सोते समय बड़बड़ाने की वजह और बचाव के तरीके, जानिए कब मनोचिकित्सक से मिलना जरूरी है रात में सोते वक्त बातचीत या बड़बड़ाना आमतौर पर सामान्य होता है, लेकिन लगातार तनाव, चिल्लाने या झटके लगने की स्थिति में चिकित्सीय सलाह लेना जरूरी हो जाता है। रात में सोते समय अचानक कुछ शब्द बोलना, अस्पष्ट आवाजें निकालना या बड़बड़ाना एक बेहद आम स्थिति है, जिसे चिकित्सा विज्ञान में सोमनिलोकी के नाम से जाना जाता है। इस अवस्था में व्यक्ति कभी पूरे वाक्य बोलता है, तो कभी केवल अधूरे शब्द या आवाजें निकालता है, और कई बार व्यक्ति अचानक जोर से चिल्ला भी पड़ता है। अधिकांश मामलों में सुबह सोकर उठने के बाद व्यक्ति को बिल्कुल याद नहीं रहता कि उसने रात में क्या कहा था। आम तौर पर इसे कोई गंभीर विकार नहीं माना जाता, लेकिन जब यह घटना रोज होने लगे या इसके साथ असामान्य शारीरिक हरकतें जुड़ जाएं, तो इस पर गंभीरता से ध्यान देना अनिवार्य हो जाता है। डॉ. समीर भार्गव, मनोचिकित्सक, एफएमआरआई गुरुग्राम ने इस विषय पर विस्तार से जानकारी दी है कि यह स्थिति कब तक सामान्य है और कब किसी बीमारी की ओर इशारा करती है। सोते वक्त बोलने के मुख्य कारण मनोचिकित्सक के अनुसार रात में नींद के दौरान बड़बड़ाने के पीछे कई अलग-अलग शारीरिक और मानसिक पहलू जिम्मेदार हो सकते हैं। मानसिक तनाव, अत्यधिक चिंता, नींद का पूरा न होना और अस्त-व्यस्त दिनचर्या इसके सबसे बड़े कारणों में गिने जाते हैं। जब कोई व्यक्ति दिनभर मानसिक दबाव में रहता है या किसी खास विषय पर लगातार सोचता रहता है, तो उसका सीधा असर रात की नींद के चक्र पर पड़ता है। इस मानसिक उथल-पुथल का परिणाम अक्सर सोते समय बोलने या प्रतिक्रिया देने के रूप में बाहर आता है। इसके अलावा शरीर में तेज बुखार होना, कुछ खास दवाओं के दुष्प्रभाव, शराब का सेवन और नींद से जुड़े अन्य विकार भी सोमनिलोकी को बढ़ा सकते हैं। बच्चों में रात में बड़बड़ाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया मानी जाती है, जो उम्र बढ़ने के साथ धीरे-धीरे अपने आप कम हो जाती है। क्या यह किसी गंभीर मानसिक विकार की निशानी है नींद में बोलने का सीधा अर्थ यह कतई नहीं है कि व्यक्ति किसी गंभीर मानसिक बीमारी से ग्रसित हो चुका है। हालांकि, यदि बड़बड़ाने के साथ-साथ व्यक्ति में दिन के समय लगातार चिंता, उदासी, अत्यधिक चिड़चिड़ापन, अनजाना डर या व्यवहार में अचानक आए बदलाव जैसे लक्षण दिखें, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित रहता है। कई बार सोते समय बोलना अन्य गंभीर स्लीप डिसऑर्डर्स के साथ मिलकर प्रकट होता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति नींद में जोर-जोर से चीखता है, अचानक हाथ-पैर चलाने लगता है, डरकर बिस्तर से उठ जाता है या सपनों में होने वाली घटनाओं के अनुसार अपने शरीर को हिलाता-डुलाता है, तो इसकी गहन चिकित्सीय जांच आवश्यक हो जाती है। वहीं, अगर सोते समय तेज खर्राटों के साथ बीच-बीच में सांस रुकने की समस्या दिखाई दे, तो स्लीप एपनिया की संभावना की जांच कराना जरूरी है। सोमनिलोकी से बचाव और सुधार के प्रभावी उपाय इस समस्या की तीव्रता को घटाने के लिए सबसे जरूरी कदम है एक नियमित और अनुशासित स्लीप रूटीन बनाना। प्रत्येक वयस्क को प्रतिदिन कम से कम सात से नौ घंटे की सुकून भरी नींद अवश्य लेनी चाहिए। इसके साथ ही सोने और जागने का एक निश्चित समय तय करना बेहद फायदेमंद साबित होता है। रात को बिस्तर पर जाने से पहले मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन का उपयोग बंद कर देना चाहिए। शाम के समय या रात को सोने से ठीक पहले कैफीन युक्त पेय पदार्थों का सेवन सीमित करना आवश्यक है। मानसिक तनाव को शांत करने के लिए सोने से पहले ध्यान लगाना या गहरी सांस लेने वाले श्वास अभ्यासों को अपनी दिनचर्या में शामिल करना बेहद मददगार सिद्ध होता है। डॉक्टर से संपर्क कब करना चाहिए यदि नींद में बड़बड़ाने की शिकायत अचानक शुरू हुई हो, बहुत तेजी से बढ़ने लगी हो या व्यक्ति की समग्र नींद की गुणवत्ता को खराब कर रही हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क साधना चाहिए। इसके अलावा, यदि रात में बोलने के साथ हिंसक गतिविधियां हों, हाथ-पैर चलाने से खुद को या पार्टनर को चोट लगने का जोखिम बने, अथवा दिन के समय अत्यधिक आलस और नींद का दौरा पड़े, तो विशेषज्ञों को दिखाना अनिवार्य है। ऐसी स्थिति में मनोचिकित्सक या नींद संबंधी विकारों के विशेषज्ञ जरूरी परीक्षणों के बाद सही मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। सही जीवनशैली, पर्याप्त आराम और तनाव प्रबंधन से इस पर काबू पाया जा सकता है, लेकिन गंभीर लक्षणों की अनदेखी बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। इसका आप पर असर यह जानकारी रात में नींद के दौरान असामान्य व्यवहार का सामना करने वाले पाठकों और उनके परिवारों के लिए जीवनशैली सुधारने में सीधी मदद करती है। • दैनिक जीवन पर असर: रात में नींद पूरी न होने और तनाव से बड़बड़ाने की आदत बढ़ती है, जिससे दिनभर थकावट रह सकती है। वयस्कों को प्रतिदिन सात से नौ घंटे की नींद अवश्य सुनिश्चित करनी चाहिए। • सुरक्षा और स्वास्थ्य: यदि नींद में बोलने के साथ हाथ-पैर पटकने या चिल्लाने की आदत जुड़ जाए, तो व्यक्ति या उसके साथी को चोट लग सकती है। ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत न्यूरोलॉजिस्ट या स्लीप क्लिनिक में जांच करानी चाहिए। • जीवनशैली में बदलाव: देर रात तक स्मार्टफोन देखना और कैफीन का अधिक सेवन नींद के चक्र को बिगाड़ता है। रात को स्क्रीन से दूरी बनाकर और ध्यान केंद्रित करके इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। • चिकित्सीय जांच: अगर खर्राटों के साथ सांस रुकती है, तो यह स्लीप एपनिया का बड़ा संकेत हो सकता है। समय रहते डॉक्टर से परामर्श लेने पर भविष्य के गंभीर हृदय और मानसिक रोगों से बचा जा सकता है। ऐसा क्यों हुआ नींद में बोलने की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब मस्तिष्क के नींद चक्र और चेतना के संतुलन में रुकावट आती है, जिसके पीछे कई मानसिक और शारीरिक कारक सक्रिय रहते हैं। • मानसिक दबाव और तनाव: दिनभर की अत्यधिक चिंता और मानसिक दबाव के कारण मस्तिष्क सोते समय भी पूरी तरह शांत नहीं हो पाता। यही अनसुलझा तनाव रात में अनजाने में बोले गए शब्दों के रूप में बाहर निकलता है। • नींद चक्र में असंतुलन: अनियमित दिनचर्या और नींद की गंभीर कमी से मस्तिष्क के विभिन्न चरण सामान्य रूप से कार्य नहीं कर पाते। जब गहरी नींद और स्वप्न अवस्था का तालमेल बिगड़ता है, तो सोमनिलोकी की घटनाएं बढ़ जाती हैं। • शारीरिक और औषधीय प्रभाव: तेज बुखार, कुछ विशेष दवाओं के प्रतिकूल प्रभाव और शराब का अत्यधिक सेवन सीधे तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करते हैं। ये कारक नींद के दौरान मांसपेशियों और वोकल कॉर्ड्स के नियंत्रण को शिथिल कर देते हैं। • जटिल स्लीप डिसऑर्डर: कई बार यह समस्या स्लीप एपनिया या आरईएम स्लीप बिहेवियर डिसऑर्डर जैसी स्थितियों से जुड़ी होती है। जब शरीर में ऑक्सीजन की कमी होती है या सपनों के दौरान शरीर का पक्षाघात सामान्य रूप से काम नहीं करता, तब व्यक्ति बोलने और हरकतें करने लगता है। सवाल-जवाब 1. सोमनिलोकी क्या है? सोमनिलोकी नींद में बोलने या बड़बड़ाने की एक सामान्य स्थिति है, जिसमें व्यक्ति सोते हुए शब्द या आवाजें निकालता है। 2. नींद में बोलने के मुख्य कारण क्या हैं? मानसिक तनाव, चिंता, नींद की भारी कमी, अनियमित दिनचर्या, बुखार, शराब और कुछ दवाओं के प्रभाव इसके प्रमुख कारण हैं। 3. वयस्कों को प्रतिदिन कितने घंटे सोना चाहिए? वयस्कों को स्वस्थ रहने और नींद संबंधी समस्याओं से बचने के लिए रोजाना सात से नौ घंटे की नींद लेनी चाहिए। 4. क्या नींद में बोलना हमेशा किसी मानसिक बीमारी का संकेत होता है? नहीं, यह हमेशा मानसिक बीमारी नहीं होता, लेकिन उदासी, डर या व्यवहार में बदलाव होने पर मनोचिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए। 5. सोते समय बड़बड़ाने पर डॉक्टर से कब मिलना चाहिए? यदि यह अचानक शुरू हो, बार-बार हो, व्यक्ति नींद में चिल्लाए या हिंसक गतिविधियां करे, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। https://trendkia.com/health/sote-samaya-barabarane-ki-vajaha-aura-bachava-ke-tarike-janie-kaba-psychiatrist-se-milana-jaruri-hai-45377 TrendKia — Har trend, sabse pehle.