रीढ़ की हड्डी के दर्द में कब जरूरी होती है सर्जरी और कैसे सुरक्षित बनी आधुनिक तकनीक कमर दर्द, स्लिप डिस्क या साइटिका से जूझ रहे 70 से 90 प्रतिशत मरीज बिना ऑपरेशन के ठीक हो सकते हैं, लेकिन नसों में कमजोरी आने पर आधुनिक तकनीक से सर्जरी सुरक्षित साबित होती है। खराब जीवनशैली, घंटों एक ही जगह बैठकर काम करने की आदत और झुककर उठने या बैठने के गलत तरीकों के कारण आजकल कमर दर्द, स्लिप डिस्क और साइटिका की समस्या बहुत आम हो चुकी है। रीढ़ की हड्डी में होने वाले इस तेज दर्द से परेशान मरीजों को जब डॉक्टर सर्जरी की सलाह देते हैं, तो सबसे पहला ख्याल लकवे के खतरे का आता है। ऑपरेशन थियेटर में जाने के इस डर के चलते कई मरीज जरूरी इलाज को टालते रहते हैं, जिससे नसों को भारी नुकसान पहुंचने की आशंका बढ़ जाती है। हालांकि चिकित्सा विज्ञान में आए बदलावों और अत्याधुनिक उपकरणों की उपलब्धता ने रीढ़ की सर्जरी को पहले की तुलना में कई गुना अधिक सटीक और सुरक्षित बना दिया है। लकवे के खतरे की क्या है असली हकीकत स्पाइन सर्जरी को लेकर समाज में यह भ्रांति लंबे समय से रही है कि रीढ़ की हड्डी में चीरा लगते ही मरीज हमेशा के लिए बिस्तर पर आ सकता है। फरीदाबाद स्थित अमृता अस्पताल के कंसल्टेंट ऑर्थोपेडिक एवं स्पाइन सर्जन डॉ. अर्चित गोयल के अनुसार, चिकित्सा तकनीक के विकास ने इस जोखिम को बेहद सीमित कर दिया है। आज के समय में ज्यादातर स्पाइन ऑपरेशनों में लकवे का जोखिम महज 0.3 से 0.4 प्रतिशत के आसपास ही रहता है। कुछ बहुत जटिल और विशेष प्रकार की स्पाइन सर्जरी में ही यह संभावना एक प्रतिशत से ऊपर जा सकती है। यह खतरा कितना होगा, यह पूरी तरह से मरीज की बीमारी की गंभीरता और उसकी रीढ़ की स्थिति पर निर्भर करता है। कब पड़ती है ऑपरेशन की आवश्यकता स्लिप डिस्क या साइटिका की समस्या से जूझ रहे हर व्यक्ति को सीधे ऑपरेशन की मेज पर जाने की जरूरत बिल्कुल नहीं होती। डॉ. अर्चित गोयल बताते हैं कि करीब 70 से 90 प्रतिशत मरीज बिना किसी चीरफाड़ के ही पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं या फिर उन्हें दर्द से भारी राहत मिल जाती है। शुरुआत में मरीजों को दर्द निवारक दवाइयां दी जाती हैं, विशेष कसरत कराई जाती है और आवश्यकता पड़ने पर कमर के खास हिस्से में इंजेक्शन लगाए जाते हैं। इन रूढ़िवादी उपचारों से अधिकांश मामलों में सूजन कम हो जाती है और मरीज सामान्य जीवन में लौट आते हैं। सर्जरी का फैसला केवल उन परिस्थितियों में लिया जाता है जब ये गैर सर्जिकल उपाय पूरी तरह बेअसर साबित हों। यदि दवाओं और व्यायाम के बाद भी दर्द कम नहीं हो रहा है, या फिर नसों पर रीढ़ की हड्डी का दबाव इतना बढ़ गया है कि पैरों और नसों में कमजोरी महसूस होने लगी है, तो तुरंत कदम उठाना पड़ता है। नसों पर लंबे समय तक दबाव बने रहने से उनके हमेशा के लिए निष्क्रिय होने का जोखिम रहता है। ऐसी आपात स्थिति में स्थायी नुकसान से बचने के लिए समय रहते ऑपरेशन कराना ही एकमात्र सुरक्षित उपाय बचता है। नई तकनीकों ने कैसे बदला स्पाइन सर्जरी का स्वरूप पारंपरिक पद्धतियों की तुलना में अब स्पाइन सर्जरी बेहद सटीक हो चुकी है, जिसके पीछे कई आधुनिक उपकरणों और डिजिटल तकनीकों का योगदान है। डॉ. अर्चित गोयल के अनुसार, ऑपरेशन के दौरान रोबोटिक्स और कंप्यूटर नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल रीढ़ की हड्डी में स्क्रू या इंप्लांट बिठाने की प्रक्रिया को अभूतपूर्व सटीकता प्रदान करता है। इससे सर्जन को मिलीमीटर के स्तर पर बिल्कुल सही जगह इंप्लांट लगाने में मदद मिलती है। इसके साथ ही 3D सी-आर्म तकनीक ऑपरेशन के दौरान ही रीढ़ की हड्डी की त्रिविमीय तस्वीरें उपलब्ध कराती है, जिससे सर्जन वास्तविक समय में अंदरूनी स्थिति देख सकते हैं। नसों की सुरक्षा के लिए न्यूरो मॉनिटरिंग प्रणाली एक महत्वपूर्ण हथियार साबित हुई है। यह तकनीक पूरे ऑपरेशन के दौरान मरीज की नसों के संकेतों पर लगातार नजर रखती है। अगर किसी नस पर जरा सा भी खिंचाव या दबाव पड़ता है, तो मशीन तुरंत सतर्क कर देती है, जिससे नसों को पहुंचने वाली संभावित चोट को रोका जा सकता है। इसके अलावा बोन स्कैल्पेल जैसे आधुनिक उपकरण केवल हड्डियों को काटते हैं और आसपास की कोमल नसों को सुरक्षित रखते हैं। हालांकि, इन सभी तकनीकी सुरक्षा घेरों के बावजूद किसी भी बड़ी सर्जरी में जोखिम की संभावना को शून्य नहीं माना जा सकता। ऑपरेशन के बाद रिकवरी और सावधानियां स्पाइन सर्जरी को लेकर एक और बड़ा डर यह रहता है कि मरीज महीनों तक चल फिर नहीं पाएगा। आधुनिक तकनीकों की बदौलत अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। ज्यादातर मामलों में मरीज ऑपरेशन के अगले ही दिन अपने पैरों पर खड़ा होकर चलना शुरू कर देता है। हालांकि शुरुआती गतिशीलता के बावजूद रीढ़ को मजबूत सहारा देने के लिए छह सप्ताह से लेकर तीन महीने तक वजन न उठाने, आगे न झुकने और झटके से बचने जैसी सावधानियां बरतनी पड़ती हैं। मरीज को पूरी तरह स्वस्थ होने में कितना समय लगेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि ऑपरेशन से पहले उसकी नसों की हालत कैसी थी। अगर नसों को गंभीर क्षति नहीं पहुंची थी, तो रिकवरी बहुत जल्दी और सहज तरीके से हो जाती है। इसके विपरीत, यदि सर्जरी से पहले ही नसों में गंभीर कमजोरी आ चुकी थी, तो नसों के सामान्य कामकाज को बहाल होने में तीन महीने से लेकर एक साल या कुछ जटिल मामलों में 18 महीने तक का लंबा समय भी लग सकता है। सर्जरी से पहले डॉक्टर से जरूर पूछें ये सवाल रीढ़ की हड्डी का ऑपरेशन कराने से पहले मरीज और उसके परिजनों को पूरी तरह जागरूक होना चाहिए। डॉ. अर्चित गोयल का सुझाव है कि मरीज को अपने डॉक्टर से स्पष्ट रूप से समझना चाहिए कि यह सर्जरी क्यों जरूरी है और इससे उन्हें क्या व्यावहारिक लाभ मिलेगा। मरीज को यह जानना चाहिए कि ऑपरेशन पीठ के दर्द को ठीक करने के लिए किया जा रहा है, पैरों में उतरने वाले साइटिका के दर्द को खत्म करने के लिए हो रहा है, या फिर रीढ़ की दबी हुई नसों को दबाव मुक्त करने के लिए इसकी योजना बनाई गई है। इसके अलावा संभावित जोखिमों की दर, सर्जरी के अलावा मौजूद अन्य विकल्पों और प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने के लिए किन आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाएगा, इन सभी बिंदुओं पर सर्जन से खुलकर चर्चा करना बेहद आवश्यक है। इसका आप पर असर रीढ़ की हड्डी के दर्द और सर्जरी से जुड़े वास्तविक तथ्यों को समझने से मरीजों को सही समय पर सुरक्षित उपचार चुनने में मदद मिलती है। • भारत में मरीजों के लिए: आधुनिक स्पाइन सर्जरी में लकवे का जोखिम 0.3 से 0.4 प्रतिशत तक सीमित हो चुका है, जिससे मरीज बिना किसी बेवजह डर के सही फैसला ले सकते हैं। लंबे समय तक सर्जरी टालने के बजाय समय पर इलाज कराने से नसों के स्थायी नुकसान से बचा जा सकता है। • फरीदाबाद और आसपास के क्षेत्रों में: अमृता अस्पताल में रोबोटिक्स, 3D सी-आर्म और न्यूरो मॉनिटरिंग जैसी उन्नत तकनीकों से लैस विशेषज्ञ स्पाइन देखभाल उपलब्ध है। स्थानीय मरीज दूसरे बड़े महानगरों में जाए बिना अपने ही शहर में सुरक्षित और सटीक रीढ़ की सर्जरी करा सकते हैं। • दैनिक कामकाज पर प्रभाव: 70 से 90 प्रतिशत मामलों में बिना किसी चीरफाड़ के केवल दवाओं, फिजियोथेरेपी और इंजेक्शन से आराम मिल जाता है। इसका मतलब है कि अधिकांश लोग बिना अस्पताल में भर्ती हुए सामान्य जीवन में लौट सकते हैं। • रिकवरी की समयसीमा: ऑपरेशन की जरूरत पड़ने पर भी मरीज अगले ही दिन चलने-फिरने लगता है, हालांकि छह सप्ताह से तीन महीने तक एहतियात जरूरी होती है। नसों में पहले से गंभीर कमजोरी होने पर पूरी तरह ठीक होने में 3 से 18 महीने तक का समय लग सकता है। ऐसा क्यों हुआ आधुनिक जीवनशैली और बैठने की गलत आदतों के चलते रीढ़ की हड्डियों और डिस्क पर लगातार असमान दबाव बनता है, जो नसों में तेज दर्द पैदा करता है। • खराब मुद्रा और सुस्त जीवनशैली: घंटों तक एक ही कुर्सी पर बिना ब्रेक लिए बैठे रहने और गलत तरीके से झुककर भारी वजन उठाने से रीढ़ की डिस्क अपनी जगह से खिसक जाती है। यह खिसकी हुई डिस्क पास से गुजरने वाली साइटिक और अन्य तंत्रिकाओं पर दबाव बनाने लगती है। • नसों पर बढ़ता दबाव: जब डिस्क का अंदरूनी हिस्सा बाहर निकलकर रीढ़ की नसों को दबाता है, तो साइटिका का तेज दर्द पैरों तक फैल जाता है। यदि यह संपीड़न लंबे समय तक बना रहे, तो तंत्रिकाओं में स्थायी कमजोरी और सुन्नपन आने लगता है। • चिकित्सा में तकनीकी प्रगति: पूर्व में रीढ़ की हड्डी के ऑपरेशन केवल सर्जन के अनुमान और बुनियादी एक्स-रे पर निर्भर रहते थे, जिससे नसों को चोट पहुंचने का डर बना रहता था। रोबोटिक्स, नेविगेशन और न्यूरो मॉनिटरिंग के आने से नसों की निरंतर निगरानी संभव हुई है, जिसने ऑपरेशन की सफलता दर को काफी बढ़ा दिया है। सवाल-जवाब 1. क्या स्लिप डिस्क या साइटिका होने पर ऑपरेशन कराना अनिवार्य है? नहीं, लगभग 70 से 90 प्रतिशत मरीज बिना सर्जरी के सिर्फ दवाओं, व्यायाम और कमर में लगाए जाने वाले विशेष इंजेक्शन से ठीक हो जाते हैं। 2. स्पाइन सर्जरी के बाद लकवा होने का कितना जोखिम रहता है? आधुनिक तकनीक के चलते ज्यादातर स्पाइन सर्जरी में लकवे का खतरा सिर्फ 0.3 से 0.4 प्रतिशत होता है, जबकि कुछ बेहद जटिल मामलों में यह एक प्रतिशत से अधिक हो सकता है। 3. मरीज को रीढ़ की हड्डी के ऑपरेशन की जरूरत कब पड़ती है? जब दवाइयों और कसरत से आराम न मिले, पैरों की नसों में कमजोरी आने लगे या नसों पर दबाव से स्थायी नुकसान का खतरा हो, तब ऑपरेशन जरूरी हो जाता है। 4. स्पाइन सर्जरी के कितने दिन बाद मरीज चलना शुरू कर सकता है? आधुनिक तकनीकों के कारण ज्यादातर मरीज सर्जरी के अगले ही दिन से खड़े होकर चलना शुरू कर देते हैं, हालांकि 6 सप्ताह से 3 महीने तक कुछ सावधानियां रखनी होती हैं। 5. ऑपरेशन के दौरान नसों को सुरक्षित रखने के लिए किन तकनीकों का इस्तेमाल होता है? सर्जन रोबोटिक्स, 3D सी-आर्म, कंप्यूटर नेविगेशन, न्यूरो मॉनिटरिंग और बोन स्कैल्पेल जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग करते हैं। 6. सर्जरी कराने से पहले मरीज को डॉक्टर से क्या पूछना चाहिए? मरीज को पूछना चाहिए कि सर्जरी किस दर्द के लिए जरूरी है, उससे क्या फायदा मिलेगा, क्या खतरे हैं और कौन सी आधुनिक तकनीक उपयोग की जाएगी। https://trendkia.com/health/rirha-ki-haddi-ke-darda-men-kaba-jaruri-hoti-hai-sarjari-aura-kaise-surakshita-bani-adhunika-takanika-49637 TrendKia — Har trend, sabse pehle.