फिलीपींस के जुड़वां बच्चों के लिए फरिश्ते बने दिल्ली अपोलो के डॉक्टर, ₹25 लाख में हुआ ऐतिहासिक लिवर ट्रांसप्लांट दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के डॉक्टरों ने फिलीपींस के 23 महीने के जुड़वां भाइयों की जटिल लिवर सर्जरी कर उन्हें नई जिंदगी दी है। अस्पताल के इतिहास में यह पहली बार है जब एक साथ जुड़वां बच्चों का लिवर ट्रांसप्लांट सफल हुआ है। नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में एक बेहद जटिल और दुर्लभ चिकित्सा प्रक्रिया को अंजाम देते हुए डॉक्टरों ने फिलीपींस के दो मासूम जुड़वां बच्चों की जान बचा ली है। 23 महीने के इन भाइयों, टायलर और केली, का सफल लिवर ट्रांसप्लांट न केवल उनके परिवार के लिए एक बड़ी राहत है, बल्कि यह चिकित्सा जगत में भी एक मील का पत्थर माना जा रहा है। अस्पताल में अब तक किए गए 645 बाल लिवर ट्रांसप्लांट्स के लंबे इतिहास में, जुड़वां बच्चों पर की गई यह पहली सर्जरी है। जटिल बीमारी और संघर्षपूर्ण सफर इन जुड़वां बच्चों का जन्म समय से पहले हुआ था, और जन्म के समय उनका वजन मात्र 2 किग्रा और 2.4 किग्रा था। इससे पहले भी ये माता-पिता अपना एक बच्चा खो चुके थे, जिसके कारण इन दोनों की स्थिति को लेकर पूरा परिवार बेहद चिंतित था। जन्म के केवल दो सप्ताह बाद ही बच्चों में पीलिया के लक्षण दिखाई देने लगे और उनका मल भी असामान्य रूप से पीला होने लगा। विस्तृत चिकित्सा जांच के बाद पता चला कि वे जन्मजात बाइलियरी विकार 'कोलेडोकल सिस्ट टाईप 4ए' से पीड़ित थे। इस स्थिति में बाईल डक्ट यानी पित्त नली का आकार जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है। यदि समय रहते इसका उपचार न किया जाए, तो यह लिवर को गंभीर और स्थायी नुकसान पहुंचाता है। इन बच्चों में यह बीमारी इतनी घातक हो गई कि उनका लिवर फेल होने लगा था। उन्हें बार-बार पेट में ब्लीडिंग और पेट में तरल पदार्थ जमा होने जैसी गंभीर समस्याएं होने लगीं। उनकी स्थिति इतनी नाजुक थी कि वे शारीरिक रूप से विकसित नहीं हो पा रहे थे और अस्पताल में बार-बार भर्ती होना पड़ रहा था। अंततः डॉक्टरों ने यह निष्कर्ष निकाला कि उनका लिवर प्रत्यारोपण ही एकमात्र रास्ता है। चुनौतीपूर्ण सर्जरी और डोनर का मिलना इस पूरी प्रक्रिया का नेतृत्व अपोलो के ग्रुप मेडिकल डायरेक्टर एवं सीनियर पीडियाट्रिक गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. अनुपम सिबल और लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. नीरव गोयल ने किया। डॉ. गोयल के अनुसार, सर्जरी में 10 से 12 घंटे का समय लगा। सबसे बड़ी चुनौती एक साथ दो भाइयों के लिए सही लिविंग डोनर की तलाश करना था। चूंकि बच्चों के पिता डोनेशन के लिए चिकित्सीय रूप से फिट नहीं पाए गए थे, इसलिए परिवार ने मां और मामा का सहयोग लिया। उन्होंने अपने लिवर का 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा दान किया। टायलर की सर्जरी 15 घंटे से अधिक और केली की सर्जरी 13 घंटे से अधिक समय तक चली, जिसमें अत्यंत जटिल सर्जिकल रिकॉन्स्ट्रक्शन की आवश्यकता पड़ी। सफलता और इलाज का प्रभाव सर्जरी के बाद दोनों बच्चों ने तेजी से रिकवरी की है और उनका नया लिवर सही तरह से कार्य कर रहा है। इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल के मैनेजिंग डायरेक्टर शिवकुमार पट्टाभिरमन ने कहा कि यह ऑपरेशन उस विश्वास का परिणाम है जो एक विदेशी परिवार ने भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली पर दिखाया। फिलीपींस में विशेषज्ञ डॉक्टर इस उपचार को करने में असमर्थ थे, जिसके बाद उन्हें भारत रेफर किया गया था। बच्चों के माता-पिता ने अपनी मातृभाषा में डॉक्टरों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि जो इलाज उन्हें उनके अपने देश में नहीं मिल पाया, वह भारत में संभव हो सका। इस पूरे उपचार और ट्रांसप्लांट प्रक्रिया में कुल ₹2500000 का खर्च आया है। डॉ. अनुपम सिबल ने सलाह दी कि इस तरह की बीमारियों के प्रति सावधानी प्रेगनेंसी के दौरान ही रखनी चाहिए, क्योंकि मां का खान-पान और स्वास्थ्य सीधे तौर पर बच्चे के विकास पर प्रभाव डालता है। इसका आप पर असर भारत में: यह उपलब्धि यह दर्शाती है कि भारत जटिल पीडियाट्रिक सर्जरी और ऑर्गन ट्रांसप्लांट के क्षेत्र में विश्व स्तर पर एक प्रमुख केंद्र बन गया है। फिलीपींस में: जो परिवार अपने देश में सीमित संसाधनों या विशेषज्ञों के कारण उपचार नहीं पा सके, उनके लिए यह मामला उम्मीद की किरण है कि गंभीर स्थितियों में भारत में बेहतर उपचार संभव है। सवाल-जवाब 1. जुड़वां बच्चों को क्या बीमारी थी? बच्चों को जन्मजात बाइलियरी विकार 'कोलेडोकल सिस्ट टाईप 4ए' था, जिससे उनकी पित्त नली बढ़ गई और लिवर फेल हो गया। 2. लिवर दान किसने किया? बच्चों के लिवर ट्रांसप्लांट के लिए उनकी मां और मामा ने अपने लिवर का 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा दान किया। 3. सर्जरी में कितना समय लगा? सर्जरी बेहद जटिल थी, जिसमें टायलर के लिए 15 घंटे से अधिक और केली के लिए 13 घंटे से अधिक का समय लगा। 4. इस उपचार पर कुल कितना खर्च आया? फिलीपींस के इन जुड़वां बच्चों के सफल लिवर ट्रांसप्लांट पर कुल ₹25 लाख का खर्च आया। प्रेरणा और सबक • सही समय पर निर्णय: बच्चों के माता-पिता ने स्थिति की गंभीरता को पहचानकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिकित्सा सहायता लेने का साहसी निर्णय लिया। • परिवार का सहयोग: अंगों के दान में परिवार के सदस्यों (मां और मामा) की तत्परता और त्याग ने ही इस ट्रांसप्लांट को संभव बनाया। • विशेषज्ञता पर विश्वास: चिकित्सा विशेषज्ञों की सलाह का पालन करना और कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद न छोड़ना इस सफल परिणाम की नींव बना। https://trendkia.com/health/philipinsa-ke-juravan-bachchon-ke-lie-pharishte-bane-delhi-apollo-ke-doktara-25-lakha-men-hua-aitihasika-liver-transplant-6002 TrendKia — Har trend, sabse pehle.