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  "type": "article",
  "title": "बेटियों की पढ़ाई के लिए नंगे पैर दौड़ी मां, सरकारी नौकरी की तैयारी में क्यों लुट जाती है परिवारों की पूंजी",
  "summary": "महाराष्ट्र के बीड में 47 वर्षीय रमाबाई रणवीर ने बेटियों की कोचिंग और पढ़ाई की खातिर नंगे पांव 3 किलोमीटर दौड़कर 3,000 रुपये का पुरस्कार जीता, जिससे प्रतियोगी परीक्षाओं की अंतहीन दौड़ और परिवारों की आर्थिक तंगी पर नई बहस छिड़ गई है।",
  "content": "महाराष्ट्र के बीड जिले में स्थित अंबाजोगाई कस्बे में 47 साल की रमाबाई रणवीर जब सड़क पर दौड़ रही थीं, तो उनके हाथ में अपनी ही चप्पलें थीं और पैरों में कोई जूता नहीं था। उनके सामने कोई खेल पदक जीतने की ख्वाहिश नहीं थी, बल्कि उनकी निगाहें सिर्फ 3,000 रुपये के उस नकद इनाम पर टिकी थीं जिससे उनकी बेटियों की पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं का खर्च निकल सके। घरेलू रसोइया और घरों में झाड़ू-पोंछा करने वाली रमाबाई ने कभी दौड़ने की औपचारिक ट्रेनिंग नहीं ली थी। पति के निधन के बाद वे अपने परिवार का अकेला सहारा बनीं और बीड के अंबाजोगाई आकर मेहनत-मजदूरी से घर चलाने लगीं। उनकी बेटी पूजा खाकी वर्दी का सपना लिए पुलिस भर्ती की तैयारी में जुटी हैं, जबकि दूसरी बेटी आरती बीएससी आईटी की डिग्री ले रही हैं और साथ ही महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग यानी एमपीएससी की परीक्षाओं के लिए दिन-रात एक कर रही हैं।\n\nअंबाजोगाई में 29 अगस्त को इस दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन हुआ था। बारिश से भीगी सड़क पर जब उनकी चप्पलें फिसलने लगीं, तो रमाबाई ने बिना वक्त गंवाए चप्पलें हाथ में उठा लीं और गीली सड़क पर नंगे पैर दौड़ पड़ीं। अंत में उन्होंने वह रेस पूरी की और 3,000 रुपये का प्रथम पुरस्कार अपने नाम कर लिया। रमाबाई की इस दौड़ ने पूरे देश का ध्यान उस कड़वी हकीकत की तरफ खींचा है जहां भारत के लाखों साधारण परिवार सरकारी नौकरी के एक इम्तिहान की तैयारी के लिए अपनी जिंदगी भर की जमा-पूंजी और कई साल झोंक देते हैं।\n\nएक और प्रयास का वो चक्रव्यूह जिसमें फंसते हैं युवा\nप्रतियोगी परीक्षा की डगर शुरू करने वाले किसी भी छात्र की योजना बेहद सीधी दिखती है। एक साल मन लगाकर पढ़ाई करनी है, परीक्षा पास करनी है और सरकारी कुर्सी हासिल कर लेनी है। हकीकत की जमीन पर कदम रखते ही यह गणित बिगड़ने लगता है। पहले प्रयास में छात्र कुछ नंबरों के अंतर से कट-ऑफ से चूक जाता है। परिवार का स्वाभाविक हौसला सामने आता है कि जब इतनी मेहनत कर ही ली है, तो एक बार और सही। दूसरे साल की तैयारी छात्र को मुख्य परीक्षा या अगले चरण तक तो पहुंचा देती है, लेकिन अंतिम चयन फिर फिसल जाता है। इसके बाद एक साल और बीत जाता है।\n\nइसके बाद छात्र सिर्फ एक इम्तिहान तक सीमित नहीं रहता। कर्मचारी चयन आयोग यानी एसएससी, रेलवे भर्ती, प्रांतीय पुलिस, राज्य लोक सेवा आयोग और अन्य सरकारी विभागों के विज्ञापन निकलते हैं और छात्र हर जगह अर्जी लगाने लगता है। इस तरह एक परीक्षा कई परीक्षाओं में तब्दील हो जाती है और एक साल की तैयारी कई वर्षों के संघर्ष में बदल जाती है। यह चक्रव्यूह चार चरणों में गहराता है\n\n• पहला प्रयास: थोड़े नंबरों से कट-ऑफ चूकना और दोबारा तैयारी का संकल्प लेना।\n• दूसरा प्रयास: आरंभिक चरण पार कर लेना और अगले पड़ाव के लिए नया साल लगाना।\n• तीसरा प्रयास: बेहद मामूली अंतर से अंतिम चयन से बाहर होना और परिवार का कहना कि एक कोशिश और कर लो।\n• चौथा प्रयास: किसी अन्य विभाग की भर्ती का विज्ञापन आना और फिर से नए सिरे से फॉर्म भरना।\n\nमध्य प्रदेश के नर्मदापुरम के रहने वाले मनोज पाल का उदाहरण इस सफर को बयां करता है। उन्होंने वर्षों के लंबे संघर्ष और लगातार प्रयासों के बाद आखिरकार एमपीएससी राज्य सेवा परीक्षा 2024 में सफलता हासिल की।\n\nकोचिंग के अलावा कहां खर्च होती है परिवारों की गाढ़ी कमाई\nअक्सर यह मान लिया जाता है कि सरकारी नौकरी की तैयारी का मतलब सिर्फ कोचिंग की फीस भरना है, जबकि यह कुल खर्चे का एक हिस्सा भर होता है। घर से दूर किसी प्रतियोगी परीक्षा केंद्र या बड़े शहर में रहने वाले छात्र के लिए हर साल मकान का किराया, मेस का खाना, किताबों का नया जखीरा, टेस्ट सीरीज, दूर-दराज के परीक्षा केंद्रों तक आने-जाने का रेल या बस किराया और लगातार निकलने वाले परीक्षा फॉर्म की फीस का बोझ जुड़ता चला जाता है।\n\nयदि कोई अभ्यर्थी पैसे बचाने के लिए अपने घर पर रहकर भी पढ़ाई करे, तो भी उसका खर्च खत्म नहीं होता। उसे ऑनलाइन कक्षाओं के सब्सक्रिप्शन, अद्यतन अध्ययन सामग्री और बार-बार भरे जाने वाले फॉर्म पर पैसे लगाने ही पड़ते हैं। ऐसे में साधारण वेतन या मजदूरी करने वाले परिवारों के लिए हर नया साल एक भारी वित्तीय संकट लेकर आता है।\n\nघर बैठकर पढ़ाई करना क्यों नहीं होता आसान\nकागजों पर यह सोचना बहुत आसान लगता है कि अगर हाथ में स्मार्टफोन, किताबें और घर का एक कोना मिल जाए, तो कोई भी छात्र शांत मन से पढ़ाई कर सकता है। असलियत में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में छात्रों को रोजाना यह खुद तय करना होता है कि क्या पढ़ना है और कितना पढ़ना है। महीनों और सालों तक अकेले बैठकर यह कड़ा अनुशासन बनाए रखना किसी भी युवा के लिए मानसिक रूप से बेहद कठिन हो जाता है।\n\nइसके अलावा माहौल का भारी अंतर देखने को मिलता है। मध्य प्रदेश के भोपाल, राजस्थान के जैसलमेर या उत्तर प्रदेश के किसी छोटे कस्बे में घर से तैयारी कर रहे युवा के आसपास शायद ही कोई अन्य साथी उसी परीक्षा की तैयारी कर रहा हो। इसके विपरीत बड़े कोचिंग केंद्रों में सैकड़ों छात्र एक साथ बैठते हैं, पढ़ाई के समूह बनाते हैं और परीक्षा के बदलते पैटर्न पर एक-दूसरे से सूचनाएं साझा करते हैं। भारत के कोचिंग तंत्र का अध्ययन करने वाले शोधकर्ता भी मानते हैं कि यह सामाजिक जुड़ाव और साथियों का दबाव तैयारी की प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा बन जाता है।\n\nमुफ्त ई-बुक्स और यूट्यूब के बावजूद कोचिंग का अरबों का बाजार\nइंटरनेट की दुनिया में आज यूट्यूब पर अनगिनत मुफ्त व्याख्यान, पुरानी परीक्षाओं के हल किए गए प्रश्नपत्र, अध्ययन सामग्री और मॉक टेस्ट मौजूद हैं। इसके बावजूद छात्र मोटी रकम देकर कोचिंग संस्थानों में दाखिला लेते हैं। इसका कारण यह है कि कोचिंग केवल अध्ययन सामग्री नहीं बेचती, बल्कि वह माहौल और एक तय ढांचा बेचती है।\n\nकोचिंग संस्थानों में छात्रों को एक पूरा समूह मिलता है जो ठीक उसी पद के लिए मुकाबला कर रहा होता है। संस्थान उन्हें एक निश्चित समय-सारिणी देते हैं, जिसमें रोज का लक्ष्य, उसे पूरा करने की समय सीमा और अन्य प्रतियोगियों के मुकाबले उनकी रैंकिंग साफ दिखती है। प्रयागराज में एसएससी, भोपाल में एमपीएससी या राजस्थान में पुलिस भर्ती की तैयारी करने वाले किसी भी युवा को यह ढांचा अपनी अनिश्चितता दूर करने का एक मजबूत साधन लगता है। असली पेच तब फंसता है जब पहले, दूसरे और तीसरे प्रयास में भी परिणाम सकारात्मक नहीं आता।\n\nलगातार असफलताओं के बाद भी परिवार क्यों दोहराते हैं कोशिश की बात\nजब कोई छात्र अपने तीसरे प्रयास तक पहुंचता है, तब तक परिवार का उसमें केवल पैसा ही नहीं लगा होता, बल्कि कई साल और अनगिनत उम्मीदें भी बंध चुकी होती हैं। ऐसे मोड़ पर पीछे हटना किसी भी माता-पिता के लिए और ज्यादा दर्दनाक हो जाता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि शायद अगला प्रयास उनके बरसों के त्याग को एक सुरक्षित और स्थायी सरकारी नौकरी में बदल देगा।\n\nसरकारी नौकरियों में सीटों की भारी कमी और आवेदकों की अथाह भीड़ भी हर एक चयन के सामाजिक मूल्य को कई गुना बढ़ा देती है। वर्ष 2020 में केंद्र सरकार की ओर से संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, हर साल केंद्र सरकार की लगभग 1.25 लाख रिक्तियों के लिए करीब 2.5 करोड़ अभ्यर्थी परीक्षाओं में शामिल होते हैं। हालांकि हर अभ्यर्थी एक ही पद का दावेदार नहीं होता, फिर भी यह आंकड़ा नौकरियों की भारी किल्लत और नौकरी चाहने वालों की विशाल संख्या के बीच की चौड़ी खाई को पूरी तरह उजागर करता है। इसी भारी असमानता के चलते परिवारों के भीतर यह सोच जड़ जमा लेती है कि जब दो साल पहले ही लगा दिए हैं, तो थोड़ी और मशक्कत सही।\n\nइस पूरी प्रक्रिया में व्यवस्थागत पारदर्शिता पर बात करते हुए आईपीएस पंकज चौधरी ने स्पष्ट किया है कि प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणामों का समय पर आना और चयन प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता बरता जाना बेहद अनिवार्य है। फिर भी इस सब्र की एक तय सीमा होती है, क्योंकि उम्र की सीमा, प्रयासों की गिनती या परिवार की जमा-पूंजी एक दिन खत्म हो ही जाती है।\n\nजब सरकारी नौकरी का सपना टूटता है तो क्या होता है\nप्रतियोगी परीक्षाओं की इस अनवरत दौड़ से बाहर निकलने के बाद कुछ छात्र तो किसी निजी काम या अन्य करियर का रुख कर लेते हैं, लेकिन कई युवाओं के लिए सालों का यह मानसिक दबाव और असफलता का दंश बेहद गहरा असर छोड़ता है। आईसी3 इंस्टीट्यूट द्वारा राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़ों के विश्लेषण के मुताबिक, वर्ष 2013 से 2022 के बीच देश में 1 लाख से अधिक छात्रों की आत्महत्या दर्ज की गई।\n\nसर्वोच्च न्यायालय में उद्धृत एनसीआरबी के 2022 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में केवल एक वर्ष के भीतर 13,044 छात्रों ने अपनी जान दी। इनमें से 2,248 आत्महत्याओं की सीधी वजह परीक्षाओं में असफलता को बताया गया। यह आंकड़ा रोजाना औसतन लगभग 36 छात्रों द्वारा आत्महत्या करने के बराबर बैठता है, हालांकि एनसीआरबी के इन आंकड़ों में विशेष रूप से यह अलग से दर्ज नहीं है कि इनमें से कितने छात्र सिर्फ सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे थे।\n\nछात्रों पर यह जानलेवा दबाव प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रमुख केंद्रों में भी साफ देखा जा सकता है। राजस्थान विधानसभा के रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2019 से 2022 के बीच कोटा संभाग में स्कूल, कॉलेज और कोचिंग संस्थानों के 53 छात्रों की आत्महत्या दर्ज की गई। राज्य सरकार ने इन मामलों के पीछे टेस्ट के खराब प्रदर्शन, माता-पिता की अत्यधिक उम्मीदों, अकादमिक तनाव और परिवारों की आर्थिक तंगी को प्रमुख वजहों के रूप में गिनाया। हालांकि इन आंकड़ों में व्यापक स्तर पर छात्रों और परीक्षाओं का तनाव शामिल है, फिर भी यह उस अंतहीन दबाव की भयावह तस्वीर पेश करता है जो हमारे देश में परीक्षाओं के इर्द-गिर्द पनप चुका है।\n\nइसका आप पर असर\nयह घटना और इससे जुड़े आंकड़े प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों और उनके परिवारों पर पड़ने वाले गंभीर वित्तीय और मानसिक प्रभाव को रेखांकित करते हैं।\n\n• भारत में परिवारों पर असर: सरकारी नौकरियों की अंधी दौड़ में साधारण परिवारों की जीवन भर की जमा-पूंजी कोचिंग, रहने और परीक्षा फॉर्मों में खर्च हो रही है। यदि समय रहते बैकअप करियर योजना तैयार न की जाए, तो युवाओं के कई कीमती साल और आर्थिक स्थिरता पूरी तरह खतरे में पड़ सकती है।\n• महाराष्ट्र और ग्रामीण क्षेत्रों में: ग्रामीण इलाकों में रहने वाले परिवारों के पास बेटियों और बेटों की उच्च शिक्षा के लिए बुनियादी साधनों की भारी कमी बनी हुई है। छात्र-छात्राओं को राज्य स्तरीय भर्तियों के लिए सीमित संसाधनों में जूझना पड़ता है, जिससे समय पर भर्ती प्रक्रिया पूरी होना उनके अस्तित्व का सवाल बन जाता है।\n• छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर: लगातार असफलताओं और समाज की उम्मीदों के बोझ तले हर साल हजारों छात्र गंभीर तनाव और अवसाद की चपेट में आ रहे हैं। परिजनों को चाहिए कि वे सिर्फ सरकारी नौकरी को जीवन का एकमात्र पैमाना न बनाएं और बच्चों पर अतिरिक्त दबाव डालने से बचें।\n• आर्थिक योजना की जरूरत: प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए समय सीमा और बजट पहले से तय करना बेहद आवश्यक है। अनिश्चित काल तक प्रयास जारी रखने के बजाय दो या तीन प्रयासों के बाद निजी क्षेत्र या कौशल विकास की ओर कदम बढ़ाना अधिक व्यावहारिक रणनीति है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nसरकारी नौकरियों के प्रति युवाओं और परिवारों का यह भारी आकर्षण सामाजिक सुरक्षा की चाह और निजी क्षेत्र में स्थिर अवसरों की कमी के चलते बना हुआ है।\n\n• अतुलनीय प्रतिस्पर्धा और रिक्तियों की भारी कमी: देश में प्रतिवर्ष सवा लाख केंद्रीय पदों के लिए ढाई करोड़ से अधिक उम्मीदवार आवेदन करते हैं, जिससे सफलता की दर नगण्य रह जाती है। यह भारी असंतुलन छात्रों को बार-बार परीक्षा में बैठने और कई साल गंवाने के लिए विवश करता है।\n• सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा की तलाश: भारतीय समाज में सरकारी नौकरी को आर्थिक स्थिरता, पेंशन, चिकित्सा सुविधाओं और ऊंचे सामाजिक रुतबे का सबसे सुरक्षित जरिया माना जाता है। इसी कारण माता-पिता अपनी जमीन या बचत दांव पर लगाकर भी बच्चों को बार-बार मौका देने के लिए तैयार रहते हैं।\n• भर्ती परीक्षाओं में विलंब और अनिश्चितता: कई राज्यों में भर्ती परीक्षाओं की अधिसूचना से लेकर अंतिम परिणाम आने में वर्षों लग जाते हैं। प्रक्रिया के पारदर्शी और समयबद्ध न होने के कारण छात्र बीच में तैयारी छोड़ भी नहीं पाते और उनकी उम्र सीमा समाप्त होने लगती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. रमाबाई रणवीर कौन हैं और उन्होंने बीड में क्या किया?\nरमाबाई रणवीर महाराष्ट्र के बीड जिले के अंबाजोगाई में रहने वाली 47 वर्षीय महिला हैं, जो घरेलू रसोइया का काम करती हैं। उन्होंने अपनी बेटियों की पढ़ाई और कोचिंग की फीस भरने के लिए 29 अगस्त को नंगे पैर 3 किलोमीटर की दौड़ जीतकर 3,000 रुपये का पुरस्कार हासिल किया।\n\n2. रमाबाई की बेटियां किन परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं?\nउनकी एक बेटी पूजा पुलिस भर्ती की तैयारी कर रही हैं, जबकि दूसरी बेटी आरती बीएससी आईटी की पढ़ाई के साथ महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (एमपीएससी) की परीक्षा की तैयारी में जुटी हैं।\n\n3. छात्र सरकारी नौकरी की तैयारी के चक्रव्यूह में कैसे फंस जाते हैं?\nछात्र अक्सर एक साल की योजना बनाकर तैयारी शुरू करते हैं, लेकिन कट-ऑफ से थोड़े अंतर से चूकने के बाद वे बार-बार नए प्रयास करते हैं और धीरे-धीरे एसएससी, रेलवे तथा राज्य लोक सेवा जैसी कई परीक्षाओं में कई साल उलझ जाते हैं।\n\n4. सरकारी नौकरी के लिए देश में प्रतियोगिता का क्या स्तर है?\nवर्ष 2020 में केंद्र सरकार द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार, हर साल केंद्र सरकार की लगभग 1.25 लाख नौकरियों के लिए करीब 2.5 करोड़ अभ्यर्थी परीक्षाओं में शामिल होते हैं।\n\n5. कोचिंग की फीस के अलावा छात्रों का पैसा किन चीजों में खर्च होता है?\nछात्रों का पैसा कोचिंग के अलावा कमरे के किराए, भोजन, किताबों, टेस्ट सीरीज, दूर-दराज के परीक्षा केंद्रों के यात्रा खर्च और बार-बार भरे जाने वाले परीक्षा फॉर्मों पर खर्च होता है।\n\n6. देश में परीक्षा के तनाव और असफलता से जुड़ी आत्महत्याओं के क्या आंकड़े हैं?\nएनसीआरबी के 2022 के आंकड़ों के अनुसार देश में 13,044 छात्रों ने आत्महत्या की, जिनमें से 2,248 मामलों का कारण परीक्षाओं में असफलता था। वहीं आईसी3 इंस्टीट्यूट के मुताबिक 2013 से 2022 के बीच 1 लाख से अधिक छात्रों की आत्महत्या दर्ज की गई।\n\nप्रेरणा और सबक\nरमाबाई रणवीर का संघर्ष एक मां के अटूट संकल्प और अपनी बेटियों को शिक्षा के जरिए आत्मनिर्भर बनाने के जज्बे की अद्भुत मिसाल है।\n\n• साधनों के अभाव को कभी बाधा न बनने दें: पति के देहांत के बाद घरेलू रसोइया के तौर पर काम करते हुए भी रमाबाई ने बेटियों की उच्च शिक्षा को नहीं रुकने दिया। किसी भी कठिन परिस्थिति में अपने बच्चों के भविष्य के लिए आगे बढ़ते रहना ही सबसे बड़ा कर्तव्य है।\n• अड़चनों के बीच तुरंत निर्णय लेने का साहस: दौड़ते समय चप्पल फिसलने पर उन्होंने हार मानने के बजाय नंगे पैर दौड़ने का त्वरित फैसला किया। जीवन में जब परिस्थितियां प्रतिकूल हों, तो उपलब्ध साधनों के साथ पूरी ताकत झोंक देना ही सफलता दिलाता है।\n• शिक्षा के प्रति अटूट समर्पण: मात्र 3,000 रुपये के पुरस्कार के लिए नंगे पांव 3 किलोमीटर दौड़ना दिखाता है कि एक मां के लिए शिक्षा का मोल क्या है। आर्थिक तंगी चाहे जितनी बड़ी हो, शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर ही नई पीढ़ी की दिशा बदली जा सकती है।",
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  "category": "पड़ताल",
  "publishedAt": "2026-09-22",
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