कम उम्र में जोड़ों की जकड़न और दर्द से परेशान युवाओं के लिए हड्डियों की मजबूती के जरूरी उपाय महिलाओं में 30 और पुरुषों में 40 की उम्र के बाद जोड़ों का दर्द तेजी से बढ़ रहा है, जिसे नियमित शारीरिक सक्रियता और संतुलित पोषण से रोका जा सकता है। करियर और दैनिक जिम्मेदारियों में व्यस्त रहने की उम्र में युवाओं का जोड़ों की पीड़ा से जूझना एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है। एक समय था जब जोड़ों में दर्द और अकड़न को केवल वृद्धावस्था की निशानी माना जाता था, परंतु मौजूदा दौर में युवा पीढ़ी भी हड्डियों और जोड़ों की समस्याओं के उपचार के लिए ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञों के पास लगातार पहुंच रही है। महिलाओं में यह परेशानी अमूमन 30 वर्ष की आयु के आसपास और पुरुषों में 40 की उम्र पार करते ही उभरने लगती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि दिनचर्या में आया ठहराव, शारीरिक गतिविधियों में लगातार आ रही गिरावट और असंतुलित खानपान इस समस्या की प्रमुख जड़ हैं। थकान और जोड़ों के दर्द का बदलता स्वरूप अस्पतालों के बाह्य रोगी विभाग यानी ओपीडी में जोड़ों के दर्द की शिकायत लेकर पहुंचने वाले मरीजों का आंकड़ा तेजी से बढ़ा है। अंबाला के ऑर्थो स्पेशलिस्ट डॉ. अक्षय सेठ के अनुसार, ओपीडी में आने वाले कई मरीज केवल घुटनों के दर्द की ही बात नहीं करते, बल्कि वे पूरे शरीर में टूटन, भारीपन और अत्यधिक थकान की शिकायत भी दर्ज कराते हैं। ऐसे लोगों का अनुभव होता है कि दिनभर कोई बहुत भारी श्रम न करने के बावजूद शाम ढलते ही उनका शरीर पूरी तरह निढाल हो जाता है। कुछ वर्षों पहले तक सामान्य दैनिक कार्यों के दौरान भी लोगों की अच्छी खासी आवाजाही और पैदल चलना हो जाता था, लेकिन अब कार्यालयीन कार्य हो या घरेलू जिम्मेदारियां, अधिकांश समय एक ही स्थान पर बैठकर व्यतीत हो रहा है। बाहर निकलना और सक्रिय रहना लगभग न के बराबर रह गया है। मांसपेशियों की मजबूती और धूप का महत्व शारीरिक गतिविधियों का अभाव शरीर के संतुलन को बिगाड़ देता है। डॉ. अक्षय सेठ का कहना है कि जब मांसपेशियां सुदृढ़ रहती हैं, तब वे जोड़ों को बेहतर सहारा और मजबूती प्रदान करती हैं। कई लोग इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि अधिक चलने-फिरने से उनके घुटने समय से पहले घिस जाएंगे या खराब हो जाएंगे, जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। केवल इस डर से चलना-फिरना बंद कर देना हड्डियों के स्वास्थ्य को और अधिक नुकसान पहुंचाता है। कम शारीरिक सक्रियता और धूप के संपर्क में बिल्कुल न आने के कारण शरीर में विटामिन D की गंभीर कमी पनपने लगती है। यह कमी सीधे तौर पर हड्डियों के घनत्व और मजबूती पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। हर व्यक्ति के शरीर में जोड़ों के दर्द का कारण भिन्न हो सकता है, इसलिए समय पर चिकित्सीय परामर्श लेना अनिवार्य है। दैनिक दिनचर्या में सक्रियता का स्तर शरीर को स्वस्थ और लचीला बनाए रखने के लिए सही तरीके से सक्रिय रहना आवश्यक है। डॉ. अक्षय सेठ के अनुसार, टहलना, साइकिल चलाना और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुकूल हल्का व्यायाम नियमित दिनचर्या का हिस्सा होना चाहिए। किसी भी व्यक्ति को रोजाना कितनी देर और किस तीव्रता का व्यायाम करना चाहिए, इसका निर्णय उसकी उम्र, वर्तमान फिटनेस स्तर और पहले से मौजूद बीमारियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। बिना सोचे-समझे क्षमता से अधिक दबाव डालना या बिल्कुल निष्क्रिय रहना दोनों ही नुकसानदेह साबित हो सकते हैं। पोषक तत्वों की भूमिका और आवश्यक आहार हड्डियों और घुटनों की मजबूती में खानपान का संतुलन अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कुछ लोग पर्याप्त पोषण नहीं लेते और जरूरत से कम भोजन करते हैं, जबकि कई लोग जंक फूड और बाहरी खाद्य पदार्थों पर अत्यधिक निर्भर हो चुके हैं। इस असंतुलन से शरीर को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते। कैल्शियम की दैनिक आवश्यकता पूरी करने के लिए भोजन में दूध, दही, पनीर, सोयाबीन के अलावा हरी पत्तेदार सब्जियों जैसे पालक, बथुआ और साग को प्रमुखता से शामिल करना चाहिए। इसके साथ ही जो लोग मांसाहारी आहार लेते हैं, वे मछली और अंडों को अपनी संतुलित खुराक में शामिल करके कैल्शियम और प्रोटीन का स्तर सुधार सकते हैं। कैल्शियम की गोलियों और पथरी से जुड़े भ्रम कैल्शियम सप्लीमेंट्स को लेकर मरीजों के मन में कई प्रकार की आशंकाएं रहती हैं। डॉ. अक्षय सेठ बताते हैं कि कई मरीज अक्सर यह सवाल पूछते हैं कि क्या कैल्शियम की दवा लेने से गुर्दे या शरीर में पथरी की समस्या पैदा हो सकती है। विशेषज्ञ का स्पष्ट मत है कि यदि जांच के बाद शरीर में कैल्शियम की कमी पाई गई है और चिकित्सक ने सप्लीमेंट लेने का सुझाव दिया है, तो केवल पथरी के डर से दवा छोड़ देना कतई उचित नहीं है। हालांकि, इसका यह अर्थ भी नहीं है कि बिना डॉक्टरी सलाह के खुद से ही कैल्शियम की गोलियां खाना शुरू कर दिया जाए। विशेष रूप से महिलाओं में मासिक धर्म यानी पीरियड्स बंद होने के बाद हड्डियों का घनत्व तेजी से घटने लगता है, जिससे उन्हें हड्डियों की सेहत पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है। उम्र के इस पड़ाव पर हड्डियों से जुड़ी जटिलताओं का जोखिम बढ़ जाता है, जहां विशेषज्ञ की सलाह पर कैल्शियम और जरूरी सप्लीमेंट्स का सेवन अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है। स्वयं दवा लेने से बचें और समय पर लें सलाह इंटरनेट पर किसी बीमारी के लक्षण या दवाओं की जानकारी पढ़कर खुद से इलाज शुरू करने की आदत बेहद नुकसानदेह हो सकती है। डॉ. अक्षय सेठ स्पष्ट करते हैं कि कैल्शियम और विटामिन D की जरूरत हर व्यक्ति की शारीरिक स्थिति के आधार पर अलग-अलग होती है, इसलिए किसी भी सप्लीमेंट की शुरुआत करने से पहले किसी योग्य ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ से जांच कराना ही सबसे सुरक्षित कदम है। जोड़ों को दीर्घकाल तक कार्यक्षम रखने के लिए शारीरिक रूप से सक्रिय रहना, संतुलित आहार लेना और मांसपेशियों को सुदृढ़ बनाए रखना ही मूल मंत्र है। यदि घुटनों में लगातार दर्द, सूजन या चलने में कठिनाई महसूस हो रही हो, तो उसे सामान्य थकान समझकर टालने के बजाय तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। इसका आप पर असर कम उम्र में जोड़ों की समस्याओं से बचाव के लिए जीवनशैली में सक्रियता और पोषण का संतुलन बनाना जरूरी है। • भारत में: डेस्क जॉब और बंद कमरों में रहने वाले युवाओं को रोजाना धूप में समय बिताने और पैदल चलने की आदत डालनी चाहिए। इससे 30 की उम्र के बाद होने वाली विटामिन D की कमी और जोड़ों की अकड़न से बचा जा सकता है। • अंबाला में: स्थानीय निवासियों को जोड़ों में दर्द या सूजन होने पर नीम-हकीमों या इंटरनेट के नुस्खों के बजाय सीधे योग्य ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञों से जांच करानी चाहिए। सही समय पर परामर्श लेने से बीमारी को गंभीर रूप लेने से रोका जा सकता है। • आहार योजना: दैनिक भोजन में दूध, पनीर, हरी पत्तेदार सब्जियां या अंडे शामिल करके हड्डियों को आवश्यक पोषण दिया जा सकता है। ऐसा करने से बिना किसी अतिरिक्त खर्च के प्राकृतिक रूप से कैल्शियम की पूर्ति होती है। • सप्लीमेंट्स का उपयोग: बिना डॉक्टर की पर्ची के मेडिकल स्टोर से कैल्शियम की गोलियां खरीदना और खाना तुरंत बंद करना चाहिए। केवल चिकित्सकीय जांच में कमी पाए जाने पर ही निर्धारित खुराक का सेवन सुरक्षित रहता है। ऐसा क्यों हुआ युवाओं में जोड़ों की समस्या तेजी से बढ़ने के पीछे शारीरिक निष्क्रियता, धूप की कमी और असंतुलित आहार मुख्य कारण हैं। • शारीरिक निष्क्रियता: घंटों तक एक ही स्थान पर बैठकर काम करने से जोड़ों के आसपास की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं। कमजोर मांसपेशियां जोड़ों को पर्याप्त सहारा नहीं दे पाती हैं, जिससे घुटनों पर दबाव बढ़ जाता है। • धूप और पोषण का अभाव: खुले वातावरण में न निकलने से शरीर में विटामिन D का निर्माण बाधित होता है। इसके साथ ही खानपान में पोषक तत्वों की कमी हड्डियों के घनत्व को तेजी से घटाने लगती है। • स्व-चिकित्सा और भ्रांतियां: कई लोग दर्द के डर से चलना पूरी तरह बंद कर देते हैं या बिना जांच के मनमाने सप्लीमेंट्स लेने लगते हैं। सही मार्गदर्शन के अभाव में यह समस्या धीरे-धीरे और अधिक गंभीर हो जाती है। सवाल-जवाब 1. महिलाओं और पुरुषों में घुटनों के दर्द की समस्या किस उम्र से शुरू हो रही है? महिलाओं में यह समस्या लगभग 30 वर्ष की उम्र से और पुरुषों में 40 वर्ष की आयु के बाद देखने को मिल रही है। 2. क्या ज्यादा चलने-फिरने से घुटने खराब हो जाते हैं? नहीं, यह एक भ्रम है। चलने-फिरने से मांसपेशियां मजबूत होती हैं और जोड़ों को बेहतर सहारा मिलता है, इसलिए चलना बंद नहीं करना चाहिए। 3. हड्डियों को मजबूत रखने के लिए कौन से खाद्य पदार्थ फायदेमंद हैं? दूध, पनीर, सोयाबीन, पालक, बथुआ, साग और मांसाहारियों के लिए अंडा व मछली हड्डियों की सेहत के लिए बेहद उपयोगी हैं। 4. क्या कैल्शियम की गोलियां खाने से पथरी हो जाती है? डॉक्टर की सलाह पर ली जाने वाली कैल्शियम की दवा को केवल पथरी के डर से नहीं छोड़ना चाहिए, लेकिन इसे बिना डॉक्टर के पूछे खुद से भी नहीं लेना चाहिए। 5. धूप में न निकलने का हड्डियों पर क्या असर पड़ता है? धूप न मिलने से शरीर में विटामिन D की कमी हो जाती है, जिसका सीधा नकारात्मक असर हड्डियों की सेहत और मजबूती पर पड़ता है। https://trendkia.com/health/kama-umra-men-joron-ki-jakarana-aura-darda-se-pareshana-yuvaon-ke-lie-haddiyon-ki-majabuti-ke-jaruri-upaya-44643 TrendKia — Har trend, sabse pehle.