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  "type": "article",
  "title": "चीन और पाकिस्तान ने शुरू किया सीमा प्रबंधन तंत्र, भारत ने क्षेत्र पर दोहराया अपना संप्रभु दावा",
  "summary": "पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर से गुजरने वाली सीमा की देखरेख के लिए चीन और पाकिस्तान ने संयुक्त आयोग को सक्रिय किया है, जिस पर भारत अपने वैध अधिकार की बात दोहराता रहा है।",
  "content": "काराकोरम पर्वत श्रृंखला के संवेदनशील इलाके में चीन और पाकिस्तान ने एक दशक से अधिक समय पहले तय की गई व्यवस्था को जमीनी स्तर पर लागू कर दिया है। इस्लामाबाद में 16 और 17 सितंबर को बाउंड्री ज्वाइंट कमीशन की पहली औपचारिक बैठक आयोजित की गई। यह पूरी प्रशासनिक व्यवस्था उस भौगोलिक सीमा पर केंद्रित है जो पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू और कश्मीर से होकर गुजरती है। भारत इस पूरे इलाके को अपना अभिन्न अंग मानता है, इसलिए इस सीमा रेखा को एक वैध अंतरराष्ट्रीय सीमा के तौर पर स्वीकार नहीं करता। ऐसे में दोनों देशों के इस साझा कदम ने क्षेत्र की भू-राजनीतिक स्थिति पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।\n\nसंयुक्त आयोग का गठन और इसकी जिम्मेदारियां\nइस नई प्रशासनिक व्यवस्था की नींव वर्ष 2013 में रखे गए सीमा प्रबंधन प्रणाली समझौते के तहत रखी गई थी। इसी द्विपक्षीय समझौते के अनुच्छेद 45 में इस आयोग की स्थापना का स्पष्ट प्रावधान मौजूद था। करीब तेरह साल बाद हुई इस पहली बैठक का मकसद सीमा रेखा का पुनर्निर्धारण करना नहीं, बल्कि रोजमर्रा के सीमा संबंधी व्यावहारिक मसलों का संयुक्त समाधान निकालना है।\n\nयह आयोग वास्तविक नियंत्रण और आवाजाही से जुड़े कई प्रमुख क्षेत्रों में काम करेगा\n\n• सीमावर्ती इलाकों में होने वाली किसी भी अप्रिय घटना अथवा टकराव के दौरान दोनों पक्षों के बीच तुरंत तालमेल बैठाना।\n• निर्धारित चौकियों के जरिए नागरिकों और वाणिज्यिक सामान की आवाजाही को व्यवस्थित करना।\n• द्विपक्षीय व्यापार तंत्र को सुगम बनाना और सीमा पार बुनियादी ढांचे के संपर्क को बढ़ावा देना।\n\nयह ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि यह नया आयोग उस पुराने संयुक्त सीमा निर्धारण आयोग से बिल्कुल अलग है, जिसे 1963 के सीमा समझौते के तहत बनाया गया था। उस पुराने आयोग की जिम्मेदारी केवल इलाके का सर्वेक्षण करने, सीमा स्तंभ लगाने और आधिकारिक मानचित्र तैयार करने तक सीमित थी। इसके विपरीत, वर्तमान आयोग पहले से खींची गई सीमा रेखा पर प्रशासनिक तंत्र और समन्वय बनाए रखने वाला एक स्थायी मंच है।\n\nइस समय आयोग को सक्रिय करने के रणनीतिक मायने\nइस व्यवस्था को इतने लंबे अंतराल के बाद अचानक सक्रिय करने का कोई अकेला आधिकारिक कारण दोनों पक्षों की ओर से घोषित नहीं किया गया है। इसका सबसे स्पष्ट तथ्यात्मक पहलू यह है कि वर्ष 2013 से लंबित रहने के बावजूद हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार, रणनीतिक आवाजाही और बुनियादी ढांचे के विस्तार की प्राथमिकताएं काफी बढ़ चुकी हैं। दोनों सरकारों ने इस तंत्र की शुरुआत को अपनी दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी को और अधिक मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम बताया है।\n\nसीमा की वैधता पर भारत का अडिग रुख\nभारत सरकार का दृष्टिकोण इस क्षेत्र को लेकर पूरी तरह सुस्पष्ट है। भारत का कहना है कि यह पूरा भूभाग तत्कालीन जम्मू और कश्मीर रियासत तथा लद्दाख का अविभाज्य हिस्सा है। चूंकि पाकिस्तान का इस इलाके पर अनधिकृत नियंत्रण है, इसलिए भारत वहां चीन और पाकिस्तान के बीच किसी भी प्रकार की अंतरराष्ट्रीय सीमा के अस्तित्व को कानूनी रूप से खारिज करता है।\n\nमानचित्र पर भले ही चीन और पाकिस्तान की सीमाएं आपस में मिलती दिखाई देती हों, लेकिन नई दिल्ली की नजर में वह विभाजन रेखा अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार वैध नहीं है। वर्ष 1963 में जब पाकिस्तान ने चीन के साथ सीमा समझौता किया था, तभी भारत ने इसे अवैध करार देते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया था और आज भी उसी रुख पर कायम है।\n\n1963 का समझौता और शक्सगाम घाटी का हस्तांतरण\nइस पूरे विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वर्ष 1947 के विभाजन से जुड़ी है, जिसके बाद पाकिस्तान ने जम्मू और कश्मीर के एक हिस्से पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था। इसी क्षेत्र के अंतर्गत काराकोरम के उत्तर में स्थित दुर्गम शक्सगाम घाटी भी आती है। भारत इस पूरी रियासत पर अपनी संप्रभुता का दावा करता रहा है।\n\nवर्ष 1963 में पाकिस्तान ने चीन के साथ एक सीमा समझौते पर हस्ताक्षर किए। भारतीय विदेश मंत्रालय के विवरण के अनुसार, इस समझौते के जरिए शक्सगाम घाटी का लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीनी पक्ष के नियंत्रण में दे दिया गया। इस समझौते में एक बेहद असामान्य और महत्वपूर्ण शर्त भी शामिल की गई थी। दोनों देशों ने यह दर्ज किया था कि यदि भविष्य में कश्मीर विवाद का कोई अंतिम समाधान निकलता है, तो इस सीमा पर दोबारा बातचीत की जाएगी। इस औपचारिक शर्त से यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि दोनों पक्षों ने स्वयं यह स्वीकार किया था कि कश्मीर की संप्रभुता का मामला अंतिम रूप से सुलझा हुआ नहीं था।\n\nभारत के लिए इस क्षेत्र का असाधारण सामरिक महत्व\nयह इलाका मात्र वीरान और बर्फीले पहाड़ों का टुकड़ा नहीं है, बल्कि सामरिक दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील त्रि-जंक्शन पर स्थित है\n\n• भौगोलिक संप्रभुता: भारत शक्सगाम घाटी को लद्दाख का अभिन्न भूभाग मानता है और इसे चीन को सौंपे जाने के कदम को कभी मान्यता नहीं दी है।\n• सियाचिन की निकटता: यह घाटी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सियाचिन ग्लेशियर के ठीक उत्तर में स्थित है, जो भारत-चीन और भारत-पाकिस्तान दोनों की सैन्य अग्रिम चौकियों के बेहद करीब है।\n• चीन-पाकिस्तान संपर्क मार्ग: शिनजियांग प्रांत को पाकिस्तान से जोड़ने वाले बुनियादी ढांचे का लगातार विस्तार हो रहा है, जो भारत के दावे वाले क्षेत्र से होकर गुजरता है।\n\nचीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी CPEC भी इसी क्षेत्र के हिस्सों से गुजरता है। भारत ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि यह गलियारा पाकिस्तान के अवैध और जबरन कब्जे वाले भारतीय क्षेत्र से होकर निकलता है, इसलिए भारत CPEC को मान्यता नहीं देता। यह समझना भी आवश्यक है कि शक्सगाम घाटी और CPEC का मार्ग एक नहीं हैं। शक्सगाम घाटी 1963 के समझौते से जुड़ा क्षेत्र है, जबकि CPEC मुख्यतः गिलगित-बाल्टिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के अन्य हिस्सों से गुजरते हुए आगे बढ़ता है। यह गलियारा चीन की विशाल बेल्ट एंड रोड पहल यानी BRI का हिस्सा है।\n\nजमीनी हकीकत पर नए आयोग का प्रभाव\nयह नवगठित आयोग दोनों देशों के बीच सीमावर्ती मामलों के संचालन के तौर-तरीकों को तो बदल सकता है, लेकिन यह भारत के संप्रभु अधिकारों और दावों को कानूनी या कूटनीतिक रूप से प्रभावित नहीं कर सकता। वर्ष 2013 के समझौते में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित है कि यदि किसी सीमा स्तंभ को स्थानांतरित भी किया जाता है, तब भी वास्तविक सीमा रेखा में कोई फेरबदल नहीं होगा। अतः यह कदम रातों-रात कोई नई अंतरराष्ट्रीय सीमा बनाने का नहीं है, बल्कि एक ऐसे विवादित क्षेत्र में स्थायी प्रशासनिक ढांचा खड़ा करने का प्रयास है जिसे भारत सिरे से नकारता है।\n\nइसका आप पर असर\nचीन और पाकिस्तान के इस साझा प्रशासनिक तंत्र के सक्रिय होने से क्षेत्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक संतुलन पर सीधा असर पड़ सकता है।\n\n• राष्ट्रीय सुरक्षा पर: भारत की उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर दोनों पड़ोसी देशों का बढ़ता संस्थागत तालमेल सुरक्षा एजेंसियों के लिए सतर्कता बढ़ाने की मांग करता है। इससे वास्तविक नियंत्रण रेखा और नियंत्रण रेखा के आसपास निगरानी तंत्र को और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता होगी।\n• कूटनीतिक स्तर पर: अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सीमा विवाद और संप्रभुता के दावों को लेकर भारत के रुख पर वैश्विक ध्यान फिर से केंद्रित होगा। भारतीय कूटनीति इस बात पर जोर देती रहेगी कि बिना उसकी सहमति के विवादित क्षेत्र में कोई भी द्विपक्षीय ढांचा कानूनी रूप से अमान्य है।\n• सीमावर्ती व्यापार और पारगमन: शिनजियांग और गिलगित-बाल्टिस्तान के बीच माल एवं लोगों की आवाजाही अधिक सुगम होने से क्षेत्र में चीनी बुनियादी ढांचे की पकड़ मजबूत होगी। यह विकास भारत के सामरिक हितों के लिए नई चुनौतियां पेश कर सकता है।\n• क्षेत्रीय स्थिरता पर: दोनों देशों का यह स्थायी प्रबंधन तंत्र भविष्य में किसी भी सीमा संबंधी घटना से निपटने की अपनी क्षमता बढ़ाएगा। इससे द्विपक्षीय विवादों में किसी तीसरे पक्ष के दावों को नजरअंदाज करने का प्रयास साफ दिखाई देता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह संयुक्त आयोग वर्ष 2013 के द्विपक्षीय समझौते के आधार पर गठित हुआ है, जिसे दोनों देशों के बढ़ते रणनीतिक और व्यापारिक हितों को साधने के लिए अब औपचारिक रूप से सक्रिय किया गया है।\n\n• 2013 के समझौते की अनिवार्यता: चीन और पाकिस्तान ने 2013 में सीमा प्रबंधन प्रणाली समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके अनुच्छेद 45 में इस आयोग का प्रावधान था। करीब 13 वर्षों तक लंबित रहने के बाद दोनों देशों ने इस प्रशासनिक तंत्र को पहली बार इस्लामाबाद में बैठक कर क्रियान्वित किया।\n• बढ़ती आर्थिक और ढांचागत गतिविधियां: काराकोरम क्षेत्र में व्यापारिक परिवहन, नागरिकों की आवाजाही और बुनियादी ढांचे के विकास में तेजी आई है। इन बढ़ती गतिविधियों के प्रबंधन और सीमा पर संभावित घटनाओं के त्वरित समाधान के लिए दोनों पक्षों को एक औपचारिक समन्वय मंच की आवश्यकता थी।\n• 1963 के समझौते की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: वर्ष 1963 में पाकिस्तान और चीन ने एक सीमा समझौते के तहत शक्सगाम घाटी के लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चीनी नियंत्रण में स्थानांतरित किया था। उसी समझौते से बनी सीमा रेखा के दैनिक संचालन को सुव्यवस्थित रखने के लिए यह नया तंत्र अस्तित्व में लाया गया है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. चीन और पाकिस्तान के संयुक्त सीमा आयोग की पहली बैठक कब और कहां हुई?\nइस बाउंड्री ज्वाइंट कमीशन की पहली बैठक 16 और 17 सितंबर को इस्लामाबाद में आयोजित की गई।\n\n2. इस संयुक्त आयोग की स्थापना किस समझौते के तहत की गई है?\nइसकी स्थापना वर्ष 2013 में हस्ताक्षरित चीन-पाकिस्तान सीमा प्रबंधन प्रणाली समझौते के अनुच्छेद 45 के तहत की गई है।\n\n3. यह नया आयोग मुख्य रूप से क्या काम करेगा?\nयह आयोग सीमा संबंधी घटनाओं में समन्वय करने, लोगों और वस्तुओं की आवाजाही को सुगम बनाने और सीमा पार संपर्क सुधारने का काम करेगा।\n\n4. भारत इस सीमा को कानूनी रूप से मान्यता क्यों नहीं देता?\nभारत का कहना है कि यह क्षेत्र जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख का हिस्सा है जिस पर पाकिस्तान का अनधिकृत नियंत्रण है, इसलिए वहां कोई वैध अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं हो सकती।\n\n5. 1963 के समझौते के तहत पाकिस्तान ने कितना इलाका चीन को सौंपा था?\nभारतीय विदेश मंत्रालय के विवरण के अनुसार, 1963 के समझौते के तहत शक्सगाम घाटी का लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीनी नियंत्रण में दिया गया था।\n\n6. क्या चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) शक्सगाम घाटी से होकर गुजरता है?\nनहीं, CPEC और शक्सगाम घाटी अलग-अलग मार्ग हैं; CPEC मुख्य रूप से गिलगित-बाल्टिस्तान और अन्य हिस्सों से होकर पाकिस्तान में प्रवेश करता है।",
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  "category": "पड़ताल",
  "publishedAt": "2026-09-19",
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    "भारत चीन सीमा",
    "पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर",
    "शक्सगाम घाटी",
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    "लद्दाख विवाद"
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