मस्तिष्क आघात के शुरुआती इशारों को न करें नजरअंदाज, जानिए बचाव और देखभाल का सही तरीका मऊ के चिकित्सक डॉक्टर सुमंत कुमार गुप्ता ने स्ट्रोक के मुख्य लक्षणों और शुरुआती घंटों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए जीवनशैली में बदलाव की सलाह दी है। मस्तिष्क तक रक्त का प्रवाह बाधित होने या नसों से जुड़ी गंभीर समस्याओं के चलते स्ट्रोक के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है, जो कई बार जानलेवा साबित होते हैं। इस स्वास्थ्य संकट के उत्पन्न होने के जैविक कारण, इसके शुरुआती शारीरिक संकेत और समय पर किए जाने वाले चिकित्सकीय उपायों की सही समझ होना हर व्यक्ति के लिए आवश्यक है। मऊ स्थित केसरी राज हॉस्पिटल के चिकित्सक डॉक्टर सुमंत कुमार गुप्ता ने इस जटिल स्थिति के विभिन्न पहलुओं, लक्षणों की पहचान और बचाव के आवश्यक तरीकों को विस्तार से साझा किया है। मस्तिष्क में रक्त प्रवाह की रुकावट और अन्य मुख्य कारण शरीर के सबसे संवेदनशील अंग मस्तिष्क की कार्यप्रणाली सुचारू रूप से चलने के लिए निरंतर रक्त संचार की आवश्यकता होती है। जब किसी कारणवश दिमाग के किसी हिस्से में खून की सप्लाई कम हो जाती है, तो स्ट्रोक का खतरा पैदा हो जाता है। इसके अतिरिक्त ब्रेन हेमरेज की स्थिति अथवा नसों में आई सूजन भी इस गंभीर बीमारी का आधार बन सकती है। डॉक्टर सुमंत कुमार गुप्ता के अनुसार, यदि उच्च रक्तचाप या अनियंत्रित डायबिटीज की समस्या हो, तो रक्त वाहिकाओं और तंत्रिका तंत्र पर सीधा प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिससे मस्तिष्क को मिलने वाला पोषण और ऑक्सीजन अचानक बाधित हो सकते हैं। चेहरे और अंगों में दिखने वाले प्रमुख चेतावनी संकेत स्ट्रोक के हमले के दौरान शरीर कई स्पष्ट चेतावनी संकेत देता है, जिन्हें बिल्कुल भी अनदेखा नहीं करना चाहिए। प्रभावित व्यक्ति के चेहरे की बनावट में असामान्य परिवर्तन नजर आने लगता है, जिसमें मुंह का एक तरफ झुकना या टेढ़ा हो जाना और मुंह से अचानक अनियंत्रित रूप से लार टपकना शामिल है। आंखों की सामान्य स्थिति में भी विकृति आ जाती है, जिससे दृष्टि या आंख का झुकाव एक दिशा में होने लगता है। इसके साथ ही पीड़ित के हाथों और पैरों में तेज झनझनाहट महसूस होने लगती है, जो धीरे-धीरे अंगों की कार्यक्षमता को पूरी तरह शिथिल कर सकती है। नियंत्रण खोने के कारण व्यक्ति का शारीरिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है, और ऐसे हालात दिखने पर बिना एक पल गंवाए किसी योग्य चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। गोल्डन आवर की अहमियत और शुरुआती घंटों का प्रबंधन मस्तिष्क को किसी भी स्थाई क्षति से बचाने के लिए स्ट्रोक के शुरुआती तीन से चार घंटे अत्यंत संवेदनशील माने जाते हैं। आपातकालीन चिकित्सा विज्ञान में इस समयावधि को गोल्डन आवर का नाम दिया गया है, क्योंकि इस नाजुक दौर में शुरू किया गया सटीक उपचार मस्तिष्क की कोशिकाओं को सुरक्षित रखने में मददगार होता है। यदि इन घंटों के भीतर मरीज को अस्पताल पहुंचाकर सही दवा और प्रबंधन मिल जाए, तो दीर्घकालिक दुष्प्रभावों और पूर्ण पैरालिसिस के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसमें होने वाली तनिक सी भी देरी उपचार की जटिलता को बढ़ा देती है और रोगी की जान पर संकट खड़ा कर सकती है। खानपान का संतुलन और 40 वर्ष की उम्र के बाद जरूरी जांच नसों और हृदय संबंधी जटिलताओं से सुरक्षित रहने के लिए दैनिक जीवनशैली में अनुशासन बरतना बेहद जरूरी है। डॉक्टर गुप्ता ने स्पष्ट किया है कि आहार में नमक की अत्यधिक मात्रा और भारी वसायुक्त खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करना चाहिए, साथ ही शारीरिक सक्रियता बनाए रखने के लिए रोजाना नियमित एक्सरसाइज को दिनचर्या का हिस्सा बनाना आवश्यक है। 40 वर्ष की आयु पार कर चुके लोगों को अपने स्वास्थ्य को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए और नियमित रूप से जांच करवाते रहना चाहिए। इसमें ब्लड शुगर, डायबिटीज और ब्लड प्रेशर की नियमित मॉनिटरिंग सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही विकार नसों की सेहत को बिगाड़ते हैं। किसी भी अप्रत्याशित लक्षण के उभरने पर घर पर खुद से कोई दवाई लेने के बजाय सीधे नजदीकी अस्पताल पहुंचकर विशेषज्ञ डॉक्टरों की देखरेख में जांच और इलाज कराना ही सबसे सुरक्षित कदम है। इसका आप पर असर स्ट्रोक के प्राथमिक संकेतों की सटीक पहचान और शुरुआती तीन से चार घंटों में त्वरित अस्पताल प्रबंधन से स्थाई लकवे और जान जाने के खतरे से बचा जा सकता है। • भारत में: गैर-संचारी बीमारियों जैसे डायबिटीज और उच्च रक्तचाप के बढ़ते मामलों के बीच नियमित जांच से स्ट्रोक के जोखिम को समय रहते टाला जा सकता है। 40 वर्ष की आयु पार कर चुके सभी वयस्कों को साल में कम से कम एक बार अपने बुनियादी स्वास्थ्य मापदंडों का परीक्षण अवश्य कराना चाहिए। • मऊ और पूर्वांचल में: स्थानीय स्तर पर आपातकालीन न्यूरोलॉजिकल लक्षणों को पहचानकर मरीज को तुरंत नजदीकी सुसज्जित अस्पताल ले जाना अत्यंत आवश्यक है। शुरुआती गोल्डन आवर में नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल पहुंचने से गंभीर पैरालिसिस का खतरा न्यूनतम हो जाता है। • आहार और दिनचर्या: दैनिक भोजन में अधिक वसायुक्त चीजें और अतिरिक्त नमक कम करने से नसों का दबाव संतुलित रहता है। हर दिन हल्का व्यायाम या टहलना अपनी जीवनशैली में शामिल करना रक्त संचार के लिए अत्यंत लाभकारी है। • आपातकालीन तैयारी: चेहरे के टेढ़ेपन, आंख के झुकाव या हाथ-पैर में सुन्नता दिखते ही घर पर दवाएं लेने के बजाय तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर को दिखाएं। समय रहते लिया गया सही फैसला मरीज को सामान्य जीवन में वापस लाने में मदद करता है। ऐसा क्यों हुआ मस्तिष्क के नाजुक ऊतकों तक खून का संचार अचानक रुक जाने या नसों के फटने से स्ट्रोक की गंभीर स्थिति उत्पन्न होती है। रक्त वाहिकाओं पर पड़ने वाला अत्यधिक आंतरिक दबाव और तंत्रिका तंत्र की सूजन इस आकस्मिक अवरोध की मुख्य वजह बनती है। • रक्त आपूर्ति में रुकावट: जब दिमाग की ओर जाने वाली रक्त धमनियों में रुकावट पैदा होती है, तो संबंधित मस्तिष्क कोशिकाओं को ऑक्सीजन मिलना बंद हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप शरीर के संबंधित अंगों का नियंत्रण अचानक समाप्त होने लगता है। • ब्रेन हेमरेज और नसों की सूजन: नसों में आई सूजन या किसी रक्त नलिका के फटने से ब्रेन हेमरेज की स्थिति बन जाती है। इस आंतरिक रक्तस्राव से मस्तिष्क के भीतरी दबाव में तेज बढ़ोतरी होती है। • अनियंत्रित ब्लड प्रेशर और डायबिटीज: लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर नसों की दीवारों को कमजोर करता है और डायबिटीज तंत्रिका तंत्र को क्षति पहुंचाती है। यह संयोजन रक्त संचार को पूरी तरह बाधित कर स्ट्रोक के हमले का रास्ता तैयार करता है। सवाल-जवाब 1. स्ट्रोक आने का मुख्य शारीरिक कारण क्या होता है? मस्तिष्क में रक्त की आपूर्ति कम होने, ब्रेन हेमरेज होने या नसों में सूजन आने के कारण स्ट्रोक की समस्या होती है। 2. स्ट्रोक के प्रमुख शुरुआती लक्षण क्या दिखाई देते हैं? चेहरे व मुंह में टेढ़ापन, मुंह से लार टपकना, आंखों का झुकना और हाथ-पैर में झनझनाहट के साथ नियंत्रण खोना इसके मुख्य लक्षण हैं। 3. स्ट्रोक के इलाज में 'गोल्डन आवर' किसे कहा जाता है? स्ट्रोक शुरू होने के पहले तीन से चार घंटे को गोल्डन आवर कहा जाता है, जिसमें इलाज मिलने पर मरीज की रिकवरी बेहतर होती है। 4. 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को कौन सी स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए? 40 वर्ष के बाद नियमित रूप से डायबिटीज, ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर की जांच कराते रहना आवश्यक है। 5. स्ट्रोक के जोखिम को कम करने के लिए किन आदतों को अपनाना चाहिए? नमक और वसायुक्त खाद्य पदार्थों का कम सेवन करना चाहिए तथा प्रतिदिन नियमित रूप से एक्सरसाइज करनी चाहिए। 6. लक्षण दिखने पर तुरंत क्या कदम उठाना चाहिए? मरीज को बिना खुद से कोई दवा दिए तत्काल नजदीकी अस्पताल ले जाकर योग्य चिकित्सक से उपचार शुरू कराना चाहिए। https://trendkia.com/health/mastishka-aghata-ke-shuruati-isharon-ko-na-karen-najaraandaja-janie-bachava-aura-dekhabhala-ka-sahi-tarika-43595 TrendKia — Har trend, sabse pehle.