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  "type": "article",
  "title": "स्तन कैंसर के आधुनिक उपचार से पूरी ब्रेस्ट निकालना हमेशा अनिवार्य नहीं, जानिए क्या कहते हैं विशेषज्ञ",
  "summary": "चिकित्सा विज्ञान में आई नई तकनीकों, टारगेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी के दम पर स्तन कैंसर के कई मरीजों में पूरा स्तन हटाए बिना सफल उपचार संभव हो रहा है।",
  "content": "स्तन कैंसर की पहचान होते ही आमतौर पर लोगों के जेहन में कीमोथेरेपी के गंभीर दुष्प्रभाव और पूरे स्तन को सर्जरी द्वारा निकाल दिए जाने का भय बैठ जाता है। हालांकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में लगातार हो रहे अनुसंधानों ने उपचार की पूरी प्रक्रिया को बदल कर रख दिया है। अब स्तन कैंसर के इलाज में केवल ट्यूमर को काटकर अलग करने या पारंपरिक कीमोथेरेपी देने तक ही प्रक्रिया सीमित नहीं रह गई है, बल्कि मरीज के कैंसर की सटीक स्थिति और उसकी जैविक संरचना को समझकर व्यक्तिगत चिकित्सा योजना तैयार की जाती है। अमृता हॉस्पिटल की ब्रेस्ट ऑन्कोलॉजिस्ट और सीनियर कंसल्टेंट डॉ. श्वेता राजदान के अनुसार, नई दवाओं के आगमन से कई मामलों में मरीजों को आक्रामक कीमोथेरेपी से बचाना संभव हो रहा है, जबकि कई परिस्थितियों में सर्जरी से पहले कीमोथेरेपी देकर ट्यूमर का आकार काफी छोटा कर दिया जाता है जिससे पूरे स्तन को सुरक्षित रखते हुए केवल कैंसर वाले हिस्से को निकाला जा सके।\n\nपारंपरिक कीमोथेरेपी से आगे आधुनिक थेरेपी के विकल्प\nस्तन कैंसर के प्रबंधन में पारंपरिक कीमोथेरेपी के साथ-साथ अब टारगेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी जैसी उन्नत पद्धतियां अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। किसी भी मरीज के लिए उपचार का रास्ता तय करने से पहले यह सूक्ष्म विश्लेषण किया जाता है कि कैंसर किस उपप्रकार का है और उसकी कोशिकाओं की सतह पर कौन से खास रिसेप्टर मौजूद हैं। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी मरीज में एचईआर2 पॉजिटिव स्तन कैंसर की पुष्टि होती है, तो उसके लिए विशेष रूप से तैयार किए गए टारगेटेड इंजेक्शन दिए जा सकते हैं जो सीधे कैंसर वाली कोशिकाओं पर असर करते हैं। वहीं यदि कैंसर हार्मोन पॉजिटिव श्रेणी का निकलता है, तो वहां टारगेटेड दवाओं और हार्मोनल थेरेपी का प्रभावी उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त, जो मामले ट्रिपल नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर की श्रेणी में आते हैं, उनमें से कुछ चुनिंदा मरीजों को इम्यूनोथेरेपी दी जाती है। हालांकि कौन सी विधि मरीज के लिए सबसे सुरक्षित और कारगर होगी, इसका अंतिम निर्णय पूर्ण चिकित्सकीय परीक्षण और पैथोलॉजी रिपोर्ट के गहन मूल्यांकन के बाद ही लिया जाता है।\n\nजैविक जांच और रिसेप्टर प्रोफाइलिंग से तय होता है सटीक इलाज\nपूर्व में स्तन कैंसर के उपचार की रूपरेखा बनाते समय मुख्यतः ट्यूमर के आकार और उसके फैलाव पर ही अधिक ध्यान दिया जाता था। समय के साथ ऑन्कोलॉजी की समझ में बड़ा बदलाव आया है और अब ट्यूमर के भौतिक आकार के साथ-साथ उसकी जैविक बनावट और आनुवंशिक व्यवहार को भी सर्वाधिक प्राथमिकता दी जाती है। इसके लिए बायोप्सी के पश्चात विशेष प्रकार की पैथोलॉजिकल जांचें कराई जाती हैं, जिनमें मुख्य रूप से हार्मोन रिसेप्टर, एचईआर2 और केआई-67 जैसी उन्नत जांच शामिल होती हैं। ये विशिष्ट परीक्षण डॉक्टरों को यह समझने में मदद करते हैं कि कैंसर की प्रकृति कितनी आक्रामक है और उसकी कोशिकाएं शरीर में किस गति से विभाजित हो रही हैं। इन वैज्ञानिक रिपोर्टों के अध्ययन के आधार पर विशेषज्ञ यह निर्णय करते हैं कि मरीज का पहले ऑपरेशन किया जाना चाहिए या पहले कीमोथेरेपी देकर बीमारी को नियंत्रित करना उचित रहेगा, साथ ही यह भी तय होता है कि किस तरह की औषधियां सबसे अधिक प्रभावशाली साबित होंगी।\n\nक्या हर मरीज में स्तन को सुरक्षित रखना संभव है\nअक्सर यह सवाल उठता है कि क्या स्तन कैंसर में पूरे स्तन को हटाए बिना भी पूरी तरह से ठीक होना संभव है। इस विषय पर विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि कई परिस्थितियों में नियोएडजुवेंट कीमोथेरेपी यानी सर्जरी से पहले दी जाने वाली कीमोथेरेपी के जरिए ट्यूमर के आकार को काफी हद तक सिकोड़ दिया जाता है। जब ट्यूमर सिकुड़कर छोटा हो जाता है, तब सर्जन ऐसी ब्रेस्ट-कंजर्विंग सर्जरी करने में सक्षम होते हैं जिसमें केवल गांठ और उसके आसपास के सीमित हिस्से को ही निकाला जाता है और बाकी पूरे स्तन को सुरक्षित बचा लिया जाता है। लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह विकल्प प्रत्येक मरीज के लिए लागू नहीं हो सकता। स्तन संरक्षण की संभावना पूरी तरह से कैंसर के प्रकार, स्तन के आकार की तुलना में गांठ के अनुपात, कैंसर के स्थानीय फैलाव और पूर्व में दी गई दवाओं के प्रति ट्यूमर की प्रतिक्रिया पर निर्भर करती है।\n\nकैंसर कोशिकाओं को सीधे निशाना बनाने वाली नई दवाएं\nपारंपरिक कीमोथेरेपी और आधुनिक दवाओं की कार्यप्रणाली में बुनियादी अंतर मौजूद होता है। कीमोथेरेपी की दवाएं शरीर के भीतर तेजी से विभाजित होने वाली सभी कोशिकाओं को प्रभावित करती हैं, जिसके कारण कई सामान्य कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचता है। इसके विपरीत, टारगेटेड थेरेपी कैंसर कोशिकाओं में मौजूद विशिष्ट जैविक लक्ष्यों, प्रोटीनों या आनुवंशिक संकेतों को पहचानकर सीधे उन्हीं पर प्रहार करती है। इससे कैंसर के अनियंत्रित विभाजन और वृद्धि को रोकने में बेहद सटीक सहायता मिलती है। दूसरी तरफ, इम्यूनोथेरेपी मरीज के अपने शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली को सक्रिय और सुदृढ़ बनाती है ताकि प्रतिरक्षा तंत्र स्वयं कैंसर कोशिकाओं की पहचान करके उनसे मुकाबला कर सके। मरीज की आवश्यकता, उम्र और शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखकर ही इन विभिन्न उपचार विधियों का संयोजन निर्धारित किया जाता है।\n\nभविष्य में कम आक्रामक सर्जरी और व्यक्तिगत चिकित्सा की दिशा\nस्तन कैंसर अनुसंधान की दिशा में हो रही तेज प्रगति आने वाले समय में मरीजों के लिए नई आशाएं लेकर आ रही है। टारगेटेड थेरेपी और व्यक्तिगत रूप से तैयार की गई चिकित्सा पद्धतियों के कारण भविष्य में ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ सकती है जिन्हें भारी सर्जिकल प्रक्रियाओं या आक्रामक कीमोथेरेपी से बचाया जा सकेगा। बहरहाल, विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान दौर में यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि स्तन कैंसर में सर्जरी या कीमोथेरेपी की भूमिका पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। आज भी बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए सर्जिकल हस्तक्षेप और कीमोथेरेपी कई चरणों में अनिवार्य अंग बने हुए हैं। हर मरीज की बीमारी का चरण, उसकी जैविक प्रकृति और परीक्षण रिपोर्ट ही यह तय करती है कि उसके लिए सबसे सुरक्षित और जीवन रक्षक उपचार पद्धति कौन सी होगी।\n\nइसका आप पर असर\nस्तन कैंसर के आधुनिक उपचार विकल्पों से मरीजों के जीवन और शारीरिक संरचना पर सीधा और सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।\n\n• शारीरिक प्रभाव: सर्जरी से पहले ट्यूमर को सिकोड़ने से स्तन को पूरी तरह निकालने के बजाय केवल गांठ हटाने का विकल्प संभव हो जाता है। इससे मरीजों को अंग-भंग के मानसिक आघात से बचने में मदद मिलती है।\n• उपचार का विकल्प: एचईआर2 और हार्मोन पॉजिटिव कैंसर में नई दवाओं के जरिए सटीक और लक्षित थेरेपी दी जा सकती है। इससे सामान्य कोशिकाओं को होने वाले नुकसान और अनावश्यक कीमोथेरेपी के दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है।\n• जांच की जरूरत: बायोप्सी के साथ हार्मोन रिसेप्टर और केआई-67 जैसी प्रोफाइलिंग जांच करवाना अनिवार्य हो गया है। इन जांचों की रिपोर्ट के आधार पर ही डॉक्टर सबसे सही और असरदार दवा का चयन करते हैं।\n• मरीजों के लिए सलाह: स्तन कैंसर का लक्षण दिखते ही तुरंत विशेषज्ञ ऑन्कोलॉजिस्ट से संपर्क करके अपनी बायोलॉजिकल रिपोर्ट समझें। समय पर जांच कराने से कम आक्रामक सर्जरी और बेहतर जीवन गुणवत्ता की संभावना बढ़ जाती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nस्तन कैंसर के उपचार में यह बदलाव आधुनिक चिकित्सा अनुसंधान, आणविक जीव विज्ञान की समझ और उन्नत दवाओं के विकास के कारण आया है। पहले केवल ट्यूमर के भौतिक आकार के आधार पर उपचार निर्धारित होता था, लेकिन अब कोशिकाओं के आंतरिक रिसेप्टर्स और आनुवंशिक व्यवहार की समझ ने उपचार की दिशा बदल दी है।\n\n• जैविक संरचना की पहचान: बायोप्सी और उन्नत पैथोलॉजिकल परीक्षणों से यह पता लगाना संभव हुआ है कि हर स्तन कैंसर एक जैसा नहीं होता। एचईआर2, हार्मोन रिसेप्टर्स और सेल प्रोलिफरेशन मार्करों की पहचान ने व्यक्तिगत उपचार की नींव रखी है।\n• लक्षित दवाओं का विकास: पारंपरिक कीमोथेरेपी के व्यापक दुष्प्रभावों को देखते हुए वैज्ञानिकों ने ऐसी दवाएं विकसित की हैं जो केवल कैंसर कोशिकाओं के विशिष्ट लक्ष्यों पर हमला करती हैं। इस कारण स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए बिना ट्यूमर को तेजी से नियंत्रित करना आसान हुआ है।\n• ट्यूमर को सिकोड़ने की रणनीति: नियोएडजुवेंट थेरेपी के जरिए ऑपरेशन से पहले ट्यूमर का आकार छोटा करने की तकनीक सफल रही है। इसके चलते बड़े ट्यूमर वाले मामलों में भी पूरे स्तन को हटाने के बजाय सीमित सर्जरी करना संभव हो सका है।\n• इम्यूनोथेरेपी की प्रगति: शरीर के स्वयं के प्रतिरक्षा तंत्र को कैंसर कोशिकाओं से लड़ने के लिए तैयार करने की क्षमता ने ट्रिपल नेगेटिव जैसे कठिन कैंसर मामलों में भी नए उपचार विकल्प खोल दिए हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. क्या स्तन कैंसर होने पर हमेशा पूरा स्तन निकालना पड़ता है?\nनहीं, सर्जरी से पहले कीमोथेरेपी देकर ट्यूमर को छोटा किया जा सकता है, जिससे केवल प्रभावित हिस्सा निकालकर पूरे स्तन को बचाया जा सकता है।\n\n2. स्तन कैंसर का सही इलाज तय करने के लिए कौन सी जांचें जरूरी हैं?\nबायोप्सी के बाद हार्मोन रिसेप्टर, एचईआर2 और केआई-67 जैसी जांचें की जाती हैं ताकि कैंसर की गति और उसकी जैविक बनावट समझी जा सके।\n\n3. कीमोथेरेपी और टारगेटेड थेरेपी में क्या अंतर होता है?\nकीमोथेरेपी तेजी से बढ़ने वाली सभी कोशिकाओं पर असर करती है, जबकि टारगेटेड थेरेपी कैंसर कोशिकाओं के खास लक्ष्यों पर सीधे वार करती है।\n\n4. एचईआर2 पॉजिटिव और ट्रिपल नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर का इलाज कैसे होता है?\nएचईआर2 पॉजिटिव में विशेष टारगेटेड इंजेक्शन दिए जाते हैं, जबकि कुछ ट्रिपल नेगेटिव मामलों में इम्यूनोथेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है।\n\n5. क्या भविष्य में स्तन कैंसर के इलाज से सर्जरी पूरी तरह खत्म हो जाएगी?\nविशेषज्ञों के अनुसार इलाज के तरीके बेहतर हो रहे हैं, लेकिन फिलहाल सर्जरी और कीमोथेरेपी की आवश्यकता पूरी तरह खत्म नहीं होगी।",
  "url": "https://trendkia.com/health/stana-kainsara-ke-adhunika-upachara-se-puri-breast-nikalana-hamesha-anivarya-nahin-janie-kya-kahate-hain-visheshajna-47684",
  "category": "स्वास्थ्य",
  "publishedAt": "2026-10-15",
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