लगातार बैठकर काम करने से होने वाली शारीरिक जकड़न दूर करने में कारगर है पूर्वोत्तानासन वर्क फ्रॉम होम के दौरान कुर्सी पर घंटों बैठे रहने से पीठ, कूल्हों और कंधों में अकड़न आ जाती है। ऐसे में पूर्वोत्तानासन का नियमित अभ्यास शरीर को सक्रिय और लचीला बनाए रखने में मदद करता है। घर से काम करने की व्यवस्था में एक ही जगह लगातार कई घंटों तक बैठे रहना अब सामान्य हो चुका है। अनुचित मुद्रा में देर तक बैठने और बीच में बिल्कुल भी हलचल न करने के कारण पीठ, कंधों के साथ-साथ कूल्हों में तनाव और जकड़न पैदा होने लगती है। जब रीढ़ और मांसपेशियों को पर्याप्त खिंचाव नहीं मिलता, तो शरीर की सक्रियता घटने लगती है। इस शारीरिक सुस्ती और खिंचाव से निपटने के लिए रोजाना कुछ मिनट का हल्का व्यायाम और योगाभ्यास बेहद उपयोगी साबित हो सकता है। शारीरिक लचीलापन वापस पाने के लिए पूर्वोत्तानासन का अभ्यास किया जा सकता है, जिसमें हथेलियों और पैरों के सहारे पूरे शरीर को ऊपर की दिशा में उठाया जाता है। अंग्रेजी भाषा में इस मुद्रा को अपवर्ड प्लैंक पोज के नाम से जाना जाता है। पूर्वोत्तानासन का अर्थ और शारीरिक प्रभाव संस्कृत के तीन अलग-अलग शब्दों के मेल से पूर्वोत्तानासन शब्द की रचना हुई है। इसमें पहला शब्द ‘पूर्व’ है, जिसका अर्थ शरीर का अगला भाग होता है। दूसरा शब्द ‘उत्तान’ है, जिसका मतलब गहरा खिंचाव या विस्तार होता है, जबकि तीसरा शब्द ‘आसन’ स्थिति या मुद्रा को दर्शाता है। इस पूरे योगासन के दौरान शरीर का अग्र भाग पूरी तरह से खुलता है और उसमें एक गहरा खिंचाव महसूस होता है। साथ ही शरीर के वजन को ऊपर टिकाए रखने के लिए हाथों, कंधों, पैरों तथा पीठ की सभी मांसपेशियों को एक साथ मिलकर काम करना पड़ता है। जो लोग अपने कामकाजी दिन का बड़ा हिस्सा डेस्क या कुर्सी पर बिताते हैं, उनके लिए यह अभ्यास विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है। लंबे समय तक निष्क्रिय अवस्था में बैठे रहने से कूल्हों की बनावट और पैरों की गतिशीलता प्रभावित होती है, जिसमें यह मुद्रा नया संतुलन ला सकती है। पूर्वोत्तानासन करने की चरणबद्ध विधि इस आसन को करने के लिए सबसे पहले समतल जमीन पर बैठ जाएं और दोनों पैरों को सामने की ओर सीधा फैला लें। इसके बाद अपने दोनों हाथों की हथेलियों को कूल्हों से थोड़ा पीछे जमीन पर मजबूती से टिकाएं। हाथों की उंगलियों की दिशा पैरों की तरफ रखी जा सकती है या अपनी व्यक्तिगत सुविधा के अनुसार उंगलियों का रुख थोड़ा बाहर भी रखा जा सकता है। हथेलियों की पकड़ स्थिर हो जाने के बाद, एड़ियों और हथेलियों पर एक समान दबाव बनाते हुए कूल्हों को धीरे-धीरे जमीन से ऊपर उठाएं। इस स्थिति में शरीर को कंधों से लेकर पंजों तक एक सीधी रेखा में रखने का प्रयास करें। गर्दन को बिना किसी अनावश्यक तनाव के आरामदायक स्थिति में संतुलित रखें। अपनी शारीरिक क्षमता और संतुलन के आधार पर कुछ सेकंड तक इस खिंचाव को रोक कर रखें। इसके बाद बेहद सहजता और नियंत्रण के साथ कूल्हों को वापस जमीन पर ले आएं। योगाभ्यास की शुरुआत करते समय पहली ही बार में इस मुद्रा को ज्यादा देर तक रोकने की जिद न करें। शुरुआती दिनों में केवल कुछ पलों के ठहराव से शुरुआत करनी चाहिए, और जैसे-जैसे मांसपेशियों की क्षमता और संतुलन में सुधार हो, वैसे-वैसे समय को धीरे-धीरे बढ़ाया जा सकता है। मांसपेशियों की मजबूती और लचीलेपन में लाभ जब शरीर को पूर्वोत्तानासन की स्थिति में ऊपर की ओर उठाया जाता है, तो उस समय पीठ, दोनों कंधों, बाजुओं, पैरों और कूल्हों की अनेक मांसपेशियां एक साथ सक्रिय हो जाती हैं। यदि इस आसन को निरंतर और उचित तकनीक के साथ अपनी दिनचर्या में रखा जाए, तो यह शारीरिक मजबूती और लचीलापन दोनों को बेहतर बनाने में सहायता करता है। लंबे समय तक कुर्सी पर बैठने से हिप फ्लेक्सर्स, यानी कूल्हे के आगे की मांसपेशियां सख्त और छोटी होने लगती हैं। पूर्वोत्तानासन करने से शरीर का पूरा अग्र हिस्सा खुल जाता है, जिससे कूल्हों के आसपास स्वाभाविक खिंचाव उत्पन्न होता है और ग्लूट्स व पैरों की मांसपेशियों को सक्रिय होकर काम करना पड़ता है। पैरों का भारीपन और कूल्हों की जकड़न से राहत डेस्क पर लगातार टिके रहने से कई बार पैरों में भारीपन और कूल्हों के जोड़ों में अकड़न महसूस होने लगती है। पूर्वोत्तानासन के अभ्यास में जब पैरों को सीधा रखकर एड़ियों से फर्श को दबाया जाता है, तो पैरों की मांसपेशियां तुरंत सक्रिय हो जाती हैं। इसके साथ ही कूल्हों को ऊपर की ओर धकेलने में ग्लूट्स की मांसपेशियां भी पूरी ताकत लगाती हैं। इसके बावजूद यह समझना जरूरी है कि कोई भी योगाभ्यास किसी गंभीर चिकित्सीय समस्या या दर्द का मुकम्मल इलाज नहीं होता। यदि पीठ में दर्द लंबे समय से बना हुआ है, दर्द की तीव्रता बहुत अधिक है, या पैरों में सुन्नता और कमजोरी जैसे गंभीर लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो बिना देर किए किसी कुशल डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट से संपर्क करना चाहिए। अभ्यास के दौरान जरूरी सावधानियां इस आसन को शुरू करने से पहले थोड़ा वॉर्म-अप जरूर कर लेना चाहिए। शरीर का एक बड़ा वजन कलाइयों और हाथों पर टिका होता है, इसलिए कलाइयों और कंधों को घुमाकर तैयार करना बेहद जरूरी कदम है। मुद्रा में रहते हुए गर्दन को अत्यधिक पीछे लटकाने से बचना चाहिए ताकि रीढ़ के ऊपरी हिस्से पर दबाव न पड़े। यदि कलाई, कंधे, गर्दन या रीढ़ की हड्डी में पहले से कोई चोट या गंभीर शिकायत हो, तो इस योगासन को आजमाने से पहले किसी स्वास्थ्य विशेषज्ञ की राय लेना अनिवार्य है। अभ्यास के दौरान यदि अचानक तेज दर्द, चक्कर आना या किसी भी तरह की असहजता महसूस हो, तो तुरंत आसन से सामान्य अवस्था में लौट आएं। घर से काम करते समय केवल कुछ मिनट का योग कर लेना ही काफी नहीं होता। रीढ़ और मांसपेशियों को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है कि हर 30 से 60 मिनट के अंतराल पर कुर्सी से उठें, थोड़ा टहलें और अपनी बैठने की स्थिति बदलते रहें। इसका आप पर असर वर्क फ्रॉम होम के दौरान कुर्सी पर लंबे समय तक बैठने से होने वाले पीठ और कूल्हों के दर्द को साधारण दिनचर्या बदलाव से कम किया जा सकता है। • कार्यशैली में बदलाव: हर 30 से 60 मिनट में अपनी डेस्क से उठकर थोड़ा टहलने की आदत डालें। ऐसा करने से रीढ़ की हड्डी पर निरंतर पड़ने वाला दबाव कम होता है और मांसपेशियों में रक्त संचार सुधरता है। • मांसपेशियों का लचीलापन: रोजाना कुछ सेकंड के लिए पूर्वोत्तानासन का अभ्यास करें। यह आपके कूल्हे के आगे की टाइट मांसपेशियों को खोलता है और शरीर के पिछले हिस्से को मजबूती देता है। • शारीरिक सुरक्षा: अभ्यास से पहले कलाइयों और कंधों का वॉर्म-अप जरूर करें। शरीर का वजन सीधे हाथों पर आने के कारण जोड़ों में खिंचाव या मोच के जोखिम से बचाव होगा। • चिकित्सीय निगरानी: यदि कमर दर्द लगातार बना रहे या पैरों में सुन्नपन महसूस हो, तो तुरंत विशेषज्ञ से मिलें। घरेलू उपायों या व्यायाम को किसी गंभीर चिकित्सीय समस्या का विकल्प न समझें। ऐसा क्यों हुआ वर्क फ्रॉम होम के दौरान लंबे समय तक एक ही मुद्रा में बैठे रहने से शरीर की शारीरिक बनावट और मांसपेशियों के संतुलन पर प्रतिकूल असर पड़ता है। कुर्सी पर घंटों समय बिताने से कुछ मांसपेशियां निष्क्रिय हो जाती हैं जबकि अन्य पर अत्यधिक भार पड़ता है। • लगातार गतिहीनता: लंबे समय तक डेस्क पर बैठे रहने से कूल्हों की हिप फ्लेक्सर्स मांसपेशियां सिकुड़कर सख्त हो जाती हैं। इसके कारण शरीर के पिछले हिस्से की मांसपेशियों की सक्रियता घट जाती है और खिंचाव उत्पन्न होता है। • गलत बैठने की आदत: बिना हिले-डुले या गलत पोस्चर में बैठे रहने से रीढ़ की हड्डी, कंधों और गर्दन पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। बीच-बीच में स्ट्रेचिंग न करने से यह तनाव धीरे-धीरे दर्द में बदल जाता है। • सक्रियता की कमी: शारीरिक गतिविधियों के अभाव में ग्लूट्स और पैरों की मांसपेशियां कमजोर पड़ने लगती हैं। पूर्वोत्तानासन जैसी मुद्राओं का अभ्यास शरीर के अग्र भाग को स्ट्रेच करके इस असंतुलन को ठीक करता है। सवाल-जवाब 1. पूर्वोत्तानासन को अंग्रेजी में किस नाम से जाना जाता है? पूर्वोत्तानासन को अंग्रेजी में अपवर्ड प्लैंक पोज कहा जाता है। 2. पूर्वोत्तानासन नाम का क्या अर्थ है? यह संस्कृत के तीन शब्दों से बना है, जिसमें पूर्व का अर्थ शरीर का अगला भाग, उत्तान का अर्थ खिंचाव और आसन का अर्थ मुद्रा है। 3. यह आसन कुर्सी पर काम करने वालों के लिए क्यों फायदेमंद है? यह लगातार बैठने से टाइट होने वाली कूल्हे की मांसपेशियों को खोलता है और पीठ, कंधों व पैरों को सक्रिय करता है। 4. शुरुआत में इस आसन को कितनी देर तक रोकना चाहिए? शुरुआत में इसे केवल कुछ सेकंड तक ही रोकना चाहिए और अभ्यास बढ़ने पर धीरे-धीरे समय बढ़ाना चाहिए। 5. पूर्वोत्तानासन करने से पहले क्या सावधानी रखनी चाहिए? अभ्यास से पहले कलाइयों और कंधों का वॉर्म-अप करना चाहिए और गर्दन को अत्यधिक पीछे नहीं झुकाना चाहिए। 6. पीठ दर्द के गंभीर लक्षणों में क्या करना चाहिए? यदि दर्द बहुत ज्यादा हो या पैर में सुन्नपन और कमजोरी महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट से सलाह लेनी चाहिए। https://trendkia.com/health/lagatara-baithakara-kama-karane-se-hone-vali-sharirika-jakarana-dura-karane-men-karagara-hai-purvottanasana-40704 TrendKia — Har trend, sabse pehle.