{
  "type": "article",
  "title": "पैकेज्ड फूड पर साफ चेतावनी छापे FSSAI, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को दो हफ्ते की दी मोहलत",
  "summary": "सुप्रीम कोर्ट ने पैकेज्ड फूड पर पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी लेबल लगाने के मामले में FSSAI और केंद्र सरकार को दो हफ्ते का अल्टीमेटम दिया है। पीठ ने कहा कि बच्चों और नागरिकों के स्वास्थ्य को कॉर्पोरेट दबाव से ऊपर रखा जाना चाहिए।",
  "content": "सुप्रीम कोर्ट ने पैकेज्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स पर 'फ्रंट-ऑफ-पैक वॉर्निंग लेबल' (पैकेट के सामने चेतावनी वाले लेबल) लागू करने के मामले में केंद्र सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) को कड़ी फटकार लगाई है। शीर्ष अदालत ने सरकार को इस नीति पर अंतिम फैसला लेने के लिए दो हफ्ते का आखिरी मौका दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि आम नागरिकों और खासकर बच्चों की सेहत से जुड़े इस गंभीर मुद्दे पर कॉर्पोरेट कंपनियों का दबाव या नियामक की ढिलाई कतई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।\n\nअदालत की दो हफ़्ते की समय-सीमा और सख्त हिदायत\nजस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 13 अगस्त को हुई सुनवाई के दौरान खाद्य नियामक FSSAI के रवैये पर गहरी नाराजगी जताई। बेंच ने केंद्र सरकार को अपना अंतिम फैसला रिकॉर्ड पर रखने के लिए चौदह दिन का समय दिया। शीर्ष अदालत ने चेतावनी दी कि अगर सरकार इस तय समय के भीतर ठोस कदम उठाने में नाकाम रहती है, तो न्यायपालिका खुद आगे आकर जरूरी दिशानिर्देश और आदेश जारी करेगी।\n\nफ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग (FOPL) का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बिस्किट, नमकीन, ब्रेकफास्ट सीरियल और बच्चों के स्नैक्स का पैकेट उठाते ही ग्राहक को तुरंत पता चल जाए कि उसमें कितनी चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट मौजूद है। इसके लागू होने से खरीदारों को पैकेट के पीछे छोटे अक्षरों में छपी पोषण तालिका को पढ़ने और उसका मतलब निकालने की मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। पैकेट के सामने लगा साफ चेतावनी का प्रतीक सीधे बता देगा कि उत्पाद स्वास्थ्य के लिए कितना खतरनाक हो सकता है।\n\nFSSAI का हलफनामा और सुप्रीम कोर्ट का रुख\nइससे पहले फरवरी महीने में भी सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI को निर्देश दिया था कि वह अत्यधिक चीनी (High Sugar), अत्यधिक सोडियम (High Sodium) और अत्यधिक सैचुरेटेड फैट (High Saturated Fat) वाले उत्पादों पर स्पष्ट चेतावनी चिन्ह लगाने पर विचार करे। कोर्ट ने साफ कर दिया था कि उसका आदेश केवल एक सुझाव नहीं, बल्कि एक अनिवार्य निर्देश था।\n\nहालांकि, 3 अगस्त को FSSAI द्वारा दायर किए गए अनुपालन हलफनामे में एक अलग ही तस्वीर सामने आई। नियामक ने सीधे चेतावनी देने के बजाय पोषण तत्वों की मात्रा के साथ दैनिक अनुशंसित सीमा (recommended daily limits) प्रदर्शित करने का प्रस्ताव रखा। इसके तहत 25 ग्राम चीनी, 10 ग्राम सैचुरेटेड फैट और 5 ग्राम नमक की दैनिक सीमा दिखाने की बात कही गई। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि पैकेट पर कोई स्पष्ट चेतावनी नहीं होगी, बल्कि केवल आंकड़े दिए जाएंगे जिन्हें समझने का जोखिम और जिम्मेदारी पूरी तरह उपभोक्ता पर ही छोड़ दी जाएगी।\n\nसुप्रीम कोर्ट ने इसी प्रस्ताव पर सबसे ज्यादा आपत्ति जताई। पीठ ने सवाल किया कि FSSAI साफ और सीधे चेतावनी वाले सिस्टम को अपनाने से क्यों कतरा रहा है। अदालत ने आशंका व्यक्त की कि नियामक के फैसलों पर खाद्य उद्योग की लॉबी का असर पड़ रहा है, जबकि प्राथमिकता नागरिकों के स्वास्थ्य को दी जानी चाहिए।\n\nउद्योग के दबाव, एमएसएमई और पारंपरिक खाद्य पदार्थों पर बहस\nसुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार से तीखे सवाल पूछे कि क्या वह बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों के दबाव में काम कर रही है। पीठ ने कहा कि निर्माताओं को चेतावनी वाले लेबल पसंद न आए हों, लेकिन उपभोक्ताओं को यह जानने का पूरा अधिकार है कि वे क्या खा रहे हैं। जब केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल बृजेंद्र चाहर ने तर्क दिया कि अंतरराष्ट्रीय मानकों को लागू करने से भारतीय नमकीन और पारंपरिक व्यंजनों पर असर पड़ सकता है, तो अदालत ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी।\n\nसरकारी पक्ष का कहना था कि दो अंडों में लगभग 11 ग्राम फैट होता है, जबकि दैनिक सीमा 10 ग्राम प्रस्तावित है, जिससे सामान्य चीजें भी चेतावनी के दायरे में आ सकती हैं। इसके अलावा, भारत में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) की लगभग एक-तिहाई कमाई पारंपरिक खाद्य पदार्थों से होती है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय पोषण पैमानों को सीधे लागू करना जटिल हो सकता है।\n\nअदालत ने इन तर्कों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि चेतावनी लेबल का मकसद किसी उत्पाद की बिक्री रोकना या प्रतिबंध लगाना नहीं है, बल्कि उपभोक्ता को जागरूक बनाना है। पीठ ने भारत को अविकसित बनाए रखने की मानसिकता पर सवाल उठाया और समाज के अलग-अलग वर्गों के खान-पान पर टिप्पणी करते हुए पूछा कि कितने लोग मेवे खरीद सकते हैं और कितने बच्चे कुरकुरे जैसे स्नैक्स खाते हैं।\n\nस्टार रेटिंग बनाम स्पष्ट चेतावनी: अध्ययन के चौंकाने वाले आंकड़े\nयह पूरा कानूनी मामला अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड और खान-पान से होने वाली बीमारियों जैसे मधुमेह, मोटापा और हृदय रोगों के बढ़ते मामलों के बीच चल रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि पैकेट के पीछे बनी बारीक टेबल आम उपभोक्ता को तुरंत निर्णय लेने में मदद नहीं करती।\n\nसुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि सामने चेतावनी वाले लेबल देखने पर 60.8 प्रतिशत लोगों ने अत्यधिक पोषक तत्वों वाले हानिकारक उत्पादों की सही पहचान की। इसकी तुलना में केवल 55 प्रतिशत लोग ही बारीक न्यूमेरिकल टेबल से सही जानकारी समझ पाए, जबकि स्टार-रेटिंग सिस्टम का उपयोग करने पर मात्र 45 प्रतिशत लोग ही सही पहचान कर सके।\n\nइससे पहले FSSAI ने 'इंडियन न्यूट्रिशन रेटिंग' का सुझाव दिया था, जिसमें प्रोडक्ट्स को आधा स्टार से पांच स्टार तक रेटिंग देने की बात थी। लेकिन आलोचकों ने इसे \"हेल्थ हेलो\" (स्वास्थ्य का भ्रम) पैदा करने वाला बताया था, क्योंकि अत्यधिक चीनी या नमक वाले नुकसानदेह उत्पाद भी कुछ अन्य घटकों के बल पर ज्यादा स्टार हासिल कर भ्रम फैला सकते थे।\n\nइसका आप पर असर\nउपभोक्ताओं और अभिभावकों के लिए:\n\n• खरीदारी में स्पष्टता: पैकेट के सामने चेतावनी मिलने से आप मिनटों में समझ सकेंगे कि बच्चे के लिए खरीदा जाने वाला स्नैक कितना सेहतमंद है।\n• स्वास्थ्य संबंधी फैसले: मधुमेह, मोटापा और ब्लड प्रेशर के मरीज अपने खान-पान में चीनी, नमक और वसा की मात्रा को आसानी से नियंत्रित कर सकेंगे।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सुप्रीम कोर्ट ने पैकेज्ड फूड लेबलिंग पर क्या आदेश दिया है?\nसुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और FSSAI को दो हफ्ते का समय दिया है ताकि वे अधिक चीनी, नमक और वसा वाले पैकेज्ड फूड पर पैकेट के सामने चेतावनी लेबल लगाने का अंतिम फैसला रिकॉर्ड पर रख सकें।\n\n2. FSSAI के हलफनामे में पोषक तत्वों की क्या सीमाएं प्रस्तावित की गई थीं?\nFSSAI ने पैकेट पर 25 ग्राम चीनी, 10 ग्राम सैचुरेटेड फैट और 5 ग्राम नमक की दैनिक सीमा के साथ प्रति सर्विंग पोषण की मात्रा प्रदर्शित करने का सुझाव दिया था।\n\n3. सुप्रीम कोर्ट ने केवल आंकड़े दिखाने के FSSAI के प्रस्ताव पर क्या आपत्ति जताई?\nकोर्ट ने कहा कि केवल आंकड़े देने से हिसाब लगाने की जिम्मेदारी ग्राहक पर आ जाती है, जबकि सीधे चेतावनी वाले निशान से खरीदार को तुरंत सही जानकारी मिल जाती है।\n\n4. स्टार-रेटिंग सिस्टम की तुलना में चेतावनी लेबल कितने प्रभावी पाए गए?\nकोर्ट में पेश एक अध्ययन के अनुसार 60.8 प्रतिशत लोगों ने चेतावनी लेबल से नुकसानदेह पोषक तत्वों की सही पहचान की, जबकि स्टार-रेटिंग से केवल 45 प्रतिशत लोग ही समझ पाए।\n\n5. सरकार ने पारंपरिक भारतीय खाद्य पदार्थों के संबंध में क्या चिंता जताई?\nसरकार का कहना था कि कड़े मानक लागू करने से नमकीन जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों और एमएसएमई क्षेत्र पर असर पड़ सकता है, जो अपनी एक-तिहाई कमाई पारंपरिक खान-पान से हासिल करता है।",
  "url": "https://trendkia.com/health/package-food-par-saaf-chetawani-chhape-fssai-supreme-court-ne-kendra-sarkar-ko-do-hafte-ki-di-mohalat-17603",
  "category": "स्वास्थ्य",
  "publishedAt": "2026-08-17",
  "tags": [
    "सुप्रीम कोर्ट",
    "एफएसएसएआई",
    "पैकेज्ड फूड",
    "फूड लेबलिंग",
    "स्वास्थ्य नीति",
    "अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}