मौसम के उतार-चढ़ाव में बकरियों की देखभाल कैसे करें, पशु चिकित्सा विशेषज्ञ ने बताए अहम नियम तापमान में अचानक बदलाव, नमी और दूषित खानपान से बकरियों में बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. राकेश कुमार तिवारी ने शेड प्रबंधन, टीकाकरण और समय पर इलाज के सुझाव साझा किए हैं। गोंडा जिले में बड़ी तादाद में किसान और पशुपालक अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए बकरी पालन का सहारा ले रहे हैं। जब भी मौसम करवट लेता है, तो वातावरण के बदलते मिजाज के साथ बकरियों की शारीरिक सेहत पर सीधा दबाव पड़ता है। अचानक तापमान में वृद्धि या गिरावट से जानवरों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने लगती है, जिसके चलते वे कई तरह के संक्रमणों की चपेट में आ जाते हैं। विशेष रूप से छोटे मेमनों और शारीरिक रूप से कमजोर बकरियों में यह जोखिम कई गुना अधिक पाया जाता है। अगर पशुपालक समय रहते उचित प्रबंधन और बुनियादी सावधानियां अपना लें, तो अपने पशुधन को गंभीर बीमारियों और आकस्मिक नुकसान से पूरी तरह सुरक्षित रख सकते हैं। तापमान का उतार-चढ़ाव और बीमारियों का बढ़ता खतरा उप मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. राकेश कुमार तिवारी के अनुसार, जब मौसम बदलता है तब कभी तेज धूप और गर्मी, कभी अचानक ठंडक तो कभी वर्षा के कारण वातावरण में अनिश्चितता बनी रहती है। यह निरंतर तापमान असंतुलन सीधे तौर पर बकरियों के स्वास्थ्य पर विपरीत असर डालता है। यदि इन जीवों को गीले, सीलन भरे अथवा अत्यधिक ठंडे फर्श पर बांधा जाए, तो उनके बीमार होने की दर काफी तेज हो जाती है। इसके अलावा बाड़े के आसपास जमा गंदा पानी, बासी या फफूंद लगा चारा और बाड़े के इर्द-गिर्द पनप रही गंदगी भी कई संक्रामक रोगों को जन्म देती है, जो तेजी से पूरे झुंड में फैल सकते हैं। बाड़े और शेड के रख-रखाव में बरतें यह सावधानी बदलते मौसम के दौरान पशुपालक को सबसे पहला ध्यान बकरियों के आवास स्थल पर देना चाहिए। शेड के भीतर किसी भी हाल में पानी का ठहराव नहीं होना चाहिए और फर्श को हर समय सूखा रखने की व्यवस्था करनी चाहिए। बाड़े में एकत्र होने वाले गोबर, मल-मूत्र और अन्य कचरे की रोजाना व्यवस्थित सफाई बेहद आवश्यक है। बारिश के दिनों में शेड के अंदर सीलन और नमी बढ़ जाना स्वाभाविक है, इसलिए उसे तुरंत सुखाने या हवादार रखने के पुख्ता इंतजाम होने चाहिए। बकरियों को ठंडी हवाओं के सीधे झोंकों और वर्षा की बौछारों से महफूज रखने के लिए मजबूत शेड जरूरी है, क्योंकि अत्यधिक नमी और सर्दी बकरियों के श्वसन तंत्र को सबसे पहले प्रभावित करती है। ताजा पानी और फफूंद रहित चारे की व्यवस्था पशुओं के लिए हमेशा शुद्ध और ताजा पीने का पानी ही उपलब्ध कराया जाना चाहिए। कई दिनों से बर्तनों में जमा गंदा अथवा बासी पानी पिलाने से पेट और आंतों से जुड़ी बीमारियां पनपने लगती हैं। खानपान के मामले में भी स्वच्छता और पौष्टिकता का पूरा ध्यान रखना अनिवार्य है। सड़ चुका, बासी अथवा फफूंद लगा चारा बकरियों को कभी न परोसें। सूखे चारे और दाने का भंडारण भी ऐसे सुरक्षित कमरों में करें जहां सीलन या बारिश का पानी न पहुंच सके। दूषित और सड़ा चारा खाने से बकरियों के पाचन तंत्र में गंभीर विकार उत्पन्न हो जाते हैं। बीमारी के शुरुआती संकेत और तुरंत अलगाव की जरूरत यदि झुंड में किसी भी बकरी की तबीयत खराब दिखाई दे, तो संक्रमण की रोकथाम का पहला कदम उसे बाकी स्वस्थ बकरियों से तत्काल अलग करना है। यदि कोई बकरी नियमित खुराक छोड़ दे, चारा खाना बेहद कम कर दे, सुस्त होकर एक कोने में बैठी रहे, लगातार खांस रही हो, उसकी नाक से तरल पदार्थ बह रहा हो, दस्त की शिकायत हो या उसका शरीर बुखार से तप रहा हो, तो पशुपालक को इन संकेतों को कतई नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे किसी भी असामान्य लक्षण के उभरते ही योग्य पशु चिकित्सक से संपर्क साधना जरूरी है। इसके साथ ही कई जानलेवा संक्रमणों से स्थायी बचाव के लिए निर्धारित समय पर टीकाकरण पूरा कराना अनिवार्य है। पशुपालक अपने स्थानीय पशु अस्पताल या पशुपालन विभाग से संपर्क कर टीकाकरण कैलेंडर और जरूरी एहतियात की पूरी जानकारी हासिल कर सकते हैं। कमजोर मेमनों की सुरक्षा और जरूरी चिकित्सा परामर्श बकरी के नन्हे बच्चों में बीमारियों से लड़ने की स्वाभाविक ताकत कम होती है। इसलिए ऋतु परिवर्तन के समय उन्हें ठंड, बरसात और गीलेपन से दूर रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। बच्चों को हमेशा साफ-सुथरी, सूखी और गर्म जगह पर रखें और उनके पोषण की विशेष निगरानी करें। डॉ. राकेश कुमार तिवारी बताते हैं कि थोड़ी सी सतर्कता और नियमित देखभाल बकरियों को कई घातक व्याधियों से बचा सकती है। आवास की स्वच्छता, संतुलित आहार, शुद्ध पेयजल और समयबद्ध टीकाकरण को अपनाकर पशुपालक नुकसान से बच सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी प्रकार की बीमारी दिखने पर अपनी मर्जी से कोई दवा देने के बजाय केवल पंजीकृत पशु चिकित्सक के परामर्श पर ही उपचार शुरू करना चाहिए। इसका आप पर असर बदलते मौसम में बकरियों के स्वास्थ्य प्रबंधन से जुड़े ये दिशा-निर्देश पशुपालकों को वित्तीय नुकसान से बचाने और पशुधन की सुरक्षा में सीधे तौर पर मददगार हैं। • गोंडा में: स्थानीय स्तर पर बकरी पालन से अपनी आजीविका चलाने वाले किसान समय रहते बाड़े को सूखा रखकर और टीकाकरण कराकर मेमनों की मृत्यु दर को रोक सकते हैं। इससे अचानक होने वाले आर्थिक नुकसान से बचाव होगा और पशुपालक समय पर क्षेत्रीय पशु चिकित्सा केंद्र से जरूरी परामर्श ले सकेंगे। • भारत में: देश भर के पशुपालक इन सावधानियों को अपनाकर बदलते मौसम में संक्रमण फैलने की घटनाओं को नियंत्रित कर सकते हैं। झुंड में रोग फैलने से रोकने के लिए समय पर बीमार पशु को अलग करने और स्वच्छ चारा-पानी देने से पशु उत्पादकता और आमदनी स्थिर बनी रहती है। ऐसा क्यों हुआ मौसम में अचानक होने वाले बदलाव, बढ़ते तापमान के अंतर और नमी के कारण बकरियों की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता तेजी से घट जाती है, जिससे सूक्ष्म जीवाणु और वायरस आसानी से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। • तापमान का उतार-चढ़ाव: दिन में गर्मी और रात में ठंडक या अचानक बारिश होने से जानवरों का शरीर तुरंत मौसम के अनुकूल नहीं ढल पाता। इस शारीरिक तनाव के कारण श्वसन और पाचन संबंधी समस्याएं उभरने लगती हैं। • सीलन और स्वच्छता की कमी: शेड में पानी भरने, गीले फर्श पर बैठने और गोबर की नियमित सफाई न होने से बैक्टीरिया पनपने लगते हैं। नम वातावरण में रहने से बकरियों में सर्दी, खांसी और निमोनिया जैसे रोगों का खतरा बढ़ जाता है। • दूषित आहार और बासी पानी: कई दिनों का ठहरा हुआ पानी और फफूंद लगा चारा आंतों के संक्रमण और गंभीर दस्त का प्रमुख कारण बनता है। समय पर स्वच्छ आहार न मिलने से कमजोर बकरियां और मेमने जल्दी बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। सवाल-जवाब 1. मौसम बदलने पर बकरियों के शेड का रख-रखाव कैसे करना चाहिए? शेड के फर्श को हमेशा सूखा और साफ रखना चाहिए तथा गोबर की नियमित सफाई करनी चाहिए। पानी का जमाव तुरंत रोकें और बकरियों को ठंडी हवा व बारिश से बचाने के लिए बाड़े को सुरक्षित रखें। 2. बकरियों को किस तरह का चारा और पानी देना चाहिए? बकरियों को हमेशा ताजा और साफ पानी पिलाना चाहिए। चारे के रूप में केवल पौष्टिक व सूखा चारा दें और फफूंद लगा या सड़ा-गला चारा कभी न खिलाएं। 3. बीमार बकरी के मुख्य लक्षण क्या होते हैं? चारा कम खाना, लगातार सुस्ती, खांसना, नाक बहना, दस्त होना और शरीर का तापमान बढ़ना बीमारी के प्रमुख लक्षण हैं। 4. यदि किसी बकरी में बीमारी के लक्षण दिखें तो सबसे पहले क्या कदम उठाना चाहिए? बीमार बकरी को तुरंत बाकी स्वस्थ झुंड से अलग कर देना चाहिए ताकि संक्रमण न फैले, और तत्काल पशु चिकित्सक से जांच करानी चाहिए। 5. छोटे मेमनों की देखभाल के लिए क्या विशेष ध्यान रखना जरूरी है? छोटे बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, इसलिए उन्हें ठंड, बारिश और सीलन से दूर सूखी जगह पर रखें और उनके खानपान पर विशेष नजर रखें। 6. बकरियों को गंभीर संक्रमणों से बचाने के लिए टीकाकरण का क्या महत्व है? समय पर कराया गया टीकाकरण बकरियों को कई जानलेवा संक्रामक रोगों से सुरक्षित रखता है। इसके लिए स्थानीय पशुपालन विभाग या पशु चिकित्सक से संपर्क किया जा सकता है। https://trendkia.com/health/mausama-ke-utara-charhava-men-bakariyon-ki-dekhabhala-kaise-karen-pashu-chikitsa-visheshajna-ne-batae-ahama-niyama-41976 TrendKia — Har trend, sabse pehle.