# 17 दिनों से बिना अन्न, सोनम वांगचुक के अनशन ने केंद्र सरकार पर बढ़ाया दबाव

> जंतर मंतर पर 17 दिन से अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक सिर्फ नमक पानी पर हैं और 8.5 किलो वजन घटा चुके हैं, वे शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और लद्दाख को छठी अनुसूची व पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** पड़ताल · **Published:** 2026-07-14 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/investigations/17-dinon-se-bina-anna-sonam-wangchuk-ke-anashana-ne-kendra-sarakara-para-barhaya-dabava-7670 · **Language:** Hindi
**Tags:** सोनम वांगचुक, भूख हड़ताल, लद्दाख, धर्मेंद्र प्रधान, छठी अनुसूची, कॉकरोच जनता पार्टी, जंतर मंतर, नीट पेपर लीक

दिल्ली के जंतर मंतर पर 59 साल के सोनम वांगचुक बीते 17 दिनों से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। वे सिर्फ नमक मिला पानी पीकर जिंदा हैं और इस दौरान उनका वजन 8.5 किलो कम हो चुका है। उनके पीछे कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी का बैनर लगा है, जिस पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफे की मांग लिखी है। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत डिपके का कहना है कि सरकार बातचीत तक करने को तैयार नहीं है और वांगचुक को मरने के लिए छोड़ दिया गया है।

## जंतर मंतर पर आंदोलन कैसे शुरू हुआ
दरअसल सीजेपी के संस्थापक अभिजीत डिपके ने 6 जून को जंतर मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया था। सोनम वांगचुक ने 2 जून को ही सोशल मीडिया पर सीजेपी के सदस्यों को देशभक्त बताते हुए उनका समर्थन कर दिया था और 6 जून को खुद भी प्रदर्शन में शामिल हो गए। बीच में यह आंदोलन थमा, फिर 20 जून को सीजेपी ने दोबारा प्रदर्शन शुरू किया। इसी दौरान वांगचुक ने दो प्रमुख मांगें रखीं, लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची का दर्जा और लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा। उन्होंने केंद्र सरकार को 27 जून तक जवाब देने की मोहलत दी और कहा कि अगर इनमें से एक भी मांग मान ली जाती है तो वे अनशन खत्म कर देंगे। जब सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं आया तो 28 जून को वांगचुक ने अखिल भारतीय छात्र संघ यानी एआईएसए के छह सदस्यों के साथ मिलकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी। वांगचुक ने कहा, मैं यहां इसलिए हूं क्योंकि मेरे पास कोई और रास्ता नहीं बचा। पिछले 40 सालों से शिक्षा मेरे दिल के करीब रही है। जब युवा शिक्षा व्यवस्था की खामियों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, तो मैं चुप कैसे रह सकता हूं।

हालांकि 13 जून को पत्रकारों से बातचीत में वांगचुक ने यह भी कहा था कि वे शिक्षा से जुड़े मुद्दे को लेकर जंतर मंतर पर बैठे हैं। उन्होंने बताया कि लद्दाख को लेकर केंद्र सरकार के साथ बातचीत आगे बढ़ रही है और ज्यादातर मुद्दों पर सहमति बन चुकी है। उनका कहना था कि बाकी बचे मसले मानसून सत्र के दौरान सुलझाए जा सकते हैं, बशर्ते सरकार की मंशा ऐसी हो।

## धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग क्यों उठ रही है
दरअसल मई में नीट परीक्षा का पेपर लीक होने के बाद परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी। इसके बाद 14 से ज्यादा नीट अभ्यर्थियों ने आत्महत्या कर ली थी। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इस पूरे मामले में शिक्षा मंत्री को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ देना चाहिए। इस पर 23 जून को धर्मेंद्र प्रधान ने पलटवार करते हुए सीजेपी को आतंकियों की बी टीम बता दिया। उन्होंने कहा कि जिन्हें लोकतंत्र ने नकार दिया है, वे अब नया रूप धरकर व्यवस्था को निशाना बना रहे हैं।

गौर करने वाली बात यह है कि भाजपा शायद ही कभी किसी मंत्री का इस्तीफा स्वीकार करती है। 2018 में मी टू आरोपों के बाद एम जे अकबर के इस्तीफे को छोड़ दें तो नरेंद्र मोदी के 12 साल के कार्यकाल में किसी केंद्रीय मंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया है। राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई का मानना है कि प्रधान का इस्तीफा सीधे तौर पर सरकार की नाकामी माना जाएगा, इसलिए इसकी संभावना बेहद कम है। अब तक भाजपा के किसी नेता ने वांगचुक की भूख हड़ताल पर कोई बयान नहीं दिया है। अभिजीत डिपके का कहना है कि किसी केंद्रीय मंत्री ने न तो वांगचुक से मुलाकात की है और न ही बातचीत का प्रस्ताव दिया है। हालांकि सूत्रों के मुताबिक जल्द ही मंत्रिमंडल में फेरबदल हो सकता है, जिसमें धर्मेंद्र प्रधान से शिक्षा मंत्रालय छिनकर उन्हें कोई और मंत्रालय या भाजपा में संगठनात्मक जिम्मेदारी दी जा सकती है।

## अनशन जारी रहा तो सेहत को कितना खतरा
डॉक्टरों के मुताबिक भूख हड़ताल के दौरान इंसान कितने दिन टिक पाएगा, यह उसके शरीर में पानी की मात्रा, फैट और कुल सेहत पर निर्भर करता है। सिर्फ नमक पानी पीने वाला व्यक्ति दो से तीन महीने तक जिंदा रह सकता है, लेकिन जब वजन 10 प्रतिशत से ज्यादा घट जाए तो चिकित्सकीय निगरानी जरूरी हो जाती है। शुरुआती दो से तीन दिनों में शरीर अपने फैट को जलाना शुरू कर देता है, जिससे तेजी से वजन गिरता है। करीब दो हफ्तों के बाद दिल, लिवर और किडनी जैसे अहम अंग कमजोर पड़ने लगते हैं। दिल्ली के सी के बिड़ला अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ अमित प्रकाश सिंह ने बताया कि करीब दो हफ्तों के उपवास के बाद दिल, लिवर और किडनी जैसे महत्वपूर्ण अंग कमजोर होने लगते हैं और यह जानलेवा भी साबित हो सकता है।

बहुत से लोगों ने वांगचुक से अनशन खत्म करने की अपील की है, लेकिन उन्होंने साफ इनकार करते हुए कहा कि जो मैंने शुरू किया है, उसे अंजाम तक पहुंचाना ही होगा। 13 जुलाई को अभिजीत डिपके ने बताया कि जब भी वे वांगचुक से अनशन खत्म करने को कहते हैं तो वे डांट देते हैं और कहते हैं कि मेरी चिंता मत करो। डिपके के मुताबिक वांगचुक को चक्कर आ रहे हैं और अब वॉशरूम तक चलकर जाना भी मुश्किल हो गया है।

## 20 जुलाई को संसद तक मार्च की तैयारी
सीजेपी ने 20 जुलाई को जंतर मंतर से संसद तक मार्च निकालने का ऐलान किया है, यही दिन मानसून सत्र की शुरुआत का भी है। वांगचुक ने लोगों से इस मार्च में शामिल होने की अपील करते हुए कहा कि जितनी ताकत बची है, उसी के साथ वे मार्च करेंगे। उनका कहना है कि हर किसी को शांतिपूर्वक घूमने और अपनी मांगें उठाने का अधिकार है। वरिष्ठ पत्रकार अरुण दीक्षित के मुताबिक केंद्र सरकार के फौरन वांगचुक की मांगें मान लेने की संभावना कम ही है। हालांकि अगर उनकी सेहत तेजी से बिगड़ती है, तो प्रशासन उन्हें अस्पताल में भर्ती कराकर जबरन अनशन खत्म भी करा सकता है।

## इरोम शर्मिला का जिक्र क्यों हो रहा है
इस तरह के लंबे अनशन की सबसे चर्चित मिसाल इरोम चानू शर्मिला हैं। इंफाल के पास कथित तौर पर असम राइफल्स की गोलीबारी में 10 आम नागरिकों की मौत के बाद उन्होंने 4 नवंबर 2000 को भूख हड़ताल शुरू की थी। उनकी मांग थी कि सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून यानी आफस्पा को खत्म किया जाए। हड़ताल के तीसरे दिन ही उन्हें आईपीसी की धारा 309 यानी आत्महत्या के प्रयास के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें अस्पताल में भर्ती कर नाक के जरिए जबरन खाना दिया जाने लगा। इंफाल के एक सरकारी अस्पताल का एक वार्ड 2016 तक अस्थायी जेल की तरह इस्तेमाल होता रहा। आखिरकार 9 अगस्त 2016 को उन्होंने अपनी 16 साल लंबी भूख हड़ताल खत्म की।

## वांगचुक का लद्दाख आंदोलन का पुराना इतिहास
वांगचुक इससे पहले भी बार बार भूख हड़ताल और पैदल मार्च के जरिए लद्दाख की मांगें उठाते रहे हैं। 26 जनवरी 2023 को उन्होंने 18 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित खारदुंग ला में पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग को लेकर पांच दिन का उपवास शुरू करने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें नजरबंद कर दिया गया। 18 से 26 जून 2023 के बीच उन्होंने लेह के एनडीएस स्टेडियम में आठ दिन की भूख हड़ताल की। सितंबर 2024 में उन्होंने लेह से करीब 130 समर्थकों के साथ लगभग एक हजार किलोमीटर लंबी दिल्ली चलो पदयात्रा निकाली, जिसे 30 सितंबर को दिल्ली पुलिस ने सिंघु बॉर्डर पर रोककर हिरासत में ले लिया। इसके बाद 5 से 21 अक्टूबर 2024 के बीच उन्होंने दिल्ली के लद्दाख भवन में एक और भूख हड़ताल शुरू की, जिसे उन्होंने गृह मंत्रालय से दिसंबर में बातचीत का आश्वासन मिलने के बाद खत्म किया। 10 सितंबर 2025 को उन्होंने लेह एपेक्स बॉडी यानी एलएबी के सदस्यों के साथ 35 दिन की भूख हड़ताल शुरू की थी। इसी दौरान 24 सितंबर 2025 को लेह में हिंसक प्रदर्शन भड़क गए, भाजपा के दफ्तर में आग लगा दी गई और पुलिस की गोलीबारी में चार प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई। इसके अगले ही दिन यानी 25 सितंबर 2025 को हिंसा भड़काने के आरोप में वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी एनएसए के तहत गिरफ्तार कर जोधपुर जेल भेज दिया गया। वे 14 मार्च 2026 को 170 दिन जेल में बिताने के बाद रिहा हुए।

## लद्दाख को छठी अनुसूची की मांग क्यों
5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया था। तभी से वांगचुक का कहना रहा है कि इस बदलाव के बाद लद्दाख के हाथ से राजनीतिक और प्रशासनिक अधिकार निकल गए हैं। उनकी मांगों में संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाना, स्थानीय भर्तियों के लिए अलग लोक सेवा आयोग बनाया जाना और लेह तथा कारगिल के लिए एक एक करके कुल दो लोकसभा सीटें और एक राज्यसभा सीट देना शामिल है। वांगचुक का तर्क है कि इन कदमों से स्थानीय निकायों को जमीन, जंगल, खेती और बाकी स्थानीय मामलों पर ज्यादा अधिकार मिल जाएंगे।

इसी बीच 13 जुलाई को लद्दाख के प्रिंसिपल सेक्रेटरी आशीष कुंद्रा ने सातों जिलों के लिए स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद यानी एएचडीसी बनाने का ऐलान किया। बताया गया कि इन परिषदों को अनुच्छेद 371 पर आधारित एक विशेष ढांचे के तहत विधायी, वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार मिलेंगे। वांगचुक ने इस बातचीत का स्वागत तो किया, लेकिन साथ ही कहा कि असली बात यह है कि इन्हें अमल में कैसे लाया जाता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि 20 जुलाई से शुरू हो रहा संसद का मानसून सत्र कोई ठोस फैसला लेकर आएगा। फिलहाल केंद्र सरकार की तरफ से वांगचुक की मांगों पर कोई आधिकारिक बयान अब तक जारी नहीं किया गया है।

## इसका आप पर असर
यह मामला सिर्फ लद्दाख तक सीमित नहीं है, इसका असर देशभर की राजनीति और परीक्षा व्यवस्था दोनों पर पड़ सकता है।

- **भारत में:** नीट पेपर लीक और छात्रों की मौतों से जुड़ी यह मांग केंद्र सरकार पर परीक्षा प्रणाली में जवाबदेही तय करने का दबाव बना सकती है, जिसका असर आने वाले वर्षों की परीक्षाओं पर पड़ सकता है।
- **लद्दाख में:** लेह और कारगिल के लोगों के लिए स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद और संभावित छठी अनुसूची का दर्जा जमीन, रोजगार और स्थानीय भर्तियों पर सीधा असर डाल सकता है।
- **दिल्ली में:** 20 जुलाई को मानसून सत्र के पहले दिन जंतर मंतर से संसद तक प्रस्तावित मार्च के चलते इलाके में यातायात और सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

## सवाल-जवाब

### 1. सोनम वांगचुक की मौजूदा भूख हड़ताल कब शुरू हुई थी?
उन्होंने 28 जून को छह एआईएसए सदस्यों के साथ अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी और अब तक वे 17 दिनों से अनशन पर हैं।

### 2. वांगचुक की मुख्य मांगें क्या हैं?
वे शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा चाहते हैं और साथ ही लद्दाख को छठी अनुसूची का दर्जा तथा पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं।

### 3. धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग क्यों उठी?
मई में नीट परीक्षा का पेपर लीक होने से परीक्षा रद्द करनी पड़ी और 14 से ज्यादा नीट अभ्यर्थियों ने आत्महत्या कर ली, प्रदर्शनकारी इसकी नैतिक जिम्मेदारी शिक्षा मंत्री पर डाल रहे हैं।

### 4. वांगचुक की सेहत पर अनशन का क्या असर पड़ा है?
वे 8.5 किलो वजन घटा चुके हैं, केवल नमक पानी पर हैं, उन्हें चक्कर आ रहे हैं और वॉशरूम तक चलना भी मुश्किल हो गया है।

### 5. क्या सरकार ने वांगचुक की मांगों पर कोई जवाब दिया है?
अब तक केंद्र सरकार की तरफ से इन मांगों पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं हुआ है, हालांकि सूत्रों के मुताबिक जल्द मंत्रिमंडल में फेरबदल हो सकता है।

### 6. 20 जुलाई को क्या होने वाला है?
सीजेपी ने मानसून सत्र के पहले दिन जंतर मंतर से संसद तक मार्च का ऐलान किया है, जिसमें वांगचुक ने लोगों से शामिल होने की अपील की है।

### 7. इरोम शर्मिला का जिक्र इस खबर में क्यों हो रहा है?
उनकी 16 साल लंबी भूख हड़ताल को लंबे अनशन का सबसे चर्चित उदाहरण माना जाता है, इसलिए वांगचुक के मामले में उसका उल्लेख हो रहा है।

### 8. लद्दाख के लिए छठी अनुसूची की मांग क्यों की जा रही है?
2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने से इलाके ने राजनीतिक और प्रशासनिक अधिकार खोए हैं, छठी अनुसूची से स्थानीय निकायों को जमीन और संसाधनों पर ज्यादा अधिकार मिलेगा।

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