# खराब होती आबोहवा से सांसों पर संकट, चिकित्सकों ने कमजोर फेफड़ों और बुजुर्गों को चेताया

> दिल्ली में सितंबर के अंतिम दिनों में ही वायु गुणवत्ता सूचकांक 230 के करीब पहुंच गया है। सांस और फेफड़ों के मरीजों के साथ बच्चों और बुजुर्गों को सावधानी बरतने के निर्देश दिए गए हैं।

**Type:** article · **Category:** स्वास्थ्य · **Published:** 2026-09-24 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/health/kharaba-hoti-abohava-se-sanson-para-snkata-chikitsakon-ne-kamajora-phepharon-aura-bujurgon-ko-chetaya-38032 · **Language:** Hindi
**Tags:** दिल्ली प्रदूषण, वायु गुणवत्ता सूचकांक, अस्थमा देखभाल, फेफड़ों का स्वास्थ्य, पीएम 2.5, यथार्थ अस्पताल

सितंबर के अंतिम सप्ताह में प्रवेश करते ही देश की राजधानी के वायुमंडल में धुंध और जहरीले तत्वों का प्रभाव दिखने लगा है। बीते दो दिनों के दौरान वायु गुणवत्ता सूचकांक 224 के आसपास दर्ज किया गया है, जो आने वाले शीतकालीन महीनों के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह मौसमी बदलाव ऐसे समय में सामने आ रहा है जब 25 सितंबर को विश्व फेफड़ा दिवस के उपलक्ष्य में सांस संबंधी स्वास्थ्य पर विशेष जोर दिया जा रहा है। गिरती वायु गुणवत्ता के कारण आम नागरिकों के फेफड़ों पर पड़ने वाले खतरों को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ गंभीर चिंता जता रहे हैं।

## शीतकालीन महीनों में गहराता संकट
राजधानी में सितंबर से जनवरी के बीच हर साल प्रदूषण का स्तर लगातार गंभीर श्रेणी में बना रहता है। इस समयावधि में कई बार एयर क्वालिटी इंडेक्स 400 से 500 के खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है। यथार्थ अस्पताल, नोएडा में पल्मोनोलॉजी विभाग के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. अरुणाचलम एम और दिल्ली के मॉडल टाउन स्थित यथार्थ अस्पताल में पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के कंसल्टेंट डॉ. दिव्येंदु शर्मा ने इस मौसमी बदलाव पर विस्तृत जानकारी साझा की है। चिकित्सकों का कहना है कि वर्तमान में सितंबर के दौरान ही AQI करीब 224 से 230 के बीच दर्ज किया जा रहा है। यह स्तर भी इंसानी सेहत को बड़ा नुकसान पहुंचाने के लिए काफी है। जो लोग पहले से ही सांस संबंधी दिक्कतों का सामना कर रहे हैं, उनके लिए यह समय बेहद संवेदनशील हो जाता है। अस्थमा, तपेदिक यानी टीबी और क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) से जूझ रहे मरीजों को शुरुआती दिनों से ही अत्यधिक एहतियात बरतनी चाहिए।

## कमजोर वर्गों पर प्रदूषण का सबसे गहरा प्रभाव
डॉ. दिव्येंदु शर्मा के अनुसार, जहरीली हवा और वातावरण में जमा धुंध का सबसे बुरा असर बच्चों और अधिक उम्र के लोगों पर देखा जाता है। इन दोनों आयु वर्गों की रोग प्रतिरोधक क्षमता और फेफड़ों की कार्यक्षमता सामान्य वयस्कों की तुलना में संवेदनशील होती है। इसलिए परिवार के वरिष्ठ सदस्यों और बच्चों को विशेष देखभाल की आवश्यकता है। जब हवा में प्रदूषण का स्तर असामान्य रूप से बढ़ने लगे, तब बच्चों और बुजुर्गों को खुले में जाने से बचना चाहिए। यदि किसी अपरिहार्य कारण से घर से बाहर निकलना भी पड़े, तो उचित मास्क पहनना अनिवार्य होना चाहिए। घर के भीतर सुरक्षित वातावरण बनाए रखने के लिए खिड़कियों और मुख्य दरवाजों को बंद रखने का सुझाव दिया गया है। इसके अलावा, यदि संभव हो तो घरों के भीतर एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल भी सुरक्षा को बढ़ा सकता है।

## दैनिक गतिविधियों में बदलाव और परहेज
चिकित्सकों ने स्पष्ट किया है कि दूषित हवा फेफड़ों के आंतरिक ऊतकों को नुकसान पहुंचा सकती है। इससे सांस लेने में गंभीर रुकावट और सांस फूलने जैसी परेशानियां तेजी से उभरती हैं। कुछ संवेदनशील मामलों में यह समस्या बहुत गंभीर रूप ले सकती है। वातावरण में जब धुंध और धूल के कण बढ़ जाएं, तो खुले मैदानों में दौड़ना, टहलना, बच्चों का बाहर खेलना और सुबह-शाम की जाने वाली भारी कसरत तुरंत कम या पूरी तरह बंद कर देनी चाहिए। ऐसे समय में बाहर की जाने वाली शारीरिक गतिविधियां फेफड़ों के भीतर अधिक मात्रा में विषैली हवा खींच लेती हैं, जिससे नुकसान कई गुना बढ़ जाता है।

## फेफड़ों की संरचना को नुकसान पहुंचाते सूक्ष्म कण
प्रदूषित वातावरण में लगातार सांस लेने के खतरों को समझाते हुए डॉ. अरुणाचलम एम ने कहा कि हवा में तैरने वाले PM2.5 और PM10 जैसे अति सूक्ष्म कण सबसे बड़ी चिंता का विषय हैं। सांस लेने की प्रक्रिया के दौरान ये महीन कण सीधे फेफड़ों की गहराई तक पहुंच जाते हैं। ऐसी विषैली हवा के सीधे संपर्क में आने से गले में खराश और लगातार खांसी की शिकायत हो सकती है। मरीजों को सीने में भारीपन, दर्द या जलन की अनुभूति हो सकती है। इसके साथ ही सांस फूलने की समस्या बढ़ती है तथा आंखों और नाक में निरंतर जलन की परेशानी हो सकती है। लंबे समय तक इस वातावरण में सांस लेने से फेफड़ों में आंतरिक सूजन आ सकती है, जिससे उनकी कार्यप्रणाली बुरी तरह प्रभावित होती है। एलर्जी या अस्थमा के रोगियों की तकलीफ इस दौरान काफी बढ़ जाती है। लंबे समय तक इन जहरीले कणों के संपर्क में रहने से क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज और फेफड़ों के कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों की आशंका काफी बढ़ जाती है।

## इसका आप पर असर
बढ़ते वायु प्रदूषण का सीधा असर दैनिक जीवन और बाहरी गतिविधियों पर पड़ता है, जिसके लिए तुरंत जीवनशैली में बदलाव जरूरी है।

- **दैनिक व्यायाम:** सुबह और शाम के समय खुले में भारी कसरत या दौड़ना टालना होगा। इसके बदले घर के अंदर ही योगासन या हल्की इनडोर एक्सरसाइज करना फेफड़ों के लिए सुरक्षित रहेगा।
- **मास्क का उपयोग:** जब भी बाहर निकलें, तो सामान्य कपड़े के मास्क के बजाय सही गुणवत्ता वाला मास्क पहनना होगा। यह हवा में घुले महीन धूल और धुएं के कणों को सांस नली में जाने से रोकता है।
- **घर के भीतर की हवा:** खिड़कियों और दरवाजों को दिन के समय बंद रखना चाहिए ताकि जहरीली हवा अंदर न आए। अगर संभव हो तो एयर प्यूरीफायर चालू रखें ताकि इनडोर हवा साफ बनी रहे।
- **मरीजों की दवाएं:** जिन लोगों को पहले से दमा या सांस की पुरानी बीमारी है, उन्हें अपनी नियमित दवाएं और इनहेलर तैयार रखने होंगे। किसी भी तरह की सांस फूलने या सीने में भारीपन पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

## ऐसा क्यों हुआ
मौसमी बदलाव और पर्यावरणीय परिस्थितियों के मेल से हर वर्ष सितंबर के अंत में प्रदूषण का स्तर अचानक तेजी से बढ़ने लगता है।

- **मौसम का बदलाव:** मानसून की वापसी के साथ ही हवा की रफ्तार सुस्त पड़ जाती है और तापमान में गिरावट शुरू होती है। हवा के धीमे होने से वायुमंडल में मौजूद धूल और धुएं के कण बिखरने के बजाय सतह के करीब ही जमा हो जाते हैं।
- **सूक्ष्म कणों का फैलाव:** औद्योगिक गतिविधियों, निर्माण कार्यों और वाहनों के धुएं से PM2.5 और PM10 की सघनता वायुमंडल में बढ़ जाती है। अनुकूल मौसमी बहाव न होने के कारण यह पूरी तरह एक मोटी धुंध में तब्दील हो जाता है।
- **वार्षिक पैटर्न:** हर साल सितंबर से जनवरी के दौरान यह भौगोलिक क्षेत्र इसी गंभीर स्थिति से गुजरता है। आने वाले महीनों में ठंड बढ़ने के साथ ही वायु गुणवत्ता सूचकांक अक्सर 400 से 500 के अति गंभीर स्तर तक पहुंच जाता है।

## सवाल-जवाब

### 1. दिल्ली में वर्तमान में वायु गुणवत्ता का स्तर क्या दर्ज किया गया है?
बीते दो दिनों के दौरान दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक करीब 224 से 230 के बीच दर्ज किया गया है।

### 2. प्रदूषण का सबसे अधिक जोखिम किन लोगों को रहता है?
छोटे बच्चों, बुजुर्गों और पहले से अस्थमा, टीबी या सीओपीडी जैसी सांस की बीमारियों से पीड़ित मरीजों को सबसे अधिक खतरा रहता है।

### 3. वायु में मौजूद PM2.5 और PM10 कण शरीर को क्या नुकसान पहुंचाते हैं?
ये सूक्ष्म कण सांस के रास्ते फेफड़ों की गहराई तक पहुंचकर खांसी, सीने में भारीपन, फेफड़ों में सूजन और लंबे समय में कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं।

### 4. प्रदूषण बढ़ने पर घर से बाहर निकलने को लेकर क्या सलाह दी गई है?
जरूरी न होने पर बाहर निकलने से बचें और यदि निकलना जरूरी हो तो सुरक्षा के लिए मास्क अवश्य पहनें।

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