लाहौल-स्पीति में घेपन ग्लेशियल झील का मुआयना करने 14 किमी पैदल पहुंचीं डीसी, सैलाब के खतरे पर अलर्ट लाहौल-स्पीति में 4,070 मीटर ऊंची घेपन झील का जलस्तर बढ़ने से प्रशासन सतर्क हो गया है। उपायुक्त किरण भड़ाना ने 14 किलोमीटर पैदल चढ़ाई कर स्थिति का निरीक्षण किया और चेतावनी दी कि झील फटने पर पानी 5 मिनट में बस्तियों तक पहुंच सकता है। हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिले लाहौल-स्पीति में अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित हिमनद झीलों की संवेदनशीलता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने व्यापक स्तर पर सतर्कता बरतनी शुरू कर दी है। समुद्र तल से 4,070 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद घेपन ग्लेशियल झील में पानी की बढ़ती मात्रा ने संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की आशंका को गहरा कर दिया है। इसी खतरे की जमीनी हकीकत परखने के लिए जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) की अध्यक्ष एवं उपायुक्त किरण भड़ाना ने खुद दुर्गम रास्तों पर 14 किलोमीटर की सीधी और कठिन पैदल चढ़ाई पूरी की और झील के मुहाने पर पहुंचकर वर्तमान परिस्थितियों की गहन समीक्षा की। 10 विभागों के 15 अधिकारियों के दल ने परखे जमीनी हालात इस जोखिम भरे निरीक्षण अभियान में उपायुक्त के साथ 10 अलग-अलग प्रशासनिक एवं तकनीकी विभागों से जुड़े 15 अधिकारियों और कर्मचारियों का एक संयुक्त दल मौके पर पहुंचा। इस तकनीकी दल ने झील के मौजूदा जलस्तर, उसके चारों ओर मौजूद चट्टानी संरचना, मिट्टी की स्थिरता और यदि पानी का रिसाव या तटबंध टूटन होती है तो संभावित बहाव मार्ग क्या रहेगा, इसका बारीकी से अध्ययन किया। मौके पर ही इस बात पर भी तकनीकी विमर्श हुआ कि झील के बढ़ते दबाव को नियंत्रित करने के लिए पानी की निकासी के क्या उपाय हो सकते हैं। इलाका बेहद बीहड़ और खतरनाक होने के चलते तकनीकी टीम ने रात का ठहराव बेस कैंप में किया, जबकि उपायुक्त उसी दिन अपना मुआयना समाप्त कर नीचे लौट आईं। बाकी दल अगले दिन बुधवार दोपहर बाद जिला मुख्यालय केलांग सुरक्षित वापस पहुंचा। चंद मिनटों में बस्तियों तक तबाही का पानी पहुंचने का अंदेशा निरीक्षण के बाद उपायुक्त किरण भड़ाना ने वस्तुस्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि घेपन झील के ऊपरी और नजदीकी हिस्सों में कई बड़े ग्लेशियर और खड़े पहाड़ मौजूद हैं। नेपाल में हाल ही में ग्लेशियर टूटने की वजह से आई विनाशकारी आपदा ने यह साबित कर दिया है कि इन ग्लेशियरों की स्थिरता पर लगातार नजर रखना कितना आवश्यक है। प्रारंभिक वैज्ञानिक अनुमानों में यह माना गया था कि झील का किनारा टूटने की स्थिति में बहाव को आबादी वाले इलाकों तक पहुंचने में लगभग 22 मिनट का वक्त लगेगा। इसके विपरीत, व्यावहारिक और भौगोलिक ढलान को देखते हुए यह सैलाब 5 मिनट के भीतर ही नीचे बसी बस्तियों में तबाही मचा सकता है। ऐसे नाजुक हालात में रिहायशी इलाकों की सुरक्षा के लिए मजबूत निकासी व्यवस्था, नियमित मॉक ड्रिल और स्थानीय लोगों को जागरूक करने की मुहिम तुरंत शुरू की जानी है। इसके लिए राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के साथ मिलकर विस्तृत योजना तैयार की जा रही है। सी-डैक प्रणाली और प्रारंभिक चेतावनी तंत्र की स्थापना पर जोर संभावित प्राकृतिक आपदा से जान-माल के नुकसान को न्यूनतम करने के लिए प्रशासन घेपन झील में अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की दिशा में तेजी से कदम उठा रहा है। सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (सी-डैक) तिरुवनंतपुरम द्वारा तैयार किए गए इस चेतावनी तंत्र का पूर्व में सिस्सु झील में सफल परीक्षण किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के विशेषज्ञ भी इस झील की भौगोलिक जटिलताओं का विस्तृत अध्ययन कर चुके हैं। उपायुक्त के अनुसार हिमालय के इन दुर्गम और तेजी से बदलते भौगोलिक परिवेश में निरंतर तकनीकी निगरानी, पूर्व तैयारी और सभी विभागों का साझा तालमेल ही किसी बड़े खतरे से बचने का सबसे प्रभावी उपाय है। इसका आप पर असर लाहौल-स्पीति की घेपन झील में जलस्तर बढ़ने और संभावित बाढ़ के खतरे से घाटी के संवेदनशील निचले इलाकों में रहने वाले निवासियों की सुरक्षा पर सीधा असर पड़ा है। • लाहौल-स्पीति में: नदी किनारे और निचले इलाकों में बसी आबादी के लिए आपातकालीन निकासी और सतर्कता के निर्देश लागू किए जा रहे हैं। स्थानीय निवासियों को संभावित खतरे के समय सुरक्षित स्थानों पर जाने के लिए मॉक ड्रिल और जागरूकता सत्रों में भाग लेना होगा। • भारत में: हिमालयी राज्यों में ग्लेशियल झीलों के बढ़ते जोखिम को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर आपदा नीतियों में बदलाव किए जा रहे हैं। संवेदनशील ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पर्यटकों और स्थानीय यात्रियों के लिए मौसम व भूवैज्ञानिक चेतावनियों पर नजर रखना अनिवार्य हो गया है। • आपातकालीन चेतावनी: सी-डैक द्वारा विकसित अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित होने से लोगों को बाढ़ की स्थिति में समय रहते अलर्ट मिल सकेगा। इससे ग्रामीणों को सुरक्षित ठिकानों की तरफ भागने के लिए जीवनरक्षक अतिरिक्त समय प्राप्त होगा। • प्रशासनिक तैयारी: 10 विभागों के संयुक्त दल की समीक्षा के बाद जोखिम प्रबंधन और जलस्तर घटाने के उपायों पर काम तेज किया जा रहा है। नदी किनारे किसी भी तरह के अस्थाई निर्माण या अनावश्यक आवागमन पर रोक लगाई जा सकती है। ऐसा क्यों हुआ घेपन ग्लेशियल झील के बढ़ते जलस्तर और अचानक आने वाली बाढ़ के खतरे के पीछे हिमालयी क्षेत्र में मौजूद ग्लेशियरों की अस्थिरता और भौगोलिक परिस्थितियां मुख्य कारण हैं। नेपाल में हाल ही में ग्लेशियर टूटने से मची तबाही ने इस पूरे क्षेत्र की संवेदनशीलता को उजागर कर दिया है। • ग्लेशियरों की अस्थिरता: घेपन झील के आसपास अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित पर्वतों और विशाल ग्लेशियरों में प्राकृतिक बदलाव हो रहे हैं। नेपाल में ग्लेशियर टूटने की हालिया घटना ने पर्वतीय संरचनाओं के अचानक दरकने के गंभीर खतरे को प्रत्यक्ष रूप से सामने ला दिया है। • जलस्तर में निरंतर वृद्धि: 4,070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस हिमनद झील में पानी की मात्रा लगातार बढ़ रही है। झील के प्राकृतिक तटबंधों पर अतिरिक्त पानी का भारी दबाव बनने से उसके टूटने की संभावना बढ़ जाती है। • कठिन ढलान और भौगोलिक बनावट: झील और निचले इलाकों के बीच का भू-भाग अत्यधिक सीधा और ढलवा है। इसी ढलान के कारण यदि झील का तटबंध टूटता है तो पानी को रिहायशी इलाकों तक पहुंचने में मात्र 5 मिनट का समय लग सकता है। सवाल-जवाब 1. घेपन ग्लेशियल झील किस जिले में और कितनी ऊंचाई पर स्थित है? घेपन झील हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में समुद्र तल से 4,070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। 2. उपायुक्त किरण भड़ाना ने झील तक पहुंचने के लिए कितनी दूरी पैदल तय की? उपायुक्त किरण भड़ाना ने झील की स्थिति का जायजा लेने के लिए 14 किलोमीटर की कठिन पैदल चढ़ाई पूरी की। 3. निरीक्षण दल में कितने विभागों के अधिकारी शामिल थे? इस निरीक्षण अभियान में 10 अलग-अलग विभागों के 15 अधिकारी और कर्मचारी शामिल हुए थे। 4. झील टूटने की स्थिति में पानी को आबादी तक पहुंचने में कितना समय लग सकता है? प्रारंभिक आकलन में 22 मिनट का अनुमान लगाया गया था, लेकिन व्यावहारिक तौर पर पानी मात्र 5 मिनट के भीतर आबादी तक पहुंच सकता है। 5. झील में किस तकनीकी संस्थान द्वारा विकसित अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया जा रहा है? सी-डैक तिरुवनंतपुरम द्वारा विकसित अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया जा रहा है, जिसका सिस्सु झील में पहले ही परीक्षण हो चुका है। https://trendkia.com/himachal-pradesh/lahaul-spiti-men-ghepan-gleshiyala-jhila-ka-muayana-karane-14-kimi-paidala-pahunchin-dc-sailaba-ke-khatare-para-alarta-37060 TrendKia — Har trend, sabse pehle.