नवजात शिशुओं में पीलिया होने पर धूप दिखाने की गलती न करें, डॉक्टर ने चेताया नवजात बच्चों में पीलिया के लक्षण दिखने पर घरेलू नुस्खों और धूप के भरोसे रहने के बजाय समय पर चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है, ताकि गंभीर खतरे से बचा जा सके। जन्म के तुरंत बाद नवजात शिशुओं में पीलिया की समस्या पैदा होना एक आम बात है। अतीत में भी बच्चों को यह बीमारी होती रही है, मगर उस दौर में पर्याप्त जागरूकता और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कमी के चलते समय रहते इसकी पहचान नहीं हो पाती थी। वर्तमान समय में अस्पतालों के भीतर बेहतर नैदानिक जांच और उपचार की व्यवस्थाएं मौजूद हैं। इन्हीं आधुनिक सुविधाओं की बदौलत जन्म के चंद दिनों के भीतर ही बीमारी पकड़ में आ जाती है और फौरन इलाज शुरू कर दिया जाता है, जिससे छोटे बच्चों को किसी भी बड़ी जटिलता से सुरक्षित रखा जा सकता है। शुरुआती दिनों से लेकर महीने भर तक दिख सकते हैं लक्षण आरा सदर अस्पताल के विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ. विकास कुमार के अनुसार नवजात बच्चों में पीलिया के लक्षण दिखना काफी सामान्य प्रक्रिया है। हर बच्चे के शरीर पर इसका असर एक जैसा नहीं होता। किसी शिशु में इसका असर बेहद हल्का नजर आता है, तो किसी में यह काफी तीव्र रूप में उभर सकता है। जन्म के शुरुआती दिनों से लेकर लगभग एक महीने की अवधि तक बच्चे के शरीर में इसके लक्षणों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। चूंकि प्रत्येक बच्चे की शारीरिक स्थिति भिन्न होती है, इसलिए निरंतर डॉक्टर की देखरेख और निगरानी बनाए रखना बेहद जरूरी है। अस्पताल में नीली रोशनी से होता है सटीक उपचार शिशु में पीलिया के लक्षण नजर आने पर माता-पिता को घबराने या परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, बशर्ते बीमारी की पहचान सही समय पर कर ली जाए। अस्पतालों में इसके इलाज के लिए फोटोथेरेपी तकनीक का सहारा लिया जाता है, जिसमें बच्चे को विशेष नीली रोशनी यानी ब्लू लाइट में रखा जाता है। यह चिकित्सीय प्रक्रिया शिशु के शरीर में जमा हुए अतिरिक्त बिलीरुबिन के स्तर को तेजी से नीचे लाने में मदद करती है। विशेषज्ञ चिकित्सक बच्चे की शारीरिक जांच और रिपोर्ट देखकर यह निर्णय लेते हैं कि उसे कितनी देर या कितने दिनों तक इस रोशनी में रखने की जरूरत है। धूप दिखाने की पुरानी परंपरा पर विशेषज्ञ की दो टूक राय नवजात को पीलिया होने पर सुबह की पहली किरण या हल्की धूप में लिटाने की एक पुरानी घरेलू परंपरा समाज में चली आ रही है। डॉ. विकास कुमार ने इस भ्रांति को दूर करते हुए स्पष्ट किया कि धूप दिखाना पीलिया का कोई वैज्ञानिक या प्रमाणित उपचार बिल्कुल नहीं है। हल्की धूप से शिशु को सीमित मात्रा में केवल विटामिन-डी मिल सकता है, लेकिन रक्त में बढ़े हुए खतरनाक बिलीरुबिन को धूप के जरिए समाप्त नहीं किया जा सकता। उसके लिए केवल चिकित्सकीय पद्धति ही कारगर होती है। घरेलू नुस्खों को छोड़कर विशेषज्ञ परामर्श को प्राथमिकता दें अभिभावकों को विशेष रूप से सलाह दी गई है कि यदि नवजात की आंखों की पुतलियों या त्वचा पर पीलापन झलके, तो किसी भी पुराने नुस्खे या घरेलू उपाय में समय बर्बाद न करें। बच्चे को बिना किसी देरी के नजदीकी बाल रोग विशेषज्ञ के पास ले जाना चाहिए। वहां डॉक्टर के परामर्श के अनुसार बिलीरुबिन टेस्ट करवाकर आवश्यक दवाएं या थेरेपी शुरू की जानी चाहिए। यदि जन्म लेने के शुरुआती चौबीस घंटों के भीतर ही शिशु में पीलापन नजर आने लगे, तो यह एक गंभीर चेतावनी हो सकती है। आज स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार से इसका निदान आसान हो चुका है, इसलिए माता-पिता पुरानी मान्यताओं को छोड़कर वैज्ञानिक उपचार को अपनाएं। इसका आप पर असर यह जानकारी नए माता-पिता को अंधविश्वास छोड़कर नवजात में पीलिया का सुरक्षित और त्वरित डॉक्टरी इलाज चुनने में मदद करती है। • समय पर पहचान: शिशु की त्वचा या आंख में पीलापन दिखते ही तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए। देरी करने से बिलीरुबिन का स्तर बढ़कर नवजात की सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। • घरेलू नुस्खों पर रोक: बच्चे को सुबह की धूप दिखाने या पारंपरिक नुस्खे आजमाने से बचना चाहिए। यह पीलिया का प्रमाणित इलाज नहीं है और इससे समय नष्ट होता है। • जांच की जरूरत: जन्म के शुरुआती चौबीस घंटों में लक्षण दिखने पर तत्काल बिलीरुबिन टेस्ट कराएं। अस्पताल में उपलब्ध फोटोथेरेपी नीली रोशनी से शिशु को तुरंत राहत दिलाती है। • सदर अस्पताल आरा में: आरा सदर अस्पताल में विशेषज्ञ परामर्श और नवजात बच्चों की जांच सुविधाएं उपलब्ध हैं। स्थानीय नागरिक बिना देरी सीधे अस्पताल पहुंचकर चिकित्सकीय मदद ले सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ नवजात शिशुओं में पीलिया तब होता है जब उनके रक्त में बिलीरुबिन का स्तर बढ़ जाता है, जिसे शुरुआती दिनों में नियंत्रित करने के लिए चिकित्सकीय निगरानी आवश्यक होती है। • शारीरिक प्रक्रिया: जन्म के बाद बच्चे के शरीर में बिलीरुबिन का निर्माण और उसका स्तर घटता-बढ़ता रहता है। प्रत्येक बच्चे की शारीरिक प्रतिक्रिया अलग होती है, जिससे लक्षण हल्के या गंभीर रूप में नजर आ सकते हैं। • जांच में पूर्व की बाधाएं: पूर्व में ग्रामीण व सुदूर इलाकों में आधुनिक जांच मशीनों और बाल रोग विशेषज्ञों की अनुपलब्धता के कारण पीलिया देर से पकड़ में आता था। मौजूदा समय में जांच केंद्रों और अस्पतालों के विस्तार से यह पहचान आसान हो गई है। • धूप से इलाज न होने का कारण: सामान्य धूप में केवल थोड़ी मात्रा में विटामिन-डी प्राप्त होता है। रक्त में मौजूद अत्यधिक बिलीरुबिन को तोड़ने के लिए जिस विशिष्ट नीली रोशनी की आवश्यकता होती है, वह केवल फोटोथेरेपी मशीनों से ही संभव है। सवाल-जवाब 1. क्या नवजात शिशु को धूप दिखाने से पीलिया पूरी तरह ठीक हो सकता है? नहीं, विशेषज्ञ के अनुसार धूप दिखाना पीलिया का प्रमाणित उपचार नहीं है। इससे केवल विटामिन-डी मिल सकता है, बिलीरुबिन कम करने के लिए चिकित्सकीय इलाज ही आवश्यक है। 2. अस्पतालों में नवजात के पीलिया का इलाज किस प्रकार किया जाता है? अस्पतालों में फोटोथेरेपी तकनीक के जरिए विशेष नीली रोशनी (ब्लू लाइट) में रखकर बच्चे के शरीर में बढ़े बिलीरुबिन को घटाया जाता है। 3. जन्म के कितने दिनों तक नवजात में पीलिया के लक्षण बने रह सकते हैं? जन्म के शुरुआती दिनों से लेकर लगभग एक महीने की अवधि तक बच्चे के शरीर में पीलिया के लक्षणों में उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है। 4. शिशु में पीलिया का कौन सा लक्षण सबसे अधिक चिंताजनक माना जाता है? यदि जन्म लेने के शुरुआती चौबीस घंटों के भीतर ही बच्चे की त्वचा या आंखों में पीलापन दिखने लगे, तो इसे गंभीर संकेत मानकर तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए। https://trendkia.com/health/navajata-shishuon-men-piliya-hone-para-dhupa-dikhane-ki-galati-na-karen-doktara-ne-chetaya-56907 TrendKia — Har trend, sabse pehle.