दीवारों की सीलन से फेफड़ों पर गहरा असर, फफूंदी से सांस के मरीजों और बुजुर्गों की बढ़ सकती है मुश्किल मकान की दीवारों पर रिसने वाली सीलन और पनपने वाली फफूंदी सांस की नलियों में संक्रमण और एलर्जी पैदा कर सकती है, जिससे अस्थमा रोगियों और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। बरसात के मौसम में रिहायशी मकानों और दफ्तरों की दीवारों पर उभरने वाली सीलन को अमूमन एक सामान्य मौसमी समस्या मानकर टाल दिया जाता है, मगर इस नमी के भीतर पनपने वाले फफूंद इंसानी जिस्म के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं। नम दीवारों पर उगने वाले ये कवक जब हवा में तैरते हैं, तो इनके बारीक कण सांस लेते वक्त फेफड़ों के भीतरी हिस्सों तक पहुंच जाते हैं। इससे श्वसन तंत्र की नलियों में जलन, एलर्जी और गंभीर रेस्पिरेटरी इंफेक्शन का जोखिम पैदा हो जाता है। जिन व्यक्तियों को पहले से दमा या सांस संबंधी शिकायतें हैं अथवा जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहद कमजोर है, उनके लिए यह स्थिति स्वास्थ्य को गंभीर संकट में डाल सकती है। सांस की नलियों तक फंगस के स्पोर्स का पहुंचना गाजियाबाद स्थित यशोदा हॉस्पिटल संजयनगर की सीनियर कंसलटेंट पल्मोनोलॉजी डॉ. खुशबू के मुताबिक, मकान के अंदर लंबे वक्त तक मौजूद नमी और काली या हरी फफूंदी को नजरअंदाज करना सेहत के लिहाज से भारी पड़ सकता है। फफूंदी के स्पोर्स हवा के सहारे सांस के जरिए सीधे फेफड़ों की गहराई तक दाखिल होते हैं। सामान्य लोगों में यह एलर्जी की शुरुआत करा सकता है, जबकि रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी से जूझ रहे मरीजों में सीधा फंगल इन्फेक्शन पैदा होने की संभावना बन जाती है। इसके अलावा डायबिटीज के मरीजों को भी अपने आसपास के वातावरण को लेकर बहुत सतर्क रहने की आवश्यकता होती है, क्योंकि उनका शरीर फंगल संक्रमणों के खिलाफ जल्दी जंग नहीं जीत पाता। लक्षण और एलर्जिक ब्रोंकोपल्मोनरी एस्परगिलोसिस का खतरा फफूंदीयुक्त वातावरण में सांस लेने पर मरीज को लगातार खांसी आना, सांस फूलना, दम घुटने जैसा अहसास, सीने और श्वसन मार्ग में जलन तथा कफ जमने की शिकायत हो सकती है। कई मामलों में बलगम का रंग हल्का भूरा भी देखा जाता है। यदि किसी अस्थमा के मरीज की हालत नियमित दवाओं और सामान्य इलाज के बावजूद लगातार बिगड़ रही हो, तो चिकित्सकों को फफूंदी जनित फंगल एलर्जी की जांच करानी चाहिए। ऐसी ही एक जटिल बीमारी एलर्जिक ब्रोंकोपल्मोनरी एस्परगिलोसिस (ABPA) है, जो अक्सर दमा से पीड़ित मरीजों में कवक के संपर्क में आने से सक्रिय हो जाती है। घर में रहने वाले छोटे बच्चों और बुजुर्गों पर भी इसका गहरा असर होता है, क्योंकि उनकी शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता सीमित होती है। सीलन बढ़ने के साथ ही यदि यह दिक्कतें उभरें और लंबे समय तक बनी रहें, तो बिना देर किए विशेषज्ञ पल्मोनोलॉजिस्ट से संपर्क करना चाहिए। सतही सफाई के बजाय सीलन के मूल स्रोत का निदान दीवारों पर उगी फफूंदी को कपड़े या झाड़ू से साफ कर देना कोई स्थायी समाधान नहीं है। डॉ. खुशबू की सलाह है कि सीलन के वास्तविक कारण को पहचानकर उसे ठीक कराया जाए। पानी की पाइपलाइन में होने वाला लीकेज, छतों से रिसता पानी या जमीन से चढ़ने वाली नमी को तुरंत प्लंबर अथवा विशेषज्ञों से ठीक कराना आवश्यक है। कमरों में ताजी हवा की आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए वेंटिलेशन बेहतर रखें ताकि नमी का ठहराव न हो। अत्यधिक फफूंदी जमा होने पर सफाई करते वक्त मुंह पर मास्क और उचित सुरक्षा उपाय पहनना बेहद जरूरी है, और खुद से दवाएं लेने के बजाय चिकित्सकीय परामर्श को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसका आप पर असर घर की सीलन को ठीक न कराने से परिवार के सदस्यों में फेफड़ों की गंभीर बीमारी और भारी मेडिकल खर्च का जोखिम बढ़ सकता है। • मरीजों और बुजुर्गों के लिए: दमा, एलर्जी और डायबिटीज के मरीजों को सीलन वाले कमरों से तुरंत दूर रखें। ऐसा न करने पर सांस फूलने और भूरे बलगम जैसी जटिलताओं के चलते अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ सकती है। • घर की मरम्मत और बजट: केवल दीवार पर पेंट या सतही पुट्टी कराने के बजाय लीकेज की जड़ को ठीक कराएं। शुरुआत में प्लंबर या वाटरप्रूफिंग का काम कराने से आगे चलकर बड़े संरचनात्मक नुकसान और महंगे मेडिकल बिल से बचा जा सकता है। • साफ-सफाई के दौरान सुरक्षा: फफूंदी को पोंछते वक्त चेहरे पर सुरक्षात्मक मास्क का उपयोग अनिवार्य रूप से करें। सीधे संपर्क में आने से हवा में उड़ने वाले स्पोर्स सीधे सांस की नली में घुसकर तुरंत संक्रमण पैदा कर सकते हैं। • वेंटिलेशन और हवा का बहाव: रोजाना खिड़कियां और दरवाजे खोलकर घर के अंदर ताजी धूप और हवा आने दें। सीलन वाली जगहों पर नमी का स्तर घटाने से फंगस के पनपने की रफ्तार काफी धीमी हो जाती है। ऐसा क्यों हुआ मानसून अथवा पाइपलाइन रिसाव के कारण कमरों की दीवारों में नमी ठहर जाती है, जो फफूंद के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती है। • सीलन और फंगस की उत्पत्ति: बारिश का पानी रिसने या पाइपलाइन लीकेज के कारण दीवारों की ईंटें पानी सोख लेती हैं। यह बंद कमरों में नम तापमान बनाकर फंगल स्पोर्स के अंकुरण का कारण बनता है। • हवा में कणों का फैलना: फफूंदी की कॉलोनी विकसित होने पर वह अपने स्पोर्स हवा में छोड़ती है। कमरों में उचित वेंटिलेशन न होने से ये हानिकारक कण हवा में तैरते रहते हैं और सांस के साथ अंदर चले जाते हैं। • रोगियों में जटिलताएं: कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली और अस्थमा से पीड़ित शरीर इन बाहरी फंगल प्रोटीन्स के प्रति अत्यधिक तीव्र प्रतिक्रिया देता है। इससे एलर्जिक ब्रोंकोपल्मोनरी एस्परगिलोसिस जैसी विकृतियां जन्म लेती हैं। सवाल-जवाब 1. दीवारों पर उगने वाली फफूंदी से फेफड़ों पर क्या असर पड़ता है? फफूंदी से निकलने वाले बारीक स्पोर्स सांस के जरिए फेफड़ों में पहुंचकर एलर्जी, श्वसन नली में जलन और फेफड़ों का गंभीर संक्रमण पैदा कर सकते हैं। 2. फफूंदी के संपर्क में आने पर कौन से लक्षण दिखाई देते हैं? मरीज को लगातार खांसी, सांस फूलने की समस्या, सांस लेने में तकलीफ, गले और नलियों में जलन तथा भूरे रंग का बलगम आने की शिकायत हो सकती है। 3. सीलन वाली फफूंदी से किन लोगों को सबसे ज्यादा खतरा है? अस्थमा के मरीजों, कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों, डायबिटीज के रोगियों, छोटे बच्चों और बुजुर्गों को इससे सर्वाधिक खतरा रहता है। 4. एलर्जिक ब्रोंकोपल्मोनरी एस्परगिलोसिस (ABPA) क्या है? यह फफूंदी जनित फंगल एलर्जी से जुड़ी एक चिकित्सीय स्थिति है, जो अस्थमा से पीड़ित मरीजों में कवक के संपर्क में आने पर उनकी तकलीफों को कई गुना बढ़ा देती है। 5. घर में सीलन और फफूंदी को दूर करने का सही तरीका क्या है? सिर्फ ऊपरी सफाई करने के बजाय पानी के रिसाव या पाइप लीकेज को ठीक कराएं, कमरों में वेंटिलेशन दुरुस्त रखें और सफाई करते समय मास्क का प्रयोग करें। https://trendkia.com/health/divaron-ki-silana-se-phepharon-para-gahara-asara-phaphundi-se-sansa-ke-marijon-aura-bujurgon-ki-barha-sakati-hai-mushkila-34533 TrendKia — Har trend, sabse pehle.