छात्रों के बीच राहुल गांधी की नई सियासी दस्तक से क्या बदलेगा युवा वोटर का मिजाज राहुल गांधी ने देश के कई शहरों में छात्र संवाद कार्यक्रमों के जरिए युवा मतदाताओं को साधने की मुहिम तेज की है, जिसके जवाब में बीजेपी भी नए प्रचार अभियानों और डिजिटल रणनीतियों के साथ मैदान में उतर चुकी है। देश के सियासी परिदृश्य में युवा मतदाताओं की भागीदारी निर्णायक भूमिका निभाती रही है, और इसी वर्ग को अपने पाले में लाने के लिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार जमीनी स्तर पर सक्रियता बढ़ा रहे हैं। पिछले तीन महीनों के दौरान राजस्थान के कोटा स्थित दशहरा मैदान में सत्रह जून से लेकर उन्नीस सितंबर को मध्य प्रदेश के इंदौर में स्थित आईडीए मैदान तक पांच अलग-अलग छात्र सम्मेलनों का आयोजन किया गया। छात्रों की गूंज नाम से संचालित इस पूरी श्रृंखला के जरिए विपक्षी दल युवाओं के सीधे संपर्क में आने की कोशिश कर रहा है। इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य उन बुनियादी सवालों को उठाना है जो देश की नई पीढ़ी के भविष्य और उनकी पढ़ाई-लिखाई से जुड़े हुए हैं। राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस तरह के आयोजनों के माध्यम से कांग्रेस सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के मजबूत वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल होगी, या फिर बीजेपी अपने संगठनात्मक तंत्र के जरिए इस बढ़त को बरकरार रखेगी। छात्रों के बीच पहुंचकर चार रणनीतिक लक्ष्यों को साधने की कोशिश छात्रों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को मंच देने के पीछे एक सोची-समझी चुनावी गणित काम कर रही है। पिछले तीन लोकसभा चुनावों के आंकड़ों पर गौर करें तो अठारह से पच्चीस वर्ष आयु वर्ग के युवा मतदाताओं में से एक-तिहाई से अधिक ने हर बार बीजेपी के पक्ष में मतदान किया है। इसके विपरीत, कांग्रेस के खाते में इस युवा वर्ग का केवल बीस प्रतिशत समर्थन ही आ पाया। सीधे शब्दों में कहें तो हर तीन में से एक युवा मतदाता बीजेपी के साथ खड़ा दिखाई दिया, जबकि कांग्रेस के साथ पांच में से केवल एक युवा ही जुड़ सका। राहुल गांधी की मौजूदा रणनीति का केंद्र बिंदु बीजेपी के इसी मजबूत आधार को तोड़कर युवा मतदाताओं को अपने पाले में खींचना है। इस संवाद अभियान का दूसरा चरण सत्रह जुलाई को देहरादून में आयोजित हुआ था, लेकिन उस समय यह कार्यक्रम जनता के बीच बहुत अधिक चर्चा हासिल नहीं कर पाया था। इसके ठीक विपरीत, बीस जुलाई को संसद सत्र के पहले दिन सीजेपी द्वारा आयोजित संसद मार्च ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। संसद सत्र की शुरुआत में कांग्रेस पार्टी ने राम मंदिर के चंदे में कथित गबन के मुद्दे को प्रमुखता से उठाने की योजना बनाई थी, जबकि नीट परीक्षा में गड़बड़ी और सीजेपी के आंदोलन को प्राथमिकता नहीं दी गई थी। जैसे ही बीस जुलाई को छात्रों का आंदोलन तीव्र हुआ, पार्टी ने अपनी रणनीति में तत्काल फेरबदल किया। प्रियंका गांधी ने छात्र आंदोलन के समर्थन में आधिकारिक बयान जारी किया और अगले दिन राहुल गांधी तथा प्रियंका गांधी दोनों घायल छात्रों का हालचाल जानने अस्पताल पहुंचे। उसी दोपहर साढ़े तीन बजे प्रधानमंत्री आवास के बाहर अनशन शुरू कर दिया गया। केंद्र सरकार द्वारा प्रदर्शनकारियों की मांगें स्वीकार किए जाने के बाद यह संदेश गया कि युवा वर्ग एकजुट हो चुका है। इसी घटनाक्रम के असर के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे बड़े नेता युवाओं को संबोधित करते हुए सेल्फी शैली के वीडियो जारी करते नजर आए, जबकि वामपंथी छात्र संगठन आइसा की नेता नेहा बोरा ने भी कई बड़े शहरों में युवाओं से जुड़े विशेष सम्मेलनों का सिलसिला शुरू किया। उन्नीस अगस्त को आयोजित कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में तय किया गया कि पूरे देश में ऐसे कुल आठ सौ कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें से पहले चरण के कम से कम पच्चीस कार्यक्रमों में राहुल गांधी स्वयं उपस्थित रहेंगे। नरेंद्र मोदी के सामने युवा नेतृत्व की पहचान स्थापित करने की चुनौती उम्र के लिहाज से देखें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच बीस साल का अंतर है। सत्तरह सितंबर को नरेंद्र मोदी छिहत्तर वर्ष के हुए, जबकि उन्नीस जून को राहुल गांधी छप्पन वर्ष के पूरे हुए हैं। अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती दौर में राहुल गांधी कांग्रेस की छात्र शाखा एनएसयूआई और युवा कांग्रेस के प्रभारी महासचिव रह चुके हैं। वर्तमान समय में भी वे अपनी वेशभूषा, संवाद शैली और शारीरिक गतिविधियों के जरिए नई पीढ़ी के बीच अपनी एक खास छवि बनाने का निरंतर प्रयास करते रहते हैं। वर्ष 2022-23 की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भीषण ठंड में केवल एक सफेद टी-शर्ट पहनने का उनका फैसला लंबे समय तक चर्चा में रहा। सितंबर 2023 में जयपुर के महारानी कॉलेज की एक छात्रा के पीछे स्कूटी पर बैठकर उन्होंने यात्रा की। इसके बाद 2024 की भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान बच्चों के साथ मार्शल आर्ट का अभ्यास करना, केरल में स्थानीय मछुआरों के साथ समुद्र के पानी में छलांग लगाकर मछली पकड़ना और कन्याकुमारी के एक विद्यालय में छात्रों के साथ नाचना व दंड-बैठक करना इसी छवि निर्माण का हिस्सा माना गया। प्रयागराज के छात्र संवाद में उनकी गुलाबी कमीज और पुणे में छात्राओं के लिए आयोजित विशेष कार्यक्रम में उनकी पीली कमीज भी लोगों का ध्यान खींचने में सफल रही। इसके अलावा उन्होंने युवाओं से सीधे संवाद के लिए सोशल मीडिया पर विशेष अभियान और सवाल-जवाब सत्र भी शुरू किए। चुनावी विश्लेषक और वोटवाइब के संस्थापक अमिताभ तिवारी का मानना है कि नरेंद्र मोदी वर्ष 2013 से ही राष्ट्रीय राजनीति में युवाओं से सीधा संवाद स्थापित करते रहे हैं और राहुल गांधी का यह तरीका भी पूरी तरह नया नहीं है। फर्क केवल इतना है कि अखिल भारतीय स्तर पर एक सर्वमान्य युवा नेता की खाली जगह को भरने के लिए उन्होंने अपनी सक्रियता काफी बढ़ा दी है, क्योंकि वे इसके चुनावी लाभ को भली-भांति समझते हैं। उन राज्यों पर विशेष ध्यान जहां पार्टी दूसरे पायदान पर मौजूद है पिछले तीन महीनों के दौरान जिन पांच शहरों में छात्र संवाद आयोजित किए गए, वे पांच अलग-अलग राज्यों राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में स्थित हैं। राजस्थान, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में पार्टी मुख्य विपक्षी दल यानी दूसरे स्थान पर है। बाकी दो राज्यों में वह विपक्षी गठबंधन की हिस्सेदार है, लेकिन विधानसभा सीटों की संख्या के हिसाब से महाराष्ट्र में पांचवें और उत्तर प्रदेश में सातवें पायदान पर खड़ी है। इन पांचों राज्यों में वर्तमान में बीजेपी की सरकारें हैं और कांग्रेस वहीं पर सत्ता पक्ष को सीधी चुनौती देने की जमीन तैयार कर रही है। उन्नीस अगस्त की बैठक में यह स्पष्ट रूप से तय किया गया था कि छात्रों से जुड़े यह आयोजन सबसे पहले बीजेपी शासित राज्यों में ही होंगे। पार्टी नेतृत्व इसे आगामी विधानसभा चुनावों और वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव की पूर्व तैयारी के रूप में देख रहा है। उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल से अवध तक यानी बलिया से लेकर प्रयागराज तक एक नई यात्रा की तैयारी चल रही है, जिसके तहत गोरखपुर, कानपुर और मेरठ में भी छात्रों के बड़े सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई गई है। बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नया युवा संपर्क अभियान युवा मतदाताओं के महत्व को देखते हुए बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी अपने प्रयासों को तेज कर दिया है। छह फरवरी 2013 को राष्ट्रीय पटल पर अपनी पहचान मजबूत करते हुए नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में एक घंटे से अधिक समय का पहला भाषण दिया था। इसके तेरह साल बाद, पांच सितंबर को उन्होंने उसी कॉलेज के मंच से सैंतालीस मिनट तक छात्रों को संबोधित किया। बीजेपी ने देश भर के परिसरों में युवाओं से संपर्क के लिए एक परिसर, एक मंत्री नामक विशेष अभियान की शुरुआत की है, जिसके तहत केंद्रीय और राज्य स्तर के मंत्री सीधे शिक्षण संस्थानों में जाकर युवाओं से चर्चा करेंगे। अगस्त के महीने में बीजेपी ने दिल्ली में पैंतालीस युवा नेताओं की एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई। इस बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, महासचिव स्मृति ईरानी और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए। इस दौरान यह सुझाव सामने आया कि किसी एक समूह तक सीमित रहने के बजाय पूरे युवा वर्ग को केंद्र में रखकर काम किया जाना चाहिए। दूसरी तरफ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी स्पष्ट किया है कि युवाओं के विचारों और उनकी बातों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। इसी कड़ी में सत्तरह से उन्नीस सितंबर के दौरान उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद में सत्रह सौ युवाओं ने हिस्सा लिया, जिसे मोहन भागवत और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने संबोधित किया। सोशल मीडिया पर नए दौर की भाषा और आधुनिक संचार माध्यमों का उपयोग जंतर-मंतर पर शुरू हुए छात्र आंदोलन के दौरान ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डिजिटल मोर्चे पर कमान संभालते हुए इंस्टाग्राम पर सेल्फी वीडियो साझा करने शुरू किए और युवाओं को दोस्त कहकर संबोधित किया। इसके बाद सिलसिलेवार तरीके से कई रील्स जारी की गईं। चौबीस जुलाई को हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में प्रधानमंत्री ने सभी मंत्रियों को निर्देश दिए कि वे इंस्टाग्राम जैसे मंचों पर युवाओं से जुड़ें और उनके अनुकूल आधुनिक संवाद साधनों का प्रयोग करें। बीजेपी ने हाल ही में एक नई सोशल मीडिया टीम का गठन किया है, जिसने फेसबुक, एक्स और व्हाट्सएप की पुरानी प्रचार शैली के मुकाबले इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और रेडिट जैसे मंचों पर अपनी उपस्थिति बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया है। पार्टी की राष्ट्रीय और प्रांतीय टीमें आधुनिक संगीत, ट्रेंडिंग एडिटिंग शैलियों, पोस्टरों और व्यंग्य चित्रों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रही हैं। पांच सितंबर को श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने नई पीढ़ी की लोकप्रिय शब्दावली का इस्तेमाल किया। इसके तीन दिन बाद जब वे वडोदरा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय पहुंचे, तो मंच तक जाने के लिए विशेष रूप से बनाए गए वाई-आकार के रैंप पर चले, जहां बैकग्राउंड में चर्चित अंतरराष्ट्रीय रॉक गीत और फिल्म धुरंधर के संगीत की धुनें गूंज रही थीं। विपक्षी कार्यक्रमों पर राजनीतिक हमले और विवादित बयानों की बौछार जैसे-जैसे राहुल गांधी के कार्यक्रम आगे बढ़े, बीजेपी ने उनके आयोजन के तरीकों पर तीखे प्रहार शुरू कर दिए। महाराष्ट्र बीजेपी के प्रवक्ता नवनाथ बान ने पुणे के कार्यक्रम को पैसों की गूंज करार देते हुए आरोप लगाया कि भीड़ जुटाने के लिए कांग्रेस ने दस करोड़ रुपये खर्च किए और सोशल मीडिया प्रभावशाली व्यक्तियों को पैंतीस हजार रुपये तक का भुगतान किया गया। उन्नीस सितंबर को इंदौर के मंच पर हास्य कलाकार पुलकित मणि ने राहुल गांधी को गले लगाया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विदेशी नेताओं से मिलने के अंदाज की नकल उतारी। मंच पर मणि ने अंग्रेजी में संबोधन की नकल करते हुए हालचाल पूछा, जिस पर राहुल गांधी ने जवाब दिया कि वे ठीक हैं। इसके जवाब में मणि ने अपनी टिप्पणी की। मणि ने प्रधानमंत्री की एक पुरानी रैली के संदर्भ में माताजी को कुर्सी देने से जुड़ा संवाद भी दोहराया और बच्चों के साथ बातचीत में किए जाने वाले सिक्के वाले करतब की नकल भी की। कांग्रेस पार्टी ने जब इस वीडियो को सोशल मीडिया पर साझा करते हुए इसे विदेश नीति से जोड़ा, तो बीजेपी नेताओं ने कड़ा विरोध जताया। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि प्रधानमंत्री की दिवंगत माताजी के संदर्भ में ऐसे शब्दों का प्रयोग और उस पर राहुल गांधी की हंसी अत्यंत शर्मनाक है तथा देश की जनता यह सब देख रही है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी इस मामले में राहुल गांधी से बिना शर्त माफी की मांग की। इससे पहले अगस्त में भी एक आयोजन के दौरान राहुल गांधी ने पार्टी नेता संदीप दीक्षित को गले लगाकर प्रधानमंत्री के अंदाज की नकल की थी, जिस पर विवाद खड़ा हुआ था और दोनों दलों के बीच जमकर बयानबाजी हुई थी। छात्र राजनीति के नतीजे और युवाओं के मिजाज को लेकर विश्लेषकों की राय उन्नीस सितंबर को घोषित हुए दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के परिणामों को युवाओं के बीच दोनों दलों के प्रभाव की एक व्यावहारिक परीक्षा के रूप में देखा गया। इन चुनावों में बीजेपी समर्थित छात्र संगठन एबीवीपी ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव के तीन पदों पर विजय प्राप्त की, जबकि एनएसयूआई से बगावत करके चुनाव मैदान में उतरे निर्दलीय प्रत्याशी दीपांशु शौकीन ने उपाध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की। मुख्य विपक्षी दल की छात्र शाखा को एक भी पद नहीं मिल सका। चुनाव परिणामों के बाद बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन, केंद्रीय मंत्री अमित शाह, जेपी नड्डा और किरेन रिजिजू जैसे प्रमुख नेताओं ने अपनी प्रतिक्रियाएं दीं। दिल्ली से बीजेपी सांसद बांसुरी स्वराज ने कहा कि इन नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि युवाओं ने राष्ट्रवादी विचारधारा और एबीवीपी को चुना है तथा प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों पर भरोसा जताते हुए कांग्रेस को पूरी तरह नकार दिया है। नितिन नबीन ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह जीत सकारात्मक राजनीति में युवाओं के विश्वास का प्रमाण है। दूसरी ओर, कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास ने अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा कि छात्रों का एक बड़ा वर्ग मौजूदा सरकार के विरोध में है लेकिन वह आपस में बंटा हुआ है, जिसका सीधा लाभ सत्ता पक्ष को मिलता है। उन्होंने कांग्रेस को अपना आंतरिक ढांचा दुरुस्त करने की सलाह दी। वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने इस घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए कहा कि एनएसयूआई के बागी निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु ने रिकॉर्ड अंतर से जीत हासिल की है, इसलिए कांग्रेस को अपनी चुनावी रणनीति पर फिर से विचार करना चाहिए क्योंकि युवा मतदाता अभी भी पूरी तरह एकजुट नहीं हैं। चुनावी विश्लेषक संजय कुमार का कहना है कि देश के युवाओं में व्यवस्था को लेकर बेचैनी और असंतोष जरूर मौजूद है, लेकिन उनके समग्र राजनीतिक रुझान का सटीक आकलन करना आसान नहीं है। पूरे देश में कोई एक जैसा युवा वोट बैंक नहीं होता, क्योंकि हर राज्य में सामाजिक और स्थानीय परिस्थितियां अलग होती हैं। वहीं अमिताभ तिवारी का तर्क है कि बेरोजगारी जैसे अहम मुद्दों पर युवाओं में नाराजगी जरूर है, लेकिन कांग्रेस को इसका फायदा उठाने के लिए कई सामाजिक समीकरणों पर काम करना होगा। आरक्षण और जातिगत राजनीति के विभिन्न मुद्दों पर राजनीतिक दलों का क्या रुख रहता है, वही अंततः तय करेगा कि इस युवा वर्ग का झुकाव किस ओर होगा। इसका आप पर असर राजनीतिक दलों द्वारा युवाओं और छात्रों को केंद्र में रखकर चलाई जा रही इस होड़ का सीधा प्रभाव देश की नई पीढ़ी पर पड़ रहा है। • भारत में: राजनीतिक दलों की इस सक्रियता से युवाओं से जुड़े मुद्दों जैसे रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और शिक्षा बजट पर राष्ट्रीय विमर्श तेज होगा। छात्र और युवा मतदाता अपने बुनियादी अधिकारों और मांगों को लेकर राजनीतिक दलों से सीधी जवाबदेही मांग सकते हैं। • छात्रों के लिए: दोनों प्रमुख दलों द्वारा आयोजित किए जा रहे सम्मेलनों और संवाद सत्रों से छात्रों को अपनी समस्याएं सीधे नेतृत्व तक पहुंचाने का अवसर मिलेगा। कॉलेज परिसरों में होने वाले इन आयोजनों के माध्यम से युवा अपनी स्थानीय समस्याओं और शैक्षणिक सुविधाओं के सुधार पर बात रख सकते हैं। • युवा मतदाताओं के लिए: सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों पर राजनीतिक दलों का बढ़ता फोकस युवाओं को अधिक जागरूक और सतर्क बनाएगा। पहली बार मतदान करने वाले युवा दोनों दलों की नीतियों, वायदों और उनके काम करने के तरीकों की तुलना करके बेहतर निर्णय ले सकेंगे। • शिक्षण संस्थानों में: कैंपस आधारित आउटरीच और छात्र संघ चुनावों से कॉलेजों में संगठनात्मक गतिविधियां तेज होंगी। परिसरों में बढ़ते राजनीतिक आयोजनों से छात्रों को संवाद और नेतृत्व का अवसर मिलेगा, हालांकि उन्हें कैंपस के माहौल को शांतिपूर्ण बनाए रखने पर भी ध्यान देना होगा। ऐसा क्यों हुआ युवा मतदाताओं को लेकर शुरू हुई इस व्यापक राजनीतिक कवायद के पीछे हाल के चुनावी रुझान, प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी को लेकर फैला असंतोष और आगामी चुनावों की रणनीतिक तैयारियां मुख्य वजह हैं। • चुनाव आंकड़ों में युवा झुकाव: पिछले तीन लोकसभा चुनावों में अठारह से पच्चीस वर्ष के एक-तिहाई से अधिक युवा लगातार बीजेपी का समर्थन करते रहे हैं, जबकि कांग्रेस को केवल बीस प्रतिशत युवाओं का साथ मिला। कांग्रेस इस बड़े अंतर को पाटने के लिए छात्रों के बीच सीधी पहुंच बना रही है, जबकि बीजेपी अपने इस मजबूत आधार को सुरक्षित रखना चाहती है। • छात्र आंदोलनों की पृष्ठभूमि: नीट परीक्षा विवाद और संसद मार्च के दौरान छात्रों के बड़े विरोध प्रदर्शनों ने राजनीतिक दलों को यह अहसास कराया कि युवा वर्ग अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरने को तैयार है। इस जनआक्रोश की राजनीतिक दिशा तय करने के लिए ही विपक्षी दल ने छात्र संवाद शुरू किए और सरकार ने भी नए डिजिटल अभियानों के जरिए संपर्क बढ़ाया। • आगामी चुनावों की जमीन: कांग्रेस मुख्य रूप से उन पांच राज्यों पर ध्यान दे रही है जहां बीजेपी सत्ता में है और वह खुद मुख्य विपक्षी दल या गठबंधन का हिस्सा है। इन आयोजनों को आगामी विधानसभा चुनावों और वर्ष 2029 के आम चुनाव से पहले युवाओं के बीच संगठन मजबूत करने की दीर्घकालिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। • नेतृत्व की नई पहचान: दोनों दलों के शीर्ष नेता नई पीढ़ी से जुड़ने के लिए नए संचार माध्यमों, सेल्फी वीडियो और कैंपस संवाद का सहारा ले रहे हैं। इसका मकसद युवाओं के बीच एक प्रभावी और भरोसेमंद नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी स्वीकार्यता स्थापित करना है। सवाल-जवाब 1. छात्रों की गूंज अभियान क्या है? यह कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा विभिन्न शहरों के छात्रों और युवाओं से सीधे संवाद करने के लिए शुरू की गई कार्यक्रमों की एक विशेष श्रृंखला है। 2. पिछले तीन महीनों में यह कार्यक्रम किन शहरों में आयोजित किए गए? यह कार्यक्रम कोटा, देहरादून, प्रयागराज, पुणे और इंदौर में आयोजित किए गए। 3. कांग्रेस कार्यसमिति ने इस अभियान को लेकर क्या योजना बनाई है? पार्टी ने देशभर में ऐसे 800 कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय लिया है, जिनमें से पहले चरण के कम से कम 25 कार्यक्रमों में राहुल गांधी शामिल होंगे। 4. बीजेपी ने युवा मतदाताओं से जुड़ने के लिए कौन सा विशेष कार्यक्रम शुरू किया है? बीजेपी ने एक परिसर, एक मंत्री अभियान शुरू किया है, जिसके तहत पार्टी के मंत्री विभिन्न कॉलेजों में जाकर छात्रों से सीधे बात करेंगे। 5. डूसू चुनाव 2024 के प्रमुख परिणाम क्या रहे? एबीवीपी ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव के तीन पदों पर जीत दर्ज की, जबकि एनएसयूआई के बागी निर्दलीय प्रत्याशी दीपांशु शौकीन ने उपाध्यक्ष पद जीता। 6. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने युवाओं के लिए कहां आयोजन किया? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मध्य प्रदेश सरकार के सहयोग से उज्जैन में 17 से 19 सितंबर तक युवा धर्म संसद आयोजित की गई, जिसमें 1,700 युवा शामिल हुए। https://trendkia.com/investigations/chhatron-ke-bicha-rahul-gandhi-ki-nai-siyasi-dastaka-se-kya-badalega-yuva-votara-ka-mijaja-35355 TrendKia — Har trend, sabse pehle.