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  "type": "article",
  "title": "पहाड़ी शैली में घर पर तैयार करें पौष्टिक सतरंगी आटा, जानिए सही अनुपात और बनाने का पारंपरिक तरीका",
  "summary": "गेहूं के साथ मंडुवा, जौ, ओगल, मक्का और काले भट्ट को मिलाकर घर पर ही पारंपरिक पहाड़ी मल्टीग्रेन आटा तैयार किया जा सकता है। यह मिश्रण रोटियों के स्वाद को बढ़ाने के साथ भरपूर पोषण भी देता है।",
  "content": "पर्वतीय क्षेत्रों की पारंपरिक खान-पान संस्कृति हमेशा से खेतों और प्रकृति के बेहद करीब रही है। पुराने समय में रसोइयों में केवल एक ही अनाज का उपयोग करने के बजाय विभिन्न स्थानीय अनाजों और दालों का मेल बनाकर आटा तैयार किया जाता था। इस पारंपरिक पद्धति से बनने वाले नौरंगी अथवा सतरंगी आटे की लोकप्रियता पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी वैसी ही बनी हुई है। साधारण गेहूं में मंडुवा, जौ, ओगल, भट्ट और मक्का को शामिल करके तैयार किए जाने वाले इस आटे से न सिर्फ रोटियों का स्वाद बदल जाता है, बल्कि भोजन में कई जरूरी पोषक तत्व भी प्राकृतिक रूप से जुड़ जाते हैं।\n\nमल्टीग्रेन मिश्रण के लिए जरूरी सामग्री और सही माप\nपहाड़ी परंपरा की स्थानीय जानकार संतोषी देवी के अनुसार, इस खास आटे की मूल ताकत इसमें प्रयुक्त होने वाले अनाजों और दलहनों का संतुलित संयोजन है। यदि आप घरेलू स्तर पर लगभग 5 किलो की मात्रा में पहाड़ी शैली का यह मल्टीग्रेन आटा तैयार करना चाहते हैं, तो इसके लिए एक सटीक अनुपात का पालन करना चाहिए। इस पूरे मिश्रण में 2.5 किलो साधारण गेहूं आधार का काम करता है। इसके साथ 1 किलो मंडुवा मिलाया जाता है। इसके अतिरिक्त 500 ग्राम ओगल या फापर, 500 ग्राम जौ, 250 ग्राम काला भट्ट अथवा सोयाबीन और 250 ग्राम मक्का शामिल करने की सलाह दी जाती है। इस तय मात्रा से आटे का पोषण और बनावट दोनों एकदम संतुलित रहते हैं।\n\nअनाजों के पोषक गुण और रोटियों की बनावट\nइस मिश्रण में शामिल हर एक अनाज का अपना अलग महत्व और कार्य है। गेहूं की मौजूदगी आटे में स्वाभाविक खिंचाव और लोच पैदा करती है, जो पूरे मिश्रण को आपस में बांधकर रखती है और रोटियां बेलने में कोई परेशानी नहीं आने देती। मंडुवा, जिसे कई स्थानों पर रागी के नाम से भी पहचाना जाता है, पहाड़ी खान-पान का मुख्य हिस्सा है और यह शरीर को प्रचुर मात्रा में फाइबर और कैल्शियम प्रदान करता है। वहीं जौ को भी पाचन के अनुकूल फाइबर का बेहतरीन जरिया माना जाता है। मिश्रण में डाला जाने वाला ओगल या फापर आटे के मूल स्वाद को एक नया रूप और अनोखी विविधता देता है। प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिए काले भट्ट और सोयाबीन की भूमिका अहम होती है, जबकि मक्का आटे के स्वाद में हल्कापन और अलग सौंधापन घोलने का काम करता है।\n\nअनाज की सफाई और सुखाने की जरूरी प्रक्रिया\nघर पर यह पौष्टिक आटा तैयार करने की शुरुआत अनाजों और दालों की बारीक सफाई से होती है। सभी सामग्रियों को अच्छी तरह देखकर उनमें मौजूद कंकड़, धूल, मिट्टी और अन्य अनावश्यक अशुद्धियों को पूरी तरह बाहर कर देना चाहिए। इसके उपरांत सभी दानों को साफ पानी से धोना जरूरी होता है। धोने के बाद इन्हें तेज धूप में फैलाकर पूरी तरह सुखाया जाता है। इस चरण में सबसे अधिक सावधानी नमी को लेकर रखनी होती है। यदि दानों में जरा भी सीलन या गीलापन बाकी रह गया, तो पिसाई के बाद तैयार आटा बहुत जल्दी खराब होने या उसमें फफूंद लगने का खतरा बना रहता है।\n\nभूनने और पिसाई से जुड़ी सावधानियां\nसफाई और पूरी तरह सूखने के बाद काले भट्ट को लेकर एक खास प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। इसे तवे या कढ़ाई में हल्का सा भूना जा सकता है। हल्का भूनने से भट्ट का स्वाद निखर जाता है और आटे में एक बेहतरीन प्राकृतिक खुशबू आने लगती है, हालांकि इसे जरूरत से ज्यादा तेज आंच पर कभी नहीं भूनना चाहिए। इसके बाद सभी साफ और सूखे अनाजों को मिलाकर या अलग-अलग पारंपरिक घराट यानी पनचक्की में या फिर सामान्य आटा चक्की में ले जाकर पिसवाया जा सकता है। जो लोग महीन रोटियां पसंद करते हैं, वे पिसने के बाद इसे बारीक छलनी से छान सकते हैं। वहीं जो लोग चोकरयुक्त या थोड़ा दरदरा और मोटा आटा खाना पसंद करते हैं, वे इसे बिना अधिक छाने सीधे उपयोग में ला सकते हैं।\n\nभंडारण के नियम और उपयोग के पारंपरिक विकल्प\nतैयार आटे की ताजगी बनाए रखने के लिए उसका सही भंडारण बेहद महत्वपूर्ण है। इसे सदैव एक साफ, सूखे और पूरी तरह एयरटाइट डिब्बे में बंद करके रखना चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि भंडारण का स्थान नमी से मुक्त हो, वहां सीधी धूप न पड़ती हो और कीड़े-मकोड़ों की पहुंच से वह सुरक्षित रहे। उचित रखरखाव करने पर आटे की गुणवत्ता और उसके पोषक तत्व काफी लंबे समय तक सुरक्षित बने रहते हैं। इस आटे का इस्तेमाल केवल रोजमर्रा की रोटियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे बेहद स्वादिष्ट पराठे, पौष्टिक हलवा और कई पारंपरिक पहाड़ी पकवान भी तैयार किए जा सकते हैं। हालांकि, अपनी नियमित खुराक में किसी भी नए अनाज को शामिल करते समय अपनी आयु, शारीरिक स्थिति और व्यक्तिगत जरूरतों को ध्यान में रखना आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति को किसी खास खाद्य पदार्थ से एलर्जी हो या कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या हो, तो खान-पान में ऐसा बदलाव करने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना ही सबसे उचित कदम होता है।\n\nइसका आप पर असर\nघर पर पारंपरिक पहाड़ी मल्टीग्रेन आटा तैयार करके आप अपनी दैनिक थाली में बिना अतिरिक्त खर्च के आवश्यक फाइबर, कैल्शियम और प्राकृतिक प्रोटीन जोड़ सकते हैं।\n\n• दैनिक पोषण में सुधार: गेहूं के साथ पांच अन्य अनाजों का यह मिश्रण साधारण रोटी की तुलना में कहीं अधिक फाइबर और प्रोटीन देता है। नियमित रूप से इसका सेवन पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने और शरीर को जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व पहुंचाने में मदद करता है।\n• पैकेटबंद आटे के खर्च से बचत: बाजार में मिलने वाले महंगे प्रोसेस्ड मल्टीग्रेन पैकेटों की जगह घर पर कच्चा अनाज खरीदकर इसे तैयार किया जा सकता है। इससे लागत कम आती है और अनाज की शुद्धता व गुणवत्ता पर आपका सीधा नियंत्रण रहता है।\n• रसोई की तैयारी और समय: अनाज को धोने, धूप में सुखाने और पिसवाने की पूरी प्रक्रिया में एक से दो दिन का समय लग सकता है। इसे पहले से अच्छी तरह सुखाकर रखने पर कई हफ्तों तक खराब होने की चिंता नहीं रहती।\n• आहार में बदलाव से पहले सावधानी: यदि परिवार में किसी को पेट की संवेदनशीलता या किसी खास अनाज से एलर्जी है, तो धीरे-धीरे इसे आहार में शामिल करना चाहिए। किसी भी पुरानी बीमारी में इसका नियमित सेवन शुरू करने से पहले चिकित्सक या आहार विशेषज्ञ की राय लेना सुरक्षित रहता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nपहाड़ी क्षेत्रों में भौगोलिक परिस्थितियों और कठोर मौसम के कारण लंबे समय तक ऊर्जा देने वाले और स्थानीय खेतों में उगने वाले अनाजों को मिलाकर आटा तैयार करने की परंपरा विकसित हुई।\n\n• कठिन जलवायु और ऊर्जा की जरूरत: पर्वतीय भूभाग में शारीरिक श्रम अधिक होता है और मौसम ठंडा रहता है, जिसके चलते केवल गेहूं पर्याप्त पोषण नहीं दे पाता था। विभिन्न अनाजों और दालों का मिश्रण शरीर को आवश्यक गर्मी, सहनशक्ति और संपूर्ण पोषण देने के लिए तैयार किया जाने लगा।\n• स्थानीय फसलों की उपलब्धता: पहाड़ों में मंडुवा, जौ, ओगल, मक्का और भट्ट जैसी फसलें सीढ़ीदार खेतों में आसानी से पैदा होती हैं। खेतों की इस प्राकृतिक उपज का पूरा लाभ उठाने के लिए रसोई में इन्हें एक साथ मिलाकर पीसने का चलन शुरू हुआ।\n• रोटी बांधने की व्यावहारिक तकनीक: मंडुवा, ओगल या मक्के के आटे में स्वाभाविक लचक कम होती है, जिससे अकेले इनकी रोटियां बनाना कठिन होता है। गेहूं की अधिक मात्रा मिलाकर पीसने से आटे में जरूरी लोच आ जाती है और रोटियां टूटे बिना आसानी से बन जाती हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. 5 किलो पहाड़ी मल्टीग्रेन आटा बनाने के लिए क्या सामग्री और मात्रा चाहिए?\nइसके लिए 2.5 किलो गेहूं, 1 किलो मंडुवा, 500 ग्राम जौ, 500 ग्राम ओगल या फापर, 250 ग्राम मक्का और 250 ग्राम काला भट्ट या सोयाबीन की आवश्यकता होती है।\n\n2. मिश्रण में गेहूं का अनुपात सबसे ज्यादा क्यों रखा जाता है?\nगेहूं आटे को आपस में बांधने और लोच देने का काम करता है, जिससे रोटियां बेलते समय टूटती नहीं हैं और आसानी से बन जाती हैं।\n\n3. अनाजों को धोने के बाद धूप में पूरी तरह सुखाना क्यों जरूरी है?\nयदि अनाज के दानों में जरा भी नमी रह जाएगी तो पिसाई के बाद आटा बहुत जल्दी खराब हो जाएगा और उसमें फफूंद या कीड़े लग सकते हैं।\n\n4. काले भट्ट को आटे में शामिल करने से पहले भूनना क्यों चाहिए?\nकाले भट्ट को हल्का सा भूनने से उसका स्वाद निखर जाता है और आटे में अच्छी खुशबू आती है, हालांकि इसे ज्यादा तेज नहीं भूनना चाहिए।\n\n5. तैयार मल्टीग्रेन आटे को लंबे समय तक सुरक्षित कैसे रखें?\nआटे को हमेशा साफ, सूखे और पूरी तरह एयरटाइट डिब्बे में रखना चाहिए तथा इसे नमी, सीधी धूप और कीड़ों से दूर रखना चाहिए।\n\n6. क्या इस आटे से रोटी के अलावा अन्य चीजें भी बनाई जा सकती हैं?\nहां, इस पहाड़ी आटे से साधारण रोटियों के अलावा स्वादिष्ट पराठे, हलवा और पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन भी बनाए जा सकते हैं।",
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  "category": "स्वास्थ्य",
  "publishedAt": "2026-10-01",
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