माउंट सिनाई में न्यूरोवैज्ञानिक डेविड पुट्रिनो का अनोखा प्रयोग, पैर की मांसपेशियों से माइटोकॉन्ड्रिया निकालकर महिला की आंखों में किया इंजेक्ट अमेरिकी शोधकर्ताओं ने 26 वर्षीय दृष्टिहीन महिला की आंखों में उसके पैर की मांसपेशियों से निकाले गए माइटोकॉन्ड्रिया इंजेक्ट करके एक ऐतिहासिक मेडिकल प्रयोग किया है। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में वैज्ञानिक लगातार ऐसी नई तकनीकों की खोज में लगे रहते हैं जो लाइलाज बीमारियों के इलाज का नया रास्ता खोल सकें। आमतौर पर जब हमारे किसी इलेक्ट्रॉनिक्स डिवाइस या रिमोट की बैटरी खराब या खत्म हो जाती है, तो हम उसे किसी दूसरे उपकरण की काम कर रही बैटरी से बदल देते हैं। इंसानी शरीर के मामले में ऐसी कल्पना करना भले ही अजीब लगे, लेकिन सूक्ष्म सेल्यूलर स्तर पर वैज्ञानिक अब ठीक ऐसा ही अनोखा प्रयोग कर रहे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में माउंट सिनाई के इकॉन स्कूल ऑफ मेडिसिन में न्यूरोवैज्ञानिक डेविड पुट्रिनो के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की एक टीम ने चिकित्सा इतिहास में पहली बार एक दृष्टिहीन महिला के पैर की मांसपेशी से माइटोकॉन्ड्रिया निकालकर उसकी दोनों आंखों के लिक्विड में इंजेक्ट किया है। माइटोकॉन्ड्रिया को हमारे शरीर की हर कोशिका का पावरहाउस या जैविक बैटरी माना जाता है, जो भोजन और ऑक्सीजन को ऊर्जा में बदलने का काम करता है। इस प्रयोग का उद्देश्य ऑक्सीजन की कमी से क्षतिग्रस्त हो चुकी आंखों की कोशिकाओं को दोबारा ऊर्जा प्रदान करना था। सेल्यूलर स्तर पर पावरहाउस ट्रांसप्लांट की नई चिकित्सा अवधारणा मानव शरीर में कोशिकाएं अत्यंत जटिल प्रणालियों के तहत कार्य करती हैं। कोशिकाओं के भीतर मौजूद माइटोकॉन्ड्रिया सूक्ष्म अंगों के रूप में कार्य करते हैं जो शरीर में ऊर्जा का मुख्य स्रोत होते हैं। पूर्व में वैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रयोगशाला जानवरों के क्षतिग्रस्त ऊतकों में माइटोकॉन्ड्रिया ट्रांसप्लांट करके यह जांचने का प्रयास किया था कि क्या कमजोर पड़ रही कोशिकाओं को नई ऊर्जा देकर बचाया जा सकता है। पशु परीक्षणों में मिले सकारात्मक संकेतों के बाद, वैज्ञानिकों ने पहली बार इस तकनीक को किसी इंसान की आंखों पर आजमाने का साहसिक निर्णय लिया। माउंट सिनाई के न्यूरोवैज्ञानिक डेविड पुट्रिनो ने इस पूरी रिसर्च प्रक्रिया का मार्गदर्शन किया और इस अध्ययन को रिसर्च स्क्वायर प्लेटफॉर्म पर प्रस्तुत किया। इंसानी आंख एक बेहद संवेदनशील और जटिल अंग है, जिसमें किसी भी बाहरी या अन्य अंग की जैविक सामग्री को इंजेक्ट करना एक बड़ा जोखिम हो सकता है। इसके बावजूद, वैज्ञानिकों ने इस वैज्ञानिक चुनौती को स्वीकार किया और विजुअल नर्वस सिस्टम के इलाज की दिशा में एक नया अध्याय जोड़ा। इस प्रयोग से भविष्य में ऑप्टिक नर्व से जुड़ी लाइलाज बीमारियों के इलाज की नई उम्मीद जगी है। हादसे से अंधापन तक: 26 वर्षीय मरीज की गंभीर मेडिकल हिस्ट्री इस ऐतिहासिक क्लिनिकल ट्रायल में शामिल मरीज 26 साल की एक युवा महिला है, जिसकी जिंदगी एक अचानक हुए हादसे के कारण पूरी तरह बदल गई थी। इस महिला को अचानक मस्तिष्क में रक्तस्राव यानी ब्रेन ब्लीड हुआ, जिससे उसकी स्थिति अत्यंत नाजुक हो गई। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह रही कि गंभीर स्थिति होने के बावजूद उसे लगभग 18 घंटे तक किसी अस्पताल में चिकित्सा सहायता नहीं मिल सकी। जब मरीज को अंततः अस्पताल पहुंचाया गया, तब डॉक्टरों ने उसकी जान बचाने के लिए तत्काल इमरजेंसी सर्जरी की। सर्जरी के जरिए उसकी जान तो बचा ली गई, लेकिन 18 घंटे की लंबी अवधि तक मस्तिष्क और आंखों तक खून तथा ऑक्सीजन की आपूर्ति रुकने से भारी क्षति हो चुकी थी। ऑक्सीजन की इस गंभीर कमी के कारण महिला की दोनों आंखों की ऑप्टिक नर्व्स बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं और उसकी दोनों आंखों की रोशनी लगभग पूरी तरह समाप्त हो गई। हादसे के 8 हफ्ते बीत जाने के बाद जब मरीज की जांच की गई, तो पाया गया कि उसकी ऑप्टिक नर्व्स धीरे-धीरे सिकुड़ने लगी थीं। इलाज के लगभग 3 महीने बीत जाने के बाद भी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों का मरीज की दृष्टि पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं दिखा, जिसके बाद चिकित्सा दल ने इस नए सेल्यूलर ट्रांसप्लांट दृष्टिकोण को अपनाने का निर्णय लिया। पैर की मांसपेशी का चयन और बायोप्सी प्रक्रिया जब डॉक्टरों ने महिला की आंखों की आधुनिक इमेजिंग तकनीकों से विस्तृत जांच की, तो पाया गया कि ऑप्टिक नर्व की सभी कोशिकाएं पूरी तरह नष्ट नहीं हुई थीं। इमेजिंग रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि आंख और मस्तिष्क को जोड़ने वाले कुछ नर्व फाइबर और सेल्यूलर परतें अब भी जीवित थीं। इसके साथ ही, मस्तिष्क की गतिविधियों के परीक्षण से यह भी संकेत मिले कि कुछ विजुअल जानकारी अब भी आंखों से दिमाग के विजुअल कॉर्टेक्स तक पहुंच रही थी। इन निष्कर्षों के आधार पर न्यूरोवैज्ञानिकों को विश्वास हुआ कि यदि बची हुई कोशिकाओं को माइटोकॉन्ड्रिया के जरिए नई ऊर्जा प्रदान की जाए, तो वे पुनः सक्रिय हो सकती हैं। किसी भी ट्रांसप्लांट प्रक्रिया में मरीज के शरीर द्वारा बाहरी ऊतकों को खारिज किए जाने यानी इम्यून रिजेक्शन का भारी खतरा रहता है। इस खतरे को पूरी तरह समाप्त करने के लिए डॉक्टरों ने मरीज की अपनी ही जैविक सामग्री का उपयोग करने का फैसला किया। डॉक्टरों ने महिला की जांघ की मांसपेशियों से बायोप्सी सैंपल लिया और प्रयोगशाला में विशेष तकनीकों के जरिए उस सैंपल से करोड़ों की संख्या में स्वस्थ और ताजा माइटोकॉन्ड्रिया अलग किए। इसके बाद अत्यधिक सावधानी बरतते हुए इन माइटोकॉन्ड्रिया को महिला की दोनों आंखों के आंतरिक लिक्विड में इंजेक्ट कर दिया गया। रेटिनल गैन्ग्लियन सेल्स और माइटोकॉन्ड्रिया की जैविक कार्यप्रणाली आंखों के पीछे मौजूद रेटिना में पाई जाने वाली रेटिनल गैन्ग्लियन सेल्स हमारे विजुअल सिस्टम का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। ये कोशिकाएं आंखों द्वारा देखी गई तस्वीरों और प्रकाश की जानकारी को विद्युत संकेतों के रूप में मस्तिष्क तक पहुंचाने का कार्य करती हैं। न्यूरोवैज्ञानिक डेविड पुट्रिनो के अनुसार, पूरे सेंट्रल नर्वस सिस्टम में रेटिनल गैन्ग्लियन सेल्स को काम करने के लिए सबसे अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा पूरी तरह से कोशिकाओं के भीतर मौजूद माइटोकॉन्ड्रिया द्वारा निर्मित होती है। जब किसी कारण से आंखों तक रक्त और ऑक्सीजन की सप्लाई बंद या बाधित हो जाती है, तो कोशिकाओं के भीतर सबसे पहले माइटोकॉन्ड्रिया ही डैमेज होते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया के निष्क्रिय होते ही ऊर्जा का निर्माण रुक जाता है, जिससे रेटिनल कोशिकाएं धीरे-धीरे मरने लगती हैं। इस अनूठे प्रयोग का मुख्य उद्देश्य मृत हो चुकी कोशिकाओं को पुनर्जीवित करना नहीं था, बल्कि ऑक्सीजन की कमी से कमजोर हो चुकी और बची हुई जीवित कोशिकाओं को मरने से बचाना था। माइटोकॉन्ड्रिया इंजेक्ट करके डॉक्टरों ने उन बची हुई सेल्यूलर संरचनाओं को अतिरिक्त पावर प्रदान करने की कोशिश की ताकि वे अपना काम जारी रख सकें। परीक्षण के नतीजे: पुतलियों की प्रतिक्रिया और मस्तिष्क के संकेत इस प्रायोगिक इलाज के परिणाम अत्यंत महत्वपूर्ण और हैरान करने वाले रहे। शोध रिपोर्ट के अनुसार, महिला की आंखों में माइटोकॉन्ड्रिया इंजेक्ट किए जाने के बाद शरीर में किसी प्रकार का नकारात्मक साइड इफेक्ट या खतरनाक इम्यून रिएक्शन देखने को नहीं मिला, जो सुरक्षा की दृष्टि से एक बड़ी सफलता मानी जा रही है। ट्रांसप्लांट प्रक्रिया के कुछ ही दिनों के भीतर महिला की आंखों में सकारात्मक शारीरिक बदलाव दिखाई देने लगे। इलाज की शुरुआत से पहले 71 दिनों की अवधि के दौरान मरीज की पुतलियों ने प्रकाश पर कोई सामान्य प्रतिक्रिया नहीं दी थी और वे पूरी तरह निष्क्रिय बनी हुई थीं। हालांकि, सेल्यूलर ट्रांसप्लांट के बाद महिला की पुतलियों ने रोशनी के प्रति सामान्य रूप से सिकुड़ने और फैलने की प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया। इसके अतिरिक्त, इलाज के बाद 3, 44 और 45वें दिनों में आयोजित किए गए ब्रेन रिकॉर्डिंग सेशन के दौरान मस्तिष्क के विजुअल कॉर्टेक्स में भी स्पष्ट और सकारात्मक प्रतिक्रिया दर्ज की गई। यद्यपि इस प्रयोग से महिला की पूर्ण दृष्टि वापस नहीं आ सकी और वह केवल प्रकाश या रोशनी की उपस्थिति को महसूस करने में सक्षम हो पाई, फिर भी जैविक स्तर पर यह एक अभूतपूर्व बदलाव था। पुतलियों में देखा गया यह सुधार स्थायी नहीं रहा; महिला की बाईं आंख ने 11वें दिन अपनी अंतिम सामान्य प्रतिक्रिया दी, जबकि दाईं आंख में 39वें दिन तक प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया दर्ज की गई। भावी वैज्ञानिक संभावनाएं और ऑप्टिक नर्व रिसर्च का भविष्य यह अनोखा क्लिनिकल प्रयोग भले ही मरीज की पूरी रोशनी वापस लाने में सफल नहीं रहा हो, लेकिन इसने यह साबित कर दिया है कि आंखों में सेल्यूलर स्तर पर जैविक बैटरी का ट्रांसप्लांट पूरी तरह सुरक्षित है और यह क्षतिग्रस्त तंत्रिकाओं में अल्पकालिक प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकता है। न्यूरोवैज्ञानिक डेविड पुट्रिनो और उनकी टीम का मानना है कि यह अध्ययन ऑप्टिक नर्व एट्रोफी और ग्लूकोमा जैसी गंभीर और लाइलाज आंखों की बीमारियों के इलाज में माइटोकॉन्ड्रियल थेरेपी की उपयोगिता को रेखांकित करता है। भविष्य के अध्ययनों में वैज्ञानिक इस बात पर ध्यान केंद्रित करेंगे कि इन इंजेक्ट किए गए माइटोकॉन्ड्रिया के प्रभाव को लंबे समय तक कैसे बनाए रखा जाए। यह शोध न्यूरोडीजेनेरेटिव विकारों के उपचार के लिए एक नई दिशा प्रदान करता है, जहां ऊर्जा उत्पादन की कमी के कारण कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं। यदि शोधकर्ता इस प्रभाव की अवधि को बढ़ाने में सफल हो जाते हैं, तो आने वाले समय में यह तकनीक लाखों दृष्टिहीन लोगों के जीवन में उम्मीद की नई किरण ला सकती है। इसका आप पर असर पाठकों के लिए इस रिसर्च का प्रभाव और महत्व: • भारत और दुनिया भर में: ऑप्टिक नर्व की क्षति, ग्लूकोमा या दुर्घटना के कारण दृष्टि खोने वाले रोगियों के लिए यह तकनीक भविष्य में दृष्टि वापस पाने की नई वैज्ञानिक उम्मीद जगाती है। • चिकित्सा और स्वास्थ्य क्षेत्र में: यह शोध यह साबित करता है कि कोशिकाओं की जैविक बैटरी (माइटोकॉन्ड्रिया) का ट्रांसप्लांट पूरी तरह सुरक्षित है और भविष्य में लाइलाज न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के इलाज का तरीका बदल सकता है। सवाल-जवाब 1. वैज्ञानिकों ने आंखों के इलाज के लिए महिला के पैर की मांसपेशी को ही क्यों चुना? बाहरी दाता के ऊतकों का उपयोग करने पर शरीर में इम्यून रिजेक्शन का खतरा रहता है। महिला के अपने जांघ की मांसपेशी से बायोप्सी लेकर माइटोकॉन्ड्रिया निकालने पर खतरनाक इम्यून प्रतिक्रिया का कोई खतरा नहीं रहा। 2. महिला की आंखों की रोशनी कैसे चली गई थी? 26 वर्षीय महिला को अचानक ब्रेन ब्लीड हुआ था और लगभग 18 घंटे तक अस्पताल न पहुंच पाने के कारण ऑक्सीजन की कमी से उसकी दोनों आंखों की ऑप्टिक नर्व्स गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गई थीं। 3. क्या माइटोकॉन्ड्रिया इंजेक्ट करने के बाद महिला की आंखों की पूरी रोशनी वापस आ गई? नहीं, महिला की पूर्ण दृष्टि वापस नहीं आई। हालांकि, उसकी पुतलियों ने प्रकाश पर सामान्य प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया और मस्तिष्क के विजुअल कॉर्टेक्स में सकारात्मक सिग्नल दर्ज किए गए। 4. माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिकाओं का पावरहाउस क्यों कहा जाता है? माइटोकॉन्ड्रिया कोशिकाओं के सूक्ष्म अंग होते हैं जो शरीर में मौजूद भोजन और ऑक्सीजन को जैविक ऊर्जा में बदलते हैं, जिससे कोशिकाएं जीवित रहकर अपना कार्य करती हैं। 5. माइटोकॉन्ड्रिया इंजेक्ट करने के प्रभाव कितने समय तक टिके रहे? मरीज की बाईं आंख में प्रकाश के प्रति सामान्य प्रतिक्रिया 11वें दिन तक और दाईं आंख में 39वें दिन तक बनी रही, जिसके बाद यह प्रतिक्रिया समाप्त हो गई। https://trendkia.com/health/mount-sinai-men-nyurovaijnanika-david-putrino-ka-anokha-prayoga-paira-ki-mansapeshiyon-se-maitokondriya-nikalakara-mahila-ki-ankho-22490 TrendKia — Har trend, sabse pehle.