खराब आबोहवा और पाचन तंत्र के ट्यूमर के बीच संबंध की पड़ताल में जुटे ऑन्कोलॉजिस्ट, बच्चों में बढ़ते मामलों ने बढ़ाई चिंता दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में ऑन्कोलॉजिस्ट्स ने वायु प्रदूषण और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर के जोखिम पर विस्तृत अध्ययन की मांग की है। विशेषज्ञों ने ओपीडी में 15 वर्ष तक के किशोरों में पाचन तंत्र की गांठें पाए जाने पर गहरी चिंता जताई। देश के अत्यधिक प्रदूषित शहरी इलाकों में सांस लेने वाली आबादी के पाचन तंत्र पर पर्यावरण का क्या असर हो रहा है, अब इस पर चिकित्सा जगत की निगाहें टिक गई हैं। ऑन्कोलॉजी विशेषज्ञों का मानना है कि केवल खानपान अथवा तंबाकू के सेवन को ही ट्यूमर का मुख्य कारक मानना अब पर्याप्त नहीं है। जहरीले सूक्ष्म कणों पीएम2.5 और सतही ओजोन के लंबे संपर्क तथा आंतरिक अंगों में गंभीर बीमारियों के उभरने के बीच संभावित कड़ियों को सुलझाने के लिए गहन और केंद्रित वैज्ञानिक पड़ताल की तुरंत आवश्यकता है। किशोरों में पाचन तंत्र की गांठें मिलने से डॉक्टरों में चिंता अस्पतालों के बाह्य रोगी विभागों में सामने आ रहे मामलों ने ऑन्कोलॉजिस्ट्स को हैरान कर दिया है। सर गंगा राम अस्पताल के मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. श्याम अग्रवाल ने रेखांकित किया कि क्लीनिक में महज 15 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चे भी पाचन तंत्र के ट्यूमर की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं। लगभग पांच वर्ष पहले इस उम्र के मरीजों में ऐसे गंभीर विकार बेहद दुर्लभ माने जाते थे। उनके अनुसार, यह बदलता ढर्रा इस बात की ताकीद करता है कि अब जांच का दायरा केवल व्यक्तिगत आदतों तक सीमित न रखकर मरीजों के व्यापक परिवेश तक फैलाया जाए। चिकित्सा विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए अनुसंधान खराब आबोहवा और ट्यूमर के जोखिम के बीच सह-संबंध तो दर्शाते हैं, लेकिन यह ठोस रूप से साबित नहीं करते कि प्रदूषण ही सीधे तौर पर आंतों अथवा पेट के कैंसर की प्राथमिक वजह है। इसी प्रकार, युवाओं अथवा बच्चों में बढ़ रही इस बीमारी के पीछे केवल वातावरण की विषाक्तता को अकेला जिम्मेदार कारक नहीं ठहराया जा सकता। सतही ओजोन और अनदेखे कणों की भूमिका पर केंद्रित नजर वायु गुणवत्ता पर विमर्श के दौरान सामान्यतया पीएम2.5 तथा पीएम10 कणों की मात्रा पर ही सारा ध्यान केंद्रित रहता है। डॉ. श्याम अग्रवाल ने धरातल के निकट तैयार होने वाली ओजोन गैस के जैविक प्रभावों पर विशेष रूप से रोशनी डाली। वातावरण के निचले स्तर पर मौजूद ओजोन मानव कोशिकाओं और आंतरिक प्रणाली को किस प्रकार प्रभावित करती है, इसका वैज्ञानिक आकलन अभी काफी सीमित है। विशेषज्ञों का मत है कि भारतीय परिस्थितियों और अत्यधिक प्रदूषित नगरों में रहने वाले नागरिकों पर इन वायुमंडलीय तत्वों के प्रभाव को जांचने के लिए स्वतंत्र और व्यवस्थित शोध परियोजनाएं शुरू की जानी चाहिए। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि विभिन्न प्रकार के कार्सिनोजेनिक कण शरीर के भीतरी अंगों में पहुंचकर किस सीमा तक नुकसान पहुंचा रहे हैं। द्विवार्षिक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में साझा हुआ वैश्विक अनुभव इस गंभीर स्वास्थ्य संकट की पड़ताल के उद्देश्य से 10 और 11 अक्टूबर को राजधानी दिल्ली में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की गई। सर गंगा राम अस्पताल और यूनाइटेड किंगडम के द क्रिस्टी एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस सत्र में कोलोरेक्टल और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल विकारों पर विस्तृत मंथन हुआ। संस्थान की ट्रस्ट सोसाइटी के प्रमुख डॉ. डीएस राणा ने रेखांकित किया कि वैश्विक साझेदारी जटिल व्याधियों की रोकथाम के लिए ज्ञान के आदान-प्रदान को मजबूत बनाती है। कार्यक्रम में शामिल सर्जिकल विशेषज्ञों ने कहा कि विभिन्न देशों के चिकित्सकों के अनुभवों से शीघ्र जांच, डायग्नोस्टिक सटीकता और आधुनिक उपचार प्रोटोकॉल तैयार करने में बड़ी मदद मिलती है। संयुक्त प्रयासों के जरिए ट्यूमर के आणविक और पर्यावरणीय कारणों की तह तक पहुंचना आसान हो जाता है। बीमारी के बहुआयामी कारक और शीघ्र परामर्श का महत्व गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल विकारों के मूल कारणों को समझने के लिए समग्र दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। सर गंगा राम अस्पताल के सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. सौमित्र रावत ने आगाह किया कि किसी एकल घटक पर दोष मढ़ना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। ट्यूमर के विकास में वंशानुगत प्रवृत्तियां, जेनेटिक म्यूटेशन, दैनिक आहार, शारीरिक गतिविधियां, क्रोनिक इन्फेक्शन और बाह्य परिवेशीय विषैले तत्व मिलकर भूमिका निभाते हैं। डॉ. सौमित्र रावत ने जनसामान्य को सचेत किया कि पेट में लंबे समय से चली आ रही गड़बड़ी, पाचन की असामान्यताओं अथवा लगातार दिखने वाले संकेतों को हल्के में न लिया जाए। द क्रिस्टी एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट के सलाहकार कोलोरेक्टल एवं लैप्रोस्कोपिक सर्जन सेल्वसेकर चेल्लैया ने भी इस बात का समर्थन किया कि विभिन्न विधाओं के विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम करने से उपचार के परिणाम सुधरते हैं और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले पर्यावरणीय प्रभावों की वैज्ञानिक समझ गहरी होती है। इसका आप पर असर प्रदूषित क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को अपने श्वसन तंत्र के साथ-साथ पाचन संबंधी दीर्घकालिक लक्षणों पर भी तत्काल सतर्कता बरतनी होगी। • लक्षणों की निगरानी: यदि पेट में लगातार दर्द, अपच या पाचन क्रिया में असामान्य बदलाव लंबे समय तक बने रहें, तो उन्हें सामान्य गैस समझकर अनदेखा न करें। समय रहते गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से चिकित्सकीय परामर्श लेना गंभीर जटिलताओं से बचा सकता है। • बच्चों और युवाओं पर ध्यान: 15 वर्ष तक के किशोरों में पाचन संबंधी गंभीर दिक्कतों के उभरते मामलों को देखते हुए अभिभावकों को खानपान और पर्यावरण दोनों पर नजर रखनी चाहिए। किसी भी अस्वाभाविक शारीरिक गिरावट पर तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से जांच कराएं। • प्रदूषण से बचाव: हवा में पीएम2.5 और सतही ओजोन के अत्यधिक स्तर के दौरान खुले में अत्यधिक श्रम या गतिविधियों को सीमित करें। प्रदूषित वातावरण में लंबे समय तक रहने से शरीर के आंतरिक अंगों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को कम करने के लिए सुरक्षात्मक उपाय अपनाएं। • नियमित स्वास्थ्य जांच: जिन परिवारों में आनुवंशिक या पारिवारिक स्तर पर ट्यूमर का इतिहास रहा है, वे नियमित स्क्रीनिंग कराएं। प्रारंभिक अवस्था में निदान होने पर आंत और पेट से जुड़े विकारों का उपचार अधिक प्रभावी साबित होता है। ऐसा क्यों हुआ यह विषय चिकित्सा जगत के सामने इसलिए आया क्योंकि ऑन्कोलॉजिस्ट्स ने ओपीडी में बहुत कम उम्र के मरीजों में आंतों और पाचन तंत्र के गंभीर ट्यूमर दर्ज किए, जबकि पहले यह बीमारी मुख्य रूप से अधिक उम्र के लोगों में देखी जाती थी। • असामान्य मरीज प्रोफाइल: अस्पतालों में 15 वर्ष तक के बच्चों और किशोरों में पाचन तंत्र की गांठें पाई गईं, जो परंपरागत जोखिम मानकों से मेल नहीं खातीं। इस अप्रत्याशित बदलाव ने डॉक्टरों को सोचने पर मजबूर किया कि केवल खानपान या धूम्रपान ही इसके कारक नहीं हैं। • अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के संकेत: वैश्विक स्तर पर प्रकाशित शोधपत्रों ने लंबे समय तक जहरीली हवा में रहने और कैंसर की बढ़ती संभावनाओं के बीच सांख्यिकीय संबंध दर्ज किए थे। हालांकि, इन अध्ययनों से यह साबित नहीं हुआ कि प्रदूषण ही इस बीमारी का सीधा कारण है, इसलिए भारत में स्वतंत्र अनुसंधान की मांग उठी। • सतही ओजोन का कम आंका जाना: वायु प्रदूषण की चर्चा में आमतौर पर केवल सूक्ष्म कणों पर विचार किया जाता था, जबकि जमीन के पास बनने वाली ओजोन गैस के जैविक प्रभावों पर पर्याप्त शोध नहीं हुआ था। डॉक्टरों ने इस अनदेखी कड़ी की जांच के लिए दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में आह्वान किया। सवाल-जवाब 1. क्या वायु प्रदूषण सीधे तौर पर पाचन तंत्र के कैंसर का कारण बनता है? अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में दोनों के बीच संबंध का संकेत मिलता है, लेकिन यह साबित नहीं हुआ है कि वायु प्रदूषण ही सीधे पाचन तंत्र के कैंसर का कारण है। 2. डॉक्टरों को किन मरीजों की उम्र देखकर सबसे ज्यादा चिंता हुई है? ओपीडी में 15 वर्ष तक की कम उम्र के मरीजों में भी पाचन तंत्र के ट्यूमर पाए जा रहे हैं, जो पांच वर्ष पहले बेहद दुर्लभ थे। 3. प्रदूषण के किन घटकों के स्वास्थ्य प्रभावों पर डॉक्टरों ने विशेष ध्यान देने को कहा है? विशेषज्ञों ने हवा में मौजूद बेहद बारीक कणों पीएम2.5 और जमीन के निकट बनने वाली ओजोन गैस के स्वास्थ्य प्रभावों पर गहन शोध की मांग की है। 4. दिल्ली में यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन किन संस्थानों द्वारा आयोजित किया गया? यह दो दिवसीय सम्मेलन 10 और 11 अक्टूबर को सर गंगा राम अस्पताल और ब्रिटेन के द क्रिस्टी एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया। 5. पाचन तंत्र के कैंसर के संभावित कारणों में डॉक्टरों ने किन चीजों को शामिल माना है? डॉक्टरों के अनुसार पारिवारिक इतिहास, आनुवंशिकी, खानपान, जीवनशैली, संक्रमण और पर्यावरणीय कारक मिलकर इस बीमारी के संभावित कारणों में शामिल हैं। https://trendkia.com/health/kharaba-abohava-aura-pachana-tntra-ke-tyumara-ke-bicha-snbndha-ki-paratala-men-jute-oncologists-bachchon-men-barhate-mamalon-ne-ba-46475 TrendKia — Har trend, sabse pehle.