{
  "type": "article",
  "title": "नवजात शिशुओं में पीलिया के लक्षण और खतरे: दून मेडिकल कॉलेज के डॉ. अशोक कुमार ने बताए बचाव के उपाय",
  "summary": "नवजात शिशु में जन्म के तुरंत बाद पीलिया होना आम बात है, लेकिन 24 घंटे के भीतर लक्षण दिखना गंभीर हो सकता है। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अशोक कुमार ने इसके प्रकार, केर्निकटेरस के खतरे और सही इलाज पर महत्वपूर्ण सलाह दी है।",
  "content": "नवजात शिशुओं के जन्म के तुरंत बाद शरीर या आंखों में पीलापन दिखाई देना एक बेहद आम स्वास्थ्य समस्या मानी जाती है। हालांकि इसे सामान्य समझकर अनदेखा करना बच्चे की सेहत के लिए अत्यंत हानिकारक और जानलेवा साबित हो सकता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार नवजात बच्चों में पीलिया मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित होता है, जिन्हें फिजियोलॉजिकल जॉन्डिस और पैथोलॉजिकल जॉन्डिस कहा जाता है। यदि समय रहते इसके लक्षणों की पहचान न की जाए और सही चिकित्सीय परामर्श न लिया जाए, तो शिशु के लीवर और मस्तिष्क को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है।\n\nफिजियोलॉजिकल और पैथोलॉजिकल पीलिया में मुख्य अंतर\nदेहरादून स्थित दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल के बाल रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार ने नवजात बच्चों में होने वाले पीलिया की बारीकियों पर प्रकाश डाला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जन्म के 24 घंटे के भीतर दिखाई देने वाले पीलिया को पैथोलॉजिकल जॉन्डिस की श्रेणी में रखा जाता है। यह स्थिति अत्यंत संवेदनशील होती है और किसी अंदरूनी शारीरिक बीमारी, शिशु और माता के ब्लड ग्रुप में असमानता (आरएच असंगतता) अथवा गंभीर संक्रमण के कारण उत्पन्न होती है। इस प्रकार के पीलिया में तत्काल डॉक्टरी जांच और इलाज की आवश्यकता होती है।\n\nदूसरी ओर, जन्म के 2 से 4 दिनों के भीतर उभरने वाले और 3 से 7 दिनों तक बने रहने वाले पीलिया को फिजियोलॉजिकल जॉन्डिस कहा जाता है। नवजात शिशु का लीवर जन्म के समय पूरी तरह विकसित नहीं होता है, जिसके कारण लाल रक्त कोशिकाओं के स्वाभाविक टूटने से बिलीरुबिन का निर्माण होता है। सामान्यतः यह पीलिया सही देखभाल, नियमित स्तनपान और हल्की धूप सेकने से 1-2 सप्ताह की अवधि में अपने आप ठीक हो जाता है।\n\nबिलीरुबिन का बढ़ता स्तर और 5 दिनों के भीतर चिकित्सकीय जांच\nचिकित्सकों के अनुसार अधिकतर मामलों में फिजियोलॉजिकल पीलिया स्वयं ही ठीक हो जाता है, लेकिन लगभग 40 से 50 प्रतिशत बच्चों में पीलिया का स्तर धीरे-धीरे खतरनाक सीमा तक बढ़ने लगता है। ऐसी स्थिति में चिकित्सकीय देखभाल और विशेष उपचार की सख्त जरूरत होती है। इसी जोखिम को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों ने अभिभावकों को सलाह दी है कि शिशु के जन्म के शुरुआती 5 दिनों के भीतर बाल रोग विशेषज्ञ से परीक्षण अवश्य कराएं। इससे बच्चे के शरीर में बिलीरुबिन के सटीक स्तर का सही समय पर आकलन किया जा सकता है और किसी भी अप्रिय स्थिति से बचाव संभव हो पाता है।\n\nगंभीर लक्षण और केर्निकटेरस का स्थायी खतरा\nडॉ. अशोक कुमार ने बताया कि यदि नवजात की त्वचा, चेहरे या आंखों में असामान्य रूप से गहरा पीलापन दिखे, बच्चा बहुत अधिक सुस्त महसूस हो, लगातार सोता रहे या ठीक से दूध न पी रहा हो, तो अभिभावकों को बिना किसी देरी के तुरंत अस्पताल पहुंचकर डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। जब रक्त में बिलीरुबिन का स्तर अत्यधिक बढ़ जाता है, तो यह केवल लीवर को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि रक्त तंत्र से गुजरकर बच्चे के मस्तिष्क तक पहुंच सकता है।\n\nमस्तिष्क में बिलीरुबिन के जमाव से स्थायी मानसिक और तंत्रिका संबंधी क्षति हो सकती है, जिसे चिकित्सीय भाषा में केर्निकटेरस कहा जाता है। केर्निकटेरस एक बेहद गंभीर स्थिति है जिसके कारण बच्चा जीवनभर के लिए विकलांग हो सकता है या उसकी जान को खतरा पैदा हो सकता है। इस भयावह स्थिति से बचाव के लिए सही समय पर अस्पतालों में उपलब्ध फोटोथेरेपी जैसे आधुनिक उपचार शुरू करना बेहद आवश्यक होता है।\n\nसामाजिक भ्रांतियों और झाड़-फूंक के खतरों से बचें\nनवजात शिशु के स्वास्थ्य को लेकर समाज में कई तरह के मिथक और अंधविश्वास आज भी फैले हुए हैं। डॉ. कुमार के अनुसार कुछ लोगों का यह मानना है कि नवजात शिशु को पीले रंग के कपड़े पहनाने से पीलिया की बीमारी होती है, जो वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह गलत और बेबुनियाद है। कपड़ों के रंग का पीलिया के जैविक कारणों से कोई संबंध नहीं होता है।\n\nइसके अतिरिक्त, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में कई अभिभावक बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाने के बजाय झाड़-फूंक, टोने-टोटके या देसी नुस्खों का सहारा लेते हैं। झाड़-फूंक के दौरान कभी-कभी पीलिया के लक्षण अस्थायी रूप से कम प्रतीत होते हैं, जिससे माता-पिता यह मान लेते हैं कि बच्चा स्वस्थ हो रहा है। इस गलतफहमी के कारण सही डॉक्टरी इलाज में भारी देरी हो जाती है, जिससे बच्चे के शरीर में बिलीरुबिन का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है और स्थिति जानलेवा बन जाती है। शिशु की जान बचाने और उसे स्वस्थ रखने के लिए केवल प्रमाणित चिकित्सीय परामर्श और वैज्ञानिक जानकारी ही एकमात्र सही रास्ता है।\n\nइसका आप पर असर\nयह खबर नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य प्रबंधन और समय पर डॉक्टरी सलाह लेने की अहमियत को रेखांकित करती है।\n\n• भारत में: माता-पिता को सलाह दी जाती है कि जन्म के 5 दिनों के भीतर शिशु की बिलीरुबिन जांच कराएं ताकि केर्निकटेरस जैसी दिमागी बीमारी से बचाया जा सके। अंधविश्वास और झाड़-फूंक में समय नष्ट करने से बच्चे की जान जा सकती है।\n• देहरादून/उत्तराखंड में: दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल में नवजात पीलिया की जांच और फोटोथेरेपी इलाज की सुविधा उपलब्ध है। स्थानीय अभिभावक जन्म के 24 घंटे के भीतर पीलिया दिखने पर तुरंत बाल रोग विभाग में संपर्क कर सकते हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. फिजियोलॉजिकल और पैथोलॉजिकल पीलिया में क्या अंतर है?\nफिजियोलॉजिकल पीलिया जन्म के 2 से 4 दिनों में उभरता है और 1-2 हफ्तों में ठीक हो जाता है, जबकि पैथोलॉजिकल पीलिया जन्म के पहले 24 घंटे में दिखता है और किसी बीमारी या ब्लड ग्रुप असंगतता का संकेत होता है।\n\n2. नवजात शिशु को डॉक्टर के पास कब ले जाना अनिवार्य है?\nविशेषज्ञों की सलाह है कि शिशु के जन्म के शुरुआती 5 दिनों के भीतर बिलीरुबिन स्तर की जांच के लिए बाल रोग विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए।\n\n3. केर्निकटेरस क्या है और यह क्यों होता है?\nशरीर में बिलीरुबिन का स्तर अत्यधिक बढ़ जाने पर यह मस्तिष्क तक पहुंचकर स्थायी नुकसान पहुंचाता है, जिसे केर्निकटेरस कहते हैं।\n\n4. क्या पीले कपड़े पहनाने से शिशु को पीलिया होता है?\nनहीं, यह एक सामाजिक अंधविश्वास है। कपड़ों के रंग का पीलिया की बीमारी से कोई संबंध नहीं होता।",
  "url": "https://trendkia.com/health/navajata-men-piliya-ke-lakshana-aura-khatare-doon-medical-college-ke-dr-ashok-kumar-ne-batae-bachava-ke-tarike-23686",
  "category": "स्वास्थ्य",
  "publishedAt": "2026-08-28",
  "tags": [
    "नवजात पीलिया",
    "बाल रोग",
    "दूध मेडिकल कॉलेज",
    "डॉ अशोक कुमार",
    "फिजियोलॉजिकल पीलिया",
    "पैथोलॉजिकल जॉन्डिस",
    "केर्निकटेरस",
    "शिशु स्वास्थ्य"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}