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  "type": "article",
  "title": "प्रदूषण और पराली के बीच कैसे रखें फेफड़ों का ख्याल, सांस के मरीजों के लिए विशेषज्ञों के अहम सुझाव",
  "summary": "दिवाली पर पटाखों के धुएं और धान की कटाई के कारण हवा में फैले धूल-कणों से सांस की तकलीफ बढ़ सकती है, जिससे बचाव के लिए विशेषज्ञों ने इनहेलर साथ रखने और मास्क पहनने की सलाह दी है।",
  "content": "त्योहारों के मौसम में चारों ओर दीपों की जगमगाहट और आतिशबाजी का उल्लास देखने को मिलता है, लेकिन यही माहौल फेफड़ों और सांस संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित होता है। हवा में पटाखों से निकलने वाला जहरीला धुआं और खेतों से उठने वाले धूल-कण मिलकर सांस के मरीजों के लिए गंभीर संकट पैदा कर देते हैं। ऐसे मौसम में जरा सी असावधानी भी फेफड़ों की गंभीर सूजन या गंभीर दमा के दौरे की वजह बन सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि उत्सव की खुशियों के बीच अपनी सेहत के प्रति सतर्कता बरतना हर संवेदनशील व्यक्ति के लिए अनिवार्य है।\n\nमौसम के बदलाव और धान की कटाई से दोहरी चुनौती\nअंबाला छावनी नागरिक अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रहे आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. जितेंद्र वर्मा के अनुसार, साल का यह समय एलर्जी और श्वसन तंत्र के लिहाज से बहुत नाजुक होता है। इस अवधि में वातावरण पर दो तरफ से गंभीर मार पड़ती है। ग्रामीण इलाकों में जीरी यानी धान की फसल की कटाई जोरों पर होती है, जिससे बड़ी मात्रा में बारीक धूल और भूसी के कण वायुमंडल में तैरने लगते हैं। दूसरी तरफ त्योहार के दौरान जलने वाले पटाखों का रासायनिक धुआं वायु गुणवत्ता को खतरनाक स्तर तक गिरा देता है। जब यह दोनों कारक एक साथ मिलते हैं, तो दमा, ब्रोंकाइटिस और पुरानी एलर्जी से ग्रस्त लोगों के लिए सांस लेना तक दूभर हो जाता है। ऐसे में धूल और धुएं वाले वातावरण से खुद को पूरी तरह दूर रखना ही पहला बचाव है।\n\nघर के भीतर की सुरक्षा और मास्क का सही चुनाव\nहवा में घुले जहरीले तत्वों से बचने के लिए मरीजों को आतिशबाजी वाली जगहों के बिल्कुल नजदीक नहीं जाना चाहिए। पटाखों का धुआं सीधे श्वासनली से होता हुआ फेफड़ों की गहराई तक पहुंच जाता है, जिसके असर से लगातार खांसी, गले में सूखापन, तीखी जलन और सांस उखड़ने जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं। यदि किसी अत्यंत आवश्यक कार्य से घर की दहलीज से बाहर निकलना ही पड़े, तो चेहरे पर अच्छी तरह फिट होने वाला N95 मास्क जरूर लगाना चाहिए। साधारण कपड़े का मास्क इन बारीक रासायनिक कणों को रोकने में पूरी तरह सक्षम नहीं होता है।\n\nघर की चारदीवारी के अंदर का वातावरण सुरक्षित रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि आसपास हो रही आतिशबाजी का धुआं कमरों में प्रवेश कर रहा हो, तो तुरंत एग्जॉस्ट फैन चालू करके दूषित हवा को बाहर फेंकने की व्यवस्था करनी चाहिए। जिन घरों में एयर प्यूरीफायर मौजूद है, वे उसका निरंतर उपयोग कर सकते हैं। इसके अलावा घर की साफ-सफाई के वक्त उड़ने वाली पुरानी धूल से फेफड़ों को बचाना जरूरी है। जिन कमरों की दीवारों पर सीलन की समस्या हो, वहां लंबे समय तक बैठने से परहेज करना चाहिए क्योंकि सीलन में मौजूद फंगस एलर्जी को कई गुना भड़का सकती है। छत के पंखों पर जमी धूल भी चलते समय हवा में फैलती है, इसलिए पंखे चालू करते वक्त सावधानी बरतनी चाहिए।\n\nखानपान की सावधानी और इनहेलर की उपलब्धता\nत्योहार के अवसर पर पारंपरिक मिठाइयों और तले-भुने व्यंजनों का दौर चलता है, परंतु सांस की बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों को अपने दैनिक खानपान को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए। डॉ. जितेंद्र वर्मा बताते हैं कि कुछ खास खाद्य पदार्थ संवेदनशील मरीजों में कफ और एलर्जी की तीव्रता को अचानक बढ़ा देते हैं। उन्होंने दमा के मरीजों को भारी मात्रा में घी, चावल और तीखे अचार जैसी ठंडी या कफकारक तासीर वाली चीजों से परहेज बरतने का सुझाव दिया है। प्रत्येक मरीज की शारीरिक प्रकृति अलग होती है, इसलिए किसी भी प्रकार के खाद्य बदलाव को अपने चिकित्सक के परामर्श के आधार पर ही लागू करना समझदारी है।\n\nश्वसन विकारों से पीड़ित प्रत्येक व्यक्ति को अपना डॉक्टर द्वारा निर्धारित रिलीवर इनहेलर यानी सांस का पंप हर समय अपनी जेब या हाथ की पहुंच में रखना चाहिए। आपातकालीन स्थिति में यह दवा तुरंत श्वासनली की मांसपेशियों को ढीला करके सांस के रास्ते को खोलती है।\n\nआपातकालीन लक्षण और घरेलू नुस्खों की सीमाएं\nहवा के सूखेपन और प्रदूषण के कारण यदि गले में खराश या जलन महसूस हो रही हो, तो नियमित अंतराल पर गुनगुना पानी पीते रहना चाहिए ताकि शरीर पूरी तरह हाइड्रेटेड रहे। हालांकि भाप लेने अथवा अन्य प्रचलित घरेलू उपायों को अस्थमा के तीव्र दौरे का पक्का उपचार नहीं माना जा सकता। यदि सीने में भारी जकड़न हो, इनहेलर के सामान्य पफ लेने के बाद भी सांस लेने में कोई राहत न मिल रही हो या बेचैनी लगातार बढ़ रही हो, तो बिना समय गंवाए तत्काल नजदीकी अस्पताल के आपातकालीन विभाग में पहुंचना चाहिए।\n\nचिकित्सकीय विमर्श के संदर्भ में डॉ. जितेंद्र वर्मा ने सितोपलादि चूर्ण जैसे कुछ पारंपरिक आयुर्वेदिक चूर्ण और औषधियों का उल्लेख भी किया है। उन्होंने स्पष्ट तौर पर ताकीद की है कि मरीजों को किसी भी आयुर्वेदिक दवा या चूर्ण का सेवन अपने मन से शुरू नहीं करना चाहिए, बल्कि योग्य चिकित्सक की जांच और सलाह के बाद ही इनका प्रयोग करना चाहिए। पूरे परिवार के साथ त्योहार का सच्चा आनंद तभी उठाया जा सकता है जब स्वास्थ्य की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता पर रहे।\n\nइसका आप पर असर\nदिवाली और फसल कटाई के मौसम में वायु प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ता है, जिसका सीधा असर सांस के रोगियों और आम नागरिकों की सेहत पर पड़ता है।\n\n• भारत में: दिवाली के दौरान हवा में पटाखों का धुआं बढ़ने से अस्थमा और ब्रोंकाइटिस के मरीजों में सांस फूलने की समस्या गंभीर हो सकती है। श्वसन संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों को बाहर निकलते समय हमेशा N95 मास्क पहनना चाहिए और अपना इनहेलर साथ रखना चाहिए।\n• अंबाला और आसपास के क्षेत्रों में: धान की कटाई और पटाखों के धुएं के कारण वायुमंडल में धूल-कणों की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। यहां के स्थानीय निवासी घर के खिड़की-दरवाजे बंद रखें और कमरों में धुआं आने पर एग्जॉस्ट फैन या एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें।\n• आहार और दिनचर्या: अत्यधिक घी, चावल और खट्टे अचार के सेवन से कफ की समस्या बढ़ सकती है। गले में सूखापन या खराश महसूस होने पर नियमित रूप से गुनगुने पानी का सेवन करें और शरीर को डिहाइड्रेट न होने दें।\n• आपातकालीन स्थिति में: यदि इनहेलर लेने के बाद भी सांस लेने में तकलीफ कम न हो, तो घरेलू उपायों के भरोसे न बैठें। मरीज को बिना देर किए तत्काल नजदीकी अस्पताल या ट्रॉमा सेंटर ले जाएं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nत्योहारों के इस दौर में सांस की समस्याओं के अचानक भड़कने के पीछे मौसम, कृषि कार्य और आतिशबाजी का एक खतरनाक तालमेल जिम्मेदार है। हवा की गति धीमी होने और तापमान गिरने से ये प्रदूषक तत्व जमीन के नजदीक ही जमा रह जाते हैं।\n\n• धान की कटाई का प्रभाव: ग्रामीण और उपनगरीय इलाकों में जीरी यानी धान की फसल कटाई का काम चल रहा है, जिससे भारी मात्रा में बारीक धूल और भूसी के कण हवा में फैल जाते हैं। यह धूल फेफड़ों में पहुंचकर सीधे एलर्जी और जलन पैदा करती है।\n• पटाखों का रासायनिक धुआं: दिवाली के अवसर पर आतिशबाजी से निकलने वाले धुएं में सल्फर, नाइट्रेट और अन्य जहरीले रासायनिक कण मौजूद होते हैं। यह धुआं श्वासनली को सिकोड़ देता है, जिससे सांस लेने में भारी रुकावट आती है।\n• घर के भीतर की नमी और धूल: कमरों की दीवारों में मौजूद सीलन और सीलिंग पंखों पर जमी पुरानी धूल पंखा चलाने पर हवा में तैरने लगती है। सीलन में पनपने वाली फफूंद एलर्जी के मरीजों के लिए अत्यंत हानिकारक साबित होती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. दिवाली पर सांस के मरीजों को बाहर निकलते समय कौन सा मास्क पहनना चाहिए?\nसांस और दमा के मरीजों को बाहर निकलते समय चेहरे पर अच्छी तरह फिट होने वाला N95 मास्क पहनना चाहिए, ताकि बारीक रासायनिक कण फेफड़ों तक न पहुंचें।\n\n2. सांस की तकलीफ होने पर किन खाद्य पदार्थों से परहेज करने की सलाह दी गई है?\nविशेषज्ञों ने घी, चावल और तीखे अचार जैसी ठंडी या कफ बढ़ाने वाली चीजों से परहेज करने का सुझाव दिया है।\n\n3. क्या अस्थमा अटैक के दौरान भाप लेना या घरेलू नुस्खे आजमाना काफी है?\nनहीं, घरेलू उपायों को अस्थमा अटैक का इलाज नहीं मानना चाहिए; इनहेलर से आराम न मिलने पर तुरंत अस्पताल पहुंचना आवश्यक है।\n\n4. घर के भीतर पटाखों का धुआं आ जाए तो क्या उपाय करना चाहिए?\nकमरों में धुआं आने पर तुरंत एग्जॉस्ट फैन चलाकर उसे बाहर निकालना चाहिए और यदि संभव हो तो एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करना चाहिए।\n\n5. डॉ. जितेंद्र वर्मा कहां कार्यरत हैं?\nडॉ. जितेंद्र वर्मा अंबाला छावनी नागरिक अस्पताल में आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में कार्यरत हैं।",
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