम्र है। जिस प्रकार उम्र बढ़ने के साथ हमारी त्वचा पर झुर्रियां आने लगती हैं, ठीक उसी तरह हृदय के एट्रिया के ऊतकों और मांसपेशियों में भी संरचनात्मक बदलाव होने लगते हैं। इन उम्र संबंधी बदलावों का सीधा प्रभाव हृदय के इलेक्ट्रिकल सिग्नलों पर पड़ता है, जिससे धड़कनें अनियंत्रित होने लगती हैं।

उम्र के अलावा कई अन्य पुरानी स्वास्थ्य स्थितियां भी AFib का खतरा बढ़ा देती हैं। जिन व्यक्तियों को उच्च रक्तचाप या हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, फेफड़ों से जुड़ी पुरानी बीमारियां, स्लीप एप्निया सिंड्रोम और कोरोनरी आर्टरी डिजीज जैसी समस्याएं होती हैं, उनमें इलेक्ट्रिकल सिग्नल खराब होने की संभावना काफी अधिक होती है। इसके अतिरिक्त, कुछ मामलों में यह बीमारी किसी अन्य स्पष्ट कारण के बिना केवल आनुवंशिक या जेनेटिक कारणों से भी विकसित हो सकती है।

## भारत में क्यों तेजी से बढ़ रहे हैं एट्रियल फाइब्रिलेशन के मामले
भारत में एट्रियल फाइब्रिलेशन के मामलों में लगातार हो रही वृद्धि के पीछे मुख्य रूप से देश की बदलती जनसांख्यिकी और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां जिम्मेदार हैं। AFib प्राथमिक रूप से बुजुर्ग आबादी को प्रभावित करने वाला विकार है। वर्तमान समय में भारत में औसत जीवन प्रत्याशा बढ़ने के कारण बुजुर्गों की संख्या में इजाफा हो रहा है। साथ ही, खानपान और जीवनशैली में बदलाव के कारण डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसे जोखिम कारक भी कम उम्र में देखने को मिल रहे हैं।

चिकित्सीय आंकड़ों और अनुमानों के अनुसार, 60 वर्ष की आयु तक पहुंचने पर लगभग 3 से 4 प्रतिशत लोगों में एट्रियल फाइब्रिलेशन विकसित होने का जोखिम रहता है। वहीं 80 वर्ष की आयु वाले बुजुर्गों में यह दर बढ़कर लगभग 8 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। आने वाले वर्षों में जैसे-जैसे बुजुर्ग आबादी बढ़ेगी, भारत में AFib से प्रभावित मरीजों की संख्या में भी बड़ा उछाल आने की संभावना जताई जा रही है।

## AFib से होने वाली गंभीर जटिलताएं और स्वास्थ्य पर खतरे
एट्रियल फाइब्रिलेशन केवल धड़कन तेज होने की सामान्य समस्या नहीं है, बल्कि यह एक अत्यंत गंभीर स्थिति है जो जीवन के लिए खतरा पैदा कर सकती है। AFib के कारण मरीजों में अचानक स्ट्रोक आने और हार्ट फेलियर का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। जब हृदय के ऊपरी कमरे पूरी तरह सिकुड़ने के बजाय केवल फड़फड़ाते हैं, तो उनमें रक्त का प्रवाह धीमा पड़ जाता है और थक्के जमने की आशंका पैदा हो जाती है।

यदि यह बना हुआ रक्त का थक्का हृदय से निकलकर मस्तिष्क की रक्तवाहिनियों में पहुंच जाता है, तो इससे मैसिव या बड़ा स्ट्रोक हो सकता है। AFib के कारण होने वाले स्ट्रोक आमतौर पर काफी गंभीर होते हैं और यदि मरीज की जान बच भी जाए, तो उसे स्थायी अपंगता या शारीरिक लाचारी का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, लंबे समय तक दिल की धड़कन अत्यधिक तेज और अनियंत्रित रहने से हृदय की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं, जिससे अंततः हार्ट फेलियर की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। नियमित जांच और शुरुआती लक्षणों की पहचान ही इस बीमारी के खतरों से बचाव का सबसे प्रभावी माध्यम है।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी और डायबिटीज व हाई ब्लड प्रेशर के बढ़ते मामलों के कारण 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को नियमित ईसीजी और कार्डियोलॉजिस्ट जांच करानी चाहिए।

**मरीजों के लिए:** दिल की धड़कन में अचानक अनियमिता या घबराहट महसूस होने पर इसे अनदेखा न करें, क्योंकि शुरुआती इलाज से स्ट्रोक और हार्ट फेलियर के खतरे को टाला जा सकता है।

## सवाल-जवाब

### 1. एट्रियल फाइब्रिलेशन (AFib) क्या है?
यह दिल की धड़कन की एक अनियंत्रित स्थिति है जिसमें हृदय के ऊपरी कमरे (एट्रिया) के इलेक्ट्रिकल सिग्नल बेतरतीब हो जाते हैं और धड़कन 450 से 600 बार प्रति मिनट तक पहुंच सकती है।

### 2. सामान्य इंसान का दिल एक मिनट में कितनी बार धड़कता है?
एक स्वस्थ व्यक्ति का हृदय विश्राम की अवस्था में एक मिनट में सामान्यतः 60 से 100 बार धड़कता है।

### 3. AFib की बीमारी का मुख्य कारण क्या है?
उम्र बढ़ना इसका मुख्य कारण है। इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, फेफड़ों की बीमारी, स्लीप एप्निया, कोरोनरी आर्टरी डिजीज और जेनेटिक कारण भी इसके मुख्य जोखिम कारक हैं।

### 4. क्या एट्रियल फाइब्रिलेशन से स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है?
हां, एट्रिया के ठीक से न सिकुड़ने पर खून का थक्का बन सकता है, जो दिमाग तक पहुंचकर गंभीर और बड़े स्ट्रोक की वजह बन सकता है।

### 5. भारत में किन उम्र के लोगों में AFib का जोखिम ज्यादा देखा जाता है?
भारत में 60 साल की उम्र के लगभग 3 से 4 प्रतिशत और 80 साल की उम्र के करीब 8 प्रतिशत लोगों में AFib विकसित होने का जोखिम रहता है।

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