बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता पर जनता का फैसला, गाजा युद्ध और सेना भर्ती विवाद के बीच नई संसद चुनने निकला इजरायल इजरायल में करीब 19 साल तक सत्ता संभालने वाले बेंजामिन नेतन्याहू कड़े चुनावी इम्तिहान का सामना कर रहे हैं, जहां 7 अक्टूबर 2023 के सुरक्षा संकट, अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स सैन्य छूट और अरब पार्टियों की भूमिका पर सबकी नजरें टिकी हैं। इजरायल की राजनीति आज एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है, जहां 27 अक्टूबर को देश भर के मतदाता यह तय करने के लिए मतदान कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अपनी सत्ता बरकरार रखेंगे या देश में एक नए नेतृत्व की शुरुआत होगी। लगभग 19 वर्षों तक प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहे नेतन्याहू के इस कार्यकाल के दौरान इजरायल ने बीते तीन वर्षों में ईरान, गाजा और लेबनान में कई मोर्चों पर युद्ध लड़े हैं। यह पूरा संघर्ष 7 अक्टूबर 2023 को हमास की ओर से किए गए घातक हमले के बाद भड़का था, जिसमें 1,200 से अधिक लोगों की जान चली गई थी। इजरायल के पास एक बेहद ताकतवर सैन्य ढांचा और आधुनिक खुफिया तंत्र होने के बावजूद वह हमला पहले से पकड़ा नहीं जा सका, जिसने नेतन्याहू के पूरे नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। अब पीड़ित परिवारों की ओर से व्यापक जांच की मांग की जा रही है और सुरक्षा की यह जवाबदेही वर्तमान चुनाव का सबसे अहम मुद्दा बन चुकी है। सड़क पर सन्नाटा और सोशल मीडिया पर चुनावी अभियान भारत की पारंपरिक चुनावी हलचलों की तुलना में इस बार इजरायल में चुनावी प्रचार का अंदाज एकदम अलग नजर आ रहा है, जहां सड़कों पर बड़े पोस्टर, बैनर या रैलियां बहुत कम दिखाई दे रही हैं और मुख्य जोर सोशल मीडिया पर दिया जा रहा है। तेल अवीव के पास स्थित 272,000 की आबादी वाले शहर पेताह तिकवा में, जहां 2022 के चुनाव में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को 28% वोट मिले थे, मतदान के दिन करीब होने के बावजूद सड़कों पर कोई बैनर या पोस्टर नहीं दिखा। स्थानीय दुकानदारों के अनुसार पिछले वर्षों की तुलना में इस बार का चुनाव प्रचार काफी शांत है और लोग अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं पर खुलकर बात करने से बच रहे हैं। स्थानीय निवासी शेली बोल्कोविच के लिए देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ घर के बढ़ते खर्चे सबसे बड़ा चुनावी सवाल हैं। उनका कहना है कि रोजमर्रा की जरूरी वस्तुएं और सार्वजनिक परिवहन पहले से कहीं अधिक महंगे हो चुके हैं, जिससे आम लोगों का जीवन कठिन हो रहा है। वह एक ऐसी सरकार चाहती हैं जो अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी को आसान बनाने और ईरान जैसी बाहरी सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए एक ठोस योजना पेश कर सके। भारत के साथ रिश्तों और नए भविष्य की उम्मीदें इजरायल में बीते 25 वर्षों से रह रहीं शेली अब्राहम को उम्मीद है कि चुनाव के बाद आने वाली नई सरकार भारत के साथ संबंधों को और मजबूत करेगी। उनका कहना है कि भारत से बड़ी संख्या में लोग काम के सिलसिले में इजरायल आते हैं, इसलिए दोनों देशों के बीच आपसी सहयोग का यह सिलसिला लगातार जारी रहना चाहिए। वह व्यक्तिगत रूप से किसी भी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करती हैं। वहीं लॉरेन डागन अमोस का मानना है कि नेतन्याहू ने अपने कार्यकाल में अच्छा काम किया है, लेकिन अब देश को एक नई दिशा की सख्त जरूरत है। उनके अनुसार इजरायल को अब एक ऐसी सरकार की आवश्यकता है जो नागरिकों में नई उम्मीद जगाए, भविष्य के लिए एक स्पष्ट दृष्टिकोण रखे और पड़ोसी देशों के साथ-साथ पूरी दुनिया के साथ रिश्तों को बेहतर बनाए। 61 सीटों का जादुई आंकड़ा और अरब पार्टियों की भूमिका इजरायल के इस चुनाव में मुख्य रूप से तीन बड़े खेमे मैदान में हैं, जिनमें नेतन्याहू का गठबंधन, विपक्षी दल और अरब पार्टियां शामिल हैं। चुनाव पूर्व सर्वेक्षण एक बेहद करीबी मुकाबले की ओर इशारा कर रहे हैं, जिसमें किसी भी बड़े खेमे को संसद में बहुमत के लिए आवश्यक 61 सीटों का आंकड़ा अपने दम पर मिलता नहीं दिख रहा है। ऐसे हालात में छोटे दल और अरब पार्टियां सरकार गठन में बेहद निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। चुनाव से पहले चैनल 13 के एक सर्वेक्षण ने नेतन्याहू विरोधी दलों को 54 सीटें, उनके सहयोगी दलों को 50 सीटें और अरब पार्टियों को 16 सीटें मिलने का अनुमान जताया था। हालांकि ये केवल अनुमान हैं और अंतिम परिणाम नहीं, लेकिन यदि ये आंकड़े सही साबित होते हैं तो छोटे और अरब गुट किंगमेकर बन सकते हैं। इजरायल की कुल आबादी में अरब नागरिक लगभग 18% हैं, और संसद में उनका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि उनकी पार्टियां कितनी एकजुट रहती हैं और कितना वोट हासिल करती हैं। मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली यूनाइटेड अरब लिस्ट, जिसे राम भी कहा जाता है, पहले भी गठबंधन से बाहर रहकर नेतन्याहू विरोधी सरकार को समर्थन दे चुकी है। इजरायल की संसदीय व्यवस्था में किसी भी दल को संसद में प्रवेश पाने के लिए कुल मतदान का कम से कम 3.25% वोट हासिल करना अनिवार्य होता है, जिसे चुनावी सीमा कहा जाता है। जो पार्टियां इस आंकड़े को पार नहीं कर पातीं, उन्हें कोई सीट नहीं मिलती, जिससे चुनाव का पूरा गणित बदल सकता है। 7 अक्टूबर की नाकामी और अनिवार्य सैन्य सेवा का गहरा विवाद लंबे समय से इजरायल में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार हरिंदर मिश्रा का कहना है कि जहां नेतन्याहू के समर्थक उनके युद्धकालीन फैसलों को एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करते हैं, वहीं आलोचक लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि हमास के हमले के दौरान सुरक्षा तंत्र पूरी तरह नाकाम क्यों रहा। इस वजह से युद्ध का प्रभाव सभी मतदाताओं पर एक समान नहीं पड़ रहा है। इसके साथ ही नेतन्याहू को न सिर्फ विपक्ष का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि अपने समर्थकों और गठबंधन सहयोगियों को भी साधे रखना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। इस पूरे चुनाव में सैन्य सेवा का मुद्दा सबसे विवादित विषय बनकर उभरा है। इजरायल में 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले अधिकांश नागरिकों के लिए सेना में सेवा देना कानूनी रूप से अनिवार्य है। हालांकि, देश की कुल आबादी का करीब 10% हिस्सा माने जाने वाले अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स यहूदी धार्मिक छात्रों को लंबे समय से इस अनिवार्य सेवा से छूट मिलती रही है। हमास के साथ शुरू हुए युद्ध के बाद यह मांग बेहद तेज हो गई है कि देश की रक्षा का यह सैन्य दायित्व समाज के हर वर्ग में बराबरी से साझा किया जाना चाहिए। नेतन्याहू के लिए यह मामला बेहद संवेदनशील है, क्योंकि उनकी सरकार यूनाइटेड तोराह जुडाइज्म और शास जैसी अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स पार्टियों के समर्थन पर ही टिकी रही है। विपक्ष की चुनौती और गाड़ी ईसेनकोट का उभार इस चुनाव में नेतन्याहू के सबसे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी विपक्षी नेता गाड़ी ईसेनकोट हैं, जो पूर्व सेना प्रमुख रहे हैं और प्रधानमंत्री पद के मजबूत दावेदारों में गिने जा रहे हैं। सेना में 41 वर्षों तक अपनी सेवाएं देने के बाद उन्होंने एक साल पहले अपनी नई राजनीतिक पार्टी का गठन किया था। गाजा युद्ध शुरू होने के महज दो महीने बाद ही उनके बेटे की युद्ध में जान चली गई थी। मिजराही यहूदी समुदाय से आने वाले ईसेनकोट अपनी सख्त सैन्य पृष्ठभूमि और सभी नागरिकों के लिए समान सैन्य दायित्व की वकालत करने के लिए जाने जाते हैं। वरिष्ठ पत्रकार हरिंदर मिश्रा का मानना है कि चुनाव में गाड़ी ईसेनकोट की छवि बेहद अहम साबित हो सकती है, क्योंकि उनका व्यापक सैन्य अनुभव और सेना में सबकी बराबरी की हिस्सेदारी का रुख मतदाताओं को आकर्षित कर सकता है। हालांकि, मिश्रा के अनुसार विपक्ष के लिए सबसे पहली चुनौती नेतन्याहू से नाराज मतदाताओं को अपने पाले में लाना है, और उसके बाद अलग-अलग विचारधारा वाले दलों को एकजुट करके सरकार बनाना होगा। केवल नेतन्याहू के खिलाफ उपजा गुस्सा ही विपक्ष को बहुमत दिलाने की पूरी गारंटी नहीं दे सकता। इसका आप पर असर इजरायल में नई सरकार के चुनाव का सीधा असर पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिरता, प्रवासी भारतीय कामगारों के भविष्य और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ेगा। • भारतीय कामगारों पर: इजरायल में नई सरकार बनने से वहां काम करने जाने वाले हजारों भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा और रोजगार नीतियों पर असर पड़ेगा। भारत और इजरायल के बीच श्रमिक सहयोग समझौते जारी रहने से निर्माण और देखभाल क्षेत्र में काम करने वाले भारतीयों को स्थिरता मिलेगी। • पश्चिम एशिया सुरक्षा पर: गाजा, लेबनान और ईरान से जुड़े क्षेत्रीय संघर्षों पर इजरायल की आगामी रणनीति नई संसद की संरचना पर निर्भर करेगी। यदि दक्षिणपंथी गठबंधन कमजोर पड़ता है, तो सैन्य फैसलों और संभावित युद्धविराम की दिशा में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। • कच्चे तेल की कीमतों पर: क्षेत्र में युद्ध या शांति के नए फैसले सीधे वैश्विक तेल बाजार और शिपिंग मार्गों की सुरक्षा को प्रभावित करेंगे। नई सरकार द्वारा क्षेत्रीय तनाव घटाने से कच्चे तेल के भाव और वैश्विक आयात खर्च स्थिर रह सकते हैं। • इजरायली समाज पर: अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स समुदाय की अनिवार्य सैन्य सेवा में छूट खत्म होने से इजरायल के सामाजिक ढांचे में बड़ा बदलाव आएगा। 18 वर्ष के युवाओं और उनके परिवारों के लिए सैन्य दायित्व का बोझ अधिक समान रूप से बंट सकेगा। ऐसा क्यों हुआ यह चुनाव 7 अक्टूबर के भारी सुरक्षा झटके, नेतन्याहू के खिलाफ उपजे जनआक्रोश और गठबंधन के भीतर सैन्य सेवा छूट को लेकर पैदा हुए गहरे मतभेदों के कारण कराया जा रहा है। • सुरक्षा विफलता का दबाव: हमास के 7 अक्टूबर 2023 के हमले में 1,200 से अधिक लोगों की जान चली गई थी, जिसे इजरायल का सुरक्षा तंत्र पहले से भांपने में नाकाम रहा। पीड़ित परिवारों और जनता की ओर से इस नाकामी की सख्त जवाबदेही और निष्पक्ष जांच की मांग ने इस चुनाव की नींव रखी। • सैन्य सेवा में छूट का विवाद: इजरायल में 18 वर्ष के युवाओं के लिए सेना में भर्ती अनिवार्य है, लेकिन 10% अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स छात्रों को लंबे समय से इससे छूट मिलती रही है। युद्ध लंबा खिंचने के बाद आम जनता में इस विशेषाधिकार के खिलाफ गुस्सा भड़का, जिसने नेतन्याहू के गठबंधन सहयोगियों को मुश्किल में डाल दिया। • गठबंधन का चुनावी गणित: 61 सीटों के जरूरी बहुमत के अभाव में नेतन्याहू और विरोधी खेमे दोनों को छोटे व अरब दलों की जरूरत है। राजनीतिक समीकरणों के उलझने और पूर्व सेना प्रमुख गाड़ी ईसेनकोट के मैदान में उतरने से मुकाबला बेहद कड़ा हो गया। सवाल-जवाब 1. इजरायल में मतदान किस तारीख को हो रहा है? इजरायल में नई संसद और सरकार चुनने के लिए मतदान 27 अक्टूबर को हो रहा है। 2. बेंजामिन नेतन्याहू कितने समय से प्रधानमंत्री पद पर रहे हैं? बेंजामिन नेतन्याहू लगभग 19 वर्षों से इजरायल के प्रधानमंत्री पद पर रहे हैं। 3. इजरायल की संसद में सरकार बनाने के लिए कितनी सीटों के बहुमत की जरूरत होती है? इजरायल की संसद में सरकार बनाने और पूर्ण बहुमत हासिल करने के लिए 61 सीटों की आवश्यकता होती है। 4. चैनल 13 के चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में किस खेमे को कितनी सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया था? चैनल 13 के सर्वेक्षण में नेतन्याहू विरोधी दलों को 54 सीटें, उनके सहयोगियों को 50 सीटें और अरब पार्टियों को 16 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया था। 5. विपक्ष के मुख्य दावेदार गाड़ी ईसेनकोट कौन हैं? गाड़ी ईसेनकोट इजरायल के पूर्व सेना प्रमुख हैं, जिन्होंने 41 साल सेना में बिताने के बाद एक साल पहले अपनी नई पार्टी बनाई थी। 6. इजरायल में किसी पार्टी को संसद में प्रवेश पाने के लिए न्यूनतम कितने वोट की जरूरत होती है? इजरायल में चुनावी सीमा के नियम के अनुसार किसी भी पार्टी को संसद में प्रवेश के लिए कम से कम 3.25% वोट पाना अनिवार्य है। 7. इजरायल में सैन्य सेवा से किसे छूट मिलती रही है? इजरायल में करीब 10% आबादी वाले अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स यहूदी धार्मिक छात्रों को पारंपरिक रूप से अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट मिलती रही है। 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