# हिमालयी राज्यों में बाढ़ की विभीषिका से बचाव के लिए रणनीति, विशेषज्ञ देवेंद्र कुमार शर्मा ने दिए अहम सुरक्षा सुझाव

> नेपाल में 26 अगस्त को आई भयंकर बाढ़ के बाद पूरे हिमालयी क्षेत्र की आपदा तैयारियों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। इंटरनेशनल कमिशन ऑन लार्ज डैम्स के अध्यक्ष देवेंद्र कुमार शर्मा ने हिमाचल और पड़ोसी राज्यों को तबाही से बचाने के लिए बहुस्तरीय सुरक्षा कदम उठाने का सुझाव दिया है।

**Type:** article · **Category:** हिमाचल प्रदेश · **Published:** 2026-09-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/himachal-pradesh/himalayi-rajyon-men-barha-ki-vibhishika-se-bachava-ke-lie-rananiti-visheshajna-devendra-kumar-sharma-ne-die-ahama-suraksha-sujhava-27103 · **Language:** Hindi
**Tags:** हिमाचल बाढ़, नेपाल बाढ़, देवेंद्र कुमार शर्मा, जलवायु परिवर्तन, बांध सुरक्षा, अर्ली वार्निंग सिस्टम, ग्लेशियर झील, हिमालय आपदा

हिमालयी भूभाग में जलवायु परिवर्तन का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है, जिसका सीधा असर पहाड़ों पर बसे इलाकों और वहां की आबादी पर पड़ रहा है। नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी आपदा ने न केवल एक पड़ोसी मुल्क को भारी नुकसान पहुंचाया, बल्कि संपूर्ण हिमालयी बेल्ट के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी भी बजा दी है। इस घटना ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों के बीच हमारी मौजूदा सुरक्षा प्रणाली कितनी कारगर है। लगभग 18 महीने पहले, यानी मार्च 2025 में ही भारत ने नेपाल सरकार को जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाले इस तरह के चरम मौसमी खतरों के प्रति आगाह किया था। भारत द्वारा साझा किए गए उस दस्तावेज में बढ़ते तापमान, तेजी से पिघलते हिमनदों, हिमनदीय झीलों के फैलाव और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी प्राकृतिक चुनौतियों का स्पष्ट उल्लेख किया गया था। नेपाल की हालिया तबाही ने यह साबित कर दिया है कि इन चेतावनियों को नजरअंदाज करना कितना भारी पड़ सकता है।

## साझा पारिस्थितिकी और जलवायु परिवर्तन का वैश्विक संकट
पर्यावरण विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि आने वाले समय में इस प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता और बढ़ सकती है। इसमें सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्र हमारा हिमालयी गलियारा है। जलवायु परिवर्तन को इस तबाही का प्राथमिक और सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। दुनिया भर में किए गए विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों से यह निष्कर्ष निकलकर सामने आया है कि किसी एक विशिष्ट गांव, शहर, राज्य या देश को इस पर्यावरणीय असंतुलन के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए वैश्विक स्तर पर सभी देश जिम्मेदार हैं। यह भी एक स्थापित तथ्य है कि विकसित राष्ट्रों ने औद्योगिक प्रगति के नाम पर पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। यही वजह है कि अब इस आपदा से मुकाबला करने के लिए अंतरराष्ट्रीय एकजुटता और संयुक्त प्रयास के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है।

## आपदा के समय नेपाल में मौजूदगी और मैदानी हकीकत
इंटरनेशनल कमिशन ऑन लार्ज डैम्स के अध्यक्ष तथा भारत सरकार के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी बोर्ड के सदस्य देवेंद्र कुमार शर्मा ने इस पूरे घटनाक्रम और पर्वतीय क्षेत्रों पर मंडराते जोखिमों पर अपने गहन अनुभव साझा किए हैं। विशेष बात यह है कि जिस दिन नेपाल में 26 अगस्त की विनाशकारी घटना घटित हुई, उस समय देवेंद्र कुमार शर्मा स्वयं नेपाल में ही उपस्थित थे। तबाही के अगले ही दिन उन्होंने वहां के जलविद्युत विशेषज्ञों, अभियंताओं और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के साथ विस्तृत बैठकें कीं और जमीनी हालात का जायजा लिया। उनके अनुसार, प्रकृति के सामने आपदाओं को पूरी तरह रोकना भले ही संभव न हो, लेकिन सही रणनीति, पूर्व तैयारी और त्वरित प्रबंधन के जरिए जान-माल के नुकसान को न्यूनतम स्तर पर लाया जा सकता है।

## भारत द्वारा 18 महीने पहले साझा की गई चेतावनी रिपोर्ट
भारत ने मार्च 2025 में नेपाल के साथ एक बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज साझा किया था, जिसका शीर्षक ‘प्रपोज्ड कोऑपरेशन बिटवीन इंडिया एंड नेपाल ऑन अकाउंट ऑफ इंपैक्ट ऑफ क्लाइमेट CHANGE ऑन नेपाल’ था। इस विस्तृत रिपोर्ट का मकसद केवल भावी खतरों की पहचान करना मात्र नहीं था, बल्कि बदलती जलवायु के दौर में पूर्व चेतावनी प्रणालियों को स्थापित करने, नियमित निगरानी रखने, वैज्ञानिक आंकड़ों के आदान-प्रदान और सीमा पार द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करने पर जोर देना था। इस रिपोर्ट में मुख्य बल इस बात पर दिया गया था कि संकट की सूचना कितनी तेजी से निचले इलाकों में रहने वाली आबादी तक पहुंचाई जा सकती है। सूचना प्रसार का समय ही यह तय करता है कि प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने के लिए कितना समय उपलब्ध हो सकेगा। नेपाल के घटनाक्रम ने इन सभी प्राथमिकताओं की महत्ता को पुनः रेखांकित किया है।

## सुरक्षा के तीन प्रमुख स्तंभ और जन-सामान्य तक चेतावनी की पहुंच
देवेंद्र कुमार शर्मा ने आपदा प्रबंधन के लिए तीन मुख्य मोर्चों पर तत्काल काम करने की आवश्यकता जताई है। पहला मोर्चा है एक अत्याधुनिक और विश्वसनीय अर्ली वार्निंग सिस्टम का निर्माण। दूसरा मोर्चा है पर्यावरण तथा स्थानीय प्राकृतिक संरचना के अनुकूल ही निर्माण कार्यों को स्वीकृति देना। तीसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण मोर्चा है जोखिम वाले क्षेत्रों की माइक्रो लैंड जोनिंग करके वहां किसी भी प्रकार के निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना। उन्होंने स्पष्ट किया कि चेतावनी संदेश केवल सरकारी दफ्तरों या प्रशासनिक अफसरों की टेबल तक सीमित रहने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा। चेतावनी हर नागरिक, दूर-दराज के गांव, नदी किनारे बसे परिवारों, पर्यटकों और आम मोबाइल फोन यूजर तक तुरंत पहुंचनी चाहिए। इसके साथ ही, स्थानीय लोगों को इस बात का स्पष्ट प्रशिक्षण होना आवश्यक है कि अलर्ट मिलते ही उन्हें किस सुरक्षित मार्ग से कहां जाना है।

## बांधों की सुरक्षा समीक्षा और डिजाइन मानकों में बदलाव
पर्वतीय क्षेत्रों में जलाशयों और बड़े जलविद्युत ढांचों की सुरक्षा पर प्रकाश डालते हुए देवेंद्र कुमार शर्मा ने बताया कि भारत में वर्तमान में लगभग 6,600 बड़े बांध संचालित हो रहे हैं। तेजी से बदलते मौसम और अत्यधिक वर्षा के पैटर्न को देखते हुए इन सभी बांधों के सुरक्षा और डिजाइन मानकों का पुनर्मूल्यांकन करना अनिवार्य हो गया है। अब नए बांधों की डिजाइनिंग केवल पुराने जलविज्ञान संबंधी आंकड़ों के भरोसे नहीं की जा सकती। आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन, अचानक होने वाली मूसलाधार बारिश और अप्रत्याशित जलस्तर को ध्यान में रखकर ही नई संरचनाएं बनाई जानी चाहिए। इसके अलावा, आवश्यकता पड़ने पर पुराने निर्मित बांधों में भी तकनीकी बदलाव और आधुनिकीकरण किया जाना चाहिए ताकि अत्यधिक बाढ़ की स्थिति में अतिरिक्त पानी को बिना किसी खतरे के बाहर निकाला जा सके। यद्यपि हिमाचल प्रदेश और अन्य पर्वतीय राज्यों में बांधों का निर्माण बेहतर गुणवत्ता के साथ हुआ है, फिर भी बदलते वक्त के साथ उनकी गहन समीक्षा बेहद जरूरी है।

## सीमा पार निगरानी और तिब्बत के ऊंचाई वाले क्षेत्रों पर नजर
नेपाल की हालिया आपदा ने क्षेत्रीय निगरानी प्रणाली की एक बड़ी सीमा को उजागर किया है। यदि किसी प्राकृतिक आपदा की शुरुआत सीमा के दूसरी तरफ अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों से होती है, तो निचले हिस्से में स्थित देश की अपनी एकल निगरानी व्यवस्था नाकाफी साबित होती है। हिमालय एक साझा और अंतरसंबंधित पारिस्थितिक तंत्र है। नेपाल, भारत और तिब्बत-चीन के उच्च पर्वतीय इलाकों में होने वाली किसी भी भूगर्भीय या मौसमी हलचल का सीधा प्रभाव नीचे बहने वाली नदियों और बसे हुए मैदानी इलाकों पर पड़ता है। इसलिए सीमा पार से उपग्रह निगरानी, आंकड़ों का त्वरित आदान-प्रदान और ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों पर सतत नजर बनाए रखना आवश्यक है। चूंकि हिमालय से निकलने वाली नदियां कई अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पार करती हैं, इसलिए बाढ़ नियंत्रण और हिमनद प्रबंधन का काम पूरे नदी बेसिन के एकीकृत क्षेत्रीय सहयोग के आधार पर ही संभव है।

## हिमाचल प्रदेश के लिए चेतावनी और हिमनदीय झीलों का अध्ययन
नेपाल के इस घटनाक्रम के आलोक में हिमाचल प्रदेश के संदर्भ में भी स्थिति अत्यंत संवेदनशील मानी जा रही है। हिमाचल प्रदेश में मौजूद हिमनदों और उनसे बनी झीलों का निरंतर और सूक्ष्म अध्ययन करना समय की सबसे बड़ी मांग है। अगर उच्च हिमालयी क्षेत्रों में झीलों के फटने या अत्यधिक वर्षा से जलस्तर अचानक बढ़ता है, तो नीचे बसे बस्तियों और बुनियादी ढांचों को भारी क्षति पहुंच सकती है। इसके लिए हिमाचल प्रदेश सरकार और केंद्रीय एजेंसियों को मिलकर राज्य की सभी संवेदनशील हिमनदीय झीलों की नियमित सैटेलाइट और मैदानी मैपिंग करनी होगी, ताकि नेपाल जैसी किसी भी अनहोनी की पुनरावृत्ति से बचा जा सके और स्थानीय नागरिकों का जीवन पूरी तरह सुरक्षित रहे।

## इसका आप पर असर
हिमालयी राज्यों में आने वाली प्राकृतिक आपदाएं और बदलता मौसम आम लोगों की सुरक्षा, संपत्ति और रोजमर्रा की जिंदगी को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।

- **भारत में:** पहाड़ी और मैदानी इलाकों में रहने वाले करोड़ों नागरिकों की सुरक्षा के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम और बांधों के नए सुरक्षा मानक लागू किए जा रहे हैं। इससे नदियों के किनारे बसे परिवारों को किसी भी आपात स्थिति में सुरक्षित निकलने का पर्याप्त समय मिल सकेगा।
- **हिमाचल प्रदेश में:** राज्य की संवेदनशील हिमनदीय झीलों और नदी घाटियों की सूक्ष्म निगरानी से स्थानीय बस्तियों, सेब के बागानों और जलविद्युत परियोजनाओं को बाढ़ के खतरे से बचाने में मदद मिलेगी।
- **पर्यटकों और यात्रियों के लिए:** मौसम की सटीक चेतावनी सीधे मोबाइल पर मिलने से पहाड़ी रास्तों पर यात्रा करने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
- **स्थानीय निर्माण और रोजगार पर:** जोखिम वाले इलाकों में निर्माण पर रोक और माइक्रो लैंड जोनिंग से असुरक्षित ढांचों के गिरने का खतरा खत्म होगा।

## सवाल-जवाब

### 1. नेपाल में 26 अगस्त को क्या घटना हुई थी?
नेपाल में 26 अगस्त को भारी बाढ़ और तबाही आई थी, जिसने पूरे हिमालयी क्षेत्र की आपदा तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

### 2. भारत ने नेपाल को जलवायु परिवर्तन पर कब चेताया था?
भारत ने मार्च 2025 में नेपाल सरकार के साथ एक विस्तृत रिपोर्ट साझा करके जलवायु परिवर्तन, हिमनदों के बदलाव और बाढ़ के खतरों के प्रति आगाह किया था।

### 3. देवेंद्र कुमार शर्मा कौन हैं और उन्होंने क्या सुझाव दिए?
देवेंद्र कुमार शर्मा इंटरनेशनल कमिशन ऑन लार्ज डैम्स के अध्यक्ष और भारत के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी बोर्ड के सदस्य हैं। उन्होंने अर्ली वार्निंग सिस्टम, माइक्रो लैंड जोनिंग और बांधों की सुरक्षा समीक्षा का सुझाव दिया है।

### 4. भारत में कुल कितने बड़े बांध हैं जिनकी सुरक्षा समीक्षा की बात कही गई है?
भारत में लगभग 6,600 बड़े बांध हैं, जिनके सुरक्षा और डिजाइन मानकों को बदलते जलवायु पैटर्न के अनुसार समीक्षा करने की आवश्यकता बताई गई है।

### 5. हिमाचल प्रदेश के लिए क्या विशेष कदम उठाने का सुझाव दिया गया है?
हिमाचल प्रदेश में स्थित सभी संवेदनशील हिमनदीय झीलों और नदियों की निरंतर मैपिंग और अध्ययन करने का सुझाव दिया गया है ताकि बाढ़ के खतरे को रोका जा सके।

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