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  "type": "article",
  "title": "हिमाचल प्रदेश में सेब उत्पादन में 48 फीसदी की भारी गिरावट, 5 हजार करोड़ रुपये की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहराया संकट",
  "summary": "खराब मौसम और जलवायु परिवर्तन के चलते हिमाचल प्रदेश में सेब की आवक आधी रह गई है, जिससे राज्य के करीब 2.5 लाख बागवान परिवारों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ रहा है।",
  "content": "हिमाचल प्रदेश की आर्थिकी को बड़ा सहारा देने वाला सेब उद्योग इस समय गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है। प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों और जलवायु परिवर्तन के दोहरे प्रहार के चलते चालू सीजन में सेब की पैदावार में करीब 48 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है। इस बड़ी गिरावट की वजह से राज्य की तकरीबन 5,000 करोड़ रुपये की सेब अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे बागवानी से जुड़े लगभग 2.5 लाख परिवारों के सामने गंभीर आजीविका संकट खड़ा हो गया है।\n\nमंडियों में आधे से भी कम पहुंचे सेब के बक्से\nराज्य के बागवानी निदेशक सतीश कुमार ने गुरुवार को आधिकारिक आंकड़ों का ब्योरा देते हुए स्पष्ट किया कि पिछले वर्ष की इसी अवधि में जहां 2.18 करोड़ सेब के बॉक्स मंडियों में पहुंचे थे, वहीं इस बार अब तक केवल 1.15 करोड़ बक्से ही बाजार में आ सके हैं। यह सीधा 48 प्रतिशत की कमी को दर्शाता है। सतीश कुमार का मानना है कि चालू सत्र के दौरान कुल उत्पादन पिछले 10 से 12 वर्षों के सबसे निचले पायदान पर पहुंच सकता है। बेमौसम बरसात, अचानक हुई ओलावृष्टि और असमय बर्फबारी ने बागानों में तैयार हो रही फसल को व्यापक नुकसान पहुंचाया है।\n\nसीजनल आवक और राज्य की जीडीपी पर सीधा प्रभाव\nहिमाचल में सेब की तुड़ान और विपणन का दौर अमूमन 15 जून से शुरू होकर अक्टूबर के अंतिम सप्ताह तक जारी रहता है। शुरुआती दौर की किस्में जून के आखिरी दिनों में मंडियों का रुख करती हैं, जबकि अधिक ऊंचाई वाले पर्वतीय व जनजातीय क्षेत्रों की फसल अक्टूबर के आखिर तक बिकने के लिए आती है। सेब यहां के बागवानी क्षेत्र का मुख्य आधार है और इसमें आने वाली किसी भी प्रकार की गिरावट का सीधा असर किसानों की आमदनी के साथ राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर भी पड़ता है।\n\nटन के हिसाब से आधा रह गया कुल उत्पादन\nबागवानी विभाग के ताजा आकलन के अनुसार, इस पूरे सीजन में कुल उपज सिमटकर केवल 1.5 करोड़ बक्से रहने की संभावना है। यदि वजन के नजरिए से देखें, तो पिछले साल राज्य में कुल सात लाख टन सेब पैदा हुआ था, लेकिन इस मर्तबा यह आंकड़ा घटकर महज 3.5 लाख से 3.75 लाख टन के दायरे में सिमटने की उम्मीद है। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक, बागवानी के पारंपरिक ढर्रे से अब काम नहीं चलने वाला है, क्योंकि पुराने पड़ चुके बगीचों में उत्पादन लगातार घट रहा है। शिमला के ऊपरी क्षेत्रों में इस साल पेड़ों पर फल बेहद कम आए हैं, जिससे किसानों की कमर टूट गई है।\n\nउच्च घनत्व वाले पौधे और सरकार की राहत योजना\nविपरीत परिस्थितियों से निपटने के लिए विभाग अब आधुनिक सघन बागवानी को आगे बढ़ा रहा है। इसी कड़ी में करसोग में करीब 1,00,000 से 1,50,000 अधिक घनत्व वाले गुणवत्तापूर्ण पौधे तैयार किए जा रहे हैं, जिन्हें विविध भौगोलिक ऊंचाई वाले इलाकों में रोपा जाएगा ताकि किसान वैज्ञानिक पद्धतियों को अपना सकें। दूसरी तरफ, स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राजस्व और बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी ने कहा कि इस बार उपज काफी नीचे आ गई है और यह कहना बेहद कठिन है कि सीजन के अंत तक कुल आंकड़ा दो करोड़ बॉक्स भी छू पाएगा या नहीं, जबकि पिछले साल 3.49 करोड़ बक्से बाजार में उतरे थे। जगत सिंह नेगी ने भरोसा दिलाया कि राज्य सरकार ‘बाजार हस्तक्षेप योजना’ (एमआईएस) के अंतर्गत सेब खरीद की दरें बढ़ाने जा रही है और बागवानों को राहत पहुंचाने के मकसद से जल्द ही मंत्रिमंडल के समक्ष एक प्रस्ताव पेश किया जाएगा।\n\nइसका आप पर असर\nसेब की फसल में आई इस भारी गिरावट का सीधा असर उत्पादकों की आय, स्थानीय रोजगार और देशभर में फलों की खुदरा कीमतों पर पड़ेगा।\n\n• भारत में: देशभर की फल मंडियों में हिमाचल के सेब की आवक घटने से आने वाले हफ्तों में सेब के खुदरा दाम तेजी से बढ़ सकते हैं। शहरी उपभोक्ताओं को इस त्योहारी सीजन में गुणवत्तापूर्ण सेब खरीदने के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी।\n• हिमाचल प्रदेश में: सेब की खेती पर निर्भर करीब 2.5 लाख परिवारों की घरेलू आय में चालू वित्त वर्ष के दौरान भारी कमी आएगी। ढुलाई, पैकेजिंग और मंडी व्यापार से जुड़े हजारों स्थानीय मजदूरों व ट्रांसपोर्टरों के दैनिक काम-काज पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ेगा।\n• बागवानों के लिए: पुराने बागानों में लगातार घटती पैदावार को देखते हुए किसानों को वैज्ञानिक सघन बागवानी की ओर रुख करना होगा। सरकार की ओर से एमआईएस के तहत खरीद दरें बढ़ने पर छोटे बागवानों को अपनी लागत निकालने में कुछ राहत मिल सकती है।\n• आपूर्ति शृंखला पर: कुल उत्पादन 7 लाख टन से घटकर करीब 3.5 से 3.75 लाख टन रह जाने से कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट्स को कच्चे माल की किल्लत झेलनी पड़ेगी। इससे जुड़े उद्योगों को अपनी क्षमता से काफी कम स्तर पर काम करना पड़ सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nहिमाचल प्रदेश में सेब उत्पादन में इस रिकॉर्ड गिरावट के पीछे मौसम का अप्रत्याशित मिजाज और लंबे समय से चल रही संरचनात्मक कमियां मुख्य वजह बनकर उभरी हैं।\n\n• प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियां: फूल आने और फल बनने के अहम समय पर बेमौसम बारिश, भीषण ओलावृष्टि और असमय बर्फबारी ने बागानों को भारी नुकसान पहुंचाया। इस मौसमी बदलाव के कारण सेब के पेड़ों पर फल लगने की प्रक्रिया बुरी तरह बाधित हुई।\n• जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: मौसम के चक्र में आ रहे बदलावों ने पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान और नमी के संतुलन को बिगाड़ दिया है। बागवानी अधिकारियों के अनुसार, इसी वजह से उत्पादन पिछले 10 से 12 वर्षों के न्यूनतम स्तर पर जाने की आशंका बन गई है।\n• पुराने पड़ चुके बागान: राज्य के कई इलाकों में लंबे समय से पारंपरिक तरीकों से लगे बागान अपनी प्राकृतिक उत्पादन क्षमता खो रहे हैं। पुराने पेड़ों की उत्पादकता लगातार गिरने से भी कुल पैदावार में तेज गिरावट आई है।\n• शिमला के ऊपरी इलाकों में नुकसान: बागवानों के मुताबिक, सबसे बड़े सेब उत्पादक क्षेत्र शिमला के ऊपरी और ऊंचाई वाले इलाकों में इस सत्र में फसल की स्थिति सबसे खराब रही है, जिससे कुल आंकड़ों पर व्यापक असर पड़ा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. इस साल हिमाचल प्रदेश में सेब के उत्पादन में कितनी गिरावट आई है?\nइस साल अब तक हिमाचल प्रदेश में सेब के उत्पादन में पिछले साल के मुकाबले लगभग 48 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।\n\n2. इस मौसम में अब तक कितने सेब के बक्से मंडियों में पहुंचे हैं?\nबाजार में अब तक केवल 1.15 करोड़ बक्से पहुंचे हैं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 2.18 करोड़ बक्से मंडियों में आए थे।\n\n3. सेब की फसल खराब होने के मुख्य कारण क्या हैं?\nजलवायु परिवर्तन, बेमौसम बारिश, भारी ओलावृष्टि और असमय बर्फबारी के कारण सेब की फसल को व्यापक नुकसान हुआ है।\n\n4. हिमाचल प्रदेश में सेब की अर्थव्यवस्था का कुल आकार कितना है?\nहिमाचल में सेब की अर्थव्यवस्था लगभग 5,000 करोड़ रुपये की है और इससे करीब 2.5 लाख परिवार प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं।\n\n5. इस सत्र में कुल सेब उत्पादन कितने रहने का अनुमान है?\nबागवानी विभाग के अनुसार इस साल कुल उत्पादन करीब 1.5 करोड़ बक्से या 3.5 लाख से 3.75 लाख टन के बीच रहने का अनुमान है, जो पिछले साल 7 लाख टन था।\n\n6. बागवानों को राहत देने के लिए राज्य सरकार क्या कदम उठा रही है?\nराज्य सरकार बाजार हस्तक्षेप योजना (एमआईएस) के तहत खरीद मूल्य बढ़ाने जा रही है, जिसका प्रस्ताव मंत्रिमंडल की बैठक में लाया जाएगा।\n\n7. उत्पादन बढ़ाने के लिए बागवानी विभाग क्या नई तकनीक अपना रहा है?\nविभाग घनी बागवानी को बढ़ावा दे रहा है और करसोग में 1,00,000 से 1,50,000 अधिक घनत्व वाले पौधे तैयार किए जा रहे हैं।",
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  "category": "हिमाचल प्रदेश",
  "publishedAt": "2026-10-02",
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