# पटाखों के जहरीले धुएं से फेफड़ों को कैसे बचाएं, अमृता अस्पताल के विशेषज्ञ ने साझा की जरूरी सलाह

> दिवाली पर पटाखों से उठने वाला सघन धुआं सांस की नलियों और फेफड़ों को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। अमृता अस्पताल फरीदाबाद के सीनियर कंसल्टेंट ने बच्चों, बुजुर्गों और सांस के मरीजों के लिए जरूरी सुरक्षा उपाय बताए हैं।

**Type:** article · **Category:** स्वास्थ्य · **Published:** 2026-11-05 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/health/patakhon-ke-jaharile-dhuen-se-phepharon-ko-kaise-bachaen-amrita-hospital-ke-visheshajna-ne-sajha-ki-jaruri-salaha-56784 · **Language:** Hindi
**Tags:** अमृता अस्पताल फरीदाबाद, डॉक्टर सौरव आहूजा, फेफड़ों की सेहत, दिवाली प्रदूषण, अस्थमा और सीओपीडी, पटाखों का धुआं, एयर प्यूरीफायर, रेस्पिरेटरी केयर

त्योहारों के दौरान आतिशबाजी से फैलने वाला धुआं आंखों में चुभन और सांस फूलने तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह इंसानी फेफड़ों की कार्यक्षमता को भी गहरी चोट पहुंचाता है। कम उम्र के बच्चों, उम्रदराज लोगों और पहले से श्वसन विकारों से जूझ रहे मरीजों के लिए यह जहरीला माहौल बेहद संकटपूर्ण बन जाता है। वातावरण में मौजूद धुएं के फेफड़ों की गहराई तक उतरने से तेज खांसी, सीने में बलगम का जमाव और सांस लेने में भारी तकलीफ पैदा होने लगती है। ऐसे संवेदनशील वक्त में श्वसन तंत्र की हिफाजत के सही तौर-तरीकों को लेकर अमृता अस्पताल फरीदाबाद में पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के सीनियर कंसल्टेंट डॉक्टर सौरव आहूजा ने महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं।

## श्वसन तंत्र पर पटाखों के धुएं का सीधा प्रहार
आतिशबाजी से निकलने वाले रासायनिक धुएं के संपर्क में आते ही सांस की नलियां बुरी तरह प्रभावित होने लगती हैं। डॉक्टर सौरव आहूजा के मुताबिक पटाखों के जलने से भारी तादाद में बारीक कण और हानिकारक धुआं हवा में घुलता है। जब कोई व्यक्ति इस दूषित हवा को सांस के जरिए भीतर खींचता है, तो श्वास नलिकाओं की भीतरी परत में तेज जलन और सूजन पैदा हो जाती है। इसके फौरन बाद खांसी के लगातार दौरे, कफ बनने और सीने में भारीपन के साथ सांस लेने में रुकावट महसूस होने लगती है। इस नुकसान की गंभीरता इस तथ्य पर टिकी होती है कि किसी व्यक्ति ने कितनी मात्रा में और कितनी देर तक इस धुएं को अपने शरीर के भीतर खींचा है। अगर कोई व्यक्ति आतिशबाजी जलने की जगह के एकदम करीब खड़ा होकर सांस ले रहा है, तो उसके फेफड़ों में तत्काल गंभीर दिक्कतें भड़कने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

## बढ़ते बच्चों के कोमल फेफड़ों पर गहरा दुष्प्रभाव
शिशुओं और बढ़ते बच्चों के नाजुक फेफड़ों पर प्रदूषण का असर कहीं अधिक विनाशकारी साबित होता है। डॉक्टर सौरव बताते हैं कि मौजूदा दौर की नई पीढ़ी लगातार खराब होती आबोहवा के बीच बड़ी हो रही है। यही प्रमुख वजह है कि बहुत छोटी उम्र में ही बच्चों में दमा, सांस फूलने की शिकायत और बार-बार निमोनिया के संक्रमण आम देखने को मिल रहे हैं। रोशनी के इस त्योहार के दौरान अचानक वायु प्रदूषण का स्तर सामान्य से कई गुना ऊपर छलांग लगा देता है। ऐसी स्थिति में यदि नन्हे बच्चे पटाखों का सघन धुआं सांस में भर लेते हैं, तो उसका कुप्रभाव केवल उसी खास रात तक महदूद नहीं रहता। यह जहरीला धुआं उनके विकसित हो रहे फेफड़ों की सामान्य वृद्धि प्रक्रिया को हमेशा के लिए प्रभावित कर सकता है। इसी खतरे को देखते हुए परिजनों को चाहिए कि वे अपने छोटे बच्चों को पटाखों के धुएं से पूरी तरह बचाकर रखें।

## बुजुर्गों और सांस के पुराने मरीजों के लिए पैदा होता जोखिम
उम्रदराज नागरिकों और क्रॉनिक बीमारियों के शिकार मरीजों की सेहत इस मौसमी प्रदूषण से सबसे पहले लड़खड़ाती है। डॉक्टर सौरव रेखांकित करते हैं कि जिन बुजुर्गों की शारीरिक क्षमता और फेफड़े पहले से कमजोर पड़ चुके हैं, अथवा जो मरीज अस्थमा और सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) जैसी तकलीफों का सामना कर रहे हैं, उनके लिए यह दूषित वातावरण किसी आघात से कम नहीं होता। अत्यधिक धुआं इन पुरानी बीमारियों को एकदम से भड़का देने का सबसे बड़ा कारण बनता है। दवाओं के जरिए काबू में चल रहा अस्थमा या सीओपीडी भी धुएं के संपर्क में आते ही अचानक बेकाबू हो जाता है। स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि कई मरीजों को त्योहार के अगले ही दिन अस्पताल की ओपीडी में कतार लगानी पड़ती है, जबकि कई नाजुक मामलों में मरीजों को एक से दो दिन के भीतर सीधे इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराने की नौबत आ जाती है।

## घर के भीतर की हवा को साफ रखने के ठोस उपाय
बाहरी जहरीली हवा से बचने के लिए घरेलू वातावरण को सुरक्षित बनाना बेहद आवश्यक है। डॉक्टर सौरव सुझाव देते हैं कि आतिशबाजी वाली रात में घर के सभी दरवाजों और खिड़कियों को पूरी तरह बंद रखना चाहिए ताकि धुआं कमरों में न भर पाए। इसके बावजूद यदि कमरों के भीतर धुएं की गंध या परत महसूस होती है, तो हवा को शुद्ध करने वाले एयर प्यूरीफायर का सहारा लिया जा सकता है। घर के अंदर प्राकृतिक हवा सुधारने वाले इंडोर पौधे लगाना भी काफी असरदार और सेहतमंद कदम माना जाता है। यदि किसी कमरे में अचानक काफी धुआं जमा हो जाए, तो कुछ समय के लिए एग्जॉस्ट फैन चालू करके उसे बाहर फेंक देना चाहिए। इसके अलावा, जब तक घर के भीतर या आसपास वातावरण में धुएं का असर महसूस हो, तब तक चेहरे पर अच्छी गुणवत्ता का मास्क पहनकर रखना चाहिए, खासकर उन घंटों के दौरान जब बाहर लगातार भारी संख्या में पटाखे जलाए जा रहे हों।

## इसका आप पर असर
त्योहार पर पटाखों का धुआं फेफड़ों की कार्यक्षमता और श्वसन स्वास्थ्य को सीधे प्रभावित करता है, जिससे बच्चों और बुजुर्गों में सांस की तकलीफ बढ़ सकती है।

- **राष्ट्रीय स्तर पर:** त्योहारों के दौरान वायु गुणवत्ता सूचकांक गिरने से देश भर के संवेदनशील नागरिकों में सांस की बीमारियां उभर सकती हैं। सभी को खिड़कियां बंद रखने और जरूरत पड़ने पर एयर प्यूरीफायर या मास्क का सहारा लेना चाहिए।
- **फरीदाबाद और आसपास:** औद्योगिक और घनी आबादी वाले इस क्षेत्र में पटाखों का धुआं हवा को तुरंत जहरीला बना सकता है। स्थानीय निवासियों को दिवाली की रात बच्चों को बाहर जाने से रोकना चाहिए और बुजुर्गों के लिए आपातकालीन दवाएं तैयार रखनी चाहिए।
- **बच्चों की सुरक्षा:** विकासशील फेफड़ों वाले बच्चों को आतिशबाजी के धुएं से पूरी तरह बचाना जरूरी है। माता-पिता उन्हें पटाखों के नजदीक खड़े होने से रोकें ताकि फेफड़ों के विकास पर स्थायी रुकावट न आए।
- **मरीजों के लिए सतर्कता:** अस्थमा और सीओपीडी के मरीजों का नियंत्रित रोग अचानक बिगड़ सकता है। मरीजों को अपने इनहेलर पास रखने चाहिए और सांस फूलने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
- **घरेलू हवा का प्रबंधन:** घर के भीतर धुआं रिसने पर एग्जॉस्ट चलाकर उसे निकालना और कमरे में पौधे रखना असरदार रहता है। चरम आतिशबाजी के घंटों में मास्क पहनकर इनहेलेशन के जोखिम को घटाया जा सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
त्योहार की रात हवा में आतिशबाजी के रासायनिक अवशेषों और बारीक धुएं की सघनता अचानक कई गुना बढ़ जाती है, जिससे श्वास तंत्र पर भारी दबाव पड़ता है।

- **पटाखों का रासायनिक धुआं:** पटाखों में मौजूद बारूद और रसायनों के जलने से हवा में अत्यंत महीन धुएं के कण और गैसें तैरने लगती हैं। यह प्रदूषक तत्व सांस के जरिए फेफड़ों की अंदरूनी नलियों तक पहुंचकर तेज सूजन और जलन उत्पन्न करते हैं।
- **कमजोर फेफड़ों की संवेदनशीलता:** बुजुर्गों और दमा या सीओपीडी से पीड़ित व्यक्तियों का श्वसन तंत्र प्रदूषण के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है। इस धुएं के संपर्क में आते ही संकुचित सांस नलियां पूरी तरह अवरुद्ध होने लगती हैं, जिससे इमरजेंसी की नौबत आती है।
- **सीधे संपर्क का प्रभाव:** आतिशबाजी के पास खड़े होकर सांस लेने से प्रदूषक तत्वों की अत्यधिक सांद्रता सीधे शरीर में उतरती है। जितनी ज्यादा मात्रा में व्यक्ति इस धुएं को भीतर खींचता है, खांसी और सीने में बलगम का जमाव उतना ही विकराल हो जाता है।

## सवाल-जवाब

### 1. पटाखों का धुआं फेफड़ों को किस तरह नुकसान पहुंचाता है?
पटाखों से निकलने वाला धुआं सांस नलियों में पहुंचकर जलन और सूजन पैदा करता है, जिससे खांसी, बलगम और सांस फूलने की समस्या होने लगती है।

### 2. दिवाली का प्रदूषण बच्चों के लिए अधिक खतरनाक क्यों माना गया है?
बच्चों के फेफड़े अभी विकसित हो रहे होते हैं, इसलिए अत्यधिक धुआं उनकी सामान्य शारीरिक वृद्धि और फेफड़ों के विकास पर स्थायी बुरा असर डाल सकता है।

### 3. अस्थमा और सीओपीडी के मरीजों को इस धुएं से क्या जोखिम है?
धुएं के संपर्क में आने से नियंत्रित अस्थमा या सीओपीडी भी अचानक बिगड़ सकता है, जिसके चलते मरीजों को ओपीडी या इमरजेंसी में भर्ती होना पड़ता है।

### 4. कमरे के भीतर धुआं जमा होने पर क्या करना चाहिए?
कमरे में धुआं जमा होने पर थोड़ी देर के लिए एग्जॉस्ट फैन चलाकर उसे बाहर निकालना चाहिए और जब तक धुआं रहे तब तक मास्क पहनना चाहिए।

### 5. घर के अंदर की हवा को साफ रखने के लिए डॉक्टर ने क्या सुझाव दिए हैं?
खिड़कियां-दरवाजे बंद रखने, एयर प्यूरीफायर चलाने और घर में इंडोर पौधे लगाने की सलाह दी गई है।

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