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  "type": "article",
  "title": "बुजुर्गों संग स्कूली बच्चों की पढ़ाई का अनोखा प्रयोग, कनाडा के सास्काटून में आईजन प्रोजेक्ट ने बदले जीवन",
  "summary": "कनाडा के सास्काटून में छठी कक्षा के छात्रों को बुजुर्गों के साथ 10 महीने तक पढ़ाने का अनूठा प्रयोग किया गया, जिससे बुजुर्गों का अकेलापन दूर हुआ और बच्चों में संवेदनाएं बढ़ीं।",
  "content": "पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था में अमूमन एक ही उम्र के बच्चे एक साथ पढ़ते और खेलते हैं, लेकिन कनाडा के सास्काटून शहर में एक अनोखी पहल ने इस ढांचे को पूरी तरह बदल दिया है। यहाँ छठी कक्षा के 25 विद्यार्थियों ने अपनी नियमित स्कूली कक्षा छोड़कर पूरा एक शैक्षणिक सत्र शेरब्रुक कम्युनिटी सेंटर नामक केयर होम में बुजुर्गों के साथ बिताया। इस 10 महीने लंबे अंतर-पीढ़ीगत (इंटरजेनरेशनल) कार्यक्रम, जिसे 'आईजन' (iGen) नाम दिया गया है, पर हुए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि दो बिल्कुल अलग पीढ़ियों का एक साथ समय बिताना दोनों के मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता में क्रांतिकारी सुधार ला सकता है।\n\nदेखभाल केंद्र में जीवन का नया उत्साह\nशेरब्रुक कम्युनिटी सेंटर में रहने वाले कई बुजुर्ग डिमेंशिया या अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। इस पहल के तहत स्कूली बच्चों और बुजुर्गों ने मिलकर दैनिक गतिविधियों में भाग लिया। वे एक साथ मिलकर अपनी यादें और अनुभव डायरी में लिखते, नए दौर की तकनीकों को सीखते और लिमरिक यानी तुकांत कविताएं रचते थे। इसके अलावा, बच्चे केयर होम के बगीचे में पौधे लगाने, उपहार दुकान में सहायता करने और कला परियोजनाओं पर काम करने में बुजुर्गों का हाथ बंटाते थे।\n\nइस अनूठे अनुभव से बच्चों और बुजुर्गों दोनों के दृष्टिकोण में बड़ा बदलाव आया। कार्यक्रम में शामिल एक छात्रा माया के अनुसार, बुजुर्गों के साथ समय बिताकर उसने नई कहानियां, खेल और एक बेहतर इंसान बनने के तरीके सीखे। वहीं, वर्षों से अकेलापन झेल रही जोडी नामक बुजुर्ग महिला के लिए यह पहल नया जीवन देने वाली साबित हुई। उन्होंने अपनी भावनाएं साझा करते हुए बताया कि दैनिक जीवन की घबराहट और उदासी से बाहर निकलकर अब वे जीवन से भरे आनंददायक दिनों की उत्सुकता से प्रतीक्षा करती हैं। जोडी ने कहा कि इन छठी कक्षा के बच्चों ने उनके जीवन को फिर से केंद्रित कर दिया है और इस कार्यक्रम ने उन्हें नया जीवन दिया है।\n\n10 महीने के वैज्ञानिक अध्ययन के निष्कर्ष\nशोधकर्ता जेसन डी. ई. प्रूलक्स के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने इस कार्यक्रम के फायदों का व्यवस्थित अध्ययन किया। अध्ययन में 25 छात्र-छात्राओं, 3 बुजुर्गों और देखभाल केंद्र के 8 कर्मचारियों को शामिल किया गया। शोध के दौरान प्रतिभागियों से सितंबर के अंत से अक्टूबर की शुरुआत के बीच 10 दिनों तक और फिर शैक्षणिक सत्र के अंत में जून के महीने में 10 दिनों तक विस्तृत सर्वेक्षण करवाए गए। इन सर्वे में उन्होंने अपनी दैनिक बातचीत के महत्व, सकारात्मक और नकारात्मक भावनाओं, शारीरिक स्वास्थ्य की स्थिति, मदद करने की प्रवृत्ति तथा सामाजिक जुड़ाव का सटीक ब्योरा दिया।\n\nशोध के परिणामों से पता चला कि जिन दिनों लोगों की आपस में सार्थक बातचीत हुई, उन दिनों उन्होंने अधिक खुश, जुड़ा हुआ, स्वस्थ और दयालु महसूस किया। यद्यपि पूरे 10 महीनों में प्रतिभागियों के समग्र स्वास्थ्य का औसत स्तर अचानक नहीं बदला, लेकिन दैनिक आधार पर उनके मूड और व्यवहार में महत्वपूर्ण सकारात्मक बदलाव देखे गए। अपनी ही उम्र के साथियों से बातचीत की तुलना में अलग पीढ़ी के लोगों के साथ बिताया गया समय कहीं अधिक लाभकारी पाया गया।\n\nगहरे रिश्ते और मानसिक स्वास्थ्य पर स्थायी प्रभाव\nअध्ययन में यह भी सामने आया कि जैसे-जैसे समय बीतता गया, इस जुड़ाव का प्रभाव और गहरा होता गया। सितंबर-अक्टूबर की तुलना में जून के महीने में सार्थक बातचीत का सकारात्मक प्रभाव प्रतिभागियों के मानसिक स्वास्थ्य पर अधिक दिखाई दिया। शोधकर्ताओं का मानना है कि 10 महीनों के लंबे समय के कारण बच्चों और बुजुर्गों के बीच का रिश्ता समय के साथ बहुत मजबूत हो गया था, जिससे सत्र के अंतिम हफ्तों में वे अपने जुड़ाव का अधिक आनंद ले पा रहे थे।\n\nछात्रा माया की मां तान्या ने साझा किया कि उनकी बेटी ने न केवल केयर होम के निवासियों के साथ स्थायी मित्रता स्थापित की, बल्कि जीवन के वास्तविक मूल्य और महत्व को भी गहराई से समझा। हालांकि यह अध्ययन मुख्य रूप से एक ही केंद्र और सीमित प्रतिभागियों पर आधारित था, फिर भी इसके नतीजे दिखाते हैं कि इस प्रकार के अंतर-पीढ़ीगत कार्यक्रम शिक्षा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं। यह अध्ययन साबित करता है कि पीढ़ियों के बीच सार्थक संवाद बढ़ाने से समाज में अकेलापन दूर कर अधिक समावेशी और खुशहाल समुदायों का निर्माण किया जा सकता है।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: यह अध्ययन भारतीय परिवारों और स्कूलों के लिए एक प्रेरणा है कि बच्चों को बुजुर्गों के साथ समय बिताने के लिए प्रोत्साहित करने से उनमें नैतिक मूल्य और संवेदनाएं विकसित होती हैं।\n\nदैनिक जीवन में: यदि आप या आपके घर के बुजुर्ग अकेलेपन का सामना कर रहे हैं, तो सामुदायिक गतिविधियों या बच्चों के साथ जुड़ाव से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में बड़ा सुधार लाया जा सकता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. आईजन (iGen) प्रोजेक्ट क्या है?\nयह कनाडा के सास्काटून में चलाया गया 10 महीने का एक अनूठा कार्यक्रम है, जिसमें छठी कक्षा के छात्र अपना स्कूल सत्र एक केयर होम में बुजुर्गों के साथ बिताते हैं।\n\n2. इस अध्ययन में किन लोगों को शामिल किया गया था?\nअध्ययन में 25 छठी कक्षा के विद्यार्थी, 3 बुजुर्ग निवासी और देखभाल केंद्र के 8 स्टाफ सदस्य शामिल थे।\n\n3. शोधकर्ताओं को अध्ययन में क्या मुख्य नतीजे मिले?\nपरिणामों से पता चला कि जिन दिनों बच्चों और बुजुर्गों के बीच सार्थक बातचीत हुई, उस दिन दोनों पक्षों ने अधिक खुश, स्वस्थ, दयालु और सामाजिक रूप से जुड़ा हुआ महसूस किया।\n\n4. क्या बुजुर्गों के मानसिक स्वास्थ्य पर इसका कोई बड़ा असर पड़ा?\nहाँ, कई बुजुर्गों ने बताया कि बच्चों के साथ समय बिताने से उनका अकेलापन और मानसिक तनाव दूर हुआ तथा जीवन में नया उत्साह आया।\n\nप्रेरणा और सबक\nप्रेरणा और सबक:\n\n• सहानुभूति की ताकत: अलग-अलग उम्र के लोगों के साथ संवाद करने से जीवन के प्रति दायरा और संवेदनाएं बढ़ती हैं।\n• अकेलेपन पर विजय: दूसरों की मदद करने और सार्थक बातचीत से जीवन में नया उद्देश्य और खुशी पाई जा सकती है।\n• निरंतरता का महत्व: 10 महीने के लंबे जुड़ाव ने साबित किया कि गहरे और मजबूत रिश्ते समय और निरंतर प्रयास से ही बनते हैं।",
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  "category": "स्वास्थ्य",
  "publishedAt": "2026-08-06",
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    "शिक्षा",
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