कम उम्र में ही दर्द से जूझ रहे बच्चे, आखिर क्यों बढ़ रही स्कूली छात्रों में रीढ़ और पीठ की गंभीर समस्याएं? देशभर के स्कूली बच्चों में मस्कुलोस्केलेटल और पीठ दर्द की समस्याओं में 40% की चिंताजनक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ भारी बस्ते ही नहीं, बल्कि कम शारीरिक गतिविधि और लंबे समय तक बैठना इसके मुख्य कारण हैं। स्कूल जाने वाले बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर एक नई और चिंताजनक बात सामने आई है, जिसने देश के अभिभावकों की नींद उड़ा दी है। हाल ही में सामने आए शोध आंकड़ों के मुताबिक, स्कूली उम्र के बच्चों में मांसपेशियों और हड्डियों से जुड़ी मस्कुलोस्केलेटल समस्याओं में पूरे 40% की भारी बढ़ोतरी देखी गई है। इस गंभीर स्थिति के कारण कम उम्र के बच्चे भी लगातार पीठ दर्द और शरीर में जकड़न की शिकायत कर रहे हैं। इस बढ़ते स्वास्थ्य संकट को लेकर इंडियन एसोसिएशन ऑफ फिजियोथेरेपिस्ट्स की ओर से भी कड़ी चेतावनी जारी की गई है, जिसमें समय रहते सुधारात्मक कदम उठाने की अपील की गई है। विशेषज्ञों की चिंता और नई रणनीति की जरूरत इस विषय पर अपनी बात रखते हुए वर्ल्ड फिजियोथेरेपी एशिया वेस्टर्न पैसिफिक रीजनल कॉन्फ्रेंस 2026 के ऑर्गनाइजिंग चेयर प्रोफेसर डॉ. संजीव के झा ने स्पष्ट किया है कि पीठ दर्द जैसी समस्याएं अब बुढ़ापे तक सीमित नहीं रह गईं हैं। उन्होंने बताया कि हम स्कूली बच्चों में मस्कुलोस्केलेटल विकारों की दर में 40% की हैरान करने वाली वृद्धि देख रहे हैं, जिसके बाद स्कूलों में निवारक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली पर दोबारा से विचार करने की अत्यंत आवश्यकता महसूस हो रही है। डॉ. संजीव के झा ने आगे विस्तार से समझाया कि आज की पीढ़ी के बच्चे पढ़ाई के नाम पर या स्क्रीन के सामने घंटों बिताते हैं, जिसके चलते उनकी फिजिकल एक्टिविटी बहुत कम हो गई है। उनके दैनिक जीवन में शारीरिक मूवमेंट, मांसपेशियों की ताकत, शरीर का लचीलापन और फिटनेस को वह प्राथमिकता नहीं मिल पाती जो प्राकृतिक रूप से मिलने चाहिए। हमें ऐसी व्यवस्था बनाने की जरूरत है जहां समस्या पैदा होने के बाद उसके इलाज पर पैसे खर्च करने के बजाय, शुरुआती स्तर पर ही बच्चों को सही फिटनेस और फिजियोथेरेपी के उपायों के जरिए सुरक्षित रखा जा सके। देशभर के विभिन्न शोधों में सामने आए डराने वाले आंकड़े भारतीय स्तर पर किए गए कई शोध कार्यों और अध्ययनों से यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है कि स्कूली बच्चों में हड्डियों से जुड़ी परेशानियां पहले से ही एक विकराल रूप ले चुकी हैं। मध्य प्रदेश के भोपाल शहर के चार चुनिंदा स्कूलों में 8 से 15 वर्ष की आयु वर्ग के कुल 934 बच्चों पर एक विस्तृत स्टडी की गई। इस अध्ययन के चौंकाने वाले परिणाम में यह बात सामने आई कि लगभग 55.9% बच्चों ने बीते 12 महीनों के दौरान शरीर के किसी न किसी हिस्से में दर्द का अनुभव किया था। वहीं, 41.6% बच्चों ने पिछले 10 दिनों के भीतर ही दर्द होने की शिकायत दर्ज कराई थी और 21.3% बच्चों को इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए डॉक्टर के पास तक जाना पड़ा था। इसके अलावा इस स्टडी में एक और गौर करने योग्य तथ्य यह मिला कि बच्चों के स्कूल बैग का औसत वजन उनके अपने शरीर के कुल वजन का 16.5% तक आंका गया था। इसी तरह का एक अन्य अध्ययन ओडिशा के खुर्दा जिले के शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के 10 से 16 वर्ष की उम्र के स्कूली बच्चों पर किया गया। इस शोध में पिछले एक साल के अंतराल में मस्कुलोस्केलेटल दर्द का प्रसार 18.8% पाया गया। इन तमाम शोधों ने स्कूली बच्चों पर शारीरिक लक्षणों के भारी बोझ को उजागर किया है और बैग के वजन के साथ-साथ उम्र, लिंग और शारीरिक बनावट जैसे तमाम कारकों की गहराई से जांच-पड़ताल की है। सिर्फ भारी स्कूल बैग को दोष देना सही नहीं हालांकि देश के तमाम स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात पर भी जोर देते हैं कि बच्चों में पनप रही पीठ दर्द की इस समस्या के लिए केवल उनके भारी-भरकम स्कूल बैग को ही एकमात्र जिम्मेदार कारक नहीं माना जाना चाहिए। वैज्ञानिक साक्ष्य और शोध इस बात की तस्दीक करते हैं कि इसके पीछे कई अन्य कारण भी समान रूप से जिम्मेदार हो सकते हैं। इनमें बच्चों की शारीरिक गतिविधि का स्तर, उनके उठने, बैठने और चलने-फिरने का गलत तरीका, बचपन में लगी कोई पुरानी चोट, मानसिक और सामाजिक तनाव, लंबे समय तक एक ही मुद्रा में बैठे रहना और अन्य व्यक्तिगत जीवनशैली से जुड़ी आदतें शामिल हैं। उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण स्पष्ट तौर पर इशारा करते हैं कि बच्चों की मस्कुलोस्केलेटल सेहत को बेहतर बनाए रखने के लिए केवल बस्तों के वजन पर पाबंदी लगाने से बात नहीं बनेगी। इसके लिए एक बहुत ही व्यापक और बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है, जो बच्चे के संपूर्ण जीवनचक्र को ध्यान में रखे। पोस्चर और सुस्त जीवनशैली की बड़ी भूमिका इस विषय पर अपने विचार साझा करते हुए डॉ. रुचि वार्ष्णेय ने बताया कि हमें बच्चों में पीठ दर्द की इस बीमारी को केवल भारी स्कूल बैग के साथ जोड़कर देखने की भूल नहीं करनी चाहिए। बच्चों को नियमित तौर पर अपने शरीर को हिलाने-डुलने, शारीरिक रूप से चुस्त-दुरुस्त रहने, मांसपेशियों की ताकत बढ़ाने, लचीलापन विकसित करने और सही पॉستر यानी उठने-बैठने की उचित शैली के बारे में शिक्षित करने की सख्त जरूरत है। फिजियोथेरेपी की मदद से स्कूल ऐसे निवारक कार्यक्रम तैयार कर सकते हैं जो दर्द के लंबे समय तक बने रहने का इंतजार करने के बजाय शुरुआती दौर में ही मूवमेंट की शिक्षा और स्वस्थ आदतों पर फोकस करें। यह चिंताजनक स्थिति उस दौर में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है जब बच्चों का अधिकांश समय बिना किसी खास शारीरिक गतिविधि वाले कामों में गुजर रहा है। वर्ष 2025 की एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-एनालिसिस के आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं, जिसमें 129 अलग-अलग रिपोर्टों को शामिल किया गया था। क्रॉस-सेक्शनल अध्ययनों के जरिए किए गए इस विश्लेषण में ज्यादा देर तक लगातार बैठे रहने और रीढ़ की हड्डी के दर्द के बीच एक स्पष्ट संबंध पाया गया है। इसलिए आज की मुख्य चुनौती केवल उन बच्चों के इलाज तक सीमित नहीं है जिन्हें दर्द की शिकायत हो चुकी है, बल्कि असल जरूरत जीवन की शुरुआत से ही एक सक्रिय और फिट माहौल तैयार करने की है। भविष्य के लिए निवारक उपाय और सही मंच देशभर के फिजियोथेरेपिस्टों का एक ही स्वर में यही मानना है कि स्कूल बच्चों में शारीरिक शिक्षा, सही व्यायाम, पोस्चर को लेकर जागरूकता, फिटनेस प्रशिक्षण, खेलकूद के दौरान चोट से बचाव, एर्गोनॉमिक्स और शुरुआती स्वास्थ्य जांच के लिए सबसे बेहतरीन मंच साबित हो सकते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मुख्य संदेश बेहद स्पष्ट है कि पीठ दर्द को कभी भी बढ़ती उम्र के साथ होने वाली किसी अनिवार्य या स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। हड्डियों और मांसपेशियों की सेहत की नींव बचपन से ही रख दी जाती है, इसलिए किसी भी दर्द के स्थायी रूप धारण करने से पहले ही बचाव के पुख्ता उपाय शुरू कर दिए जाने चाहिए। इसका आप पर असर स्कूली बच्चों में बढ़ते पीठ दर्द और मस्कुलोस्केलेटल विकारों का यह मामला अभिभावकों के लिए एक गंभीर चेतावनी है, जिसका सीधा असर बच्चों के दैनिक जीवन और शारीरिक विकास पर पड़ रहा है। • भारत में: देश भर के शैक्षणिक संस्थानों और परिवारों को बच्चों की जीवनशैली में बदलाव लाने की जरूरत है। माता-पिता को बच्चों के बस्ते के वजन के साथ-साथ उनके बैठने के तरीके और शारीरिक गतिविधियों पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। • स्वास्थ्य और फिटनेस: बच्चों को रोजाना कम से कम एक घंटा खेलकूद या शारीरिक गतिविधियों में बिताना चाहिए। शुरुआती स्तर पर ही सही पोस्चर और व्यायाम अपनाने से भविष्य में होने वाली गंभीर रीढ़ की समस्याओं से बचा जा सकता है। • दैनिक दिनचर्या: लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठे रहने की आदत पर रोक लगानी चाहिए। हर घंटे बच्चों को थोड़ा टहलने और स्ट्रेचिंग करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए ताकि मांसपेशियों में जकड़न न हो। • चिकित्सकीय परामर्श: यदि कोई बच्चा लगातार पीठ या गर्दन में दर्द की शिकायत करे, तो उसे नजरअंदाज न करें। समय रहते किसी योग्य फिजियोथेरेपिस्ट या डॉक्टर से सलाह लेकर उचित उपाय शुरू करें। ऐसा क्यों हुआ बच्चों में पीठ दर्द और मस्कुलोस्केलेटल समस्याओं के बढ़ने के पीछे जीवनशैली में आए बड़े बदलाव और शारीरिक गतिविधियों की कमी मुख्य कारण हैं। • शारीरिक गतिविधि की कमी: पढ़ाई और स्क्रीन के सामने अत्यधिक समय बिताने के कारण बच्चों का मूवमेंट बहुत कम हो गया है, जिससे उनकी मांसपेशियां कमजोर हो रही हैं। • गलत पोस्चर और आदतें: लंबे समय तक एक ही मुद्रा में गलत तरीके से बैठने और झुककर पढ़ाई करने से रीढ़ की हड्डी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। • भारी बस्ते का बोझ: कई मामलों में बच्चों के शरीर के वजन की तुलना में भारी स्कूल बैग ढोना उनकी हड्डियों और मांसपेशियों पर अत्यधिक शारीरिक तनाव पैदा करता है। सवाल-जवाब 1. स्कूली बच्चों में मस्कुलोस्केलेटल समस्याओं में कितने प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई है? हालिया शोध के अनुसार स्कूली बच्चों में मस्कुलोस्केलेटल समस्याओं में 40% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 2. भोपाल के स्कूलों में किए गए अध्ययन में कितने बच्चों को शामिल किया गया था? भोपाल के चार स्कूलों में 8 से 15 वर्ष की आयु के कुल 934 बच्चों पर यह अध्ययन किया गया था। 3. भोपाल के अध्ययन में कितने प्रतिशत बच्चों ने दर्द की शिकायत की थी? अध्ययन के मुताबिक 55.9% बच्चों ने पिछले 12 महीनों में दर्द महसूस किया था और 41.6% ने पिछले 10 दिनों में शिकायत की थी। 4. बच्चों के स्कूल बैग का औसत वजन उनके शरीर के वजन का कितना प्रतिशत पाया गया था? शोध के दौरान स्कूल बैग का औसत वजन छात्रों के शरीर के कुल वजन का 16.5% पाया गया था। 5. क्या बच्चों में पीठ दर्द की एकमात्र वजह केवल भारी स्कूल बैग है? नहीं, विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे शारीरिक गतिविधि की कमी, गलत पोस्चर, लंबे समय तक बैठना और जीवनशैली से जुड़े कई अन्य कारण भी शामिल हैं। https://trendkia.com/health/kama-umra-men-hi-darda-se-jujha-rahe-bachche-akhira-kyon-barha-rahi-skuli-chhatron-men-rirha-aura-pitha-ki-gnbhira-samasyaen-38491 TrendKia — Har trend, sabse pehle.