शिमला में मुख्यमंत्री कार्यालय पर तकरार तेज, मंत्री यादविंद्र गोमा ने विपक्ष के आरोपों को नकारा हिमाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री के नए कार्यस्थल को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बयानबाजी छिड़ गई है, जहां भाजपा ने फिजूलखर्ची के आरोप लगाए वहीं कैबिनेट मंत्री ने इसे राज्य की स्थायी संपत्ति बताया। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में शासन के शीर्ष स्तर पर बने नए कार्यस्थल को केंद्र में रखकर राजनीतिक तल्खी चरम पर पहुंच गई है। विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी की तरफ से सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार पर राजकोषीय प्राथमिकताओं की अनदेखी का आरोप लगाया गया है। इसके जवाब में प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री यादविंद्र गोमा ने मोर्चा संभालते हुए स्पष्ट किया कि तैयार हुआ परिसर किसी व्यक्ति विशेष का नहीं बल्कि राज्य की स्थायी धरोहर है, जिसका उपयोग आने वाले समय में पद संभालने वाले सभी नेता करेंगे। गोमा का विपक्ष पर पलटवार और व्यय की तुलना विपक्षी हमले का प्रत्युत्तर देते हुए कैबिनेट मंत्री यादविंद्र गोमा ने भाजपा विधायक सुधीर शर्मा के निजी आवास से तुलना कर दी। गोमा ने टिप्पणी की कि इस शासकीय स्थल के नवीनीकरण अथवा निर्माण पर हुआ व्यय शर्मा के निजी घर पर खर्च की गई रकम से भी कम है। उन्होंने रेखांकित किया कि कोई भी सार्वजनिक प्रतिनिधि पद से हटने के बाद इन परिसरों को अपने साथ नहीं ले जाता। गोमा ने इस बात पर जोर दिया कि कार्यालय के अंदर उपलब्ध कराई गई सुविधाएं, फर्नीचर और सोफे जैसी वस्तुएं सरकारी तंत्र की व्यवस्था का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा, "मुख्यमंत्री इस कार्यालय को अपने घर लेकर नहीं जाएंगे।" मंत्री ने तंज भरे लहजे में यह भी जोड़ा कि आने वाले वर्षों में जो भी व्यक्ति राज्य के सर्वोच्च प्रशासनिक पद पर बैठेगा, वह इसी परिसर और संसाधनों का इस्तेमाल जनता के कार्यों के लिए करेगा। आपदा राहत के 1500 करोड़ और केंद्र पर आरोप गोमा ने केवल निर्माण खर्च के विवाद पर ही बात नहीं की, बल्कि भाजपा के शीर्ष नेताओं पर राज्य के हितों को चोट पहुंचाने का गंभीर लांछन लगाया। उनका कहना था कि विपक्षी खेमे के प्रमुख चेहरे दिल्ली जाकर राज्य को मिलने वाली आर्थिक सहायता के मार्ग में रोड़े अटकाते हैं। उन्होंने पिछले वर्ष पहाड़ी राज्य में आई विनाशकारी प्राकृतिक विभीषिका का उल्लेख करते हुए बताया कि केंद्र सरकार द्वारा राहत पैकेज के रूप में घोषित किया गया फंड अब तक पूरी तरह धरातल पर नहीं पहुंचा है। मंत्री के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस समय भारी संकट को देखते हुए 1500 करोड़ रुपये के वित्तीय सहयोग का ऐलान किया था। हालांकि यह घोषित सहायता राशि अब तक राज्य सरकार के खजाने तक नहीं पहुंची है। इसके अलावा गोमा ने विपक्षी दल के भीतर आंतरिक खींचतान और मतभेदों की बात भी कही। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा कई धड़ों में बंट चुकी है, जिसके कारण उनके विभिन्न पदाधिकारी परस्पर विरोधी और असंगत बातें कह रहे हैं। बिंदल ने उठाए फिजूलखर्ची और जनता की दिक्कतों पर सवाल दूसरी तरफ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राजीव बिंदल ने सरकार के इस कदम को जनता के साथ धोखा करार दिया। नेता प्रतिपक्ष जय राम ठाकुर और सुधीर शर्मा सहित अन्य नेताओं के सुर में सुर मिलाते हुए बिंदल ने कहा कि आमजन की बुनियादी सहूलियतों के समय खजाना खाली होने का रोना रोया जाता है। बिंदल ने तंज कसा कि अस्पताल में एक गरीब मरीज की पर्ची के लिए आवश्यक 10 रुपये तक उपलब्ध कराने में तंत्र हाथ खड़े कर देता है, जबकि शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के कक्षों को सजाने में भारी भरकम बजट खपाया जा रहा है। बिंदल ने राजनीतिक सफर का जिक्र करते हुए कहा, "मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का अल्टो कार से शुरू हुआ सफर अब आलीशान गाड़ियों, करोड़ों के दफ्तरों और कोठियों तक पहुंच गया है।" उन्होंने तर्क दिया कि सादगी का दावा करने वाला नेतृत्व अब बेहद विलासितापूर्ण कार्यशैली अपना चुका है, जबकि प्रदेश की आम जनता को कमरतोड़ महंगाई और नए शुल्कों के दलदल में धकेला जा रहा है। प्रशासनिक कटौती और लोक कल्याणकारी योजनाएं भाजपा अध्यक्ष ने राज्य सरकार के 'व्यवस्था परिवर्तन' के नारे पर कड़ा प्रहार करते हुए कई नीतियों को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने बिजली की रियायतों में की गई कटौती, स्टांप शुल्क में बढ़ोतरी, अतिरिक्त उपकर (सेस) लगाने और एचआरटीसी बसों में दी जाने वाली छूटों को वापस लेने के फैसलों की आलोचना की। बिंदल ने कहा कि सेवानिवृत्त कर्मचारी अपनी वित्तीय देनदारियों की मांग को लेकर सड़कों पर हैं, शिक्षित युवा नौकरियों के अवसर खोज रहे हैं और हिमकेयर योजना के तहत स्वास्थ्य सेवाओं के भुगतान लटके हुए हैं। इसके साथ ही बिंदल ने राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क से जुड़े एक डिवीजन और आठ उप-मंडलों (सब-डिवीजन) को अचानक बंद किए जाने पर भी गहरी आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने सवाल किया कि ढांचागत विकास और सड़कों की मरम्मत से जुड़े इन कार्यालयों को समाप्त करने से पहाड़ी इलाकों में संपर्क मार्ग प्रभावित होंगे। भाजपा का कहना है कि सरकार को इन महत्वपूर्ण तकनीकी कार्यालयों को बंद करने के पीछे की वजह सार्वजनिक करनी चाहिए, क्योंकि एक तरफ जरूरी बुनियादी ढांचे को समेटा जा रहा है और दूसरी तरफ विलासिता के साधन जुटाए जा रहे हैं। इसका आप पर असर हिमाचल प्रदेश में सरकारी खर्चों और प्रशासनिक प्राथमिकताओं को लेकर चल रही यह तकरार सीधे तौर पर नागरिकों के करों और स्थानीय सार्वजनिक सुविधाओं से जुड़ी है। • भारत में: आपदा प्रबंधन के लिए केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय सामंजस्य की समीक्षा होगी। जब तक आपदा राहत राशि का पूर्ण हस्तांतरण नहीं होता, राहत कार्य प्रभावित रह सकते हैं। • हिमाचल प्रदेश में: नेशनल हाईवे के एक डिवीजन और आठ सब-डिवीजन बंद होने से स्थानीय स्तर पर सड़कों के रखरखाव में देरी हो सकती है। आम नागरिकों को बिजली सब्सिडी में बदलाव, नई स्टाम्प ड्यूटी, अतिरिक्त सेस और एचआरटीसी की कटौती के कारण रोजमर्रा के खर्चों का दबाव झेलना पड़ सकता है। • पेंशनर्स और युवाओं के लिए: देनदारियों के लंबित रहने और रोजगार के अवसरों में देरी से राज्य के कर्मचारियों तथा युवाओं को अभी और प्रतीक्षा करनी होगी। इसके समाधान के लिए राज्य की वित्तीय स्थिति में सुधार आवश्यक होगा। • मरीजों के लिए: हिमकेयर योजना में भुगतान अड़चनों के चलते राज्य के अस्पतालों में स्वास्थ्य लाभ लेने वाले गरीब परिवारों को उपचार खर्च के प्रति सतर्क रहना होगा। समय पर सत्यापन और क्लेम निपटारे के लिए स्वास्थ्य केंद्रों के निर्देशों का पालन करें। ऐसा क्यों हुआ यह राजनीतिक विवाद तब शुरू हुआ जब राज्य के मुख्यमंत्री के लिए तैयार किए गए नए कार्यालय परिसर और उसके खर्च को विपक्ष ने राजकोषीय संकट के बीच मुद्दा बना दिया। • कार्यालय नवीनीकरण की लागत: विपक्ष ने आरोप लगाया कि राज्य के पास जनकल्याण के लिए धन की कमी है जबकि मुख्यमंत्री और मंत्रियों के नए परिसरों पर करोड़ों खर्च हो रहे हैं। सरकार ने पलटवार करते हुए कहा कि यह राज्य की स्थायी संपत्ति है और खर्च विपक्षी नेताओं के घरों से भी कम है। • आपदा राहत पर खींचतान: सरकार का तर्क है कि राज्य भारी वित्तीय दबाव में है क्योंकि केंद्र की ओर से पिछले वर्ष आई आपदा के 1500 करोड़ रुपये अभी तक प्राप्त नहीं हुए हैं। सत्तारूढ़ दल ने भाजपा नेताओं पर केंद्र से मिलने वाली आर्थिक मदद रोकने की पैरवी करने का आरोप लगाया है। • प्रशासनिक पुनर्गठन के फैसले: राज्य में नेशनल हाईवे से जुड़े एक डिवीजन और आठ उप-मंडलों को बंद करने तथा सब्सिडी में कटौती के प्रशासनिक निर्णयों ने विपक्ष को सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाने का आधार दिया। सवाल-जवाब 1. मुख्यमंत्री के नए कार्यालय को लेकर मुख्य विवाद क्या है? भाजपा का आरोप है कि सरकार जनहित की योजनाओं के बजाय मुख्यमंत्री और मंत्रियों के दफ्तरों पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, जबकि सरकार इसे राज्य की स्थायी संपत्ति बता रही है। 2. कैबिनेट मंत्री यादविंद्र गोमा ने आरोपों का क्या जवाब दिया? गोमा ने कहा कि कार्यालय पर हुआ खर्च भाजपा विधायक सुधीर शर्मा के घर पर हुए खर्च से कम है और यह दफ्तर किसी का निजी नहीं बल्कि आने वाले सभी मुख्यमंत्रियों के उपयोग के लिए है। 3. आपदा राहत के संबंध में मंत्री ने क्या दावा किया? उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आपदा राहत के तहत घोषित 1500 करोड़ रुपये की सहायता राशि अभी तक राज्य सरकार को नहीं मिली है। 4. भाजपा प्रदेश अध्यक्ष राजीव बिंदल ने किन अन्य मुद्दों पर सरकार को घेरा? बिंदल ने बिजली सब्सिडी कटौती, सेस, स्टाम्प ड्यूटी, पेंशनर्स के बकाये, हिमकेयर योजना और एनएच के नौ कार्यालयों को बंद करने को लेकर सवाल उठाए। https://trendkia.com/himachal-pradesh/shimala-men-mukhyamntri-karyalaya-para-takarara-teja-mntri-yadvinder-goma-ne-vipaksha-ke-aropon-ko-nakara-37048 TrendKia — Har trend, sabse pehle.