कोटा की किशोरी तन्वी का एम्स नई दिल्ली में 13 वर्ष चले उपचार के बाद निधन, निदेशक निखिल टंडन ने बनाई समीक्षा समिति राजस्थान के कोटा की 15 वर्षीय तन्वी का एम्स नई दिल्ली में 13 साल चले इलाज के बाद निधन हो गया। बचपन से दिल की जटिल बीमारी से जूझ रही बच्ची की सर्जरी न हो पाने के कारणों की जांच के लिए निदेशक निखिल टंडन ने उच्च स्तरीय समिति बनाई है। राजस्थान के कोटा शहर की रहने वाली 15 वर्षीय बच्ची तन्वी का ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) नई दिल्ली में लंबी चिकित्सा प्रक्रिया के बाद मंगलवार 1 सितंबर 2026 की तड़के निधन हो गया। महज दो साल की नन्ही उम्र से एम्स के कार्डियोलॉजी विभाग में उपचाराधीन रही तन्वी पिछले 13 वर्षों से जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही थी। लंबे समय तक अस्पताल के चक्कर लगाने के बावजूद उसकी हृदय शल्य चिकित्सा (हार्ट सर्जरी) नहीं की जा सकी। अगस्त 2026 के अंतिम सप्ताह में स्थिति गंभीर होने पर उसे दोबारा एम्स में भर्ती कराया गया था, जहां फेफड़े और दिल के संयुक्त प्रत्यारोपण (हार्ट-लंग ट्रांसप्लांट) की संभावनाएं तलाशी जा रही थीं। हालांकि, प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही उसकी सांसें थम गईं। इस दुखद घटनाक्रम के बाद एम्स के निदेशक डॉ. निखिल टंडन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एक उच्च स्तरीय समीक्षा समिति का गठन किया है जो पिछले 13 सालों के संपूर्ण इलाज, चिकित्सकीय निर्णयों और मौत के कारणों की विस्तृत जांच करेगी। वर्ष 2012 में पहली जांच और जटिल जन्मजात हृदय रोग की पहचान तन्वी के चिकित्सकीय इतिहास की शुरुआत 10 अक्टूबर 2012 को हुई थी, जब उसके परिजन महज दो साल की उम्र में उसे पहली बार एम्स नई दिल्ली की कार्डियोलॉजी ओपीडी में लेकर आए थे। प्रारंभिक नैदानिक परीक्षणों (डायग्नोस्टिक टेस्ट्स) के दौरान डॉक्टरों ने पाया कि बच्ची वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट (VSD) के साथ पल्मोनरी एट्रेसिया नामक अत्यंत दुर्लभ और जटिल जन्मजात हृदय विकार से पीड़ित थी। इस गंभीर चिकित्सीय स्थिति में हृदय के निचले कक्षों के बीच न केवल असामान्य छिद्र होता है, बल्कि दिल से फेफड़ों तक अशुद्ध रक्त को ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए ले जाने वाली मुख्य धमनी (पल्मोनरी वाल्व एवं वाहिनी) या तो पूरी तरह से बंद होती है या अत्यधिक अवरुद्ध होती है। इसके कारण शरीर में ऑक्सीजन युक्त रक्त का संचार सुचारू रूप से नहीं हो पाता। प्राथमिक निदान के बाद एम्स की विशेषज्ञ कार्डियक सर्जरी टीम को मामला सौंपा गया ताकि यह तय किया जा सके कि क्या शल्य चिकित्सा के माध्यम से इस शारीरिक संरचनात्मक खराबी को सुधारा जा सकता है। 2013 से 2017: उन्नत जांच परीक्षण और शल्य चिकित्सा न करने का निर्णय वर्ष 2013 के दौरान एम्स के हृदय विशेषज्ञों ने तन्वी की शारीरिक संरचना और रक्त वाहिकाओं की स्थिति को सटीक रूप से समझने के लिए कई आधुनिक एवं जटिल जांच प्रक्रियाएं संचालित कीं। इनमें सीटी एंजियोग्राफी, कन्वेंशनल कार्डियक एंजियोग्राफी और कार्डियक कैथीटेराइजेशन जैसी उन्नत नैदानिक तकनीकें शामिल थीं। इन व्यापक परीक्षणों के माध्यम से डॉक्टरों ने हृदय के कक्षों, वाल्वों और फेफड़ों तक जाने वाली रक्त धमनियों के जाल का बारीक विश्लेषण किया। लगातार कई वर्षों तक निगरानी और विस्तृत समीक्षा के बाद, वर्ष 2017 में एम्स की मुख्य चिकित्सा टीम इस अंतिम निष्कर्ष पर पहुंची कि बच्ची के दिल की आंतरिक बनावट और बीमारी की असाधारण जटिलता को देखते हुए ओपन हार्ट सर्जरी या सुधारात्मक ऑपरेशन करना चिकित्सकीय रूप से संभव नहीं था। डॉक्टरों के अनुसार शल्य चिकित्सा का जोखिम अत्यधिक अत्यधिक था और वह जानलेवा साबित हो सकता था। नतीजतन, चिकित्सा दल ने बच्ची को निरंतर दवाओं के सहारे रखने और नियमित अंतराल पर ओपीडी फॉलो-अप की सलाह दी। इस पूरे चिकित्सीय निर्णय, संभावी जोखिमों और बीमारी के दीर्घकालिक परिणामों के बारे में तन्वी के परिजनों को विस्तार से सूचित किया गया था। परिजनों का निरंतर संपर्क और विशेषज्ञों से ली गई दूसरी राय एम्स प्रशासन द्वारा साझा की गई विस्तृत जानकारी के अनुसार, वर्ष 2017 के फैसले के बाद भी तन्वी का परिवार लगातार संस्थान के कार्डियोलॉजी विशेषज्ञों के संपर्क में बना रहा। परिजनों ने बच्ची की जान बचाने की आस में शल्य चिकित्सा की संभावना तलाशने के लिए कई वरिष्ठ विशेषज्ञों से पुनः परामर्श लिया। पिछले ही वर्ष परिजनों ने एम्स के कार्डियोथोरेसिक एंड वैस्कुलर सर्जरी (CTVS) विभाग के अध्यक्ष से विशेष राय ली थी। सीटीवीएस विभागाध्यक्ष ने भी बच्ची के संपूर्ण क्लिनिकल रिकॉर्ड की जांच करने के बाद यही राय दी कि वर्तमान स्थिति में सर्जरी करना संभव नहीं है और दवाइयों का दौर ही सबसे सुरक्षित विकल्प है। इसके पश्चात परिजनों ने संस्थान के एक अन्य अत्यंत वरिष्ठ कार्डियोथोरेसिक सर्जन से भी व्यक्तिगत परामर्श प्राप्त किया, लेकिन उन्होंने भी पूर्व में दिए गए चिकित्सकीय परामर्श का समर्थन करते हुए केवल दवाओं से इलाज जारी रखने की सिफारिश की। इस प्रकार एम्स के बहु-विशेषज्ञीय बोर्ड का मत यही रहा कि शल्य चिकित्सा बच्ची के जीवन के लिए अत्यधिक जोखिमभरी थी। अगस्त 2026 में हालत बिगड़ी और ट्रांसप्लांट की तैयारी दवाइयों के सहारे चल रहे इलाज के बीच अगस्त 2026 में तन्वी की शारीरिक स्थिति अचानक बिगड़ने लगी। सांस लेने में अत्यधिक तकलीफ और शरीर में ऑक्सीजन की भारी कमी के कारण परिजन उसे 24 अगस्त 2026 को आपातकालीन स्थिति में दोबारा एम्स लेकर पहुंचे, जहां उसे तत्काल कार्डियोलॉजी वार्ड में भर्ती कर लिया गया। डॉक्टरों की विशेष टीम ने उसकी स्थिति का नए सिरे से मूल्यांकन शुरू किया। चूंकि पारंपरिक सर्जरी का विकल्प पहले ही खारिज हो चुका था, इसलिए चिकित्सा दल ने अंतिम उपाय के रूप में संयुक्त हार्ट-लंग ट्रांसप्लांट (हृदय एवं फेफड़ा प्रत्यारोपण) की संभावना पर विचार करना शुरू किया। इसके लिए मरीज के सभी आवश्यक अंग मापदंडों, टिशू मैचिंग और ट्रांसप्लांट पात्रता की गहन जांच की जा रही थी ताकि उसे राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण सूची में प्राथमिकता के आधार पर पंजीकृत किया जा सके। 1 सितंबर की तड़के आपात स्थिति और दुखद अंत ट्रांसप्लांट मूल्यांकन प्रक्रिया के बीच ही 1 सितंबर 2026 की रात तन्वी का स्वास्थ्य अचानक बेहद चिंताजनक हो गया। अस्पताल के क्लिनिकल रिकॉर्ड के अनुसार, तड़के लगभग 2:50 बजे बच्ची को अचानक अत्यधिक थकान, घबराहट और शारीरिक कमजोरी महसूस हुई। इसके तुरंत बाद उसके शरीर में गंभीर सायनोसिस के लक्षण दिखाई दिए, जिससे उसकी त्वचा, होंठ और नाखून नीले पड़ने लगे। निगरानी उपकरणों पर उसके रक्त में ऑक्सीजन का स्तर गिरकर बेहद खतरनाक 48 प्रतिशत पर पहुंच गया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए एम्स के ऑन-ड्यूटी मेडिकल स्टाफ ने सुबह लगभग 3:30 बजे उसे हाई-फ्लो ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा। हालांकि, ऑक्सीजन दिए जाने के बावजूद बच्ची को तीव्र हाइपोक्सिक स्पेल (शरीर में ऑक्सीजन की भारी कमी के कारण आने वाला गंभीर दौरा) पड़ा। इस हाइपोक्सिक स्पेल के कारण तन्वी को कार्डियक अरेस्ट (दिल की धड़कन अचानक रुक जाना) हो गया। कार्डियक केयर यूनिट के डॉक्टरों और पुनर्जीवन टीम (रीससिटेशन टीम) ने तुरंत सीपीआर और जीवन रक्षक दवाएं देकर उसकी धड़कन वापस लाने के निरंतर प्रयास किए। लेकिन 13 वर्षों से बीमारी से लड़ रही बच्ची का शरीर इन प्रयासों का जवाब नहीं दे सका और सुबह 5:06 बजे डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। निदेशक की जांच समिति और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार इस दुखद अंत के बाद बच्ची के शव को पोस्टमार्टम प्रक्रिया के लिए भेजा गया है। एम्स निदेशक डॉ. निखिल टंडन ने स्पष्ट किया है कि संस्थान परिजनों की सभी चिंताओं और सवालों को पूरी संवेदनशीलता एवं गंभीरता से ले रहा है। निदेशक द्वारा गठित विशेष जांच समिति 2012 से लेकर 2026 तक के संपूर्ण क्लिनिकल रिकॉर्ड, नैदानिक रिपोर्टों, दिए गए इलाज, शल्य चिकित्सा न करने के फैसलों, विभिन्न विशेषज्ञों की लिखित रायों और 1 सितंबर की रात हुई मौत की परिस्थितियों की बिंदुवार समीक्षा करेगी। एम्स प्रशासन ने कहा है कि वह जांच समिति को सभी दस्तावेज और साक्ष्य उपलब्ध कराने में पूर्ण सहयोग दे रहा है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट की अंतिम निष्कर्षों और समिति की विस्तृत जांच रिपोर्ट आने के बाद ही इस मामले में आगे की उचित प्रशासनिक या चिकित्सकीय कार्रवाई तय की जाएगी। एम्स ने पीड़ित परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए मरीज की सुरक्षा, पूर्ण पारदर्शिता, साक्ष्य आधारित चिकित्सकीय फैसलों और संस्थागत जवाबदेही के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। इसका आप पर असर यह दुखद मामला एम्स जैसे शीर्ष सरकारी अस्पतालों में जटिल जन्मजात बीमारियों के इलाज और विशेषज्ञ सलाह की प्रक्रिया को रेखांकित करता है। • भारत में मरीजों के लिए: जटिल जन्मजात हृदय रोगों के मामलों में शुरुआती दौर से ही बहु-विशेषज्ञीय मेडिकल बोर्ड की राय और लिखित रिकॉर्ड सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है। इससे दूसरे अस्पतालों या विशेषज्ञों से सलाह लेते समय इलाज का सही इतिहास उपलब्ध रहता है। • राजस्थान और कोटा के परिवारों के लिए: कोटा और राज्य के अन्य जिलों से दिल्ली एम्स जाने वाले गंभीर मरीजों के लिए अस्पताल प्रशासन द्वारा अब पारदर्शी समीक्षा व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है। मरीज के परिजन किसी भी इलाज या सर्जरी न हो पाने के निर्णय पर अस्पताल के शिकायत एवं परामर्श सेल से लिखित स्पष्टीकरण प्राप्त कर सकते हैं। • अंग प्रत्यारोपण के नियम: एडवांस स्टेज की हृदय बीमारियों में यदि ट्रांसप्लांट की जरूरत हो, तो समय रहते राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण नेटवर्क (NOTTO) में पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू करानी चाहिए। • आपातकालीन स्थिति में कदम: यदि मरीज में अचानक नीलापन (सायनोसिस) या ऑक्सीजन स्तर 90% से नीचे गिरता दिखे, तो बिना देर किए तत्काल आपातकालीन ऑक्सीजन सपोर्ट और आईसीयू बैकअप वाले नजदीकी अस्पताल पहुंचना चाहिए। सवाल-जवाब 1. तन्वी की एम्स में मृत्यु किस दिन और कितने बजे हुई? तन्वी का निधन 1 सितंबर 2026 (मंगलवार) की तड़के सुबह 5:06 बजे हुआ, जब continuous CPR के बावजूद उसकी धड़कन वापस नहीं लाई जा सकी। 2. तन्वी किस बीमारी से पीड़ित थी? वह जन्मजात हृदय रोग 'वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट (VSD) के साथ पल्मोनरी एट्रेसिया' से पीड़ित थी, जिसमें दिल के कक्षों में छेद के साथ फेफड़ों की रक्त वाहिनी बंद होती है। 3. एम्स में तन्वी का इलाज कब से चल रहा था? तन्वी का इलाज 10 अक्टूबर 2012 से एम्स नई दिल्ली की कार्डियोलॉजी ओपीडी में चल रहा था, जब उसकी उम्र केवल दो वर्ष थी। 4. एम्स के डॉक्टरों ने 2017 में सर्जरी न करने का फैसला क्यों लिया? 2013 में सीटी एंजियोग्राफी और कार्डिएक कैथीटेराइजेशन जांच के बाद डॉक्टरों ने पाया कि दिल की आंतरिक बनावट की जटिलता के कारण सर्जरी करना संभव नहीं था और इसका जोखिम जानलेवा था। 5. एम्स के निदेशक ने क्या कदम उठाया है? एम्स के निदेशक डॉ. निखिल टंडन ने पिछले 13 सालों के इलाज, क्लिनिकल रिकॉर्ड और मौत की परिस्थितियों की समीक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय जांच समिति गठित की है। https://trendkia.com/health/kota-ki-kishori-tanvi-ka-aiims-new-delhi-men-13-varsha-chale-upachara-ke-bada-nidhana-nideshaka-nikhil-tandon-ne-banai-samiksha-sa-26757 TrendKia — Har trend, sabse pehle.