# शिमला के सरकारी डेंटल कॉलेज में एमडीएस डॉक्टरों का फूटा गुस्सा, स्टाइपेंड और हॉस्टल की मांग को लेकर दी ओपीडी बंद करने की चेतावनी

> शिमला के राजकीय दंत महाविद्यालय में तीन महीने से मानदेय न मिलने और मरीजों के लिए जेब से सामान खरीदने पर रेजिडेंट डॉक्टरों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। डॉक्टरों ने मांगें पूरी न होने पर ओपीडी सेवाएं पूरी तरह ठप करने का अल्टीमेटम दिया है।

**Type:** article · **Category:** हिमाचल प्रदेश · **Published:** 2026-11-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/himachal-pradesh/shimla-ke-sarakari-dentala-koleja-men-mds-doktaron-ka-phuta-gussa-staipenda-aura-hostala-ki-manga-ko-lekara-di-opd-bnda-karane-ki--55920 · **Language:** Hindi
**Tags:** शिमला, डेंटल कॉलेज, एमडीएस डॉक्टर, स्टाइपेंड विवाद, ओपीडी हड़ताल, हिमाचल प्रदेश

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला स्थित राजकीय दंत महाविद्यालय एवं अस्पताल में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रहे एमडीएस रेजिडेंट डॉक्टरों का सब्र आखिरकार टूट गया है। संस्थान परिसर में एकत्रित होकर डॉक्टरों ने बकाया स्टाइपेंड, रहने के लिए हॉस्टल की अनुपलब्धता और अस्पताल में उपचार सामग्री की भारी कमी के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट कहना है कि लगातार तीन महीनों से उन्हें मानदेय जारी नहीं किया गया है, जिसके चलते रोजमर्रा के खर्च चलाने के साथ-साथ अस्पताल में आने वाले मरीजों के दंत उपचार के लिए आवश्यक उपकरण और सामग्री भी उन्हें अपनी जेब से खरीदनी पड़ रही है।

## 'नो स्टाइपेंड, नो वर्क' के नारों से गूंजा कॉलेज परिसर
विरोध जताने के लिए कैंपस में जुटे डॉक्टरों ने व्यवस्था के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शन के दौरान 'नो स्टाइपेंड, नो वर्क' और 'ना बहाने, ना इनकार, हमें चाहिए अपना अधिकार' जैसे नारे गूंजते रहे। डॉक्टरों ने बताया कि नेशनल डेंटल कमीशन (एनडीसी) के स्पष्ट नियमों के मुताबिक सभी रेजिडेंट डॉक्टरों को हर माह के पहले हफ्ते में मानदेय का भुगतान हो जाना चाहिए। इसके विपरीत, शिमला के इस सरकारी कॉलेज में हर बार दो से तीन महीने की भारी देरी के बाद ही स्टाइपेंड जारी होता है। डॉ. प्रणव ने अपनी परेशानी साझा करते हुए बताया कि वे एमडीएस के तीसरे वर्ष में हैं, लेकिन आज भी अपने हक के पैसे मांगने के लिए उन्हें लगातार प्रशासनिक दफ्तरों की चौखट लांघनी पड़ती है। जब भी वे हिसाब विभाग में जाते हैं, उन्हें कोई निश्चित तारीख बताने के बजाय केवल एक टेबल से दूसरी टेबल तक दौड़ाया जाता है।

## 1998 से संचालित संस्थान में आज तक नहीं बना हॉस्टल
वित्तीय संकट के अलावा रेजिडेंट डॉक्टरों ने आवास से जुड़ी गंभीर समस्याओं को भी उजागर किया। डॉ. हृदेश कुमार दीक्षित ने जानकारी दी कि यह डेंटल कॉलेज वर्ष 1998 में स्थापित हुआ था, लेकिन लगभग ढाई दशक बीत जाने के बावजूद आज तक यहां रेजिडेंट डॉक्टरों के लिए आधिकारिक हॉस्टल की व्यवस्था नहीं की जा सकी है। हॉस्टल न होने के कारण डॉक्टरों को मजबूरी में संजौली और उसके नजदीकी इलाकों में महंगे कमरों का किराया देकर रहना पड़ता है। कुछ डॉक्टरों को जंगल से सटे सुदूर क्षेत्रों में शरण लेनी पड़ी है, जहां सुरक्षा के भारी जोखिम बने रहते हैं। हाल ही में जंगल किनारे रहने वाले एक रेजिडेंट डॉक्टर पर बंदरों के हिंसक हमले की घटना भी सामने आ चुकी है, जिससे डॉक्टरों की व्यक्तिगत सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

## मरीजों के इलाज का सामान अपनी जेब से खरीदने की मजबूरी और हड़ताल का अल्टीमेटम
अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए डॉ. तनुजा ठाकुर ने बताया कि विभाग में मरीजों के बेसिक इलाज के लिए जरूरी सामग्री तक उपलब्ध नहीं कराई जाती। ऐसे में मरीजों की तकलीफ दूर करने के लिए डॉक्टरों को खुद बाजार जाकर अपनी जेब से चिकित्सा सामग्री खरीदनी पड़ती है। एक तरफ तीन महीने से स्टाइपेंड रुका हुआ है, दूसरी ओर कमरे का किराया और मरीजों का सामान खरीदने का दोहरा वित्तीय बोझ उन्हें पूरी तरह तोड़ रहा है। डॉक्टरों ने अपनी समस्याओं को लेकर कॉलेज के प्रिंसिपल को औपचारिक पत्र सौंप दिया है और दो टूक चेतावनी दी है कि यदि जल्द से जल्द उनकी समस्याओं का निवारण नहीं किया गया, तो वे ओपीडी सेवाएं ठप कर पूर्ण हड़ताल पर चले जाएंगे। इस पूरे मामले पर कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. योगेश भारद्वाज ने भरोसा दिलाया है कि एमडीएस रेजिडेंट डॉक्टरों के लंबित मानदेय को जारी करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है और संबंधित फाइलों पर उनके हस्ताक्षर होते ही भुगतान कर दिया जाएगा।

## इसका आप पर असर
शिमला में दंत महाविद्यालय के रेजिडेंट डॉक्टरों के प्रदर्शन और संभावित हड़ताल से मरीजों की दंत चिकित्सा सेवाओं पर सीधा असर पड़ने का जोखिम बन गया है।

- **हिमाचल प्रदेश में:** राज्य भर से शिमला के सरकारी दंत अस्पताल में सस्ते और विशेषज्ञ उपचार के लिए आने वाले मरीजों की ओपीडी जांच और नियमित दंत प्रक्रियाएं ठप हो सकती हैं। यदि प्रशासन ने समय रहते डॉक्टरों की मांगें नहीं मानीं, तो दूरदराज के जिलों से आने वाले जरूरतमंद मरीजों को महंगे निजी क्लीनिकों का रुख करना पड़ेगा।
- **शिमला में:** संजौली और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले आम नागरिकों को दंत अस्पताल में आपातकालीन और सामान्य सेवाओं के बाधित होने की समस्या झेलनी पड़ सकती है। स्थानीय दंत मरीजों को अस्पताल जाने से पहले ओपीडी संचालन की स्थिति की पुष्टि कर लेनी चाहिए।
- **मेडिकल छात्रों और डॉक्टरों पर:** उच्च शिक्षा ले रहे रेजिडेंट डॉक्टरों की वित्तीय स्थिति तीन महीने से मानदेय न मिलने के कारण गंभीर रूप से डगमगा गई है। अपने हक का पैसा पाने के लिए पढ़ाई और क्लीनिकल ड्यूटी छोड़कर उन्हें प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
- **मरीजों के खर्च पर:** सरकारी अस्पताल में बुनियादी उपचार सामग्री का अभाव होने से कई प्रक्रियाओं में मरीजों के खर्च और प्रतीक्षा समय में बढ़ोतरी हो सकती है। डॉक्टरों द्वारा अपनी जेब से उपकरण खरीदने की विवशता अस्पताल की मुफ्त और किफायती स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से पिछले तीन महीनों से स्टाइपेंड का भुगतान न होने, सरकारी हॉस्टल की कमी और अस्पताल में जरूरी सामान की अनुपलब्धता के कारण शुरू हुआ है।

- **तीन महीने का बकाया मानदेय:** नेशनल डेंटल कमीशन के दिशा-निर्देशों के अनुसार हर महीने के पहले सप्ताह में मानदेय मिलना चाहिए, लेकिन रेजिडेंट डॉक्टरों को तीन माह से कोई भुगतान नहीं किया गया था। प्रशासनिक स्तर पर फाइलों के लंबित रहने और अकाउंट सेक्शन द्वारा ठोस जवाब न दिए जाने से डॉक्टरों का असंतोष बढ़ गया।
- **हॉस्टल सुविधा का दीर्घकालिक अभाव:** वर्ष 1998 में कॉलेज खुलने के बाद से आज तक रेजिडेंट डॉक्टरों के लिए हॉस्टल का निर्माण नहीं हुआ। डॉक्टरों को बाहरी इलाकों में महंगे किराए पर रहना पड़ता है, जहां जंगली बंदरों के हमले जैसी सुरक्षा समस्याओं का भी उन्हें सामना करना पड़ता है।
- **उपचार सामग्री का संस्थागत संकट:** अस्पताल प्रबंधन द्वारा दंत चिकित्सा के लिए आवश्यक बुनियादी उपकरण और कंज्यूमेबल्स समय पर मुहैया नहीं कराए जा रहे थे। मरीजों की तीमारदारी सुचारू रखने के लिए डॉक्टरों को खुद अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ रहे थे, जिससे उनका आर्थिक तनाव चरम पर पहुंच गया।

## सवाल-जवाब

### 1. शिमला के सरकारी डेंटल कॉलेज में डॉक्टर विरोध प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं?
एमडीएस रेजिडेंट डॉक्टरों को पिछले तीन महीने से स्टाइपेंड नहीं मिला है और अस्पताल में मरीजों के इलाज के लिए जरूरी सामान उन्हें अपनी जेब से खरीदना पड़ रहा है।

### 2. रेजिडेंट डॉक्टरों के मानदेय को लेकर नेशनल डेंटल कमीशन के क्या नियम हैं?
एनडीसी के नियमों के अनुसार रेजिडेंट डॉक्टरों का स्टाइपेंड हर महीने के पहले सप्ताह में मिल जाना चाहिए।

### 3. डॉक्टरों को रहने के लिए क्या समस्याएं आ रही हैं?
कॉलेज में 1998 से आज तक डॉक्टरों के लिए हॉस्टल सुविधा नहीं है, जिससे उन्हें संजौली और आसपास के क्षेत्रों में किराये पर रहना पड़ता है जहां हाल ही में एक डॉक्टर पर बंदरों का हमला भी हुआ था।

### 4. यदि डॉक्टरों की मांगें पूरी नहीं हुईं तो क्या कदम उठाया जाएगा?
डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें तुरंत पूरी नहीं की गईं तो वे अस्पताल की ओपीडी सेवाएं बंद करके हड़ताल पर चले जाएंगे।

### 5. कॉलेज के प्रिंसिपल ने इस पूरे मामले पर क्या आश्वासन दिया है?
प्रिंसिपल डॉ. योगेश भारद्वाज ने कहा है कि लंबित स्टाइपेंड जारी करने की प्रक्रिया चल रही है और आवश्यक फाइलों पर हस्ताक्षर होने के बाद इसे जल्द जारी कर दिया जाएगा।

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