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  "type": "article",
  "title": "हिमाचल के दूरदराज गांव कुगती का राजमाह पहुंचा देश के बाजारों में, पर बेमौसम बारिश ने बढ़ाई किसानों की धड़कनें",
  "summary": "हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले के सीमांत गांव कुगती का प्राकृतिक देसी राजमाह अपनी खास बनावट और स्वाद के दम पर दिल्ली और पंजाब समेत कई राज्यों में लोकप्रिय हो रहा है, हालांकि अत्यधिक वर्षा से पैदावार पर संकट के बादल हैं.",
  "content": "हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले में भरमौर विधानसभा क्षेत्र के आखिरी छोर पर स्थित बर्फीले गांव कुगती का देसी राजमाह अपनी अनोखी पहचान बना रहा है. प्राकृतिक आबोहवा और जैविक वातावरण में पैदा होने वाले इस राजमाह के स्वाद और बेजोड़ गुणवत्ता की चर्चा अब सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई प्रमुख बाजारों तक पहुंच चुकी है. दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों में इसकी खपत और मांग में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. स्थानीय पहाड़ी आबादी के लिए यह पारंपरिक उपज अब मात्र भोजन की जरूरत पूरा करने का जरिया नहीं रही, बल्कि आय और आजीविका की मुख्य धुरी बन चुकी है.\n\nपहाड़ों पर छह महीने की कड़ी तपस्या\nकुगती की बर्फीली वादियों और ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में खेती करना किसी अग्निपरीक्षा से कम साबित नहीं होता है. यहां कृषि योग्य मौसम काफी सीमित रहता है और भौगोलिक चुनौतियां किसानों की राह में लगातार बाधाएं खड़ी करती हैं. खेतों को तैयार करने से लेकर बुवाई और कटाई तक किसानों को बेहद कठिन शारीरिक परिश्रम से गुजरना पड़ता है. स्थानीय काश्तकार हर साल मार्च और अप्रैल के महीनों में खेतों में राजमाह के बीज बोते हैं. इसके बाद पूरे छह महीने तक फसलों की देखभाल की जाती है, जिसके बाद सितंबर और अक्टूबर में जाकर यह पैदावार कटाई के लिए पूरी तरह तैयार होती है.\n\nअत्यधिक नमी और बदलते मौसम से खड़ी हुई मुश्किलें\nइस साल का मौसम कुगती के किसानों के लिए भारी चिंता का सबब बनकर उभरा है. इलाके में लगातार हुई मूसलाधार बारिश और जलवायु में आए अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव ने खेतों में खड़ी राजमाह की फसल को काफी प्रभावित किया है. लगातार बारिश होने की वजह से ढलानों और खेतों में लंबे समय तक अत्यधिक नमी जमा रही, जिससे दानों के विकास और कुल उत्पादन पर गहरा असर पड़ने का खतरा मंडरा रहा है. कुछ खेतों में पौधों को सीधा नुकसान भी पहुंचा है, जिसने उत्पादकों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं. इन तमाम दिक्कतों के बीच किसान अब भी आस लगाए हैं कि फसल चक्र के अंतिम दौर में मौसम साफ रहेगा और उन्हें संतोषजनक पैदावार मिल सकेगी.\n\nप्रमुख नकदी फसल के रूप में बढ़ता दायरा\nबीते कुछ वर्षों में कुगती घाटी के कृषि पैटर्न में बड़ा संरचनात्मक बदलाव देखा गया है. शोध अध्ययनों के आंकड़े बताते हैं कि इस इलाके में राजमाह की खेती का कुल रकबा लगातार बढ़ रहा है. परंपरागत अनाजों और फसलों की तुलना में राजमाह की बिक्री से किसानों को अधिक आर्थिक लाभ और बेहतर आमदनी मिल रही है, जिसके चलते यह क्षेत्र की प्रमुख नकदी फसल का रूप ले चुका है. हालांकि, अत्यधिक दुर्गम और सड़क विहीन इलाके होने के कारण तैयार फसल को बड़े शहरों की मुख्य मंडियों तक पहुंचाना आज भी किसानों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है.\n\nविपणन और परिवहन के उचित प्रबंध की दरकार\nस्थानीय उत्पादकों का स्पष्ट मानना है कि यदि सरकार सुदूरवर्ती क्षेत्रों से उपज को बाहर भेजने के लिए मजबूत परिवहन साधन और व्यवस्थित सरकारी विपणन तंत्र उपलब्ध कराए, तो यह देसी राजमाह राष्ट्रीय फलक पर अपनी पहचान और मजबूत कर सकता है. मौसम की अनुकूलता के साथ-साथ सुगम बाजार मिलने पर न केवल सीमांत किसानों की आय में कई गुना इजाफा होगा, बल्कि घाटी की पारंपरिक खेती को भी एक टिकाऊ और लाभकारी भविष्य मिल सकेगा.\n\nइसका आप पर असर\nकुगती के राजमाह की पैदावार पर मौसम का असर सीधे तौर पर उपभोक्ताओं और स्थानीय उत्पादकों की जेब से जुड़ा हुआ है.\n\n• उपभोक्ताओं पर असर: मौसम की मार से उत्पादन घटने पर दिल्ली और पंजाब के खुदरा बाजारों में देसी राजमाह की कीमतें बढ़ सकती हैं. यदि आप पहाड़ी जैविक दालों के शौकीन हैं, तो आने वाले सर्दियों के महीनों में आपको इसके लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है.\n• चम्बा में: भरमौर के कुगती क्षेत्र के सैकड़ों काश्तकारों की सालाना पारिवारिक कमाई सीधे तौर पर इस नकदी फसल की बिक्री पर निर्भर करती है. खेतों में अतिरिक्त नमी से नुकसान होने पर किसानों को आगामी त्योहारी और शीतकालीन मौसम में नकदी संकट का सामना करना पड़ सकता है.\n• कृषि विपणन पर प्रभाव: दुर्गम रास्तों के कारण ढुलाई का खर्च पहले से अधिक रहता है, जिससे किसानों का मुनाफा घटता है. यदि समय पर परिवहन की व्यवस्था नहीं हुई, तो कटी हुई फसल के सड़ने या खराब होने का जोखिम बढ़ जाएगा.\n• फसल विविधीकरण: पारंपरिक अनाज छोड़कर राजमाह अपनाने वाले किसानों के लिए यह मौसम एक सबक बनकर आया है. बेहतर जल निकासी और फसल बीमा जैसी सुरक्षा व्यवस्था न मिलने पर काश्तकार दोबारा पारंपरिक फसलों की ओर मुड़ सकते हैं.\n\nऐसा क्यों हुआ\nकुगती क्षेत्र में राजमाह की फसल पर संकट और इसकी बढ़ती मांग दोनों के पीछे मौसम चक्र, भौगोलिक संरचना और हालिया कृषि बदलाव मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं.\n\n• अत्यधिक वर्षा और जलभराव: मानसून के दौरान सामान्य से अधिक बारिश होने से पर्वतीय खेतों की मिट्टी में लगातार गीलापन और नमी बनी रही. जड़ों और पौधों के आसपास लंबे समय तक पानी का जमाव रहने से फलियों की गुणवत्ता और दानों की परिपक्वता बाधित हुई है.\n• विशिष्ट भौगोलिक वातावरण: कुगती का बर्फीला और अत्यधिक ऊंचाई वाला क्षेत्र इस राजमाह को खास स्वाद और बनावट देता है. यही प्राकृतिक परिस्थितियां बुवाई के लिए केवल मार्च और अप्रैल तथा कटाई के लिए सितंबर और अक्टूबर की एक सीमित समय सीमा तय करती हैं.\n• पारंपरिक से नकदी फसल की ओर रुख: अन्य फसलों की अपेक्षा राजमाह से होने वाली बेहतर कमाई को देखते हुए शोध अध्ययनों के अनुसार किसानों ने इसका रकबा बढ़ाया है. रकबा बढ़ने से उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन परिवहन और भंडारण जैसी ढांचागत सुविधाएं वैसी की वैसी सीमित रह गईं.\n\nसवाल-जवाब\n\n1. कुगती गांव हिमाचल प्रदेश के किस जिले और विधानसभा क्षेत्र में स्थित है?\nकुगती गांव हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले के भरमौर विधानसभा क्षेत्र में स्थित सबसे अंतिम और दुर्गम गांव है.\n\n2. कुगती के देसी राजमाह की मुख्य रूप से किन राज्यों में भारी मांग है?\nअपने बेहतरीन स्वाद और विशिष्ट गुणवत्ता के कारण इसकी मुख्य रूप से दिल्ली और पंजाब सहित देश के विभिन्न राज्यों में अच्छी मांग है.\n\n3. इस क्षेत्र में राजमाह की बुवाई और कटाई किस समय की जाती है?\nकुगती में किसान मार्च-अप्रैल के महीनों में बीज की बुवाई करते हैं और सितंबर-अक्टूबर में फसल तैयार होकर कटाई की जाती है.\n\n4. इस वर्ष कुगती के किसानों की चिंता किस कारण से बढ़ गई है?\nइस साल अधिक बारिश होने और खेतों में लगातार नमी बने रहने से फसल खराब होने और उत्पादन गिरने की आशंका से किसान चिंतित हैं.\n\n5. किसानों ने अन्य पारंपरिक फसलों की जगह राजमाह की खेती का रकबा क्यों बढ़ाया है?\nपारंपरिक फसलों की तुलना में राजमाह से बेहतर आय मिलने के कारण यह एक प्रमुख नकदी फसल बन गया है और इसका रकबा लगातार बढ़ा है.\n\n6. कुगती के किसानों को फसल को बड़े बाजारों तक ले जाने में क्या मुख्य समस्या आती है?\nइलाका अत्यंत बर्फीला और दुर्गम होने की वजह से किसानों को तैयार फसल को बाजारों तक पहुंचाने में परिवहन संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.",
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  "category": "हिमाचल प्रदेश",
  "publishedAt": "2026-10-02",
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    "चम्बा समाचार",
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