# समय से पहले जन्मे शिशुओं में सुनने की जांच क्यों है जरूरी, विशेषज्ञ ने दी समय पर स्क्रीनिंग की सलाह

> कानपुर में आयोजित एक चिकित्सा कार्यक्रम में ईएनटी विशेषज्ञ ने प्रीमैच्योर और एनआईसीयू में रहे बच्चों की तत्काल जांच और समय रहते कॉक्लियर इंप्लांट के महत्व पर जोर दिया।

**Type:** article · **Category:** स्वास्थ्य · **Published:** 2026-09-30 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/health/samaya-se-pahale-janme-shishuon-men-sunane-ki-jancha-kyon-hai-jaruri-visheshajna-ne-di-samaya-para-screening-ki-salaha-40667 · **Language:** Hindi
**Tags:** शिशु स्वास्थ्य, कॉक्लियर इंप्लांट, प्रीमैच्योर बेबी, ईएनटी विशेषज्ञ, जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज, एनआईसीयू, उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य योजना

नवजात शिशु अगर तय समय से पहले जन्म लेता है या जन्म के फौरन बाद उसे नवजात गहन चिकित्सा इकाई (एनआईसीयू) में निगरानी के लिए रखना पड़ता है, तो उसकी सेहत को लेकर शुरुआत से ही विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए। ऐसे बच्चों में कई तरह की शारीरिक और विकासात्मक समस्याओं की संभावना सामान्य बच्चों की तुलना में कहीं अधिक बढ़ जाती है। कानपुर स्थित जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के ईएनटी विभाग की ओर से आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में गोरखपुर के जाने-माने ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. राजेश यादव ने नवजात शिशुओं की प्रारंभिक स्वास्थ्य जांच को लेकर बेहद महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं।

## पश्चिमी देशों की तर्ज पर त्वरित स्क्रीनिंग की आवश्यकता
डॉ. राजेश यादव ने इस बात पर विशेष बल दिया कि विकसित और पश्चिमी देशों में बच्चे के दुनिया में आते ही आधुनिक मशीनों की सहायता से कुछ ही मिनटों के भीतर व्यापक स्क्रीनिंग की जाती है। इस त्वरित प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना होता है कि शिशु के शरीर में किसी तरह की जन्मजात खराबी या विकार तो मौजूद नहीं है। यदि किसी जांच में किसी समस्या के संकेत मिलते हैं, तो बिना किसी देरी के शुरुआती चरण में ही उसका उपचार शुरू कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि भारत के सभी अस्पतालों में भी नवजात शिशुओं के लिए इस प्रकार की स्क्रीनिंग व्यवस्था को पूरी गंभीरता और अनिवार्य रूप से लागू किए जाने की सख्त जरूरत है।

## प्रीमैच्योर और एनआईसीयू में रहे शिशुओं में जोखिम
समय से पहले जन्म लेने वाले या जन्म के तुरंत बाद लंबे समय तक एनआईसीयू में भर्ती रहने वाले बच्चों की शारीरिक संरचना और आंतरिक अंग पूरी तरह विकसित होने से पहले ही बाहरी दुनिया के संपर्क में आ जाते हैं। इसके चलते उनमें कई प्रकार की चिकित्सीय जटिलताओं का खतरा सामान्य नवजात शिशुओं की तुलना में काफी बढ़ जाता है। ऐसे बच्चों के लिए नियमित अंतराल पर चिकित्सीय परीक्षण और लगातार फॉलोअप बहुत आवश्यक हो जाता है। विशेष रूप से बच्चों की श्रवण क्षमता यानी सुनने की शक्ति की जांच जन्म के बाद सही समय पर होना बेहद अनिवार्य है, क्योंकि सुनने की कमजोरी का सीधा और गंभीर असर बच्चे की आवाज पहचानने, बोलने और सीखने की समस्त क्षमताओं पर पड़ता है।

## लक्षण दिखने पर देरी न करें अभिभावक
यदि माता-पिता को तनिक भी संदेह हो कि बच्चा ध्वनि के प्रति सामान्य प्रतिक्रिया नहीं दे रहा है या उसे सुनने में कोई परेशानी है, तो उन्हें किसी भी सूरत में इंतजार नहीं करना चाहिए। अक्सर परिजन बच्चे के बड़े होने या बोलने की उम्र तक पहुंचने का इंतजार करते हैं, जो नुकसानदेह साबित हो सकता है। जैसे ही किसी परेशानी का आभास हो, बच्चे को तुरंत किसी योग्य ईएनटी विशेषज्ञ के पास ले जाकर जांच करानी चाहिए। परीक्षण के दौरान यदि यह स्पष्ट हो जाता है कि बच्चे को गंभीर बहरापन है और दवाओं या सामान्य उपचार से कोई सुधार नहीं दिख रहा है, तो कॉक्लियर इंप्लांट एक बेहद प्रभावी और सटीक विकल्प साबित हो सकता है।

## कॉक्लियर इंप्लांट और स्पीच थेरेपी का महत्व
कॉक्लियर इंप्लांट एक आधुनिक चिकित्सीय तकनीक है, जो गंभीर रूप से सुनने की समस्या से जूझ रहे बच्चों को ध्वनियों को ग्रहण करने और उन्हें समझने में मदद करती है। लगभग एक वर्ष की आयु के आसपास यदि बच्चे का कॉक्लियर इंप्लांट करा दिया जाए, तो उसे आसपास की आवाजों को पहचानने और सामान्य बच्चों की तरह बोलने की भाषा सीखने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। डॉ. राजेश यादव के अनुसार, यदि प्रारंभिक दो से तीन वर्षों के महत्वपूर्ण समय में बच्चे के बहरेपन का इलाज नहीं किया जाता, तो आगे चलकर उसकी संवाद क्षमता, उच्चारण और भाषा सीखने की स्वाभाविक प्रक्रिया स्थायी रूप से बाधित हो सकती है।

## उत्तर प्रदेश सरकार की वित्तीय सहायता
आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए इलाज की राह आसान बनाने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जरूरतमंद बच्चों के कॉक्लियर इंप्लांट के लिए छह लाख रुपये तक की आर्थिक मदद दी जा रही है। इस सरकारी सहायता के माध्यम से बच्चे की सर्जरी का खर्च उठाने के साथ-साथ ऑपरेशन के बाद जरूरी स्पीच थेरेपी और संपूर्ण उपचार की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है। डॉ. राजेश यादव ने स्पष्ट किया कि उन्नत तकनीक और सरकारी अनुदान की उपलब्धता के बावजूद सबसे महत्वपूर्ण पहलू समस्या की समय पर पहचान होना है। समय रहते की गई जांच और निरंतर फॉलोअप से बच्चों को नया जीवन मिल सकता है।

## इसका आप पर असर
इस चिकित्सीय सलाह से नवजात बच्चों के माता-पिता को समय पर सही कदम उठाकर बच्चों को जीवनभर की दिव्यांगता से बचाने में सीधी मदद मिलती है।

- **भारत में:** यदि आपका बच्चा समय से पहले जन्मा है या जन्म के बाद एनआईसीयू में रहा है, तो अस्पताल से छुट्टी मिलते ही उसकी हियरिंग स्क्रीनिंग अनिवार्य रूप से करवाएं। सही समय पर श्रवण दोष की पहचान होने से बच्चे के बोलने और भाषा सीखने के अवसर पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं।
- **उत्तर प्रदेश में:** गंभीर श्रवण दोष से पीड़ित पात्र बच्चों के कॉक्लियर इंप्लांट के लिए राज्य सरकार छह लाख रुपये तक का वित्तीय अनुदान दे रही है। अभिभावक सरकारी मेडिकल कॉलेजों में संपर्क करके सर्जरी और स्पीच थेरेपी के खर्च से पूरी तरह राहत पा सकते हैं।
- **अभिभावकों के लिए:** बच्चे के बोलने की स्वाभाविक उम्र का इंतजार करने के बजाय जन्म के पहले साल में ही विशेषज्ञ को दिखाएं। 2 से 3 साल तक समस्या नजरअंदाज रहने पर बच्चे की बोलने की क्षमता स्थायी रूप से प्रभावित हो सकती है।
- **जांच प्रक्रिया:** मशीनों की सहायता से कुछ ही मिनटों में बच्चे के कानों की बुनियादी जांच पूरी हो जाती है। यह प्रक्रिया पूरी तरह दर्द रहित होती है और किसी भी बड़े खतरे को शुरुआती स्तर पर ही पकड़ लेती है।

## ऐसा क्यों हुआ
समय से पहले जन्मे और एनआईसीयू में भर्ती रहे नवजात शिशुओं में जन्मजात श्रवण दोष और विकासात्मक रुकावटों के कई प्रमुख चिकित्सीय कारण होते हैं।

- **अपरिपक्व शारीरिक विकास:** तय समय से पहले जन्म लेने के कारण शिशु के नाजुक श्रवण तंत्र और संवेदी नसें गर्भ में पूरी तरह विकसित नहीं हो पाती हैं। अपूर्ण विकास के चलते बच्चे बाहरी ध्वनियों को सामान्य रूप से ग्रहण करने में असमर्थ रह जाते हैं।
- **एनआईसीयू का जटिल परिवेश:** गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के चलते लंबे समय तक गहन चिकित्सा में रहने वाले बच्चों पर बीमारियों और जीवन रक्षक उपचारों का असर पड़ सकता है। इसी वजह से सामान्य नवजात बच्चों के मुकाबले ऐसे शिशुओं में सुनने की अक्षमता का जोखिम काफी बढ़ जाता है।
- **जांच में देरी की प्रवृत्ति:** कई माता-पिता यह मान लेते हैं कि बच्चा समय के साथ खुद बोलना और सुनना सीख जाएगा, जिससे शुरुआती दो-तीन साल निकल जाते हैं। श्रवण तंत्र की सक्रियता के अभाव में मस्तिष्क का वाणी केंद्र विकसित नहीं हो पाता, जिससे बोलना सीखना लगभग असंभव हो जाता है।

## सवाल-जवाब

### 1. प्रीमैच्योर बच्चों के लिए जन्म के तुरंत बाद स्क्रीनिंग क्यों जरूरी है?
समय से पहले जन्मे और एनआईसीयू में रहे बच्चों में जन्मजात बीमारियां और सुनने की समस्याएं होने का खतरा ज्यादा होता है, जिसे स्क्रीनिंग से शुरुआती दौर में ही पहचाना जा सकता है।

### 2. नवजात बच्चे की सुनने की जांच कब कराई जानी चाहिए?
जन्म के तुरंत बाद ही बच्चे की सुनने की क्षमता की जांच करानी चाहिए, ताकि समस्या मिलने पर पहले साल में ही इलाज शुरू किया जा सके।

### 3. कॉक्लियर इंप्लांट किस उम्र में कराना सबसे ज्यादा फायदेमंद माना जाता है?
विशेषज्ञ के अनुसार लगभग एक साल की उम्र के आसपास कॉक्लियर इंप्लांट कराने से बच्चे को आवाजों की पहचान और बोलना सीखने के लिए पूरा समय मिलता है।

### 4. अगर बच्चे के सुनने की समस्या का इलाज 2 से 3 साल तक न हो तो क्या होगा?
यदि दो से तीन साल तक इलाज न मिले तो बच्चे की आवाज पहचानने, बोलने और भाषा सीखने की स्वाभाविक क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है।

### 5. उत्तर प्रदेश सरकार कॉक्लियर इंप्लांट के लिए कितनी आर्थिक सहायता देती है?
उत्तर प्रदेश सरकार जरूरतमंद बच्चों के कॉक्लियर इंप्लांट, सर्जरी और स्पीच थेरेपी के लिए छह लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

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