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  "type": "article",
  "title": "स्क्रीन और कुर्सी की लत से रीढ़ पर संकट, जवानी में ही कूबड़ और नसों के खिंचाव से जूझ रही नई पीढ़ी",
  "summary": "लंबे समय तक कुर्सी पर टिके रहने और स्मार्टफोन पर सिर झुकाकर काम करने की आदत से युवाओं की रीढ़ समय से पहले कमजोर हो रही है, जिससे स्लिप डिस्क और सुन्नपन का खतरा बढ़ रहा है।",
  "content": "मानव शरीर को सीधा खड़ा रखने और संतुलन बनाए रखने में रीढ़ की बनावट बुनियादी आधार की तरह काम करती है। खोपड़ी के आधार से शुरू होकर नितंब के निचले छोर तक फैली यह अस्थि श्रृंखला कई अलग-अलग हिस्सों में विभाजित रहती है। सबसे ऊपरी हिस्से को ग्रीवा खंड यानी सर्वाइकल स्पाइन के नाम से जाना जाता है, जिसमें कुल सात अस्थि खंड परस्पर जुड़े होते हैं। इसके ठीक बाद छाती और पसलियों के पीछे स्थित वक्षीय भाग आता है, जिसमें बारह अस्थियों का विन्यास मौजूद होता है। इसके निचले भाग में कटि प्रदेश यानी लंबर स्पाइन की पांच अस्थियां आती हैं, जिसके नीचे सेक्रम की पांच परस्पर जुड़ी हुई हड्डियां एक मजबूत ढांचा तैयार करती हैं और सबसे अंत में टेलबोन अथवा कॉक्सिक्स मौजूद होती है। इन सभी हड्डियों के मध्य भाग में एक नली जैसी गुहा बनी होती है, जिसमें से होकर मस्तिष्क से निकलने वाले तमाम स्नायु सूत्र पूरे शरीर में फैलते हैं। यह स्नायु रज्जु समस्त शारीरिक अंगों से संकेतों को सिर तक पहुंचाने और वहां से कार्यवाहक संदेशों को वापस मांसपेशियों तक ले जाने का कार्य करती है।\n\nशारीरिक गतिविधियों का समस्त गुरुत्वीय भार इसी अस्थि स्तंभ पर टिका रहता है। जब यह स्तंभ किसी कारणवश विकृत होने लगता है, तो समूचा तंत्रिका तंत्र प्रभावित हो जाता है। वर्तमान दौर में बीस से तीस वर्ष की आयु वाले युवाओं में ढांचागत विकृतियां तेजी से सामने आने लगी हैं, जिसके चलते कम आयु में ही शरीर झुका हुआ और शिथिल नजर आने लगा है। दैनिक दिनचर्या में स्क्रीन के अत्यधिक उपयोग और गतिहीन आदतों ने दो प्रमुख समस्याओं को जन्म दिया है, जिन्हें तकनीकी गर्दन का खिंचाव और बैठने की व्यापक आदत कहा जा सकता है। इन शारीरिक विकारों की प्रक्रिया और उनके जैविक प्रभावों को समझना रीढ़ की रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।\n\nझुकी हुई गर्दन पर बढ़ता गुरुत्वाकर्षण का असाधारण दबाव\nसामान्य स्थिति में जब मनुष्य बिना किसी झुकाव के सामने देखता है, तब सिर का प्राकृतिक भार साढ़े चार से साढ़े पांच किलोग्राम के आसपास मापा जाता है। इस मुद्रा में ग्रीवा की हड्डियों पर किसी प्रकार का अतिरिक्त खिंचाव नहीं होता क्योंकि कोण लगभग शून्य डिग्री रहता है। विपरीत इसके, जब कोई व्यक्ति मोबाइल अथवा लैपटॉप की स्क्रीन पर नजरें टिकाने के लिए सिर को साठ डिग्री के कोण तक नीचे झुकाता है, तब ग्रीवा की मांसपेशियों और अस्थियों पर पड़ने वाला प्रभावी दबाव सत्ताईस किलोग्राम तक पहुंच जाता है। यह अतिरिक्त भार रीढ़ के ऊपरी हिस्से के लिए एक लगातार चलने वाले तनाव का रूप ले लेता है।\n\nलगातार इतने भारी जैविक भार का सामना करने से ग्रीवा क्षेत्र के टेंडन, स्नायुबंधन और मांसपेशीय रेशों में सूक्ष्म स्तर पर आंतरिक चोटें उत्पन्न होने लगती हैं। समय बीतने के साथ यह खिंचाव दीर्घकालिक सूजन में बदल जाता है। ग्रीवा की स्वाभाविक संरचना में एक हल्का घुमाव होता है जिसे सी आकार का मोड़ कहा जाता है। जब सिर बार-बार आगे की तरफ झुका रहता है, तो यह स्वाभाविक मोड़ सीधा होने लगता है, जिससे सर्वाइकल लॉर्डोसिस नामक संरचनात्मक विकृति विकसित हो जाती है। परिणामतः हड्डियों और जोड़ों का संतुलन बिगड़ने लगता है, स्नायु जड़ों पर असामान्य दबाव बनने लगता है और इंटरवर्टेब्रल डिस्क के घिसने या उभरने की गति असाधारण रूप से तेज हो जाती है।\n\nगतिहीन कार्यशैली और कुर्सी पर निरंतर बिताए जाने वाले घंटे\nशारीरिक निष्क्रियता की प्रवृत्ति अब एक गंभीर सामाजिक आदत बन चुकी है, जिसमें पेशेवर कामकाजी युवा अथवा अध्ययनरत छात्र प्रतिदिन आठ से बारह घंटे निरंतर कुर्सी पर बैठकर व्यतीत करते हैं। कार्यालयीन कार्यों के अतिरिक्त शेष समय भी सोफे पर बैठकर अथवा बिस्तर पर लेटकर डिजिटल माध्यमों को देखने में बीतता है। लेटकर स्क्रीन का संचालन करना रीढ़ की वक्रता के लिए और भी अधिक विनाशकारी सिद्ध होता है क्योंकि इससे अंगों का संरेखण पूरी तरह बिगड़ जाता है।\n\nघंटों तक एक ही स्थान पर गतिहीन बैठे रहने से पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का समस्त निचला दबाव कटि प्रदेश और श्रोणि भाग यानी पेल्विस पर केंद्रित हो जाता है। इस कारण से पीठ के निचले हिस्से के मांसपेशीय ऊतक शिथिल और निष्क्रिय पड़ने लगते हैं। गति के अभाव में रक्त का परिसंचरण मंद हो जाता है, मांसपेशियों का स्वाभाविक लचीलापन समाप्त होने लगता है और रीढ़ के विभिन्न खंडों के बीच स्थित गद्देदार डिस्क पर असंतुलित एकतरफा भार पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप डिस्क समय से काफी पहले क्षीण होने लगती है। साथ ही शारीरिक चयापचय सुस्त पड़ जाने से वसा संचय, शर्करा असंतुलन और असमय रीढ़ के पुराने रोगों का प्रकोप तेजी से उभरने लगता है।\n\nस्लिप डिस्क और तंत्रिकाओं के दबने से उत्पन्न तंत्रिका संबंधी संकट\nशारीरिक यांत्रिकी के दृष्टिकोण से निरंतर बैठने की अस्वस्थ दिनचर्या ही अंततः गर्दन के इस अत्यधिक खिंचाव को जन्म देती है। जब इस तरह के शुरुआती दर्द को साधारण थकान मानकर अनदेखा कर दिया जाता है, तो इसके परिणाम तंत्रिका तंत्र के लिए घातक रूप ले सकते हैं। ग्रीवा और रीढ़ के अस्थि खंडों के मध्य जेल से भरी हुई कुशन जैसी संरचनाएं मौजूद होती हैं, जिन्हें इंटरवर्टेब्रल डिस्क कहा जाता है। यह संरचना झटकों को सोखने और हड्डियों को आपसी घर्षण से बचाने का कार्य करती है।\n\nगलत शारीरिक मुद्राओं और निरंतर मांसपेशीय ऐंठन के कारण जब इन हिस्सों पर दबाव बना रहता है, तो इनके भीतर मौजूद चिकना जेल धीरे-धीरे सूखने लगता है। जेल के सूखने से डिस्क अपनी प्राकृतिक परिधि से बाहर की ओर खिसक जाती है और उसमें सूजन आ जाती है, जिसे हर्नियेटेड डिस्क अथवा स्लिप डिस्क की स्थिति कहा जाता है। यह अवस्था तीव्र पीड़ा का कारण बनती है। चूंकि मस्तिष्क से निकलने वाली प्रमुख तंत्रिकाएं इसी ग्रीवा मार्ग से होकर दोनों बाजुओं और पैरों तक जाती हैं, अतः इनके दब जाने पर हाथों और पैरों में सुन्नता आने लगती है।\n\nगंभीर न्यूरोलॉजिकल प्रभाव और चलने-फिरने के संतुलन में गिरावट\nतंत्रिका जड़ों पर निरंतर दबाव बने रहने की स्थिति में अंगों की संवेदी क्षमता के साथ-साथ पेशीय ताकत यानी मोटर पावर भी क्षीण होने लगती है। इसका सीधा अर्थ यह है कि व्यक्ति अपनी पूरी मानसिक इच्छाशक्ति लगाने के बावजूद हाथों की उंगलियों अथवा पैरों की मांसपेशियों से आवश्यक बल उत्पन्न नहीं कर पाता। हाथ से वस्तुएं छूटने लगती हैं और पकड़ कमजोर हो जाती है।\n\nरोग की प्रगति के साथ पैरों का समन्वय भी डगमगाने लगता है, जिसके चलते सामान्य रूप से चलते समय व्यक्ति लड़खड़ाने लगता है। अति गंभीर परिस्थितियों में जब केंद्रीय तंत्रिका मार्ग अत्यधिक संकुचित हो जाता है, तब मूत्राशय और आंतों की क्रियाशीलता पर से मस्तिष्क का ऐच्छिक नियंत्रण तक समाप्त हो सकता है। मल-मूत्र त्याग के नियंत्रण का यह अभाव एक गंभीर चिकित्सीय आपातकाल का रूप ले लेता है, जिसके लिए तत्काल विशेषज्ञ हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है। अतः मोबाइल स्क्रीन के उपयोग और बैठने की मुद्रा में तत्काल सुधार करना जीवन की गतिशीलता को सुरक्षित रखने का एकमात्र उपाय है।\n\nइसका आप पर असर\nस्क्रीन पर लगातार सिर झुकाने और घंटों कुर्सी पर जमे रहने से रीढ़ की हड्डी में संरचनात्मक विकृति और नसों पर स्थायी दबाव का सीधा खतरा पैदा हो रहा है।\n\n• कार्यशैली में बदलाव: प्रतिदिन 8 से 12 घंटे लगातार कुर्सी पर बैठने से पीठ के निचले हिस्से की मांसपेशियां निष्क्रिय हो रही हैं। हर 45 से 60 मिनट में सीट से उठकर 2 मिनट का ब्रेक लेना और हल्का खिंचाव करना रीढ़ पर से दबाव को कम करता है।\n• स्क्रीन की स्थिति: मोबाइल या लैपटॉप को 60 डिग्री नीचे झुकाकर देखने से गर्दन पर 27 किलो का अतिरिक्त भार पड़ता है। डिवाइस को आंखों के ठीक समानांतर स्तर पर रखकर इस अतिरिक्त खिंचाव से तुरंत बचा जा सकता है।\n• शारीरिक लक्षण: हाथों या पैरों में झनझनाहट और सुन्नपन तंत्रिकाओं पर दबाव का सीधा संकेत है। इस तरह के लक्षण दिखने पर बिना देर किए विशेषज्ञ चिकित्सक से जांच करवानी चाहिए ताकि नसों को स्थायी नुकसान न पहुंचे।\n• चलने का संतुलन: पैरों में कमजोरी या चलने में लड़खड़ाहट डिस्क के खिसकने और मोटर पावर घटने की चेतावनी है। समय रहते रीढ़ को सीधा रखने के व्यायाम शुरू करने से स्थिति को बिगड़ने से रोका जा सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nआधुनिक जीवन में स्क्रीन पर अत्यधिक निर्भरता और लंबे समय तक गतिहीन रहने की आदत ने युवाओं की रीढ़ की प्राकृतिक बनावट और डिस्क की सुरक्षा को गंभीर क्षति पहुंचाई है।\n\n• कोण और गुरुत्वीय खिंचाव: जब सिर को स्क्रीन देखने के लिए 60 डिग्री झुकाया जाता है, तो ग्रीवा पर पड़ने वाला भार सामान्य 4.5 से 5.5 किलोग्राम से बढ़कर 27 किलोग्राम हो जाता है। यह असामान्य खिंचाव मांसपेशियों और स्नायुबंधन में निरंतर सूजन और सूक्ष्म चोटें पैदा करता है।\n• गतिहीन कार्यप्रणाली: दफ्तरों में 8 से 12 घंटे लगातार बैठे रहने से शरीर का गुरुत्वीय दबाव सीधे लंबर स्पाइन पर केंद्रित रहता है। शारीरिक गति के अभाव में रक्त संचार धीमा पड़ता है और रीढ़ की कुशन जैसी डिस्क का आंतरिक जेल सूखने लगता है।\n• संरचनात्मक मोड़ का सीधा होना: ग्रीवा के स्वाभाविक सी आकार के मोड़ के सीधे होने से सर्वाइकल लॉर्डोसिस हो जाता है। इसके चलते डिस्क अपनी जगह से खिसककर स्लिप डिस्क बन जाती है और मस्तिष्क से निकलने वाली नसों को दबा देती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. गर्दन सीधी होने और 60 डिग्री झुकने पर सिर के भार में कितना अंतर आता है?\nगर्दन सीधी होने पर सिर का स्वाभाविक भार साढ़े 4 से साढ़े 5 किलोग्राम रहता है, जबकि 60 डिग्री झुकने पर इस पर 27 किलोग्राम का अतिरिक्त भार बढ़ जाता है।\n\n2. रीढ़ की हड्डी के मुख्य भाग और उनमें हड्डियों की संख्या कितनी होती है?\nरीढ़ में गर्दन वाले सर्वाइकल भाग में 7, वक्षीय थोरोसिक में 12, लंबर में 5, सेक्रम की 5 जुड़ी हुई हड्डियां और अंत में कॉक्सिक्स होती है।\n\n3. सिटिंग एपिडेमिक शरीर को किस तरह नुकसान पहुंचाता है?\nदिन में 8 से 12 घंटे लगातार बैठे रहने से लंबर स्पाइन पर दबाव पड़ता है, रक्त संचार धीमा होता है और हड्डियों के बीच की डिस्क समय से पहले घिसने लगती है।\n\n4. स्लिप डिस्क की स्थिति में नसों पर क्या असर होता है?\nडिस्क का जेल सूखने और उसके खिसकने से नसें दबने लगती हैं, जिससे हाथ-पैरों में सुन्नपन आता है और मोटर पावर कम हो जाती है।\n\n5. रीढ़ की गंभीर स्थिति में कौन से आपातकालीन लक्षण प्रकट हो सकते हैं?\nनसों पर अत्यधिक दबाव से चलने में संतुलन बिगड़ सकता है और गंभीर मामलों में मल-मूत्र त्याग के नियंत्रण पर से असर छूट सकता है।",
  "url": "https://trendkia.com/health/skrina-aura-kursi-ki-lata-se-rirha-para-snkata-javani-men-hi-kubara-aura-nason-ke-khinchava-se-jujha-rahi-nai-pirhi-48414",
  "category": "स्वास्थ्य",
  "publishedAt": "2026-10-16",
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    "रीढ़ की हड्डी",
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