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  "type": "article",
  "title": "नागपुर से 1800 किलोमीटर दूर चलकर हिमाचल के रेणुका चिड़ियाघर पहुंचा रॉयल बंगाल टाइगर का जोड़ा",
  "summary": "महाराष्ट्र के नागपुर से 43 घंटे का सफर तय कर रॉयल बंगाल टाइगर का एक जोड़ा हिमाचल प्रदेश के सिरमौर स्थित श्री रेणुका जी चिड़ियाघर पहुंच गया है, जिससे एक दशक से खाली पड़े बाड़े में फिर रौनक लौटेगी।",
  "content": "हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में स्थित श्री रेणुका जी चिड़ियाघर में करीब दस वर्षों के लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर बड़ी बिल्ली की गूंज सुनाई देगी। महाराष्ट्र के नागपुर स्थित बाला साहेब ठाकरे गोरेवाड़ा अंतरराष्ट्रीय प्राणी उद्यान से रॉयल बंगाल टाइगर के एक नर और मादा जोड़े को अत्यंत कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच यहां सुरक्षित पहुंचा दिया गया है। रविवार की शाम जब यह जोड़ा चिड़ियाघर परिसर में दाखिल हुआ, तो वन्यजीव प्रेमियों और वन विभाग के अधिकारियों के चेहरे खिल उठे। लगभग 1800 किलोमीटर लंबे इस सफर को पूरा करने में करीब 43 घंटे का समय लगा। इस दौरान वन्य प्राणी विभाग के विशेषज्ञों और डॉक्टरों की एक विशेष टीम पूरे रास्ते दोनों बाघों की निगरानी और देखभाल करती रही।\n\nहिमाचल के लिए क्यों खास है यह कदम\nहिमाचल प्रदेश के इतिहास में यह पहला अवसर है जब राज्य के किसी चिड़ियाघर में रॉयल बंगाल टाइगर को लाया गया है। अरण्यपाल वन्य प्राणी विभाग डॉ शहनबाज अहमद के अनुसार यह पहल राज्य के लिए एक बेहद अहम और महत्वाकांक्षी योजना थी, जो औपचारिकताओं के लंबे दौर के बाद अब धरातल पर उतरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार के कड़े नियमों और दिशानिर्देशों के तहत कई जरूरी स्वीकृतियां हासिल की गईं। इस पूरी अंतरराज्यीय स्थानांतरण प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए महाराष्ट्र सरकार का भी सहयोग रहा, जिसके बाद वन विभाग की टीम ने नागपुर से इन बाघों को रेणुका झील क्षेत्र तक सुरक्षित पहुंचाया।\n\nआधुनिक सुविधाओं वाला नया बाड़ा और अस्पताल\nबाघ के इस नए जोड़े को प्राकृतिक और आरामदायक माहौल देने के लिए विशेष तैयारियां की गई हैं। चिड़ियाघर प्रबंधन ने इनके लिए 1.67 करोड़ रुपये की लागत से अत्याधुनिक सुविधाओं वाला नया बाड़ा तैयार किया है। इसके साथ ही परिसर में किसी भी आपातकालीन स्थिति और स्वास्थ्य परीक्षण के लिए एक आधुनिक वन्य प्राणी अस्पताल भी स्थापित किया गया है। अधिकारियों को पूरी उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यह नर और मादा जोड़ा अनुकूलन के बाद अपनी वंशवृद्धि करेगा, जिससे चिड़ियाघर में इनकी संख्या बढ़ेगी। यह नया आकर्षण क्षेत्र में आने वाले सैलानियों और वन्यजीव उत्साही लोगों के लिए भी एक बड़ा केंद्र बनेगा।\n\nशेरों के कुनबे के खात्मे के बाद वीरान पड़ी थी सफारी\nश्री रेणुका जी चिड़ियाघर का यह हिस्सा लंबे समय से खाली पड़ा था। वर्ष 2015 में यहां मौजूद एशियाई शेरों के अंतिम कुनबे के खत्म होने के बाद से लायन सफारी पूरी तरह वीरान हो गई थी। स्थानीय स्तर पर लगातार मांग उठ रही थी कि यहां फिर से शेरों को बसाया जाए। हालांकि, शेरों की अनुपलब्धता के चलते प्रशासन ने अपनी योजना बदली और शेरों की जगह रॉयल बंगाल टाइगर को लाने की कवायद शुरू की। भौगोलिक दृष्टि से हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक रूप से शेरों या बाघों की स्थायी आबादी नहीं पाई जाती है। हालांकि सिरमौर जिले में एक दो बार कैमरों में बाघ की हलचल जरूर दर्ज की गई थी, लेकिन वे उत्तराखंड के वन्य क्षेत्रों से सीमा पार कर हिमाचल की सीमा में दाखिल हुए थे। ऐसे में इस चिड़ियाघर में बाघों की मौजूदगी राज्य के वन्यजीव संरक्षण इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ती है।\n\nइसका आप पर असर\nइस चिड़ियाघर में रॉयल बंगाल टाइगर के जोड़े के आगमन से स्थानीय पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े पहलुओं पर सीधा असर पड़ेगा।\n\n• भारत में: अंतरराज्यीय वन्यजीव आदान-प्रदान कार्यक्रम के तहत अन्य राज्यों के पर्यटक भी अब हिमाचल में पहली बार चिड़ियाघर में बाघ देख सकेंगे। इससे हिमालयी राज्यों में वन्यजीव संरक्षण और आधुनिक चिड़ियाघर प्रबंधन के मानकों को नया बढ़ावा मिलेगा।\n• सिरमौर में: सिरमौर जिले के श्री रेणुका जी क्षेत्र में सैलानियों की आमद बढ़ने से स्थानीय गाइड, होटल और छोटे व्यापारियों के रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। करीब दस साल से वीरान पड़ी सफारी में रौनक लौटने से स्थानीय नागरिकों को एक प्रमुख पर्यटन स्थल दोबारा सक्रिय मिलेगा।\n• पर्यटकों और छात्रों के लिए: वन्यजीवों का अध्ययन करने वाले छात्रों और शोधकर्ताओं को स्थानीय स्तर पर आधुनिक सुविधाओं वाले बाड़े में बाघों के व्यवहार को समझने का मौका मिलेगा। आगंतुकों को अब बाघ देखने के लिए मैदानी राज्यों के दूरदराज चिड़ियाघरों का रुख नहीं करना पड़ेगा।\n• पशु स्वास्थ्य ढांचे में बदलाव: चिड़ियाघर में 1.67 करोड़ रुपये से तैयार बाड़े और नए वन्य प्राणी अस्पताल से अन्य वन्यजीवों के उपचार की सुविधाएं भी मजबूत होंगी। इस केंद्र से क्षेत्र में किसी भी बीमार या घायल वन्यजीव को त्वरित चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जा सकेगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह स्थानांतरण श्री रेणुका जी चिड़ियाघर के लंबे समय से खाली पड़े सफारी क्षेत्र को दोबारा आबाद करने और राज्य में पहली बार बाघों की उपस्थिति दर्ज कराने के उद्देश्य से किया गया है।\n\n• एशियाई शेरों के कुनबे की समाप्ति: वर्ष 2015 में चिड़ियाघर के भीतर मौजूद एशियाई शेरों का अंतिम कुनबा पूरी तरह समाप्त हो गया था। इसके बाद से वहां की लायन सफारी पूरी तरह खाली पड़ी थी और पर्यटक किसी भी बड़ी बिल्ली को नहीं देख पा रहे थे।\n• शेरों की अनुपलब्धता: लंबे समय तक शेरों को दोबारा लाने की मांग की जाती रही, लेकिन पर्याप्त शेरों की उपलब्धता न होने के कारण यह संभव नहीं हो सका। इसके चलते अधिकारियों ने अपनी योजना बदली और शेरों की जगह रॉयल बंगाल टाइगर को लाने का निर्णय लिया।\n• नागपुर से अंतरराज्यीय समझौता: महाराष्ट्र के बाला साहेब ठाकरे गोरेवाड़ा अंतरराष्ट्रीय प्राणी उद्यान से इन बाघों को लेने के लिए केंद्र सरकार के नियमों के अनुसार औपचारिकताएं पूरी की गईं। सभी अनुमतियां मिलने के बाद 43 घंटे की यात्रा कराकर इस जोड़े को सुरक्षित हिमाचल पहुंचाया गया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. रॉयल बंगाल टाइगर के जोड़े को किस चिड़ियाघर में लाया गया है?\nइस जोड़े को हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में स्थित श्री रेणुका जी चिड़ियाघर में लाया गया है।\n\n2. इन बाघों को कहां से लाया गया है और इन्होंने कितनी दूरी तय की?\nइन्हें महाराष्ट्र के नागपुर स्थित बाला साहेब ठाकरे गोरेवाड़ा अंतरराष्ट्रीय प्राणी उद्यान से लाया गया है और इन्होंने लगभग 1800 किलोमीटर का सफर तय किया।\n\n3. नागपुर से हिमाचल तक का सफर पूरा करने में कितना समय लगा?\nइस सड़क यात्रा को पूरा करने में लगभग 43 घंटे का समय लगा, जिसमें वन्य प्राणी विभाग की विशेष टीम लगातार साथ रही।\n\n4. बाघों के बाड़े और अस्पताल पर कितना खर्च किया गया है?\nबाघों के लिए आधुनिक सुविधाओं से युक्त बाड़ा तैयार करने पर 1.67 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं और साथ ही एक वन्य प्राणी अस्पताल भी बनाया गया है।\n\n5. रेणुका चिड़ियाघर में बड़ी बिल्लियों का बाड़ा कब से खाली था?\nवर्ष 2015 में एशियाई शेरों का कुनबा खत्म होने के बाद से यह सफारी क्षेत्र करीब दस साल से वीरान पड़ा था।\n\n6. क्या हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक रूप से बाघ या शेर पाए जाते हैं?\nहिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक तौर पर शेर या बाघ नहीं होते हैं, हालांकि सिरमौर में एक-दो बार उत्तराखंड की सीमा से दाखिल हुए बाघ कैमरों में दर्ज हुए हैं।",
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  "category": "हिमाचल प्रदेश",
  "publishedAt": "2026-09-21",
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