# 1971 के युद्ध की गुप्त गाथा: रॉ के खुफिया मिशनों और भारतीय सेना के प्रचंड पराक्रम से 13 दिनों में कैसे घुटनों पर आया पाकिस्तान

> अप्रैल 1971 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सेना प्रमुख सैम मानेकशॉ के बीच बनी गुप्त रणनीति से लेकर 16 दिसंबर को ढाका में 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों के ऐतिहासिक आत्मसमर्पण तक, जानिए 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की पूरी कहानी।

**Type:** article · **Category:** पड़ताल · **Published:** 2026-08-02 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/investigations/1971-ke-yuddha-ki-gupta-gatha-raw-ke-khuphiya-mishanon-aura-sena-ke-parakrama-se-13-dinon-men-kaise-ghutanon-para-aya-pakistan-13014 · **Language:** Hindi
**Tags:** 1971 भारत पाकिस्तान युद्ध, बांग्लादेश मुक्ति संग्राम, रॉ गुप्त मिशन, सैम मानेकशॉ, इंदिरा गांधी, ऑपरेशन ट्राइडेंट, पीएनएस गाज़ी, ढाका आत्मसमर्पण

अप्रैल 1971 की एक शांत सुबह दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय में गजब की तल्खी देखने को मिल रही थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चेहरा गुस्से से लाल था और उनके सामने भारतीय थल सेना के प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ बैठे हुए थे। पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना का कत्लेआम जारी था और लाखों शरणार्थी भारत की सीमा में दाखिल हो रहे थे। इंदिरा गांधी ने स्पष्ट शब्दों में सेना प्रमुख से कहा कि उन्हें युद्ध की तैयारी के लिए जितना समय चाहिए, वह दिया जाएगा और अब पूर्ण सैन्य अभियान की रणनीति तैयार की जाए। जनरल मानेकशॉ ने भी बिना किसी झिझक के अपनी बात रखी और कहा कि उन्हें गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय या विदेश मंत्रालय से किसी भी तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप स्वीकार नहीं होगा। इंदिरा गांधी के मुस्कुराकर पूर्ण अधिकार देने का आश्वासन देने के बाद मानेकशॉ ने जीत का वादा किया और छह महीने की तैयारी का समय मांगा।

## 1971 का तनावपूर्ण मोड़: सेनाध्यक्ष और प्रधानमंत्री के बीच रणनीतिक सहमति
पूर्वी पाकिस्तान में जनरल याह्या खान की सेना हर दिन बेकसूर लोगों पर जुल्म ढा रही थी। छह महीने तक केवल चुपचाप बैठकर इंतजार करना पूर्वी पाकिस्तान की पूरी आबादी को तबाही के मुहाने पर धकेलने जैसा था। इसी दौर में अनुसंधान और विश्लेषण विंग यानी रॉ के संस्थापक और प्रमुख आर.एन. काव अपने लोधी रोड स्थित मुख्यालय में गंभीर चिंतन में डूबे हुए थे। उन्होंने अपने करीबी सहयोगी अधिकारी शंकरन नायर को बुलाकर कहा कि भारत सीधे तौर पर सैन्य आक्रमण तो नहीं कर सकता, लेकिन दुश्मन को वहां चोट पहुंचाई जा सकती है जहां उसे सबसे ज्यादा दर्द होगा। शंकरन नायर के पूछने पर कि क्या यह छापामार युद्ध होगा, काव ने सहमति जताई। रणनीति यह बनी कि भारत भागे चले आ रहे बंगाली शरणार्थियों को ही इस लड़ाई का मुख्य हथियार बनाएगा।

अगले ही दिन शंकरन नायर कोलकाता पहुंचे और गुप्त रूप से 25 शरणार्थी शिविरों का दौरा किया। सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ के सहयोग से 18 से 35 वर्ष के युवाओं को चिन्हित किया गया। इन युवाओं को आधुनिक हथियार चलाने, अचानक हमले करने, कमांडो कार्रवाई और रेडियो संचार प्रणालियों का इस्तेमाल करने का सघन प्रशिक्षण दिया गया। देखते ही देखते एक महीने के भीतर लगभग 2.5 लाख बंगाली युवा छापामार युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार हो चुके थे।

## मनोवैज्ञानिक युद्ध और वैश्विक मीडिया में पाकिस्तान की बर्बरता का भंडाफोड़
सैन्य तैयारी के साथ-साथ रॉ प्रमुख आर.एन. काव ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक और मोर्चे पर युद्ध शुरू करने की सलाह दी, जो था मनोवैज्ञानिक युद्ध। इंदिरा गांधी ने दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों और वैश्विक नेताओं को पत्र लिखकर पाकिस्तान की सेना द्वारा की जा रही बर्बरता का ब्योरा भेजा। भारतीय समाचार पत्रों में रोज उत्पीड़न की खबरें छपने लगीं और विदेशी पत्रकारों को ज़मीनी हकीकत दिखाने के लिए भारत आमंत्रित किया गया।

इसी कड़ी में 13 जून 1971 को ब्रिटेन के प्रसिद्ध समाचार पत्र द संडे टाइम्स में एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित हुई। उस रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि पूर्वी पाकिस्तान में मरने वालों की संख्या 1 लाख से अधिक हो चुकी है। रिपोर्ट में महिलाओं पर हुए अत्याचारों और बच्चों के साथ की गई हैवानियत का सच दुनिया के सामने रखा गया। इस एक रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान का असली चेहरा बेनकाब कर दिया, जिससे भारत को सैन्य कार्रवाई के लिए नैतिक और कूटनीतिक समर्थन हासिल करने में बहुत मदद मिली।

## पूर्वी बंगाल के जंगलों में छापामार कार्रवाई: ज़मीनी तैयारी का परीक्षण
जुलाई 1971 आते-आते रॉ ने जमीनी स्तर पर बंगाली लड़ाकों की तैयारी का जायजा लेने का फैसला किया। रॉ का एक अधिकारी रात के अंधेरे में पूर्वी बंगाल के एक शिविर में पहुंचा। इलाका धुएं और जलते हुए मकानों की बदबू से भरा था, क्योंकि कुछ ही घंटे पहले पाकिस्तानी सैनिकों ने वहां के गांव पर हमला करके ग्रामीणों को मौत के घाट उतारा था।

एक बंगाली छापामार कमांडर ने जलती हुई इमारत की दीवार पर चढ़कर देखा कि अंदर 10 पाकिस्तानी सैनिक मौजूद थे, जिनमें से 7 खाना खा रहे थे और 3 पहरा दे रहे थे। पास ही एक सैन्य ट्रक भी खड़ा था। 15 बंगाली लड़ाके अपनी राइफलों के साथ चुपचाप आगे बढ़े। जैसे ही एक पाकिस्तानी सैनिक की नज़र उन पर पड़ी, कमांडर ने **जय बांग्ला** का नारा लगाया और ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं। चंद मिनटों में दसों पाकिस्तानी सैनिक ढेर हो गए। लड़ाकों ने ट्रक में रखे हथियार और गोला-बारूद कब्जे में लिए और ट्रक को आग लगा दी। इस सफल अभियान को देखकर रॉ अधिकारी को भरोसा हो गया कि पाकिस्तान का विभाजन अब तय हो चुका है।

## कराची बंदरगाह का खुफिया सर्वे: डॉक्टर कवासजी और 'रॉड-मोरीआर्टी' का गुप्त मिशन
अक्टूबर 1971 तक भारत युद्ध के लिए लगभग तैयार था, लेकिन नौसेना को कराची बंदरगाह की सटीक सुरक्षा स्थिति की जानकारी चाहिए थी। दिल्ली के वॉर रूम में रक्षा मंत्री जगजीवन राम, नौसेना प्रमुख एडमिरल एस.एम. नंदा और रॉ प्रमुख आर.एन. काव की बैठक हुई। नौसेना प्रमुख ने कहा कि कराची बंदरगाह पर आधुनिक निगरानी प्रणालियां तैनात हैं और उनकी सटीक तस्वीरें चाहिए।

आर.एन. काव ने इस कठिन काम का जिम्मा शंकरन नायर को सौंपा। मुंबई में रॉ के एक एजेंट ने नायर को बताया कि दक्षिण मुंबई के एक पारसी चिकित्सक डॉक्टर कवासजी इस काम आ सकते हैं। डॉक्टर कवासजी के पास एक छोटा निजी विमान था, जिससे वह मरीजों और सामान के सिलसिले में भारत, पाकिस्तान और कुवैत के बीच उड़ान भरते थे। दो महीने पहले डॉक्टर कवासजी बिना सीमा शुल्क दिए कीमती सामान लाने के मामले में सीमा शुल्क विभाग की जांच का सामना कर रहे थे। शंकरन नायर ने अपने पुराने मित्र और कस्टम प्रमुख से बात करके गुप्त फंड से डॉक्टर का जुर्माना भरने का सौदा किया और केस बंद करने का पत्र तैयार करवाया।

नायर स्वयं मुंबई पहुंचे और डॉक्टर कवासजी के क्लिनिक में जाकर खुद को नौसेना का कर्नल मेनन बताया। नायर ने पत्र डॉक्टर के सामने रखकर साफ कहा कि यदि वह पाकिस्तान की अगली उड़ान में रॉ के दो अधिकारियों को साथ ले जाते हैं तो यह पत्र उनका होगा, वरना जांच दोबारा शुरू हो जाएगी। मजबूर होकर डॉक्टर ने सहमति दे दी। जिन दो अधिकारियों को जाना था, उन्हें छद्म नाम दिए गए थे: **रॉड** (नौसेना अधिकारी राव) और **मोरीआर्टी** (रॉड के फोटोग्राफी विशेषज्ञ मूर्ति)।

## कराची में खौफनाक पल: चेचक का बहाना और 360-डिग्री तस्वीरें
दो दिन बाद डॉक्टर कवासजी अपने विमान में रॉड और मोरियार्टी को लेकर कराची के लिए रवाना हुए। कराची बंदरगाह पर उतरते ही पाकिस्तान सीआईडी के एक निरीक्षक और दो सिपाहियों ने विमान की जांच शुरू की। जब निरीक्षक ने यात्री सूची में रॉड और मोरियार्टी का नाम देखा तो डॉक्टर कवासजी से सख्त लहजे में पूछताछ की।

डॉक्टर ने अपनी घबराहट पर काबू पाते हुए चतुराई से झूठ बोला कि यह दोनों भारतीय ईसाई हैं और दोनों को गंभीर चेचक की बीमारी है। डॉक्टर ने चेतावनी दी कि अंदर जाने पर संक्रमण फैल सकता है। चूंकि डॉक्टर सालों से कराची आ रहे थे, इसलिए सीआईडी अधिकारी ने उनकी बात पर यकीन कर लिया और बिना केबिन की जांच किए लौट गए।

रात के सन्नाटे में विमान बंदरगाह के मुहाने पर दो बड़ी चट्टानों के बीच रुका। रॉ के दोनों अधिकारियों ने केबिन की खिड़की से देखा कि सामने एक कंक्रीट का नया ढांचा बना था, जिस पर विमान रोधी तोपें और नौसैनिक जहाज तैनात थे। अगले 30 मिनट तक कैमरों के शटर लगातार बजते रहे। अगली सुबह डॉक्टर ने बाजार से अपना काम निपटाया और विमान कुवैत के लिए उड़ गया। वहां से दोनों एजेंटों ने तुरंत भारतीय दूतावास पहुंचकर रीलों को दिल्ली भेजा। दिल्ली के वॉर रूम में जब इन तस्वीरों की 360-डिग्री प्रोजेक्शन स्क्रीन पर समीक्षा की गई, तो कराची बंदरगाह की तोपों, तेल डिपो और युद्धपोतों की सटीक लोकेशन भारतीय सेना के हाथ में आ चुकी थी।

## 3 दिसंबर की रात और गाज़ी का अंत: जब पाकिस्तान ने किया पहला हमला
जब युद्ध की अंतिम तैयारियों के बीच इंदिरा गांधी ने सैम मानेकशॉ से पूछा कि क्या वे तैयार हैं, तो जनरल ने अपने चिरपरिचित अंदाज में कहा कि वह हमेशा तैयार हैं। 3 दिसंबर 1971 की शाम पाकिस्तान वायु सेना ने भारतीय हवाई अड्डों पर अचानक बमबारी शुरू कर दी। आधी रात को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ऑल इंडिया रेडियो पर देश को संबोधित करते हुए युद्ध की आधिकारिक घोषणा कर दी।

उसी रात विशाखापत्तनम के तट के पास पाकिस्तान की सबसे घातक पनडुब्बी पीएनएस गाज़ी रहस्यमय परिस्थितियों में डूब गई। गाज़ी का मकसद भारत के विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत को तबाह करना था, लेकिन रॉ ने समय रहते आईएनएस विक्रांत को अंडमान द्वीप समूह भेज दिया था। पीएनएस गाज़ी की बैटरियों को चार्ज करने के दौरान खतरनाक हाइड्रोजन गैस बन रही थी। कमांडिंग ऑफिसर ने हाइड्रोजन गैस को बाहर निकालने के लिए पनडुब्बी को सतह पर लाने की डॉक्टर की सलाह को नजरअंदाज कर दिया। आखिरकार आंतरिक विस्फोट के कारण पीएनएस गाज़ी समुद्र की गहराई में समा गई, जिससे पाकिस्तानी नौसेना की कमर टूट गई।

## ऑपरेशन ट्राइडेंट और पायथन: कराची बंदरगाह पर भारतीय नौसेना का प्रचंड प्रहार
4 दिसंबर 1971 को भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान के ठिकानों पर भीषण बमबारी शुरू की। उसी समय मुंबई से सोवियत संघ से खरीदी गई तीन ओसा-I मिसाइल नावें कराची की ओर बढ़ीं। कराची से 250 समुद्री मील की दूरी पर रडार पर संकेत मिलते ही भारतीय कमान ने मिसाइलें दागने का आदेश दिया।

भारतीय नौसेना की मिसाइलों ने पाकिस्तानी युद्धपोत पीएनएस खैबर, एक अन्य विध्वंसक जहाज और गोला-बारूद ले जा रहे व्यापारिक पोत को नष्ट कर दिया। इसके बाद मिसाइल नौकाओं ने डॉक्टर कवासजी द्वारा खींची गई तस्वीरों की मदद से कराची के मुख्य तेल डिपो पर मिसाइलें दागीं। कराची बंदरगाह के तेल के कुएं कई दिनों तक धधकते रहे। 8 दिसंबर की रात को भारतीय नौसेना ने ऑपरेशन पायथन चलाकर एक और तेल टैंकर और पीएनएस ढाका को पूरी तरह तबाह कर दिया। इस हमले ने पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच समुद्री मार्ग को पूरी तरह काट दिया।

## आईएनएस खुकरी की शहादत: 9 दिसंबर की रात का दुखद मोड़
8 दिसंबर की रात भारतीय नौसैनिक जहाज आईएनएस खुकरी कराची की ओर से आ रही पाकिस्तानी पनडुब्बी पीएनएस हैंगोर की तलाश में मुंबई से निकला। 9 दिसंबर की रात 8:45 बजे जब जहाज पर सैनिक ऑल इंडिया रेडियो पर समाचार सुन रहे थे, तभी पीएनएस हैंगोर से दागी गई एक टॉरपीडो आईएनएस खुकरी से टकराई।

दूसरे धमाके से जहाज की बिजली गुल हो गई और उसमें तेजी से पानी भरने लगा। कप्तान मल्ला और उनकी टीम ने अंतिम क्षणों तक बहादुरी से काम लिया। महज कुछ ही मिनटों में आईएनएस खुकरी जलसमाधि ले चुका था। इस घटना में कैप्टन मल्ला, 17 अधिकारी और 176 नाविक शहीद हो गए। यह 1971 के युद्ध में भारत का एकमात्र नौसैनिक जहाज था जो दुश्मन के हमले में डूबा।

## मेघना नदी पर एयरलिफ्ट और टांगैल एयरड्रॉप: ढाका पर अंतिम धावा
जमीनी मोर्चे पर पूर्वी पाकिस्तान के दलदली इलाकों और टूटे पुलों के कारण भारतीय सेना की प्रगति धीमी हो रही थी। पाकिस्तानी सेना ने ढाका जाने वाले रास्तों की पुलियाओं को उड़ा दिया था। भारतीय सेना ने एक दुस्साहसिक योजना बनाई। 9 से 11 दिसंबर के बीच भारतीय वायु सेना ने 36 घंटों के भीतर 110 से अधिक हेलीकॉप्टर उड़ानों के जरिए 700 से अधिक सैनिकों को रात के अंधेरे में मेघना नदी के पार एयरलिफ्ट किया।

दूसरी ओर, 11 दिसंबर को टांगैल में भारतीय सेना की एक पूरी पैराशूट बटालियन को हवा से उतारा गया। टांगैल से ढाका का रास्ता बिना किसी बड़ी नदी के बिल्कुल साफ था। भारतीय सेना और मुक्ति वाहिनी ने 16 दिसंबर तक ढाका को चारों तरफ से घेर लिया।

## 16 दिसंबर 1971: ऐतिहासिक आत्मसमर्पण और बांग्लादेश का जन्म
16 दिसंबर 1971 की दोपहर तक पाकिस्तानी सेना के पास समर्पण के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। ढाका के रेसकोर्स मैदान में एक ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिला, जब पाकिस्तानी कमांडर जनरल ए.ए.के. नियाजी ने भारतीय लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए।

इस ऐतिहासिक जीत के साथ 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने अपने हथियार डाल दिए। दुनिया के नक्शे पर पाकिस्तान दो हिस्सों में बंट गया और एक नए स्वतंत्र राष्ट्र बांग्लादेश का जन्म हुआ।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** 1971 के युद्ध की यह ऐतिहासिक गाथा राष्ट्रीय सुरक्षा में खुफिया एजेंसियों, नौसेना और थल सेना के समन्वय के महत्व को दर्शाती है।

**अंतरराष्ट्रीय स्तर पर:** यह घटनाक्रम दिखाता है कि कैसे रणनीतिक तैयारी और कूटनीति से दक्षिण एशिया के भूगोल और भू-राजनीति को बदला गया।

## सवाल-जवाब

### 1. 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की शुरुआत कब हुई और यह कितने दिन चला?
यह युद्ध 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान द्वारा भारतीय हवाई अड्डों पर हमले के बाद शुरू हुआ और 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के साथ केवल 13 दिनों में समाप्त हो गया।

### 2. कराची बंदरगाह की खुफिया तस्वीरें किसने और कैसे हासिल की थीं?
रॉ के अधिकारियों (राव और मूर्ति) ने दक्षिण मुंबई के पारसी डॉक्टर कवासजी के निजी विमान में जाकर चेचक का बहाना बनाकर कराची बंदरगाह की तोपों और डिपो की 360-डिग्री तस्वीरें ली थीं।

### 3. पाकिस्तानी पनडुब्बी पीएनएस गाज़ी कैसे नष्ट हुई थी?
विशाखापत्तनम के पास आईएनएस विक्रांत का इंतजार कर रही पीएनएस गाज़ी में बैटरियों से निकली हाइड्रोजन गैस का अत्यधिक निर्माण हो गया था, जिससे हुए आंतरिक विस्फोट में वह डूब गई।

### 4. ऑपरेशन ट्राइडेंट क्या था?
4 दिसंबर 1971 की रात भारतीय नौसेना की मिसाइल नौकाओं द्वारा कराची बंदरगाह पर किया गया प्रचंड हमला ऑपरेशन ट्राइडेंट था, जिसमें पाकिस्तानी युद्धपोत पीएनएस खैबर और तेल डिपो नष्ट कर दिए गए थे।

### 5. 1971 के युद्ध में भारत का कौन सा नौसैनिक जहाज डूबा था?
9 दिसंबर 1971 को गुजरात तट के पास पाकिस्तानी पनडुब्बी पीएनएस हैंगोर के टॉरपीडो हमले में आईएनएस खुकरी डूबा था, जिसमें कैप्टन मल्ला समेत 194 नौसैनिक शहीद हुए थे।

### 6. 16 दिसंबर 1971 को ढाका में कितने पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया था?
ढाका के रेसकोर्स मैदान में पाकिस्तानी जनरल ए.ए.के. नियाजी ने 93,000 सैनिकों के साथ भारतीय सेना के सामने ऐतिहासिक आत्मसमर्पण किया था।

## प्रेरणा और सबक
**1. नेतृत्व में निडरता और स्पष्टता:** सैम मानेकशॉ ने रणनीतिक स्वायत्तता की शर्त रखकर दिखाया कि सफलता के लिए बिना हस्तक्षेप के काम करना कितना जरूरी है।

**2. सीमित संसाधनों में आउट-ऑफ-द-बॉक्स सोच:** रॉ के अधिकारियों ने पारसी डॉक्टर के माध्यम से खुफिया जानकारी जुटाकर साबित किया कि बुद्धिमत्ता से बड़ी से बड़ी बाधा दूर की जा सकती है।

**3. धैर्य और सही समय का चयन:** छह महीने तक धैर्यपूर्वक तैयारी करके भारत ने 13 दिनों के भीतर निर्णायक विजय हासिल की।

**4. दबाव में साहसिक निर्णय:** रात के अंधेरे में मेघना नदी पार एयरलिफ्ट और कराची पर साहसिक नौसैनिक हमले दिखाते हैं कि जोखिम लेने से ही बड़ी जीत मिलती है।

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