तीस की उम्र के बाद क्या माँ बनना वाकई मुश्किल है? डॉक्टर से जानिए प्रेग्नेंसी से जुड़े बड़े भ्रम और सच फैजाबाद के अमृता हॉस्पिटल की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. गार्गी अग्रवाल ने महिलाओं की सेहत, उम्र, डिलीवरी और प्रेग्नेंसी से जुड़े कई अहम सवालों के जवाब दिए हैं। फैजाबाद में महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर अक्सर कई तरह की उलझनें बनी रहती हैं। उम्र बढ़ने के साथ क्या माँ बनना सचमुच कठिन हो जाता है? यदि महावारी समय पर आ रही है, तब भी क्या गर्भधारण में रुकावट आ सकती है? पहली डिलीवरी अगर ऑपरेशन से हुई है, तो क्या अगली बार सामान्य प्रसव हो सकता है? इन तमाम उलझनों को सुलझाने के लिए, अमृता हॉस्पिटल के ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी डिपार्टमेंट की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. गार्गी अग्रवाल ने विस्तार से चर्चा की। उन्होंने महिलाओं की शारीरिक बनावट, प्रजनन क्षमता और गर्भधारण से जुड़ी कई जरूरी बातों पर खुलकर बात की। तीस की उम्र पार करने के बाद गर्भधारण पर असर डॉ. गार्गी अग्रवाल स्पष्ट करती हैं कि उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं के अंडाशय में अंडों की तादाद और गुणवत्ता दोनों में गिरावट आने लगती है। हालांकि, यह मान लेना पूरी तरह सही नहीं है कि तीस की उम्र पार करते ही माँ बनना असंभव सा हो जाता है। हाँ, यह जरूर है कि इस पड़ाव के बाद गर्भधारण में थोड़ा अधिक समय लग सकता है। जैसे-जैसे उम्र पैंतीस या चालीस वर्ष की ओर बढ़ती है, यह चुनौती और अधिक गहरी होती जाती है। समय पर महावारी आने पर भी क्यों आ सकती है दिक्कत डॉ. गार्गी अग्रवाल के अनुसार, नियमित महावारी इस बात का संकेत है कि महिला का हॉर्मोनल संतुलन ठीक है, लेकिन केवल पीरियड्स का समय पर आना ही बच्चे के जन्म के लिए काफी नहीं होता है। इसके लिए महिला की फैलोपियन ट्यूब का पूरी तरह खुला होना और पुरुष साथी के शुक्राणुओं का स्वस्थ होना भी उतना ही आवश्यक है। प्रजनन प्रक्रिया में इन सभी कारकों का सही तालमेल होना बेहद जरूरी है। क्या ऑपरेशन के बाद सामान्य डिलीवरी संभव है डॉ. गार्गी बताती हैं कि यदि पहली बार बच्चे का जन्म सिजेरियन यानी ऑपरेशन के जरिए हुआ है, तो दूसरी बार सामान्य प्रसव की कोशिश की जा सकती है। इसे चिकित्सा की भाषा में वीबैक यानी वेजाइनल बर्थ आफ्टर सिजेरियन कहा जाता है। हालांकि, यह फैसला डॉक्टर पूरी तरह जाँच के बाद लेते हैं। इसमें पिछली सर्जरी की वजह, माँ और बच्चे की सेहत, बच्चे के विकास की गति और अन्य चिकित्सीय स्थितियों को बारीकी से परखा जाता है। क्या चलने-फिरने से गर्भपात का खतरा होता है डॉ. गार्गी का कहना है कि सामान्य गर्भावस्था के दौरान रोजमर्रा की गतिविधियाँ करने, पैदल चलने या सीढ़ियों का इस्तेमाल करने से गर्भपात नहीं होता है। यह एक आम भ्रम है कि गर्भवती महिला को पूरा समय बिस्तर पर ही आराम करना चाहिए। हाँ, कुछ विशेष मामलों में यदि कोई जोखिम होता है, तो डॉक्टर भारी सामान उठाने या बहुत अधिक परिश्रम वाले कार्यों से बचने की सलाह जरूर देते हैं। कैसे तय होता है होने वाले बच्चे का लिंग डॉ. गार्गी अग्रवाल बताती हैं कि बच्चे का जैविक लिंग पूरी तरह सेक्स क्रोमोसोम पर निर्भर करता है। महिलाओं के शरीर में सामान्य रूप से XX और पुरुषों में XY क्रोमोसोम पाए जाते हैं। महिला का अंडा हमेशा X क्रोमोसोम देता है, जबकि पुरुष के शुक्राणु में X या इसी तरह Y क्रोमोसोम हो सकता है। इसी संयोजन के आधार पर शिशु का लिंग तय होता है। इसलिए इस बात के लिए केवल महिला को दोषी ठहराना पूरी तरह गलत और वैज्ञानिक रूप से निराधार है। इसका आप पर असर गर्भधारण, प्रसव और महिला स्वास्थ्य से जुड़े ये तथ्य हर उस परिवार के लिए उपयोगी हैं जो परिवार नियोजन या गर्भावस्था की योजना बना रहे हैं। • आयु का प्रभाव: 30 या 35 की उम्र के बाद गर्भधारण में अधिक समय लग सकता है, इसलिए परिवार नियोजन का फैसला करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए। • नियमित महावारी: केवल नियमित पीरियड्स होना ही गर्भधारण की गारंटी नहीं है, बल्कि आंतरिक अंगों की सेहत भी उतनी ही जरूरी है। • ऑपरेशन के बाद डिलीवरी: पहली सीजेरियन डिलीवरी के बाद डॉक्टर की सलाह से नॉर्मल डिलीवरी का प्रयास किया जा सकता है। • शारीरिक सक्रियता: सामान्य गर्भावस्था में लगातार बिस्तर पर लेटने की जरूरत नहीं होती, बल्कि सामान्य कामकाज किए जा सकते हैं। • शिशु का लिंग: बच्चे के लिंग निर्धारण में महिला को जिम्मेदार ठहराना वैज्ञानिक रूप से गलत है, जो सामाजिक भ्रांतियों को दूर करता है। ऐसा क्यों हुआ उम्र के साथ प्रजनन क्षमता में बदलाव आने और गर्भावस्था से जुड़ी भ्रांतियों के पीछे स्पष्ट चिकित्सीय और जैविक कारण होते हैं। • अंडों की गुणवत्ता: महिलाओं में उम्र बढ़ने के साथ अंडाशय के भीतर अंडों की संख्या और उनकी गुणवत्ता प्राकृतिक रूप से कम होने लगती है। • हार्मोनल और शारीरिक कारक: केवल हॉर्मोनल संतुलन सही होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि फैलोपियन ट्यूब की स्थिति और शुक्राणु की गुणवत्ता भी अहम भूमिका निभाती है। • आनुवंशिक संयोजन: बच्चे का जैविक लिंग पूरी तरह माता-पिता से मिलने वाले सेक्स क्रोमोसोम के मेल पर निर्भर करता है। सवाल-जवाब 1. क्या 30 साल की उम्र के बाद माँ बनना असंभव है? नहीं, 30 साल के बाद माँ बनना असंभव नहीं है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ गर्भधारण में थोड़ा अधिक समय लग सकता है। 2. क्या नियमित पीरियड्स होने पर गर्भधारण में कोई परेशानी नहीं आती? नियमित पीरियड्स अच्छे हॉर्मोनल स्वास्थ्य का संकेत हैं, लेकिन गर्भधारण के लिए फैलोपियन ट्यूब का खुला होना और शुक्राणुओं का स्वस्थ होना भी जरूरी है। 3. क्या पहली डिलीवरी सिजेरियन होने पर दूसरी नॉर्मल हो सकती है? हाँ, पहली सिजेरियन डिलीवरी के बाद डॉक्टर की सलाह और स्थिति की जाँच के आधार पर नॉर्मल डिलीवरी का प्रयास किया जा सकता है। 4. क्या प्रेग्नेंसी के दौरान चलने-फिरने से गर्भपात हो सकता है? सामान्य गर्भावस्था में चलने-फिरने, सीढ़ियां चढ़ने या रोजमर्रा के काम करने से गर्भपात नहीं होता है। 5. बच्चे के लिंग निर्धारण के लिए किसे जिम्मेदार माना जाता है? बच्चे का लिंग माता-पिता दोनों के क्रोमोसोम के संयोजन से तय होता है, इसलिए इसके लिए केवल महिला को जिम्मेदार ठहराना गलत है। https://trendkia.com/health/is-pregnancy-harder-after-thirty-a-gynecologist-debunks-common-myths-49148 TrendKia — Har trend, sabse pehle.