लिक्विड बायोप्सी से शुरुआती दौर में पकड़ में आएगा कैंसर, बिना चीर-फाड़ के खून से होगी बीमारी की पहचान कैंसर की पारंपरिक और दर्दनाक बायोप्सी के मुकाबले लिक्विड बायोप्सी एक आधुनिक तकनीक है, जो बिना किसी चीर-फाड़ के खून या अन्य तरल पदार्थों के जरिए ट्यूमर के डीएनए का पता लगाती है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की पहचान के लिए पारंपरिक तौर पर बायोप्सी का सहारा लिया जाता है। सामान्यतः जब अल्ट्रासाउंड या सीटी स्कैन जैसी जांचों में शरीर के किसी हिस्से में कैंसर कोशिकाओं के पनपने का संदेह होता है, तब डॉक्टर बायोप्सी की सलाह देते हैं। इस प्रक्रिया में संबंधित अंग तक सुई पहुंचाई जाती है या फिर कोशिकाओं का सैंपल खींचकर निकाला जाता है। यदि ट्यूमर शरीर के ऐसे भीतरी अंगों में स्थित है जहां सुई पहुंचना संभव नहीं होता, तो मरीज की छोटी सर्जरी तक करनी पड़ती है। इन तमाम कठिन और दर्दनाक प्रक्रियाओं के बाद ही यह पुख्ता हो पाता है कि व्यक्ति को कैंसर है या नहीं। आमतौर पर यह स्थिति तब आती है जब बीमारी शरीर में काफी हद तक फैल चुकी होती है। लेकिन चिकित्सा विज्ञान में अब ऐसी उन्नत तकनीकों पर काम चल रहा है जो इस बीमारी को इसके शुरुआती चरण में ही दबोचने में सक्षम हैं। इन्हीं में से एक बेहदpromising तकनीक लिक्विड बायोप्सी है, जिसके विभिन्न पहलुओं पर मैक्स अस्पताल के ओरल कैंसर स्पेशलिस्ट डॉ. रवि शंकर ने विस्तार से प्रकाश डाला है। क्या होती है लिक्विड बायोप्सी और कैसे की जाती है जांच मैक्स अस्पताल के कैंसर विभाग के सीनियर कंसलटेंट डॉ. रवि शंकर के अनुसार, लिक्विड बायोप्सी का सीधा मतलब शरीर के खून या अन्य तरल पदार्थों के जरिए कैंसर की मौजूदगी का पता लगाना है। इस आधुनिक विधि में किसी व्यक्ति के रक्त या अन्य फ्लूइड का सैंपल लिया जाता है और उसका बारीकी से विश्लेषण किया जाता है। इसका उद्देश्य यह जांचना होता है कि उस तरल में सर्कुलेटिंग ट्यूमर सेल्स यानी सीटीसी या उनके अवशेष मौजूद हैं या नहीं। पारंपरिक बायोप्सी के विपरीत इस प्रक्रिया में शरीर पर कोई चीरा नहीं लगाया जाता है। पुरानी पद्धति में जहां सुई या सर्जरी के जरिए मांस का टुकड़ा निकाला जाता है जो कि काफी पीड़ादायक और जटिल होता है, वहीं लिक्विड बायोप्सी में केवल खून या शरीर का दूसरा तरल सैंपल ही पर्याप्त होता है। इस सैंपल के माध्यम से सीधे तौर पर कैंसर कोशिकाओं के डीएनए का विश्लेषण कर लिया जाता है. रक्त में तैरते ट्यूमर कणों और डीएनए की भूमिका डॉ. रवि शंकर ने इस प्रक्रिया को समझाते हुए बताया कि जब भी शरीर के किसी अंग में कैंसर कोशिकाएं विकसित होती हैं, तो उन कोशिकाओं में से कुछ समय के साथ नष्ट हो जाती हैं या उनके छोटे-छोटे कण टूटने लगते हैं। ये सूक्ष्म कण या इनसे मुक्त होने वाले डीएनए रक्त प्रवाह में मिल जाते हैं और ब्लड सर्कुलेशन के साथ पूरे शरीर में घूमते रहते हैं। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इन्हें सर्कुलेटिंग ट्यूमर सेल्स यानी सीटीसी या सीटी डीएनए कहा जाता है। चूंकि ये कण रक्त में तैरते रहते हैं, इसलिए जब मरीज का ब्लड सैंपल लिया जाता है, तो आधुनिक मशीनें इन विशेष कणों को आसानी से पहचान लेती हैं। इससे बिना किसी आक्रामक सर्जरी के शरीर के भीतर चल रही हलचल का अंदाजा लग जाता है और बीमारी की थाह मिल जाती है. इलाज करा रहे और ठीक हो चुके मरीजों के लिए वरदान डॉ. रवि शंकर का कहना है कि एडवांस लिक्विड बायोप्सी टेस्ट उन मरीजों के लिए बेहद शानदार साबित होता है जिनका कैंसर का इलाज चल रहा है या जिनका ट्रीटमेंट पहले ही पूरा हो चुका है। अमूमन अधिकांश कैंसर मरीजों में बीमारी के दोबारा लौटने यानी रिलैप्स का खतरा हमेशा बना रहता है। ऐसी संवेदनशील स्थिति में एडवांस लिक्विड बायोप्सी की मदद से डॉक्टरों को मरीजों पर पैनी नजर रखने में बड़ी मदद मिलती है। कई बार ऐसा होता है कि सीटी स्कैन या सामान्य बायोप्सी जैसी जांचों में भी कैंसर का दोबारा उभरना पकड़ में नहीं आता है, जिसके चलते समय पर दोबारा इलाज शुरू नहीं हो पाता। लेकिन यदि लिक्विड बायोप्सी की रिपोर्ट में सीटीसी यानी सर्कुलेटिंग ट्यूमर सेल्स पॉजिटिव आते हैं, तो इसका सीधा सा अर्थ होता है कि शरीर के भीतर सूक्ष्म या माइक्रोस्कोपिक स्तर पर कैंसर की कुछ बची हुई कोशिकाएं अब भी खून में मौजूद हैं। यही छोटी कोशिकाएं भविष्य में कैंसर के दोबारा लौटने की मुख्य वजह बन सकती हैं। इलाज की दिशा तय करने और जोखिम घटाने में मदद चूंकि रक्त में सीटीसी की मौजूदगी इस बात का स्पष्ट संकेत देती है कि शरीर के अंदर सूक्ष्म स्तर पर कैंसर के अंश बचे हुए हैं, ऐसी स्थिति में डॉक्टर कीमोथेरेपी के कुछ अतिरिक्त चक्र या मेंटेनेंस थेरेपी देने का सुझाव देते हैं। इस एहतियाती कदम से कैंसर के दोबारा बढ़ने या लौटने का जोखिम काफी हद तक क्षीण हो जाता है। मरीज के शरीर में चल रही इस अदृश्य बीमारी का समय रहते पता चल जाने से चिकित्सकों को आगे की रणनीति बनाने में भारी सहूलियत मिलती है, जिससे मरीज की रिकवरी और जीवन रक्षा की संभावनाएं मजबूत होती हैं. क्या हर व्यक्ति करवा सकता है यह टेस्ट डॉ. रवि शंकर ने स्पष्ट किया कि कैंसर की पुष्टि करने के लिए लिक्विड बायोप्सी फिलहाल सर्वमान्य और स्थापित तरीका नहीं है और न ही यह हमारे मौजूदा मेडिकल प्रोटोकॉल का हिस्सा है। हालांकि, इस दिशा में लगातार कई रिसर्च चल रही हैं और नए-नए वैज्ञानिक प्रमाण सामने आ रहे हैं। इन तमाम अध्ययनों में इसके बेहद सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। इसलिए यदि भविष्य में तमाम परीक्षण सफल रहे और सब कुछ ठीक रहा, तो यह तकनीक आगे चलकर कैंसर को उसके शुरुआती चरण में ही पहचानने का सबसे मजबूत आधार बन सकती है। यह कैंसर के उपचार में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकती है, लेकिन इसके बावजूद सब कुछ भविष्य के शोध परिणामों पर ही निर्भर करता है। ऐसा भी संभव है कि यह तकनीक भविष्य में पूरी तरह सफल हो जाए, लेकिन इस बात की भी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि यह टेस्ट मौजूदा पारंपरिक जांचों की तरह सार्वभौमिक रूप से सर्वमान्य न हो पाए. इसका आप पर असर भारत में: कैंसर के शुरुआती दौर में सटीक पहचान होने से समय पर इलाज संभव हो सकेगा और मरीजों की रिकवरी बेहतर होगी। दैनिक जीवन में: पारंपरिक और दर्दनाक सर्जिकल बायोप्सी से राहत मिलने की उम्मीद है, जिससे जांच प्रक्रिया अधिक सुगम बनेगी। सवाल-जवाब 1. लिक्विड बायोप्सी क्या होती है? यह एक आधुनिक जांच है जिसमें खून या अन्य तरल पदार्थों के जरिए कैंसर कोशिकाओं के डीएनए और ट्यूमर सेल्स का पता लगाया जाता है। 2. क्या लिक्विड बायोप्सी में चीर-फाड़ की जरूरत पड़ती है? नहीं, इस प्रक्रिया में किसी भी तरह का चीरा नहीं लगाया जाता है, बल्कि केवल मरीज का ब्लड सैंपल लिया जाता है। 3. यह टेस्ट किन मरीजों के लिए सबसे ज्यादा उपयोगी है? यह टेस्ट उन मरीजों के लिए शानदार है जिनका कैंसर का इलाज चल रहा है या जो इलाज पूरा कर चुके हैं और जिनपर दोबारा बीमारी लौटने का खतरा रहता है। 4. क्या कैंसर की पुष्टि के लिए यह अभी सर्वमान्य तरीका है? फिलहाल यह कैंसर की पुष्टि करने का सर्वमान्य तरीका नहीं है और न ही यह मौजूदा मेडिकल प्रोटोकॉल का हिस्सा है, लेकिन इस पर रिसर्च जारी है। https://trendkia.com/health/liquid-biopsy-se-shuruat-mein-hi-ho-jayegi-cancer-ki-pehchan-21333 TrendKia — Har trend, sabse pehle.