# अयोध्या फैसले के 7 साल बाद भी धन्नीपुर मस्जिद का निर्माण ठप, फंड की कमी और सरकारी मंजूरी बनी रुकावट

> सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मिली 5 एकड़ जमीन पर धन्नीपुर में बाबरी मस्जिद का निर्माण कार्य फंड की भारी कमी और प्रशासनिक मंजूरियों के अभाव के कारण अधर में लटका हुआ है।

**Type:** article · **Category:** पड़ताल · **Published:** 2026-07-27 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/investigations/ayodhya-phaisale-ke-7-sala-bada-bhi-dhannipur-masjida-ka-nirmana-thapa-phnda-ki-kami-aura-sarakari-mnjuri-bani-rukavata-10662 · **Language:** Hindi
**Tags:** अयोध्या, धन्नीपुर मस्जिद, बाबरी मस्जिद, सुप्रीम कोर्ट, अयोध्या विकास प्राधिकरण, इंडो इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन

नवंबर 2019 में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद दो अलग-अलग रास्ते तय किए गए थे। अदालत ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन हिंदू पक्ष को सौंपी थी, जबकि मस्जिद निर्माण के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को अयोध्या से लगभग 25 किलोमीटर दूर धन्नीपुर गांव में 5 एकड़ जमीन आवंटित करने का निर्देश दिया था। आज जहां राम मंदिर का निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका है, वहीं धन्नीपुर में मस्जिद परिसर की जगह एक ईंट भी नहीं रखी जा सकी है। आवारा पशुओं से बचाव के लिए लगाई गई बाउंड्री और लोहे की घेराबंदी के बीच वहां अब सिर्फ घास उगी हुई है, जहां स्थानीय बच्चे क्रिकेट खेलते नजर आते हैं।

इस 5 एकड़ जमीन पर सिर्फ एक मस्जिद ही नहीं, बल्कि एक आधुनिक अस्पताल, मेडिकल कॉलेज और संग्रहालय बनाने का बड़ा खाका तैयार किया गया था। इस पूरी वृहद परियोजना के लिए करीब 300 करोड़ रुपये के बजट का आकलन किया गया था। हालांकि, पिछले पांच वर्षों के दौरान इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन ट्रस्ट को दान के रूप में केवल 1.5 करोड़ रुपये ही प्राप्त हो सके हैं। फंड के संकट के साथ-साथ विकास प्राधिकरण से अनिवार्य सरकारी अनुमतियां और अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) न मिलने की वजह से काम की शुरुआत ही नहीं हो पाई। अब ट्रस्ट अपने पिछले विशाल प्रोजेक्ट को छोटा करके एक साधारण मस्जिद बनाने की योजना पर काम कर रहा है, जबकि स्थानीय ग्रामीण निर्माण की उम्मीद लगभग छोड़ चुके हैं।

## धन्नीपुर में खाली पड़ा है 5 एकड़ का प्लॉट
अयोध्या-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग से हटकर धन्नीपुर गांव का रास्ता जाता है। लगभग तीन हजार की आबादी वाले इस गांव में 60 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी है। गांव की मुख्य सड़क से कुछ ही दूरी पर बाईं ओर लोहे की जालीदार बाउंड्री से घिरा वही 5 एकड़ का मैदान दिखाई देता है। इस मैदान के भीतर कोई निर्माण मशीनरी या मजदूर मौजूद नहीं हैं। खाली पड़े इस भूखंड के ठीक सामने रहने वाले माजिद खान बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जब गांव में अस्पताल और मस्जिद बनने की खबर आई थी, तो स्थानीय लोगों में काफी खुशी थी।

धन्नीपुर और आसपास के 30 किलोमीटर के दायरे में कोई बड़ा और आधुनिक अस्पताल मौजूद नहीं है। आपातकालीन स्थिति या गंभीर बीमारी के इलाज के लिए गांव के लोगों को 150 किलोमीटर दूर लखनऊ जाना पड़ता है। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि इस बहुउद्देश्यीय परियोजना से गांव में स्वास्थ्य सुविधाएं, रोजगार और बच्चों के लिए पढ़ाई के अवसर पैदा होंगे। लेकिन सात साल बीत जाने के बाद भी जमीन पर कोई काम शुरू नहीं हो सका, जिससे स्थानीय लोगों का उत्साह अब निराशा में बदल गया है।

## फंड का गंभीर संकट और पहला दान देने वाले की निराशा
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 3 अगस्त 2020 को तत्कालीन फ़ैज़ाबाद (अयोध्या) के जिलाधिकारी अनुज कुमार झा ने आधिकारिक तौर पर यह जमीन सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को सौंपी थी। इसके बाद मस्जिद, अस्पताल और सांस्कृतिक केंद्र के निर्माण के लिए इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन नामक ट्रस्ट का गठन किया गया। अगस्त 2021 में ट्रस्ट ने देश-विदेश के लोगों से वित्तीय मदद की अपील करते हुए बैंक खातों की जानकारी सार्वजनिक की थी। हालांकि, नवंबर 2022 तक पूरे देश से महज 40 लाख रुपये का दान ही इकट्ठा हो सका था।

इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन के अध्यक्ष जुफ़र अहमद फ़ारूक़ी का कहना है कि पांच सालों की तमाम कोशिशों के बावजूद ट्रस्ट कुल मिलाकर 1.5 करोड़ रुपये ही जुटा पाया है। इतने कम बजट में 300 करोड़ रुपये की विशाल परियोजना का निर्माण संभव नहीं है। इसी वजह से ट्रस्ट ने अब आम जनता से बड़े पैमाने पर चंदा मांगने के बजाय अपने आंतरिक संसाधनों और सहयोगियों से 5 करोड़ रुपये जुटाकर एक छोटे स्तर की मस्जिद का निर्माण शुरू करने का फैसला किया है।

परियोजना की शुरुआत में लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रोहित श्रीवास्तव ने पहला दान देते हुए 21 हजार रुपये की राशि दी थी। अपनी दी हुई राशि के बावजूद जमीन पर कोई प्रगति न होने से वह काफी दुखी हैं। प्रोफेसर श्रीवास्तव के अनुसार, जब भी वह राम मंदिर दर्शन के लिए अयोध्या आते हैं, तो धन्नीपुर भी जाते हैं। हर बार उन्हें वहां सिर्फ खाली पड़ा मैदान ही देखने को मिलता है, जिसका उन्हें काफी अफसोस है।

## अयोध्या शहर से दूरी और लोगों की घटती दिलचस्पी
शुरुआती दिनों में धन्नीपुर स्थित शाहगदा शाह मज़ार पर 'मोहम्मद-बिन-अब्दुल्लाह' मस्जिद के पोस्टर लगाए गए थे, जिन पर इस परियोजना को एक ऐतिहासिक रचना के रूप में प्रस्तुत किया गया था। लेकिन समय बीतने के साथ-साथ ये पोस्टर भी हटा दिए गए। ट्रस्ट से जुड़े सदस्यों का मानना है कि मस्जिद के निर्माण में देरी की एक बड़ी वजह स्थानीय समुदाय की उदासीनता भी रही है। अयोध्या और फ़ैज़ाबाद के लोगों ने इस नई जगह के प्रति वैसा जुड़ाव नहीं दिखाया जैसी उम्मीद की जा रही थी।

मस्जिद निर्माण से जुड़े पत्रकार अरशद खान का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश में अयोध्या के किसी प्रमुख स्थान पर जमीन देने की बात कही गई थी। लेकिन सरकार ने जो जमीन दी, वह शहर से 25 किलोमीटर दूर एक ग्रामीण इलाके में स्थित है। वहां तक पहुंचने वाली सड़क काफी संकरी है और वहां कोई बुनियादी ढांचा मौजूद नहीं है। शहर से इतनी दूरी होने के कारण लोग दैनिक नमाज़ या आयोजनों के लिए वहां जाने से हिचकिचाते हैं, जिससे सार्वजनिक जनसमर्थन और चंदा जुटाने की गति धीमी पड़ गई। इसके अलावा, शुरुआती दौर में मुंबई के बिजनेसमैन हाजी अराफ़ात शेख द्वारा मक्का-मदीना से पवित्र ईंटें लाने और निर्माण जल्द शुरू कराने के दावे किए गए थे, जो धरातल पर सच साबित नहीं हो सके।

## अयोध्या विकास प्राधिकरण की मंज़ूरी और कागज़ी अड़चनें
मस्जिद का नक्शा पास न होने और निर्माण अटकने के पीछे कोई राजनीतिक कारण नहीं बल्कि गंभीर प्रशासनिक व तकनीकी प्रक्रियाएं हैं। जब किसी बड़ी सार्वजनिक या व्यावसायिक इमारत का निर्माण होता है, तो नगर विकास प्राधिकरण के कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है। धन्नीपुर परियोजना के अटकने के मुख्य रूप से तीन बड़े प्रशासनिक कारण सामने आए हैं

- **भू-उपयोग (लैंड यूज़) में बदलाव:** सरकार द्वारा आवंटित की गई 5 एकड़ जमीन मूल रूप से कृषि योग्य (एग्रीकल्चरल) श्रेणी में दर्ज थी। किसी भी संस्थागत या व्यावसायिक निर्माण के लिए पहले उस जमीन का आधिकारिक भू-उपयोग बदलकर संस्थागत (इंस्टिट्यूशनल) करना अनिवार्य था। इस प्रक्रिया में काफी लंबा समय निकल गया।
- **विभिन्न विभागों से एनओसी (NOC) न मिलना:** निर्माण का नक्शा पास कराने से पहले लोक निर्माण विभाग (PWD), प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, अग्निशमन (फायर) विभाग, सिंचाई विभाग और नगर निगम से अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त करना अनिवार्य होता है। अयोध्या विकास प्राधिकरण के सचिव आरके मिश्रा के अनुसार, इमारत की ऊंचाई, सुरक्षा और अग्निशमन व्यवस्था के मानकों को पूरा किए बिना NOC जारी नहीं की जा सकती। मस्जिद समिति ने इन आवश्यक NOC को हासिल करने के लिए औपचारिक आवेदन की प्रक्रिया पूरी नहीं की।
- **विकास शुल्क का भुगतान न होना:** अनापत्ति प्रमाण पत्र मिलने के बाद विकास प्राधिकरण के इंजीनियर सड़क की चौड़ाई और भूकंप रोधी क्षमता की जांच करते हैं। इसके बाद निर्धारित लेआउट और विकास शुल्क जमा करना होता है। एडीए के अनुसार, मस्जिद समिति पर लगभग 1.22 करोड़ रुपये का विकास शुल्क बकाया है, जिसका भुगतान किए बिना नक्शे को मंजूरी देना नियम विरुद्ध है।

मस्जिद ट्रस्ट ने पहली बार 23 जून 2021 को नक्शे की मंजूरी के लिए आवेदन किया था, जिसे बाद में वापस ले लिया गया था। वर्ष 2023 में एक छोटे मस्जिद डिजाइन के साथ दोबारा आवेदन किया गया। लेकिन सितंबर 2025 तक आवश्यक एनओसी जमा न करने और पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड न करने के कारण अयोध्या विकास प्राधिकरण ने इस आवेदन को आधिकारिक रूप से निरस्त कर दिया। इस पर ट्रस्ट के महासचिव अतहर हुसैन का कहना है कि पर्याप्त फंड न होने के कारण प्रक्रिया को रोका गया है। जैसे ही आवश्यक धन जमा हो जाएगा, नए सिरे से नक्शे के लिए आवेदन जमा किया जाएगा।

## ट्रस्ट के काम पर सवाल और अंदरूनी खींचतान
बाबरी मस्जिद मामले में मुख्य पक्षकार रहे इकबाल अंसारी, जो राम जन्मभूमि परिसर के गेट नंबर 11 के सामने रहते हैं, ने इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। इकबाल अंसारी का आरोप है कि सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को मिली सरकारी जमीन पर बोर्ड के अध्यक्ष ने अपनी निजी ट्रस्ट बनाकर पूरी योजना को उलझा दिया है। हालांकि, इन आरोपों का जवाब देते हुए ट्रस्ट के महासचिव अतहर हुसैन ने कहा कि शुरुआती दिनों में टीम में समन्वय की कमी और कई व्यावहारिक अड़चनों के कारण काम प्रभावित हुआ था, लेकिन जल्द ही एक नए और स्पष्ट रोडमैप के साथ धरातल पर काम शुरू किया जाएगा।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेशों के तहत दी गई जमीनों पर सार्वजनिक परियोजनाओं के निर्माण में प्रशासनिक एनओसी और पारदर्शी फंड संग्रह की प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन अनिवार्य है।

**अयोध्या में:** धन्नीपुर गांव में 300 करोड़ रुपये का प्रस्तावित अस्पताल और मेडिकल कॉलेज न बनने से आसपास के दर्जनों गांवों के निवासियों को बेहतर स्वास्थ्य इलाज के लिए लखनऊ जाना पड़ रहा है।

## सवाल-जवाब

### 1. धन्नीपुर मस्जिद का निर्माण कार्य अब तक क्यों शुरू नहीं हो सका?
प्रोजेक्ट के लिए आवश्यक 300 करोड़ रुपये के मुकाबले केवल 1.5 करोड़ रुपये का चंदा जुटा पाना और अयोध्या विकास प्राधिकरण से नक्शा व एनओसी (NOC) न मिल पाना निर्माण शुरू न होने का मुख्य कारण है।

### 2. धन्नीपुर में मस्जिद के अलावा और क्या बनाने की योजना थी?
मस्जिद के साथ 5 एकड़ जमीन पर एक आधुनिक अस्पताल, मेडिकल कॉलेज और सांस्कृतिक संग्रहालय बनाने का प्रस्ताव तैयार किया गया था।

### 3. अयोध्या विकास प्राधिकरण (ADA) ने मस्जिद का नक्शा क्यों खारिज किया?
समिति द्वारा फायर, पीडब्ल्यूडी और प्रदूषण बोर्ड से एनओसी जमा न करने और 1.22 करोड़ रुपये के विकास शुल्क का भुगतान न करने की वजह से नक्शा खारिज किया गया।

### 4. धन्नीपुर गांव अयोध्या शहर से कितनी दूरी पर स्थित है?
धन्नीपुर गांव अयोध्या शहर और राम जन्मभूमि मंदिर परिसर से लगभग 25 किलोमीटर दूर लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग के पास स्थित है।

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