# भारत में मानसिक स्वास्थ्य का संकट, छोटी परेशानी को कैसे गंभीर बना रहे हैं लोग

> शहरी जीवन के बढ़ते दबाव के बीच मानसिक स्वास्थ्य संकट गहराता जा रहा है, जहां हर 10 में से एक भारतीय किसी न किसी मानसिक विकार से जूझ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर मदद लेने के बजाय समस्याओं को नजरअंदाज करने की पुरानी आदत इस स्थिति को और गंभीर बना रही है।

**Type:** article · **Category:** स्वास्थ्य · **Published:** 2026-08-18 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/health/urban-india-mental-health-crisis-why-1-in-10-people-ignore-warning-signs-17973 · **Language:** Hindi
**Tags:** मानसिक स्वास्थ्य, तनाव और चिंता, शहरी जीवन, मानविक विकार, स्वास्थ्य देखभाल

भारतीय समाज में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक बहुत ही पुरानी और नुकसानदायक प्रवृत्ति देखने को मिलती है। अक्सर जब लोगों को किसी छोटे-मोटे तनाव या मानसिक उलझन का सामना करना पड़ता है, तो वे उससे उबरने के प्रयास करने के बजाय उस स्थिति को खुद पर हावी होने देते हैं। वे उस माहौल या समस्या से दूर हटने की कोशिश नहीं करते, बल्कि उसी तनावपूर्ण परिस्थिति में लगातार काम करते रहते हैं। यह सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक वह मामूली सी परेशानी उनके मानसिक स्वास्थ्य को पूरी तरह से जकड़ नहीं लेती और एक गंभीर समस्या का रूप नहीं धारण कर लेती।

आज की शहरी जिंदगी डेडलाइन के दबाव, भारी ट्रैफिक, डिजिटल ओवरलोड, आर्थिक परेशानियों और लगातार बढ़ती उम्मीदों के जाल में फंस चुकी है। इस भागदौड़ भरी जीवनशैली का सबसे बुरा असर लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। डॉक्टरों और विशेषज्ञों का साफ कहना है कि भारत को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अपने पारंपरिक दृष्टिकोण में क्रांतिकारी बदलाव लाने की सख्त जरूरत है। जब कोई समस्या विकराल रूप ले ले, तब उसके इलाज का इंतजार करने की बजाय, शुरुआत में ही उसकी पहचान करना, समय पर सलाह लेना और शुरुआती दौर में ही उपचार की व्यवस्था करना बेहद जरूरी है। यह तमाम बातें “Freedom from Silent Suffering – Mental Health in Urban India” शीर्षक से आयोजित एक अहम पैनल चर्चा के दौरान देश के जाने-माने चिकित्सकों द्वारा साझा की गईं।

पैसिफिक वनहेल्थ के साइकियाट्री एवं मेंटल हेल्थ के डायरेक्टर डॉ. निमेश जी देसाई ने इस विषय पर विस्तार से रोशनी डालते हुए बताया कि मानसिक स्वास्थ्य एक बहुत ही विस्तृत स्पेक्ट्रम है। इसमें रोजमर्रा के छोटे-मोटे तनाव से लेकर गंभीर मानसिक विकार तक सब कुछ शामिल हैं जिन्हें चिकित्सकीय उपचार की जरूरत होती है। उन्होंने कहा, “देश में मानसिक विकार लगभग 10 से 12 प्रतिशत लोगों को प्रभावित करते हैं। लेकिन इससे कहीं बड़ी आबादी ऐसी है जो मानसिक परेशानी का अनुभव कर रही है और एक अन्य वर्ग ऐसा भी है जो अपनी मानसिक सेहत को बेहतर बनाना चाहता है।” उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी इन तमाम विविध जरूरतों को समझना होगा। ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए कि चिकित्सा प्रणाली केवल तभी जागे जब कोई व्यक्ति किसी गंभीर मानसिक बीमारी की चपेट में आ चुका हो।

इस चर्चा के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि तमाम लोग गंभीर स्तर की चिंता, तनाव या भावनात्मक उथल-पुथल से गुजरने के बावजूद अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को किसी तरह घसीटते रहते हैं। समाज में मानसिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर खुलकर बात करने को लेकर आज भी एक अजीब सा संकोच और झिझक बनी हुई है। इसी सामाजिक झिझक के कारण लोग समय पर डॉक्टर या काउंसलर के पास जाने से कतराते हैं और मदद लेने में बहुत देर कर देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि निवारक मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को हमारी स्वास्थ्य सेवाओं का एक सामान्य और अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इसमें जागरूकता फैलाने, शुरुआती स्तर पर जांच करने, समय रहते सहायता प्रदान करने और जरूरत पड़ने पर उचित उपचार देने पर खास जोर दिया जाना चाहिए। उनका कहना है कि निवारक मनोचिकित्सा इस पूरी सोच को बदलने में एक बहुत बड़ी भूमिका निभा सकती है।

Hope Care India के डायरेक्टर और Indian Association of Private Psychiatry की दिल्ली शाखा के अध्यक्ष डॉ. दीपक राजेहा ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर खुलकर बातचीत करने के माहौल को सामान्य बनाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने रेखांकित किया कि आज का समाज एक तरफ अत्यधिक डिजिटल जुड़ाव तो दूसरी तरफ बढ़ते हुए सामाजिक अलगाव के बीच आगे बढ़ रहा है। उनके अनुसार, आने वाले समय में हमारी मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था का ध्यान केवल मानसिक बीमारियों के इलाज तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि रोकथाम और शुरुआती स्तर पर ही दखل देने पर केंद्रित होना चाहिए। उन्होंने कहा, “अगर हम केवल उपचार की बात करेंगे, तो हम हमेशा समस्या के पीछे रहेंगे।” उन्होंने आगे कहा कि P-SAD यानी Prevention of Stress, Anxiety and Depression जैसी पहल आज के समय की सबसे बड़ी मांग हैं, क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य का बोझ लगातार बढ़ रहा है और इससे निपटने के लिए रोकथाम ही एकमात्र सटीक रास्ता है।

इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए पैसिफिक वनहेल्थ ने P-SAD की शुरुआत की है। इस विशेष पहल का मुख्य उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ाना, समय पर जांच करना और लोगों को उनकी जरूरत के मुताबिक सही सहायता उपलब्ध कराना है ताकि इसे मुख्यधारा की स्वास्थ्य व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बनाया जा सके। यह कार्यक्रम रोजमर्रा के हल्के तनाव से लेकर उन गंभीर स्थितियों तक के पूरे दायरे को कवर करने की कोशिश करता है जिनके लिए पेशेवर देखभाल अनिवार्य हो जाती है। इसका मूल मकसद इस पुरानी धारणा को बदलना है कि मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल तभी शुरू होनी चाहिए जब स्थिति पूरी तरह से बिगड़ चुकी हो।

पैसिफिक वनहेल्थ के को-फाउंडर और प्रेसिडेंट डॉ. स्वदीप श्रीवास्तव ने इस पहल के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए कहा, “स्वास्थ्य सेवाओं को ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ना होगा जहां समस्याओं के गंभीर होने के बाद उनका इलाज करने की बजाय जोखिमों की पहले पहचान की जाए और लोगों को स्वस्थ रहने में मदद की जाए। मानसिक स्वास्थ्य, समग्र स्वास्थ्य का अभिन्न हिस्सा है। P-SAD के माध्यम से हमारा प्रयास है कि तनाव, चिंता और अवसाद से जुड़ी बातचीत को लोगों के लिए अधिक सहज बनाया जाए और निवारक देखभाल को लोगों तथा समुदायों के लिए अधिक सुलभ बनाया जाए।”

विशेषज्ञों ने यह भी बहुत स्पष्ट रूप से बताया कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां किसी एक खास आयु वर्ग या जीवन के किसी एक पड़ाव तक ही सीमित नहीं हैं। लगातार काम के तनाव में घिरे कामकाजी पेशेवर हों, उम्र बढ़ने के साथ आने वाली अकेलीपन और अन्य चुनौतियों का सामना कर रहे बुजुर्ग हों, या फिर घर और बाहर की दोहरी जिम्मेदारियों का बोझ उठाने वाली महिलाएं हों, सभी के लिए जागरूकता और सही समय पर सहायता पाना बेहद आवश्यक है। विशेषज्ञों का निष्कर्ष था कि अपनी मानसिक पीड़ा को चुपचाप सहने के कल्चर से मुक्ति तभी मिल सकती है जब लोग अपनी बात खुलकर कहने, बिना किसी डर के मदद मांगने और स्थिति हाथ से निकलने से पहले सही मार्गदर्शन प्राप्त करने में पूरी तरह सहज महसूस करें।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** यह रिपोर्ट देश के हर उस व्यक्ति के लिए प्रासंगिक है जो शहरी जीवन के तनाव, डेडलाइन और काम के दबाव से जूझ रहा है, और यह समय पर मदद मांगने की जरूरत को रेखांकित करती है।

**रोजमर्रा की जिंदगी में:** मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी छोटी परेशानियों को नजरअंदाज करने के बजाय शुरुआती दौर में ही उनकी पहचान करने और डॉक्टर या काउंसलर से सलाह लेने से गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है।

## सवाल-जवाब

### 1. भारत में मानसिक विकारों से कुल कितनी आबादी प्रभावित होती है?
देश में मानसिक विकार लगभग 10 से 12 प्रतिशत लोगों को प्रभावित करते हैं।

### 2. P-SAD पहल का पूरा नाम क्या है और इसका क्या उद्देश्य है?
P-SAD का पूरा नाम Prevention of Stress, Anxiety and Depression है, और इसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता, शुरुआती जांच और उचित सहायता को मुख्यधारा की स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बनाना है।

### 3. शहरी जीवन में मानसिक स्वास्थ्य को कौन से कारक प्रभावित कर रहे हैं?
डेडलाइन, ट्रैफिक, डिजिटल ओवरलोड, आर्थिक दबाव और लगातार बढ़ती अपेक्षाएं शहरी जिंदगी में मानसिक स्वास्थ्य को तेजी से प्रभावित कर रही हैं।

### 4. डॉ. निमेश जी देसाई किस संस्थान से जुड़े हैं?
डॉ. निमेश जी देसाई पैसिफिक वनहेल्थ में साइकियाट्री एवं मेंटल हेल्थ के डायरेक्टर के रूप में कार्यरत हैं।

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