# जेन जी लड़कियों में तेजी से बढ़ रहे पीसीओएस और पीमॉस के मामले, पटना की डॉक्टर मीना सामंत ने बताए बचाव के प्रभावी उपाय

> पटना में बदलती जीवनशैली के कारण युवा लड़कियों में पीसीओएस (PCOS) और पीमॉस (PEMOS) की समस्या तेजी से बढ़ रही है, जिसके मुख्य कारण शारीरिक निष्क्रियता और अस्वस्थ खान-पान हैं।

**Type:** article · **Category:** स्वास्थ्य · **Published:** 2026-09-12 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/health/gen-z-larakiyon-men-teji-se-barha-rahe-pcos-aura-pemos-ke-mamale-patna-ki-doktara-meena-samant-ne-batae-bachava-ke-prabhavi-upaya-31650 · **Language:** Hindi
**Tags:** पीसीओएस, पीमॉस, हार्मोनल असंतुलन, महिला स्वास्थ्य, मेदांता पटना, डॉ मीना सामंत, किशोरावस्था स्वास्थ्य

पटना में युवा लड़कियों और किशोरियों के बीच एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती तेजी से उभर रही है। आधुनिक जीवनशैली में आए बदलावों ने महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को कई तरीकों से प्रभावित किया है। इनमें से सबसे अधिक चिंताजनक समस्या पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम यानी पीसीओएस (PCOS) की है। इसे चिकित्सा जगत के विशेषज्ञ अब केवल ओवरी यानी अंडाशय की बीमारी नहीं मानते, बल्कि इसे पॉलीएंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम यानी पीमॉस (PEMOS) का नया नाम दे रहे हैं। यह बदलाव इसलिए किया गया है क्योंकि यह समस्या केवल प्रजनन अंगों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध शरीर की संपूर्ण चयापचय प्रक्रिया और हार्मोनल संतुलन से है। सबसे ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस गंभीर बीमारी के लक्षण अब बहुत ही कम उम्र में, यानी किशोरावस्था से ही लड़कियों में दिखाई देने लगे हैं। मासिक धर्म की शुरुआत के साथ ही लड़कियों के शरीर में होने वाले हार्मोनल उतार-चढ़ाव इस समस्या को और बढ़ा देते हैं, जिससे अनियमित पीरियड्स, चेहरे पर मुंहासे, वजन का तेजी से बढ़ना और शरीर पर अनचाहे बालों जैसी दिक्कतें पैदा होने लगती हैं।

## जागरूकता में वृद्धि और शुरुआती लक्षणों की पहचान
पटना स्थित जय प्रभा मेदांता सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल में प्रसूति एवं स्त्री रोग (ओबीएस एंड गायनी) विभाग की डायरेक्टर डॉ. मीना सामंत ने इस विषय पर गहराई से बात की। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान समय में स्वास्थ्य के प्रति बढ़ी जागरूकता के कारण युवा लड़कियां और उनके अभिभावक ऐसी समस्याओं को लेकर काफी गंभीर हो गए हैं। पहले की तुलना में अब लोग डॉक्टरों के पास जल्दी परामर्श के लिए पहुंच रहे हैं। हालांकि, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि किशोरावस्था के दौरान शरीर में दिखने वाले हर छोटे-मोटे बदलाव को तुरंत पीसीओएस मान लेना सही नहीं है। किशोरावस्था का दौर शरीर में बड़े बदलावों का होता है, इसलिए हर लक्षण को सीधे बीमारी से जोड़कर देखना जल्दबाजी होगी।

## किशोरावस्था में हार्मोनल असंतुलन की वजह
डॉ. मीना सामंत के अनुसार, जब लड़कियों के शरीर में मासिक धर्म या माहवारी की शुरुआत होती है, तो उनका प्रजनन तंत्र सक्रिय होने लगता है। इस अवस्था में शरीर के भीतर प्रजनन से जुड़े विभिन्न प्रकार के हार्मोनों का निर्माण और उनका सक्रिय प्रवाह शुरू होता है। इसी शुरुआती संवेदनशील दौर में अगर हार्मोनों का संतुलन बिगड़ जाए, तो पीसीओएस के शुरुआती लक्षण प्रकट होने लगते हैं। इस समस्या के पीछे कोई एक निश्चित कारण नहीं होता, बल्कि यह कई आंतरिक और बाहरी कारकों का सामूहिक परिणाम है। यही वजह है कि कुछ लड़कियों के शरीर में बहुत ही कम उम्र में इस बीमारी के लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि माहवारी शुरू होने के तुरंत बाद किसी लड़की में पीसीओएस का अंतिम या पक्का निदान करने से बचना चाहिए। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि किशोरावस्था में लड़कियों का प्रजनन तंत्र पूरी तरह से परिपक्व यानी मेच्योर नहीं हुआ होता है। शरीर को अपनी प्राकृतिक लय हासिल करने में थोड़ा समय लगता है। इसी वजह से चिकित्सा विशेषज्ञ आमतौर पर मासिक धर्म शुरू होने के लगभग छह से आठ साल बाद ही किसी मरीज की स्थिति का सही मूल्यांकन करते हैं और उसके बाद ही पीसीओएस की पुष्टि कर उसका इलाज शुरू करते हैं।

## आधुनिक जीवनशैली: फास्ट फूड और बढ़ता स्क्रीन टाइम
इस बीमारी के बढ़ने में हमारी बदली हुई जीवनशैली की बहुत बड़ी भूमिका है। डॉ. मीना सामंत बताती हैं कि आज की युवा पीढ़ी का झुकाव फास्ट फूड और पैकेट बंद खाद्य पदार्थों की ओर बहुत ज्यादा बढ़ गया है। इसके अलावा, बच्चे और किशोर अपना ज्यादातर समय टेलीविजन, कंप्यूटर या मोबाइल फोन की स्क्रीन के सामने बिताते हैं। शारीरिक गतिविधियों और खेलकूद में उनकी रुचि लगातार कम हो रही है। इस प्रकार की निष्क्रिय दिनचर्या सीधे तौर पर शरीर के वजन को बढ़ाने का काम करती है।

जब शरीर का वजन बढ़ता है और शारीरिक निष्क्रियता बनी रहती है, तो शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या पैदा हो जाती है। इंसुलिन रेजिस्टेंस का मतलब है कि शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन हार्मोन के प्रति सही तरीके से प्रतिक्रिया नहीं दे पाती हैं। इसका सीधा असर महिला हार्मोनों के संतुलन पर पड़ता है और सामान्य मासिक चक्र पूरी तरह से गड़बड़ा जाता है। इस स्थिति के कारण अंडाशय में अंडों का सामान्य रूप से विकसित होना और समय पर ओवुलेशन होना बाधित हो जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि लड़कियों के पीरियड्स काफी लंबे समय तक टल जाते हैं और जब मासिक धर्म आता है, तो वह सामान्य से अधिक दिनों तक बना रहता है या अत्यधिक रक्तस्राव होता है।

## सिर्फ मासिक धर्म की गड़बड़ी नहीं हैं इसके लक्षण
आम तौर पर लोग यह समझते हैं कि पीसीओएस का मतलब केवल पीरियड्स का अनियमित होना है, लेकिन यह धारणा पूरी तरह से गलत है। यह एक बहु-आयामी स्वास्थ्य समस्या है जिसमें शरीर पर कई अन्य प्रतिकूल प्रभाव भी दिखाई देते हैं। इस बीमारी से पीड़ित लड़कियों में तेजी से वजन बढ़ना या मोटापे की शिकायत होना बहुत आम है। इसके अलावा, शरीर में एंड्रोजेन यानी पुरुष हार्मोन का स्तर बढ़ जाने के कारण उनके चेहरे, छाती और पीठ पर जरूरत से ज्यादा बाल उगने लगते हैं, जिसे चिकित्सकीय भाषा में हिर्सुटिज़्म कहा जाता है।

इसके अतिरिक्त, चेहरे पर गंभीर रूप से मुंहासे होना, सिर के बाल पतले होकर झड़ने लगना जैसी समस्याएं भी देखने को मिलती हैं। इस बीमारी में पीरियड्स का महीनों तक न आना और फिर आने पर बहुत अधिक दिनों तक बने रहना मुख्य लक्षणों में शामिल हैं। डॉ. मीना सामंत के अनुसार, शरीर के भीतर चल रहा इंसुलिन रेजिस्टेंस, ओवुलेशन में आने वाली बाधाएं और हार्मोनों का अनियंत्रित होना मिलकर इन सभी शारीरिक समस्याओं को और अधिक गंभीर बना देते हैं।

## लाइफस्टाइल में सुधार ही है सबसे प्रभावी उपाय
इस जटिल स्थिति से बचने और इसे नियंत्रित करने का सबसे महत्वपूर्ण और पहला हथियार जीवनशैली में आवश्यक सुधार करना है। डॉ. मीना सामंत का सुझाव है कि प्रत्येक लड़की को अपनी दैनिक दिनचर्या में नियमित शारीरिक गतिविधि को अनिवार्य रूप से शामिल करना चाहिए। इसके लिए रोजाना कम से कम आधे घंटे व्यायाम, योग, टहलना या कोई भी खेलकूद जैसी गतिविधियों को अपनाया जा सकता है जिससे शरीर सक्रिय रहे और पसीना आए।

शारीरिक गतिविधियों के साथ-साथ खान-पान की आदतों में सुधार करना भी उतना ही जरूरी है। भोजन में फाइबर से भरपूर चीजें जैसे ताजे फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज और सलाद को अधिक से अधिक शामिल किया जाना चाहिए। भोजन हमेशा एक निश्चित और नियमित समय पर करने की आदत डालनी चाहिए। डिब्बाबंद भोजन, पिज्जा, बर्गर जैसे फास्ट फूड और अत्यधिक तली-भुनी चीजों से पूरी तरह दूरी बना लेनी चाहिए। इसके साथ ही डॉक्टरों द्वारा मीठी चीजों और अत्यधिक फैट वाले खाद्य पदार्थों का सेवन कम करने की सलाह दी जाती है। शरीर के कुल वजन को नियंत्रित रखना पीसीओएस को हराने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है। विशेष रूप से पेट के आसपास जमा होने वाली चर्बी को कम करना आवश्यक है, क्योंकि इस अतिरिक्त चर्बी का सीधा संबंध इंसुलिन रेजिस्टेंस से होता है।

## चिकित्सीय उपचार और व्यक्तिगत दृष्टिकोण
पीसीओएस का इलाज किसी एक सामान्य दवा या एक निश्चित फॉर्मूले से नहीं किया जा सकता। प्रत्येक मरीज के शरीर की स्थिति, उसके लक्षण और उसकी व्यक्तिगत जरूरतों के आधार पर डॉक्टर इलाज का तरीका तय करते हैं। डॉ. मीना सामंत बताती हैं कि यदि किसी लड़की को बहुत लंबे समय तक मासिक धर्म नहीं आता है, तो शरीर के हार्मोनल संतुलन को फिर से ठीक करने के लिए विशिष्ट चिकित्सकीय उपचार दिया जाता है। उनके अनुसार, महिला के सामान्य स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए साल में कम से कम चार से छह बार प्राकृतिक रूप से पीरियड्स का आना बेहद जरूरी है, और यदि ऐसा नहीं हो रहा है, तो इसके लिए आवश्यक दवाएं दी जाती हैं।

यदि मरीज के शरीर में एंड्रोजेन हार्मोन का स्तर बहुत अधिक बढ़ गया है, जिसके कारण चेहरे पर मुंहासे हो रहे हैं या शरीर पर अनचाहे बाल आ रहे हैं, तो डॉक्टर एंड्रोजेन के प्रभाव को कम करने वाली दवाएं (एंटी-एंड्रोजेन) लिखते हैं। इसके विपरीत, जिन विवाहित महिलाओं को पीसीओएस के कारण गर्भधारण करने में कठिनाई आ रही है, उन्हें ओवुलेशन की प्रक्रिया को सामान्य और बेहतर बनाने वाली दवाएं दी जाती हैं। इन सबके साथ ही, शरीर में मौजूद इंसुलिन रेजिस्टेंस को नियंत्रित करने के लिए डॉक्टरों द्वारा वजन घटाने पर सबसे अधिक जोर दिया जाता है और जरूरत पड़ने पर इंसुलिन सेंसिटाइजर्स जैसी दवाओं का प्रयोग किया जाता है ताकि शरीर में शर्करा और हार्मोन का स्तर सुचारू रूप से काम कर सके।

## बिहार और पटना में बढ़ता स्वास्थ्य संकट
डॉ. मीना सामंत के अनुसार, यद्यपि मेदांता पटना जैसे सुपरस्पेशलिटी अस्पताल में आने वाले मरीज पूरे राज्य की सामान्य आबादी का सटीक प्रतिनिधित्व नहीं करते, क्योंकि यहां आमतौर पर लोग तभी आते हैं जब उन्हें कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या सताने लगती है। फिर भी, उनके ओपीडी के अनुभवों के आधार पर यह स्पष्ट है कि अस्पताल पहुंचने वाली युवा उम्र की कुल महिला मरीजों में से लगभग 15 से 20 प्रतिशत मरीज पीसीओएस या पीमॉस जैसी गंभीर समस्याओं से पीड़ित होती हैं। यदि इसमें अन्य आयु वर्ग की महिलाओं को भी शामिल कर लिया जाए, तो यह आंकड़ा और भी बड़ा दिखाई देता है। उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए बताया कि हाल ही में केवल एक सुबह के ओपीडी सत्र के दौरान ही उन्होंने पांच से छह ऐसी मरीजों का इलाज किया जो पीसीओएस या उससे जुड़ी हार्मोनल जटिलताओं से परेशान थीं। यह स्थिति दर्शाता है कि यह बीमारी अब कितनी आम और चिंताजनक हो चुकी है।

## इसका आप पर असर
यह बढ़ती स्वास्थ्य समस्या अभिभावकों और युवा लड़कियों को गंभीर चयापचय विकारों से बचाने के लिए स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।

- **भारत में:** जेन जी लड़कियों के बीच पीसीओएस और पीमॉस का बढ़ना एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा करता है, जो मुख्य रूप से गतिहीन जीवनशैली और खराब खान-पान के कारण हो रहा है। रोजाना व्यायाम और पोषणयुक्त भोजन अपनाकर भविष्य में होने वाली टाइप 2 डायबिटीज और प्रजनन संबंधी जटिलताओं से बचा जा सकता है।
- **पटना और बिहार में:** स्थानीय स्तर पर युवा ओपीडी मरीजों में इसके लक्षण 15 से 20 प्रतिशत तक देखे जा रहे हैं, इसलिए क्षेत्र के परिवारों को अनियमित पीरियड्स को नजरअंदाज करने के बजाय तुरंत चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए। शुरुआती चरण में पटना के मेदांता जैसे विशेष अस्पतालों से संपर्क कर गंभीर हार्मोनल समस्याओं को रोका जा सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
युवा लड़कियों में पीसीओएस और पीमॉस का बढ़ता ग्राफ सीधे तौर पर हमारी आधुनिक आदतों और शारीरिक बदलावों के बीच के असंतुलन को दर्शाता है।

- **शारीरिक निष्क्रियता:** टेलीविजन, कंप्यूटर और मोबाइल स्क्रीन पर बिताए जाने वाले अत्यधिक समय ने मैदानी खेलकूद और अन्य शारीरिक गतिविधियों की जगह ले ली है। इससे चयापचय की दर धीमी होती है और वजन बढ़ता है।
- **अस्वास्थ्यकर खान-पान:** ताजे फलों और फाइबर युक्त घरेलू भोजन के बजाय वसायुक्त, मीठे और रिफाइंड फास्ट फूड का बढ़ता सेवन सीधे तौर पर पेट की चर्बी और मोटापे को बढ़ाता है।
- **इंसुलिन रेजिस्टेंस:** मोटापे और निष्क्रियता का सामूहिक परिणाम इंसुलिन रेजिस्टेंस के रूप में सामने आता है। यह स्थिति शरीर में इंसुलिन का स्तर बढ़ा देती है, जो अंततः अंडाशय के कामकाज और हार्मोनल संतुलन को बाधित करती है।

## सवाल-जवाब

### 1. पीमॉस (PEMOS) क्या है और यह पीसीओएस से कैसे भिन्न है?
विशेषज्ञ अब पीसीओएस को पॉलीएंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PEMOS) कह रहे हैं क्योंकि यह केवल ओवरी से जुड़ी बीमारी नहीं है, बल्कि संपूर्ण एंडोक्राइन और मेटाबॉलिक सिस्टम को प्रभावित करती है।

### 2. डॉक्टर किशोरावस्था के तुरंत बाद पीसीओएस का पक्का निदान क्यों नहीं करते?
किशोरावस्था में लड़कियों का प्रजनन तंत्र पूरी तरह परिपक्व नहीं होता है। इसलिए, डॉक्टर आमतौर पर मासिक धर्म शुरू होने के 6 से 8 साल बाद ही स्थिति का आकलन कर पक्का इलाज तय करते हैं।

### 3. मोटापे और इंसुलिन रेजिस्टेंस का पीरियड्स पर क्या असर होता है?
बढ़ते वजन के कारण इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या पैदा होती है, जिससे हार्मोनल संतुलन बिगड़ जाता है और अंडे का सामान्य विकास व ओवुलेशन प्रभावित होता है। इससे पीरियड्स लंबे समय तक टल जाते हैं।

### 4. सामान्य स्वास्थ्य के लिए साल में कितनी बार पीरियड्स आना जरूरी है?
विशेषज्ञों के अनुसार, एक महिला के सामान्य स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए साल भर में कम से कम 4 से 6 बार पीरियड्स आना जरूरी माना जाता है।

### 5. पटना के मेदांता अस्पताल में युवा लड़कियों में इसके कितने मामले देखे जा रहे हैं?
डॉ. मीना सामंत के अनुसार, मेदांता पटना में आने वाली युवा उम्र की महिला मरीजों में से लगभग 15 से 20 प्रतिशत मरीज पीसीओएस या पीमॉस की समस्या से ग्रसित होती हैं।

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